इंद्र बाईसा का शिखरणी छंद – हिंगऴाजदानजी कविया

आदरणीय कविया हिंगऴाजदानजी विरचित इंद्र बाईसा का यह छंद अपने आप में अनूठा व अवलोकनीय है जिसमें राजस्थानी में संस्कृतंम का सुमेल कर सृजित किया है।

।।छंद-शिखरणी।।
ओऊँ तत्सत इच्छा बिरचत सुइच्छा जग बिखै।
लखै दृष्टि सृष्टि करम परमेष्टि पुनि लिखै।।
तुहि सर्जे पालै हनि संभाऴै उतपति।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवति।।1।।

क्रतध्वंसी विष्णु कमलभव जिष्णु स्तुति करै।
हिमांसू उष्णांसू पदम-पद पांसू सिरधरै।।
हगामां हमेशां बजत त्रिदवेसां नववती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।2।।

स्वक्रोधा सुसुक्षा धगधगित दक्षाधिप-सुता।
शिलौचै संभृता धजर अबधूता अदभूता।।
भुलानी भीलानी प्रगट न पिछानी पशुपति।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।3।।

बध्या चंडी चंडासुर महिष मुंडासुर बली।
बनाई निर्वीजा अचि रकत बीजासुर-अली।।
क्रुधाग्नी निस्संभा सुर भसम संभा सुरक्रती।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।4।।

त्रलोकी मैंतारी धरि तन पधारी मरूधरा।
चितारी चौरासी उर चतुरमासी उरबरा।।
सिरै नग्री सारी खुङद परवारी जगजती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।5।।

बभूतीकी टीकी निज अलिक नीकी नित बसै।
कङा डोरो मूर्ती लबंग परिपूर्ती श्रुति लसै।।
मुद्रा बाहू-साखा पुरुष पवसाखा अंगप्रती।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।6।।

सवारी शारदूला भयद त्रिशूलायुध भुजा।
जयो सिंधू जाई धनिधनि बिजाई ब्रस-धुजा।।
चढै मीढां चक्रां बल महिख बक्रां चितब्रती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।7।।

कृपाली कोपाली भ्रकृटि मतवाली गहभरी।
खगाली खप्राली चवसठी मुद्राली सहचरी।।
पत्राली छत्राली प्रणत प्रतपाली प्रकरती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।8।।

महादुष्टां मारै जित तित उबारै कवि जनां।
नहीं व्यापै नेसां कलुषित नरेशां कलपनां।।
थई हाथां थारा अडिग गढवारां बसुमती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।9।।

चहूं कुंटां चर्चा प्रथुल तव पर्चा भव पढै।
पगां चालै पंगा चरण हुय चंगा गिरि चढै।।
बधू बंध्या ध्यावै हुलर हुलरावै हरखती।
अईइंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।10।।

मुवा जीवै मांदा शरन लहि आंधा चख लहै।
तुहै त्राता तोभी संकट तव मोभी किम सहै।।
त्रकालग्या तू तो बिरद रद भूतो न भवती।
अईइंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।11।।

~~हिंगऴाजदानजी कविया

शब्दार्थः …………
क्रतध्वंसी–महादेव, कमलभव–ब्रह्मा, जिष्णु–इंद्र, हिमांसू–चंन्द्रमा, उष्णांसू–सूर्य, पांसू–रज
त्रिदवेसां–देवता, सुसुक्षा–अग्नि, दक्षाधिपसुता –सती, शिलोचै संभुता–पार्वती, बध्या–मारना,
निर्वीजा–बीजरहित,अचि–खाकर भक्षणकिया
बीजासुर अली–रक्तबीज की पंक्ति, चितारी— याद करके, चौरासी–मारवाङ का एक परगना,
अलिक–ललाट, बाहू साखा–अंगुलियां हाथकी
व्रस-धुजा—शिवकी पत्नि, पत्राली–पत्र रखने वाली, नेसां–चारणों के गांव, बसुमती–पृथ्वी,
प्रथुल–बङा, मोभी–बेटा, धरनी-धरन—रामजी के अनुज लक्ष्मणजी।।

प्रेषित: राजेंद्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर (राज.)

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