इनसे तो देव ही डरते हैं तो फिर

स्वमान व सत्य के प्रति आग्रही जितने चारण रहे हैं उतने अन्य नहीं। इनके सामने जब सत्य व स्वमान के रक्षण का संकट आसीन हुआ तब-तब इन्होंने निसंकोच उनकी रक्षार्थ अपने प्राण अर्पण में भी संकोच नहीं किया। चारणों ने सदैव अपने हृदय में इस दृढ़ धारणा को धारित किया कि सत्य सार्वभौमिक, शाश्वत, व अटल होता है। यही कारण था कि इन्होंने कभी भी सत्य के समक्ष असत्य को नहीं स्वीकारा। यही नहीं इन्होंने तो सदैव लोकमानस को यह प्रेरणा दी कि- ‘प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्य’
यानी प्राण देकर भी विश्वास बनाए रखना चाहिए।

ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं हमारी समृद्ध श्रुति परंपरा में अवस्थित हैं, जिनको सुनकर हमारी आस्था उन महामनों व मनस्विनियों के प्रति हिलोरे लेने लगती है। हमारे मनोमस्तिष्क में यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक है कि उनके त्याग, मूल्यों के प्रति समर्पण, सैद्धांतिक प्रतिबद्धता आदि का मूल्यांकन समग्र समाज के समक्ष नहीं आ पाने के क्या कारण रहे होंगे? हमारी उदासीनता, संवेदनहीनता या तत्कालीन परिस्थितियों का स्वाभाविक दबाव। खैर. . कारण जो कोई भी रहा हो लेकिन लोक वंदनीय है जिसने अपनी जीव्हा के कोषागार में ऐसी कई घटनाओं का इतिहास संचित कर रखा है।

ऐसी ही एक घटना है झिणकली की शीला माऊ की।

झिणकली चारणों का पुराना सांसण है। दूसलजी बीठू की वंश परंपरा में नेतसी बीठू हुए और उनके जोगराजजी बीठू।
दुर्योग से जोगराजजी की पहली पत्नी की असामयिक मृत्यु हो जाने से गृहस्थी की गाड़ी अकेले जोगराजजी से चलनी मुश्किल हो गई। कहावत है कि हाथ से हाथ नहीं कटता। ऐसे में भाडली के भाटी रुघजी की धर्मपत्नी जो कि जोगराजजी को अपने पिता तुल्य मानती थी ने अपने पति रुघजी से कहा कि-
“किसी भी प्रकार हो लेकिन बाजीसा का पुनर्विवाह करवाया जाए।”

पत्नी के त्रियाहठ के आगे हारकर रुघजी ने कोडां गांव के रतनू शंकरदानजी सायबदानोत की पुत्री शीलां का स्वयं मांगणा (पिता से कन्या मांगना) करके जोगराजजी की शादी करवाई। भंवरदानजी बीठू झिणकली के शब्दों में-

धन धन रतनू माड़धर, धन धन कोडां गांम।
धन शंकर तुझ धीवड़ी, नवखण्ड राख्यो नांम।।

शंकरदानजी ने शीलां को रुघजी के ही खोल़े डालदी। जैसी कि उन दिनों परंपरा थी।

दोनों का वर्षों सुखद दांपत्य जीवन रहा लेकिन एक दिन दुर्योग से जोगराजजी काल-कवलित हो गए।

शीलां माऊ के समक्ष परिवार की सभी जिम्मेवारियां आ पड़ी।

पति के देहांत के कुछ महीनों बाद पत्नी को अपने पीहर ‘गोडो-वाल़ण’ /खुणो छोडण (शोक संवेदना) हेतु जाने की एक रीत थी। चूंकि शीलां रुघजी के खोल़े थी तो भाटी आए और शीलां को भाडली ले गए।

इधर ऐसा योग बना कि अंग्रेज सरकार ने देशी रियासतों को आदेश दिया कि वे अपना सीमांकन दुरस्त करें। अतः अंग्रेज सरकार के आदेशों पालना में जैसलमेर और मारवाड़ की सीमाएं भी दुबारा मुकर्रर होने के लिए नपने लगी।

जैसलमेर की तरफ से ‘खावड़’ तरफ की सीमा नापने का जिम्मा यहां के हाकम जोरजी पुरोहित और मूहता मूल़चंद के पास था। इनका मुकाम ‘लखा’ गांव की गढ़ी में था। लखा, नीमली, भाडली, जिंझणयाल़ी, और कोहरो गांव में ‘खोखर’ राजपूत भी बसते थे। चूंकि ये कोई जागीरदार नहीं थे बल्कि सामान्य राजपूत थे। इसलिए कोहरो और लखा के खोखर झिणकली के चारणों की जमीन हासिल से जोतते थे।

ये जो जमीन जोतते थे वो उपजाऊ जमीन थी। जो ढाकणिया खड़ीन के नाम से प्रसिद्ध थी।

खोखरों का मन बदल़ गया। उन्होंने विचार बनाया कि ऐसी उपजाऊ जमीन किसी भी प्रकार चारणों से छीनी जाए। अतःखोखरों ने जैसलमेर के हाकिम को कहा कि पहले जमीन इधर से मापी जाए। क्योंकि चारण है तो मारवाड़ के निवासी परंतु अरड़फबाऊ जमीन जैसलमेर की दबे बैठे हैं। यह सुनकर हाकिम ने आदेश दिया कि जमीन ढाकणिया खड़ीन की तरफ से मापी जाए। यह बात जब झिणकली पहुंची तो वहां के मौजीज चारण भी वहां पहुंचे तथा अपनी कदीमी सीमा बताकर सही सीमांकन का निवेदन किया। उन्होंने कहा कि ढाकणिया में जैसलमेर की इंचभर जमीन नहीं है।

यह सुनकर खोखरों ने कहा कि-
“हम जैसलमेर के रहने वाले हैं लेकिन यह खड़ीन हम वर्षों से खड़ते हैं। यह बात आप सभी चारण जानते हैं।”

तब चारणों ने कहा कि-
अरे गुणचोरों ! एक तो हमने हमारी जमीन तुम्हें जोतने दी। हासिल जितना दिया, उतना लिया। एहसान मानना दूर उल्टे हमारी ही जमीन हथियाना चाहतो हो!”

लेकिन खोखर माने नहीं। विवाद बढ़ गया।

समकालीन कवि गुलाबजी ऊजल़ (ऊजल़ां) लिखते हैं-

मूल़ो महतो मेल, चौड़ै ज कीना चाल़ा।
मूल़ो महतो मेल, रैवस्यां गांम रुखाल़ा।
मूल़ो महतो मेल, खान भेल़ा खूटोड़ा।
मूल़ो महतो मेल, तीन जादम तूटोड़ा।
ऐतरी फौज लियां अवस, नसते दरहे नार री।
रणबीच आज फौजां रमै, हुई बात हुंकार री।।

जमीन नपने लगी। तब चारणों ने एकत्रित होकर विचार किया कि हमारे पास अत्याचार का प्रतिकार करने का एकमात्र उपाय है, जमर करना! या तेलिया करना लेकिन जमर करे कौन ?

आखिर यह तय हुआ कि “एक बार शीलां माऊ से सलाह ले ली जाए कि इस संबंध में हमें क्या करना चाहिए? वो जैसा कहेंगी हम सब वैसा ही करेंगे। क्योंकि वे समझदार, ठोस विचारों वाली तथा हिम्मत वाली महिला है।”

जब शीलां माऊ को भाडली से लाने हेतु उनके पुत्र सारंगधरजी को भेजा। सारंगधरजी ने जाकर अपनी मा से कहा कि-
“माऊ! इस तरह जमीन नप रही है और हमारा खड़ीन ढाकणिया पर विवाद बढ़ गया है। चारण तेलिया आदि की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने सोचा है कि आप समझदार हैं, ऐसे मैं हमें क्या करना चाहिए? इसलिए तुम्हें बुलाया है।”

यह सुनते ही शीलां माऊ के सिर के बाल चठठ करते खड़े हो गए। आंखें लालचुट हो गई। वे बोली कि इसमें सलाह व सोचने की क्या आवश्यकता है? डीकरा ! स्वर्गवास एक तुम्हारे पिता का हुआ है लेकिन मैं तो अभी जिंदा हूं ना! जमीन के लिए जमर तो मैं करूंगी।

अनोपदानजी बीठू लिखते हैं-

जमी काज आद जल़णो जरूर।
कियो काल़का रूप धारण करूर। 

इतना कहकर उन्होंने अपने बेटे से कहा-
“हाल डीकरा।”

शीलां का ऐसा विकराल रूप देख भाटियों की सहुवाल़ियों ने कहा-
“बाईसा ! आप ऐसे मत जाओ। रुघजी ठाकर गांमतरै (अन्यत्र) गए हुए हैं। उन्हें आने दो। फिर वो भी आपके साथ चलेंगे।”

यह सुनकर शीलां माऊ ने कहा कि-
“नहीं व्हाला! अब तो मैं यहां एक पल भी नहीं रुक सकती। मुझे किसी के साथ की आवश्यकता नहीं है। मुझे नवलाख का आमंत्रण आ गया है। इस बातको आप समझो!”

इतना कहकर वे अपने पुत्र के साथ रवाना हो गई। आगे शीलां माऊ और पीछे भाडली के कई मिनख। सीधे ढाकणिया ढूके।
शीलां माऊ ने आते ही कहा कि-
“रे खूटोड़ों! खज खाने से पेट भरेगा, अखज खाने से नहीं ! यह जमीन हमारी बपौती है। आप होते कौन हो नापने वाले?”

यह सुन खोखरों ने कहा कि-
“ऐसी हुंकारों से डरने वाले हम नहीं है। हम भी राजपूत हैं। ऐसी डफरायों से नहीं डरते। यह बात आप अच्छी तरह समझ लेना।”

इतना सुनते ही शीलां माऊ के क्रोध का कोई पारावार नहीं रहा। उन्होंने वहां बैठे चारणों से कहा कि-
“इन कुक्षत्रियों के दिन समाप्त हो गए हैं। मेरे जमर की तैयारी करवाओ।”

यह सुनते ही वहां बैठे घूवड़ां के घूवड़ गोमजी ने कहा कि-
“जमर करना कोई बच्चों का खेल नहीं है! जीते जी जलना बड़ा कठिन काम है। हम कैसे मानलें कि आप जमर कर ही लेंगी?”

शीलां माऊ ने उसी समय गांव से ‘सीधै’ का समान मंगवाया। अपनी हाथेली से उकलते घी से सैंतल सेककर सीरा बनाकर
सबको जीमाया। लोगों ने देखा कि माऊ की हथेली कड़ाही में ऐसे चल रही मानो ठंडे पानी में चल रही हो।

शीलां माऊ ने जीमाकर पुनः कड़क आवाज में कहा कि-
“मेरे जमर की तैयारी करो।”

यह सुनकर गोमजी ने पुनः आशंका की कि-
“माऊ आप पकांयत जमर करेंगी। यह अभी हमारे मनने में नहीं आ रही है।”

इतना सुनते ही उन्होंने अपनी कटार निकाली और लोग कुछ समझ पाते उससे पहले ही अपने दोनों स्तन वहां प्रज्ज्वलित हो रही जोत की अग्नि में अपने हाथों से होम दिए-

थण काट आपरा भरै थाल़।
होमिया अगन में निज हथाल़।
~~अनोपदानजी बीठू

फिर कठोर दृष्टि गोमजी पर डालते हुए पूछा कि-
“बगनीघोन ! पतियाया या अभी भी अविश्वास है?”

माऊ के आंखों में बरसती अग्नि से डरकर गोमजी उनके पैरों में पड़ते हुए बोला कि-
“माऊ भूल हुई। माफी दे।”

शीलां ने कहा कि चिता चुनाइए। चिता चुनी गई।

यह दृश्य देख रहे हाकम ने अपने हजूरियों को कहा कि-
“जाओ रे! चिता को बिखरदो। हमने ऐसी भोपाडफरियां बहुत देखी है।”

यह सुनते ही सात हजूरी आगे बढ़े। हजूरियों को आगे बढ़ता देखकर शीलां माऊ का ख्वास भभूतोजी मरने को संभा परंतु माऊ के तेज से हजूरी चिता को छूने से पहले अर्द्धमूर्छित होकर गिर पड़े। जिन्हें वापिस होश ही नहीं आया। यह देखकर हाकिम ने अपने साथ आए मेहर जाति के मुसलमानों से कहा कि-
“जाओ रे! चिता बिखेरदो।”

यह सुनकर मुसलमानों ने कहा कि-
“हम यहां लड़ने आए थे। हम भलेही मुसलमान हैं लेकिन जतियों-सतियों के तेज से परिचित हैं। जो जीते जी अपने शरीर को बिना उफ किए जलाती हैं उनसे तो देव भी डरते हैं। फिर हमारी कौनसी बिसात है? हम ऐसा नीच कर्म आज करेंगे न कल।”

कहते हैं जैसे ही शीलां माऊ चिता पर बैठी ही थी कि देवयोग से अग्नि स्वतः प्रज्ज्वलित हो गई।-

शीलां अगन सिनान, ऊजल़ कियो उण वारां।
जल़ै कोई जीवतां, जस रहसी जुग चारां।

अगन री बात पड़ती अवस, आपो जीव उबारणां।
सत्त तो आज शीलां कियो, चावल़ चाढ्यां चारणां।।
~~गुलाबजी ऊजल़

उक्त घटना कार्तिक शुक्ला चर्तुदशी वि. सं. 1920 की है-

काती सुदी चहुदश कां, वृसपत हंतो वार।
संमत उगणिसे बीसे वरस, सीलां तज्यो संसार।।
~~गुलाबजी ऊजल़

जैसी ही अग्नि चेतन हुई, वैसे ही जैसलमेर राज के मिनख भाग छूटे। लेकिन जो लाय वे लगाकर गए थे उसकी लपटों से मूहते और हाकम के घरों के साथ ही साथ खोखरों के घर भी बच नहीं सके।

हाकिम जोरजी पुरोहित का बेटा उसी दिन कुयोग से झांफली के कुए में पड़कर मरा तो मूहता खुद ही उसी रात को गढ़ में सोया जो सुबह मरा हुआ मिला। खोखरों के घरों में भी काफी कुटाणे हुए।

जैसलमेर महारावल रणजीतसिंह का एकाएक बेटा लालसिंह उसी रात पलंग से एक चीख के साथ तड़ाछ खाकर पड़ा और पड़ते ही मर गया। रणजीतसिंह निरवंश गया–

खोखर सब खाया दुष्ट दबाया, गांम झिणकली जस गाया।
रणजीत रुल़ाया गर्व गल़ाया, गढ सूना कर गणणाया।
चारण हरखाया परचा पाया, वंश बधाया जस वरणी।
शीलां सुख करणी आयां सरणी, दे धन धरणी दुख हरणी।।
~~भंवरदानजी बीठू झिणकली

जैसल़मेर के किले में काफी विघ्न हुए। शीलां के डर से रात में गढ में सुनसान पसरी हुई रहती थी–

सूनो कोट सांभरै, करै भणणाट जु भाल़ी।
आधी रात जो उपड़, करैसणणाट सचाल़ी।
सगत्यां नवलाख साथ, तड़ित रमती नित ताल़ी।
जादम जिण जोविया, डारण घंटियां डाढाल़ी।।
~~गुलाबजी ऊजल़

शील़ां ने चारणाचार को मंडित किया-

दोहूं पख दीपिया, आप दोहूं उजवाल्या।
रतनू बीठू राण, दोय धरा जस चाड़्या।।
~~गुलाबजी ऊजल़

शील़ां माऊ देवी के रूप में आज भी उस इलाके में पूजी जाती है। विख्यात डिंगल़ कवि गुलाबजी ऊजल़, ऊजल़ां के शब्दों में-

घूघर पद घुरत रमत नित रामत,
इल़ आवड़ अवतार इसी।
शंकर घर जलम लियो जे शीलां,
दुसमण डरप्या दिसो दिसी।
करनल ज्यां कोप व्हैण जे बंका,
जस डंका जुग च्यार जमै।
सिमर्यां नित साद सुणंती सांप्रत,
राजल शीलां रास रमै।।

शीलां माऊ के नाम पर चारणों ने उसी दिन वो 600बीघा जमीन गोचर करदी। जहां आज भी गायें चरती हैं।

शीलां माऊ के सुयश की सौरभ पूरे राजस्थान में पसरी कि किस प्रकार उन्होंने अत्याचार और हठधर्मिता के प्रतिकार स्वरूप अग्नि में जीवत स्नान करके अपनी कुल परंपरा की इस बात को अक्षुण्ण रखा कि अत्याचार के समक्ष मर जाना बेशक परंतु झुकना नहीं चाहिए।

।।गीत झिणकलीराय शीलां माऊ रो।।
।।दूहा-सोरठा।।
होवै ना होडांह, सगत शीलां री सांपरत।
कीरत धर क़ोडांह, रीझ दिराई रतनुवां।।1
सतवट मारग साज, कुऴवट दीधी कीरती।
इऴ धिन कोडां आज, ऊजऴ रतनू आपसूं।।2
जाहर बातां जोगणी, मारवाड़ धर माड़।
रँग शीलां रखवाऴिया, जोर झिणकली झाड़।।3

।।गीत – प्रहास साणोर।।
तूं शंकर रै सदन अवतार ले शंकरी,
पखो नित धार रखवाऴ पातां।
जगत में जाण जयकार मुख जापियो,
साच सुख सार ज्यां दियो सातां।।1

ताकड़ी बहै इम केहरी ताणवां,
सिमरियां भाणवां साय शीलां।
पाणवां शूऴ धर रचै हद प्रवाड़ा,
हाणवां उपाड़ै हियै हीलां।।2

धरा धिन रतनवां मात बण धीहड़ी,
दुरस जग बात आ बहै दीठू।
जोगड़ा साथ गंठजोड़ नै जामणी,
विमऴ जद जात तैं करी बीठू।।3

चाड सुण चढी तूं मदत झट चारणां,
हाड निज होमिया नकू होडां।
गाढधर झिणकली अरिदऴ गंजिया,
कीरती माडधर दीध कोडां।।4

ढाकणियो लोवङी पलै इम ढाकियो,
राखियो लोयणां कोप रातां।
जोय जैसाण रां भऴै नीं झाँकियो,
वीदगां भाखियो सुजस बातां।।5

गीत कथ कीरती रखण थिर गहरता,
डीकरां जीत नै धरा दीधी।
रूठ नै रुऴायो राव रणजीत नैं,
साख आदीत नैं लेय सीधी।।6

झिणकली तणा रखवाऴिया झाडखा,
गरब तैं गाऴिया विघनगारां।
वीदगां तणा धिन विमल़ दिन वाऴिया।
टाऴिया विघन चढ जमर तारां।।7

अमर अखियात आ इऴा रै ऊपरै,
गढवियां गुमर धिन बात गाढी।
सुमर कथ अंजसियो पी’र नै सासरो,
चमर कर लाख-नव सिंह चाढी।।8

खोखर खऴ खपाया उणिपुऴ खीझ नै,
कोप कुऴ केविया शीश कीधो।
चावऴ तैं चढाया वंश इऴ चारणां,
दोयणां गेह में ताप दीधो।।9

वसुधर ऊजऴी जात सह वीसोतर,
वऴोवऴ ख्यात री बहै बातां।
मात तन होम नै सांसणां मंडिया,
जाय ना जिकै ऐ जुगां जातां।।10

भणै कवि गीधियो गीत ओ भाव सूं,
चाव सूं यादकर तनै चंडी।
तुंही मम उबारै सोच अर ताव सूं,
जात री आब रख आभ झंडी।।11

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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