ईसरदासजी रो जस वखांण – मीठा मीर डभाल

चारण सन्त महात्मा श्री ईसरदासजी (ईशरा सो परमेसरा) रो जस वखांण

सध गुण उकती सम्मपो, आप दया कर ईश।
दाखूं ईशरदास रा, जस आखर जगदीश।।१।।
हेक दास हिंगळाज रो, करे गयो औ कौल।
आप तणै घर आवसूं, बारठ सुणैह बोल।।२।।
सूरै बारठ सांभळे, विध मन कियो विचार।
जरूर मों घर जनमसी, अबै लेय अवतार।।३।।
गिरी हिम्म तन गाळयो, अडग करे मन आस।
जनम लेय हैं जावणो, वा सूरा रे वास।।४।।
सूरा घर जन्मयो सतन, धिन अवतार धरैह।
ईसर नाम दिनो अवस, कोडे हरख करैह।।५।।
ईसर जन्मयो औलियो, पायो नर तन पीर।
जिणरो हतोह जांणजै, सूरा थांमें सीर।।६।।
ईसर बारठ ईळ में, आप लियो अवतार।
हरख्ख सूरा घर होवियो, आणद मौज अपार।।७।।
भाद्रेसो बारठ भलो, रोहड़ियो धिन्न रांण।।
लोपै कुंण मुर लौक में, ईसर थारी आंण।।८।।
ईसर बारठ औलिये, दियाह जीवन दान।
करण ने संजीवन कियो, जुग ऐ वातां जान।।९।।
तेंह दिया सूरा तणा, जग में परचा जोय।
आप सारखो ईळ में, कबू न होवै कोय।।१०।
बैणू तणें जळ बहन्तां, सांगो गयो समाय।
बारठ ईसर बोलयां, औ झट तीरे आय।।११।।
दियोह ईसरदासजी, सांगा ने झट साद।
नीर बारै जद नीसरै, मुदे रखी मरजाद।।१२।।
समपी कांमळ हाथ सूं, सांगै सहनांणीह।
ईसर शोभा आपरी, जग सारै जांणीह।।१३।।
पुरसोतम गुण पारखी, उणें दिया उपदेश।
रसना पर ईशर रटो, हरिवर नाम हमेश।।१४।।
मन हरखावै मांनयो, ईशर गुर आदेश।
गुण माधव रा गाविया, परो शरण हुय पैश।।१५।।
हरिरस गायो हरख कर, कोडे सुणियो कान।
विध पावै जग वांचयां, मोक्ष पदारथ मान।।१६।।
वेद पुराणां सूं वधू, आखर थारा ऐह।
हरिरस सुणयो हरख कर, नटवर राखै नैह।।१७।।
सदा पढै या सांभळे, प्रात समै ही पाठ।
ईसर थारै आखरां, नुगरा जावै नाठ।।१८।।
परम कथा परमेसरा, भल ईसर भाखीह।
जग में तरणी जोरवर, रोहड़िये राखीह।।१९।।
भाखीह कथा भागवत, जग मेंटण जम जाळ।
हरिरस नीमित हेत सूं, रहसी हरि रखवाळ।।२०।।
हेमर चढ कर हालयो, महा उदधि जळ मांय।
ईशर मळयो ईश ने, झट ही वैकुंठ जाय।।२१।।
उत्तम ईसर आखरां, मन हरखावत मोय।
दानव मानव देव गण, हरि पण राजी होय।।२२।।
मन कर कहया मीठिये, तिकै दुहा तैवीस।
गुण ईसर रा गावतां, आप दया कर ईश।।२३।।

~~मीठा मीर डभाल

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