जगदंबा स्तवन – कवि वजमालजी मेहडू

।।गीत चितइलोल़।।

पाताळ सातूं परठ पीठे,
कमठ धारण कोल।
इक्कीस व्रहमंड किया उभा,
भ्रगट मांही भूगोल।
तो हिंगोळ जी हिंगोळ, हरणी संकट भव हिंगोळ।।1

जोगमाया त्रिगण जाया,
व्रमा वसन महेस।
सावत्री लखमी सती सवरी,
वरी त्रिगण वेस।
तो आदेश जी आदेश, अणकळ इसरी आदेश।।2

भवखाण तुंही जीव थर चर,
सरजिया संसार।
सवशेष गणपति निगम, शोधत,
परा नह लहे पार।
तो अणपार जी अणपार, प्राक्रम तुहारा अणपार।।3

महण मथण महामाया,
महीधड़ मांडेश।
मेर रवैया धार मोटे,
नेत्र कर नागेश।
तो अवशेष जी अवशेष, अदधी शोधिओ अवशेष।।4

रगत-बीजा रगत पीधा,
अमर जे जे आख।
संभ निसंमो किया सोसण,
धोसिया घुमराख।
तो सुरसाख जी सुरसाख, शक्ति भरे सुर नर साख।।5

खडग खपर हाथ कर कर,
तोड़िया रीप तुंड।
चंड रुपा होय चंडी,
मारिया चंड मुंड।
तो चामुंड जी चामुंड, चंता मेटणी चामुंड।।6

रेणका जमदघन राणी,
जनमिया दजराम।
कोठार फेरी नखत्र कीधा,
वसुधरा वरियाम।
तो संग्राम जी संग्राम, साजीया वीस एक संग्राम।।7

सीतवा हो राम संगे,
वसी वनमां वास।
कोट लंका जाय करियो,
निशाचर रो नाश।
तो परकाश जी परकाश, करणी धरम धर परकाश।।8

द्रुपद सुता होय द्रुपदी,
पाण ग्रहियो पाथ।
प्रथिपत कौरव-पांडव,
भेड़िया भाराथ।
तो समराथ जी समराथ, सबळ कळा तो समराथ।।9

किसन रुपे होय काळी,
रमी व्रजमां रास।
मोहिया जग जन मातर,
अमर पुरी आस।
तो वसिवास जी वसिवास, व्यापक सकळ घट वसिवास।।10

सुध बुध वाणीसुख संपत,
अचळ पुरण आश।
सेवगां री साय करणी,
त्रिबध हरणी त्रास।
तो जसवास जी जसवास, वजिओ वीनवे जसवास।।11

~~कवि वजमालजी मेहडू
प्रेषित: गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”
साभार-जसवंत नाथूभा जाडेजा हजामचौरा

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