जगजामी जगदीश जयो

दूहा
सांवल़ कज भगतां सही, देख करै नीं देर।
आवै भीर उँतावल़ो, टीकम राखण टेर।।१
भगत विपत में भाल़तां, प्रभू अंतस पसीज।
तारख छोडै टीकमा, र रे नाम पर रीझ।।२

छंद रेंणकी
वराह अवतार धार इल़ रदनं, वार सुरां हरसार बणै।
वसुधर तण भार उतारण, विठ्ठल़ हाथ धार हिरणाख हणै।।
जय जय सुर जाप जपै जगतारण, भू भय हारण तुंही भयो।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।३

निकल़्यो कर दाड़ फाड़ खंभ नरहर, वरधर हिरणख जदै बियो।
तरवर जिम धूज बूझ हुय तन में, थरहर मन सिहर थयो।।
धर पर पटक्क झटक्क हथ धोमर, दँत नख निसचर चीर दियो।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।४

बामण कर रूप हुवो धर वामन, छाकट हुय बल़िराव छल़ै।
गिणियो नह भगत लेस गुण गोविंद, सुरपत संकट करण सल़ै।।
साजी मुरपैंड त्रिलोकिय साबत, थान बल़ी पंईयाल़ थयो।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।५

परसाधर अडर राम दिज परसू, कुल़ छत्री पर कोप कियो।
दल़िय धर वार इक्कीसां दाटक, रंग निबल़ सबल़ रयो।
जय जय जमदगन सुतन जग जाहर, खाग बल़म भुज सैंस खयो।।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।६

भिड़ियो कर रीस धीस लँक भंजण, दल़ण ईस असुरांण दल़ां।
राखण पत सीत जीत जुध रामण, वसुधर निरभय कीध बल़ां।
सांपण सिर ताज विभीखण सिर पर, करुणाकर रँक राव कियो।।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।७

आयो कर कोप विरज रै ऊपर, लार इंद जल़धार लिया।
डरिया मन देख लोग दुख दारुण, आतुर माधव सरण अया।
कर पर झट धार गोरधन केसव, कांणहीण मघवान कियो।।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।८

पसरै इल़ पाप बहल़ धर पामर, महियल़ हाहाकार मचै।
ऊपर कर हाथ अनाथन अंतन, सायल़ संतन कीध सचै।
सांप्रत दे सरण हरण दुख समरथ, अधम उधारण बुद्ध अयो।।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।९

तूं रीझै नाम अरध सूं राघव, खांमद साजै काम खरा।
तजियै उण वेल़ ताकड़ो तारख, धावक बणवै पंथ धरा।
पूरै झट आस सँभल परमेसर, रेणव गिरधर टेर रयो।।
नामी नवखेल रचै घणनामी, जगजामी जगदीश जयो।।
जयो जगतारण जगन्नाथ जयो।।१०

छप्पय
र रे नाम पर रीझ, उदध गजराज उबारै।
र रे नाम पर रीझ, आप अजमेल उद्धारै।
र रे नाम पर रीझ, पाल़िया पूत पँखाल़ी।
र रे नाम पर रीझ, पूरियो चीर पँचाल़ी।
जग मांय रूप धायो जकै, आयो धार उँतावल़ो।
अजूं ई गीध टोल़ै अवस, रंग विरद ओ रावल़ो।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी (छंदां री छौल़)

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