जंभवाणी के नीतिकथनों की वर्तमान प्रासंगिकता

नीति राजस्थानी संतों एवं कवियों का प्रिय विषय रहा है। संतों की वाणियों एवं पदों में प्रसंगवशात नीति-उक्तियों एवं नीतिवाक्यों का निदर्शन अवश्य ही हुआ है, गुरु जंभेस भी इसके अपवाद नहीं है। उनकी वाणी में आत्मबोध एवं वैराग्य संबंधी सबदों तथा संबोधनों में यथास्थान नीति की सूक्तियां प्रयुक्त हुई है। गुरु जांभोजी की सबद वाणी मूलतः शंका समाधान, जिज्ञासा शमन एवं नीति-निदर्शन की त्रिवेणी है।

वस्तुतः नीति समय के अनुसार होती है किंतु बाह्य आकार में न्यूनाधिक अंतर होते हुए भी उसके मूल में तो मानव मूल्यों की महत्ता सदैव प्रतिष्ठापित रहती है। समग्रतः नीति ही मनुष्य का धर्म है और अनीति अधर्म है। यद्यपि समय की परिवर्तनशीलता के कारण मानव जीवन के मूल्यों एवं नैतिकता-अनैतिकता के मापदंडों में बदलाव अवश्य ही होता है लेकिन बावजूद इसके बहुत से जीवनमूल्य देश-काल-परिस्थितियों की सीमाओं को लांघते हुए सार्वकालिक हो जाते हैं, जिनकी प्रासंगिकता एवं उपादेयता हर युग में विद्यमान रहती है। इस दृष्टि से मानवता के प्रबल पैरोकार गुरु जांभोजी की वाणी के नीति-कथनों की निर्झरणी का सुमधुर निनाद आज भी न केवल प्रासंगिक है वरन परम आवश्यक जान पड़ता है। जन साधारण अथवा अपने प्रिय भक्तों के हितार्थ रचित गुरु जंभेस की वाणी के पदों में शब्दाडंबर नहीं बल्कि सार तत्त्वों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। सत्य-साक्ष्य अनुभूत गुरुवाणी की नीति-उक्तियों में सर्वत्र हितेषणा का भाव लक्षित होता है। आज की आर्थिक आपधापी एवं भौतिक चकाचौंध में किंकर्त्तव्यविमूढ़ हुई मानवता को भटकाव से बचाने, संवेदनहीनता से छुटकारा पाने तथा संकीर्णता के नानाविध घेरों से बाहर निकलकर मानवजीवन के असली लक्ष्य की पहचान करवाने के लिए गुरु जंभेस की वाणी अचूक ओषधि साबित हो सकती है।

इस वाणी की नीति उक्तियां जहां शु़द्ध आचरण के लिए सचेष्ट करती हैं, एकाग्रता एवं कर्त्तव्यनिष्ठा का पाठ पढाती है, सुपात्र-कुपात्र की पहचान कराती है, सांप्रदायिक सौहार्द का सुभग संदेश देती है, कर्मप्रधानता हेतु प्रबोधती है, क्रोध को आग के समान बताकर उससे बचने का आह्वान करती है, सुख-दुख में समभाव रहने का सार समझाती है, माया के भ्रमजाल से परदा उठाकर असली चेहरे से अवगत कराती है, दुनिया एवं दीन के रंगों की खराखरी पहचान करवाती है, मानव के स्वभाव एवं संगति के प्रभाव को स्पष्ट करती है, मन की ताजगी के साथ तन की तंदुरुस्ती का ध्यान रखने हेतु संयमित आहार संकेत करती है। कुल मिलाकर व्यक्ति के जीवन को सुंदर, सुभग एवं सफल बनाने का हरसंभव प्रयास इस सबदवाणी में प्रत्यक्ष दिखता है, जो कि हर देश काल परिस्थिति में अपनी प्रामाणिकता एवं प्रासंगिकता को बनाए रखने में स्वतः सक्षम है।

आज के समाज की समग्र झांकी को ध्यान में रखते हुए गुरु जंभेस की वाणी का सम्यक विवेचन करें तो उनके नीति-कथनों की वर्तमान प्रासंगिकता कदम-कदम पर दृष्टिगोचर होती है। मैंने 20 अलग-अलग बिंदुओं में इनको संकलित करने का प्रयास किया है। ये बिंदु विश्लेषण-संश्लेषण के आधार पर घटाएं-बढ़ाए भी जा सकते हैं।

01. कर्म की प्रधानता
व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है।
उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं (26)
राजस्थानी लोकसाहित्य का ” कुंभ में सिंधु समात नहीं”
‘हक हलालूं, हक साच कृष्णो, सुकृत अहळो न जाई (70),
ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता (72),
ओछी किरिया आवे फिरिया (77),

02. आचरण की शुद्धता एवं ग्राह्य-अग्राह्यता
दुनियां के रंग सब कोई राचै, दीन रचे सो जाणो (69)
‘काया कसोटी, मन जोगूंटो जरणा ढाकण दीजे (56)
‘बीखा पड़ता पड़ता आया, पूरस पूरा पूरूं’
तेल लियो खळ चोपै लागी, खळपण सुँघी बिकाणो (72),
दीन गुमान करीलो ठाली, ज्यूं कण घाते घुण हाणी (72),
तेल लियो खळ चोपै लागी, रीता रहियो घाणो (95)

03. अभ्यास एवं एकाग्रता से कार्य सिद्धि
जंभवाणी का 55 वां सबद नीति-उक्तियों का समुच्चय है। इसके अलावा –
दोय मन दोय दिल सिवी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथा।
दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुणी न कथा (45)
संकल्प-विकल्प के भंवरजाल में फंसी दुनियां को सही राह दिखाने वाली है।

04. वाणी की विनम्रता
कांय बोलो मुख ताजो (64)
सुवचन बोल सदा सुहलाली (78)
भरमी वादी अति अहंकारी, करता गरब गुमानो (69)
बर-बर कूकस काय दळीजे, जामें कणूं न दाणूं (72
समझ बिना कुछ सिद्ध न पाई (92
कण विण कूकस, रस विण बाकस, विन किरिया परिवार किसो।
अरथूं गरथूं साहण थाटूं, धूंवें का लहलोर जिसो (68)

05. क्रोध नियंत्रण (आग एवं क्रोध को समान माना है)
‘आला सूका मेल्है नाहीं, जिहिं दिश करै मुहाणौं (04)
पापे पुन्है वीहे नाहीं, रीस करै रीसाणौं (04)

06. दान-दक्षिणा
दान सुपाते, बीज सुखेते, अमृत फूल पळीजे (56),
थोड़े मांही थोड़ेरो दीजे, होते नांह न कीजे (56, 103)

07. सांप्रदायिक सौहार्द, पाखंड-खंडन एवं मर्यादा-मंडन
उतपति हिन्दू जरणा जोगी, किरिया ब्राह्मण, दिल दरवेसां, उनमुन मुल्ला, अकल मिसलमानी (सबद 6),
दिल साहब हज काबो नेड़ै, क्या उलबंग पुकारो,
चढ़-चढ़ भींते मड़ी मसीते क्या उलबंग पुकारो,
आसण बैसण कूड़ कपटण, काहे काजे खेह भकरड़ो, सेवो भूत मसाणी,
‘घट ऊंधै बरसत बहु मेहां, पड़्यो न पड़सी पाणी’,
‘धवणा धूजे पाहण पूजै, बे फरमाई खुदाई’ (71)
भीगा है पण भेद्या नांही पाणी मांय पखाणो (98)

08. सुख-दुख में समरस रहने का संदेश
‘दुखिया है सो सुखिया होयसे (63),
काचा कंध गळै गळ जायसैं, बिखर जायगा राजूं (64),
यह कंवराई खेह रळाई, दुनियां रोळै कंवर किसो (68),
कवण न हुवा कवण न होयसी, किण न सहा दुख भारूं (33)

09. व्यर्थ की चाहत से बचने हेतु
‘जिहिं ठूंठडि़ये पान न होता, तें क्यूं चाहत फूलूं (77),

10. लक्ष्यानुसार एवं अवसरानुकूल आचरण की दृष्टि से
‘जो नर घोड़े चढ़े पाघ न बांधे, ताकी करणी कोण विचारो (83),
छंदे मंदे, बाळक बुद्धे, कूड़े कपटे, रिद्ध न सिद्धे (91),
रवि ऊगा जब उल्लू आंधा, दुनियां भयो उजासू (107),
बींदो, ब्योरो, ब्होर बिचारो, भूलस नांहि लेखो (115),
ठाढ़ी बेला ठार न जाग्यो, ताती बेला तायो (07),
पाते भूला मूळ न खोजो, सींचो कांय कुमूळूं (15)

11. सद्कर्म एवं लक्ष्योन्मुखी मेहनत की महत्ता बताती
‘सुकृत अहळो न जाई’ (92),
कुड़ काची लगवाड़ घणां छै, कुसळ किसी मन भाई (97 ),
हिरदै नाम विष्णु का जंपो, हाथै करो टवाई (97),

12. सत्य का आग्रह एवं झूठ का परित्याग
‘कूड़ तणों जे करतब कियो, ना तै लाव न सायों’ (07),
कलमा करतब कौल कुराणों, दिल खोजो दरबेश (10),
सीने सरवर करो बंदगी, हक्क निवाज गुजारो (11),
इंहि हेडै़ हर दिन की रोजी, तो इस ही रोजी सारों (11),
कारण खोटा करतब हीणा, (थारी) खाली पड़ी निवाजूं (11),
हक हलाल पिछाण्यों नांही, तो निश्चै गाफल दोरै दीयो (11),

13. संगति का प्रभाव
‘बेड़ी काठ संजोगे मिलिया, खेवट खेवा खेहूं।
लोहा नीर किसी विध तरिबा, उआम संग सनेहूं (16),
बिन किरिया रथ बैसैला, ज्यूं काठ संगीणी लोहा नीर तरीलूं।

14. दया एवं आव-आदर
जां दया न मया, तां तां बिकरम कया,
जां जां आव न वैसूं, तां तां सुरग न जैसूं,
जां जां दया न धर्मूं, तां तां बिकरम कर्मूं,
जां जां पाले न शीलूं, तां तां कर्म कुचीलूं,
जां जां खोज्या न मूलूं, तां तां प्रत्यक्ष थूलूं,
जां जां भेद्या न भेदूं, तो सुरगे किसी उमेदूं (20)

15. संयमित आहार
‘घण-तण जीम्या को गुण नांही, मल भरिया भण्डारूं।
आगे पीछे माटी झूलै, भूला बहैज भारूं’
उक्ति आज के तौंद लटकाते तथा तरह-तरह के फास्टफूड खाते लोगों के लिए कितनी सटीक है।

16. ज्ञान को आचरण में ढालने एवं उपयुक्तता को पहचानने
‘पढ़ कागल, वेदूं, शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया कछू न लहिया’
‘नुगरा उमग्या काठ पखाणों, कागल पोथा ना कुछ थोथा, ना कुछ आया गीयूं’
‘देखत अंधा, तासों कछु न बसाई (27),
“यूं क्यूं भलो जे आप न फरिये, अवरां अफर फराइये।
यूं क्यूं भलो जे आप न डरिये, अवरां अडर डराइये।।” (30),
पहलै किरिया आप कमाइये, तो औरां न फरमाइये।
जो कुछ कीजै मरणै पहले, मत भल कहि मर जाइयै।। (30),
जिहिं तुल भूला पाहण तोलै, तिहि तुल तोलत हीरूं (43)

निष्कर्षतः जंभवाणी आज के संकल्प-विकल्पात्मक झंझावतों के दौर में मनुष्य को लक्ष्योन्मुखी बनाने तथा ज्ञान की खड़ग के बल पर सारे दुश्मनों को सज्जन बना लेने की विलक्षण बुद्धि देने वाली सारगर्भित सूक्तियों का भंडार है। ज्ञान खड़गूं जथा हाथे, कौण होयसी हमारा रिपूं (52) आवश्यकता इस बात की है कि इन्हें पूर्ण एकाग्रता एवं श्रद्धावनत मन से समझते हुए आचरण में ढालने का प्रयास किया जाए। स्वयं गुरु जंभेस ने घोषणा की है कि “सुरमां लेणां झीणा सबदूं, म्हें भूल न भाख्या थूळूं” (15) अर्थात आंख में अंजन की तरह इन सबदों के ज्ञान को अपने आचरण में ढालते हुए अपने जीवन को साफल्यमंडित कर सकते हैं। थूळ की बजाय मूळ को पहचानने की आवश्यकता पर बल देती गुरुवाणी मानवता की महनीय रक्षक है। इस वाणी के नीति-कथन आबाल-वृद्ध सबको जीवन जीने की कला सिखाने के साथ जीवन की सार्थकता की राह दिखाती है।

~~डॉ॰ गजादान चारण “शक्तिसुत”

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