जा रै डोफा चाखू कोट रो ई कोजो लगायो !

आधुनिक सोच राखणिया अर सामंती जीवण मूल्यां सूं अजाण लोग आपरी मूंछ ऊंची राखण सारु जिण भांत सामंतवाद नैं भूंडै उणां नैं शायद जमीनी धरातल़ रो लेस मात्र ई ज्ञान नीं है या उणां किताबां सूं ओ ई ज्ञान पायो है कै उणकाल़ अर उण शासकां नैं विगोवो। ओ ई कारण है कै ऐड़ै लोगां नैं बै ठाकुर शोषक, क्रूर अमानवीय व्यवहार वाल़ा अर प्रजा रै सारु राकस रै समरूप निगै आवै। पण एक दो नै छोड र बाकी रा शासक दिल रा दरियाव, मिनखपणै सूं मंडित अर दया री प्रतिमूर्त हा।

ऐड़ो ई एक किस्सो आप री निजर कर रैयो हूं। मारवाड़ रो एक ठीकाणो हो चाखू। चाखू ठाकुर हा बन्नैसिंह। आजादी रै आसै पासै रो समय। भयंकर काल़ पड़ियो। अन्न रो एकदम तोटो। रात री बगत एक आदमी (आज री भाषा में ए सी जात) कोट रै कोठार में बड़ियो अर पांच छ सेर बाजरी अंगोछियै में बांध लेयग्यो। दिनुंगै ठाह लागो कै कोठार में चोरी होयगी। पागी आया। पग देख सीधा चोरी करणियै रै घरै पूगा। बाजरी सहित चोर नैं ठाकुरां रै साम्हो हाजर कियो।

चोर पकड़णियां नैं ठाकुरां पूछियो “कितरो धान चोरियो?”

उणां पांच सात सेर बाजरी आगै राखतां कैयो “हुकम चोर कन्नै पोटल़ी ई नीं ही। ओ पड़ियो धान!”

ठाकुर साहब कैयो  “बस! जा रै डफोल़ चाखू कोट रो ई कोजो लगायो। लोगां नैं ठाह लागैला तो बातां करैला कै कोट में कठै धान हो? हो जितरो ई चोरै बापड़ो।”

“इणनैं जोरदार सज्जा देवो। ऊंठ माथै पूरी छाटी भर र इण रै घरै पूगावो। इण रा टाबर म्हारा टाबर। भूखां मरतो ओ ई काम करैलो। छोड दो इण नैं।” ऐड़ा हा ठाकुर बन्नैसिंह।

ऐक किस्सो आं ई बन्नैसिंह रो भल़ै बतावूं। आजादी आयां पछै रै तुरंत बाद रो। ठाकुरां रो एक मोटो खेत चाखू रै डाकोत हरजी रै गलत नाम चढग्यो। फलोदी मुकदमो होयो। ठाकुर ऊंठ माथै अर हरजी आगै आगै पाल़ो।

ठाकुरां हरजी कन्नै जाय ऊंठ झेकियो अर बोलिया “ले चढ लारलै आसण! मुकदमो कचेड़ी में लड़ाला। म्हारो टाबर पाल़ो अर हूं चढियो ठीक नीं।”

जितै मुकदमै रो फैसलै नीं होयो उतै आवतां अर जावतां हरजी नैं ठाकुर ऊंठ माथै चढार ले जावता अर लावता। अबै आप ई बताओ कै उण ठाकुरां रो काल़जो कंवल़ो हो कै काल़ै लोई रो?

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