जस री नदियां जगत में।

दातार अर दातारगी री बातां सुणां तो मन मोद सूं भर जावै कै इण धरती माथै एक सूं बधर एक दातार हुया है। जिणांरी उदात्त मानसिकता अर ऊजल़ चरित्र री ओट लेय ईश्वरीय शक्ति नै ई आपरो काम कढावण सारू इणांनै आदेश दैणो पड़्यो अर इधकाई आ कै इणां उण आदेशां री पाल़णा में रति भर ई ढील नीं करी।

ऐड़ी ई एक गीरबैजोग बात उण दिनां री है जिण दिनां जामनगर माथै जाम सत्रसालजी रो राज हो। सत्रसालजी, जाम रावल जैड़ै मोटै दातार री परंपरा में हुया। जिणां रै विषय में किणी कवि कह्यो है–

हाल हिया जा द्वारका, करां ज उत्तम कांम।
जातां जादम भेटसां, वल़ता रावल़ जांम।।

सत्रसालजी ई वीर, साहसी अर दातार नरेश हा।

सत्रसालजी री बखत में जामनगर शहर में ई घणा चारण बसता अर उण बसती रो नाम हो ‘चारणपा’ इणी ‘चारणपा’ में एक सेजोजी नांधू नाम रा चारण ई रैता।

वै कवि तो ठीकठीक ई हा पण शिव भगत उच्चकोटि रा हा। उणांरै नागेश्वर महादेव रो इष्ट हो सो वै रोजीनै डोकरै महादेव रै मंदिर दरसण करण जावता। इण काम में उणां कदै ई ढील नीं दी।

पण वि. सं. 1640 री बात है। उण साल मेह नीं वरसियो। कुसमो पड़्यो सो सेजाजी आपरी जैड़ी-तैड़ी काव्य प्रतिभा बतावण सारू पाखती रै उदार क्षत्रियां रै अठै निकल़िया।

एक पथ दो काज रै मिस कविवर केई उदार नरां रै अठै मैमाण बण्या। हरेक उदार अर काव्य प्रेमी राजा अथवा ठाकुर कवि नै ओपतो सनमान दियो, जिणरै पाण उणां कनै तीन सौ ‘कोरी’ भेल़ी हुयगी। जणै उणां पाछो आपरै घरै आवणो तेवड़ बहीर हुया।
बैतां-बैतां परभात रा ठेठ जामनगर री नागमति नदी रै कांठै पूगा। परभात रो समय हो सो कविवर झूल’र महादेव नागनाथ रा दरसण करण रो विचार कियो।

जोग री बात ही कै उणी दिन एक बांमण आपरी बाई रै ब्याव सारू चिंतित हो, कोई बख नीं बैठो जणै सेवट वो हार्ये नै हरि नाम रो सा’रो लेय नागेश्वर महादेव मंदिर में धरणो देय बैठो। धरणै नै तीन दिन हुयग्या जणै उण भूखै तिरसे विपर नै भखावटै री बखत मंदिर मांय सूं आवाज आई कै-

“हे विपर! आज दिन ऊगतां ई नागमति नदी रै किनारै सेजा नांधू नाम रो चारण तनै मिलसी। तूं उठै जाई अर उणनै कैयी कै तीन सौ कोरी री चीट्ठी नागनाथ महादेव थारै नाम री मेली है सो उवै तीन सौ कोरी म्हनै दिरावो। तूं उवै कोरी लेय थारी म्हारी बाई नै चंवरी चाढूंलूं लो।”

दिन ऊगो। सेजोजी नदी में स्नान कर रह्या हा। उणी बखत महादेव रै आदेश मुजब द्विजराज आय सेजैजी नै कह्यो कै-
“आप सेजोजी नांधू हो? थांरै कनै तीन सौ कोरी है?”

आ सुणतां सेजोजी कह्यो
“हां।”

सेजैजी री हां रै सागै ई म्हाराज निशंक कह्यो कै-
“थांनै डोकरै नागनाथ रो आदेश है कै उवै तीन सौ कोरी म्हनै दे दिरावो। म्हनै इण कोरियां सूं म्हारी बाई नै धोरियै चाढणी है।”

सेजो आपरो सही नाम अर कोरी री सही गिणत सुणतां ई इणनै महादेव रो हुकम मान बिनां किणी चलविचल़ रै राजी-खुशी तीन सौ कोरी भुदेव नै दे दीनी।

बिंयां ई एक साचै भगत री आ इज ओल़खाण है कै उणरै मन में दया, धार्मिकता, करुणा अर परदुख भंजण रा भाव हुयणा चाहीजै–

चार सहज हर भगत की, प्रगट दिखाई देत।
दया धरम अरूं दीनता, परदुख को हर लेत।।

बिंयां ई इण बात में रति भर ई कूड़ नीं है कै जितरी संवेदनावां झूंपड़ियां रै धणियां में रैयी उतरी गढपतियां में नीं-

रतन बसै धर झूंपड़ां, नग्ग मुकट जड़ जाय।
जस री नदियां जगत में, आखरियां बह जाय।।

बामण कोरी लेय आशीष दे आपरै मारग बहीर हुयो।

अठीनै सेजोजी स्नान कर’र महादेव नै डंडोत कर’र आपरै घरै आया। उणी ज रात जामनगर जाम साहब सताजी नै सुपनै आयो। सुपनै में महादेव आदेश दियो कै-
“म्हारा भगतराज सेजैजी नांधू नै एक गांम दिरावो।”

ऐ सबद जाम साहब नै तीन बार सुणीज्या। जाम साहब री नींद खुलगी। उवै ई शिव भगत हा अर इण बात नै सावजोग रूप सूं जाणतां कै ज्यूं बाल़कां नै राजी राख्यां उण बाल़कां रा माईत राजी हुवै उणीगत भगत नै रीझाया भगवान रीझै–

ज्यां रा बाल़ रमावियां, त्यां रा रीझै बाप।
ज्यूं ई भगत रीझावियां, प्रभू रीझत है आप।।

सो उणां महादेव रै आदेश नै सिर चढाय सूरज उगाल़ी ई आपरै कामदार नै मेल ‘चारणपा’ मांय सूं सेजाजी नै तेड़ाया। दरबार लागो अर दरबार बिराजतां ई सेजाजी नै उठ’र आपरै हाथां ‘पीपल़िया’ नामक गांम रो तांबापत्र, लाख पसाव अर साथै ई हाथी, अर्पित करतां कह्यो-
“ओ गांम म्हैं आपनै नागेश्वर महादेव रै आदेश मुजब अर जल़सका गांम म्हारै कानी सूं इनायत करूं। इणरो म्हनै परम संतोष अर मोद हुय रह्यो है।”

बोदै कल़जुग में भगवान शंकर रो आपरै परम भगत नै इणगत तूठण रै कारण सेजाजी उणी बखत दरबार में इण बात री साख में एक छप्पय कह्यो—

संवत सोल़ चाल़ीस, साल अही लेखै सबल़।
बीज तिथि बुधवार, आसो मास पख ऊजल़।
माहेस सोणा मांय, जांम सत्रसाल जगाए।
नांधू सेजो नांम, एक गज गांम अपाए।
परभात पसा कीनो पहव, थरू पीपल़ियो थप्पियो।
विभेसनंद दाता वडम, उपर जल़सको अप्पियो।।

संदर्भ-यदुवंश प्रकाश-मावदानजी भीमजी रतनू

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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