जाट सिर झाट खागां

मध्यकालीन इतियास नै पढां तो व्यक्तिगत अहम पूर्ति अर व्यक्तिगत वैमनस्यता री बातां तो साची निगै आवै पण जिण जातिगत वैमनस्यता अर कटुता री बातां आजरै इतियासकारां लिखी है वै सायत घणीकरीक मनघड़त अर गोडां घड़्योड़ी लागै क्यूंकै जातिगत कटुता उण जुग में सायत नीं ही अर जे ही तो ई आजरै संदर्भ में जिको मनोमालिन्य है उवो जातियां में नीं हुय’र मिनखां में हो। भलांई उण दिन मिनख कमती हा पण मिनखाचार घणो हो। क्यूंकै उण जुग में ऐड़ा दाखला पढण में नीं रै बरोबर आवै। उण जुग में एक बीजै रै पेटे सनमान, अपणास समर्पण अर अपणास खोब-खोब’र भर्योड़ी ही। समर्पण इतरो कै आपरै स्वामी माथै संकट आयां अनुचर आपरै रगत सूं धरा सींच देता। मध्यकालीन इतियास में ऐड़ा दाखला अंजस दिरावै तो साथै ई आ ई बतावै कै मिनख आपरा प्राण त्याग देता पण आपरो मिनखपणो नीं छोडता। ऐड़ै साचड़ियै मिनखां रो सुजस डिंगल़ काव्य में बांचण नै मिलै। जिको इण बात नै सिद्ध करै कै-

कवि की जबान पे चढै सो नर जावै ना।

तो साथै ई आ ई सिद्ध करै कै उण कवियां जठै वीरता देखी उठै निसंकोच बिनां किणी पूर्वाग्रह रै उण वीरता रा वारणा लिया। आपरै पूर्ववर्ती कवियां री ऐड़ी वारणाजोग कवितावां पढ’र ई परवर्ती कवि नाथूसिंहजी महियारिया कह्यो है कै वीरता अर भक्ति कोई रै बापरै नीं है आ तो जिको करै उणरै गुढै आपै ई आवै–

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ ना किणरै बाप री, भगती रजपूतीह।।

ऐड़े एक रजपूती सूं सराबोर दाखलै सूं आपनै रूबरू करावूं। किस्सो है महाराज पदमसिंहजी री संवेदनशीलता अर उणांरै आदम्यां री उणांरै प्रति अथाह समर्पण भाव रो। जद पदमसिंहजी अर जादूराय, सांवतराय रै बिचाल़ै दिखण में लड़ाई हुई। उण बखत महाराज री सेना में केई जोधार भेल़ा हा। उणां मांय सूं एक नाम है जाट गोयंदजी मूल़ाणी तो दूजो अणदैजी दमामी रो।
गोयंदजी जैड़ो जोधार उतरो ई सामधर्मी तो ऐ गुण अणदैजी दमामी में। ऐड़े जोधारां रै पेटे किणी कवि कह्यो है कै

खग सहणो नृप रीझणो, व्है रहणो रस बाण।
कवि माता आसीस दे, तो जलम्यां परवाण।।
खाग सहण करणियो नृप नै रीझावणियो, सरस मन रैवणियो अर साथै माँ अर कवि सूं आशीष ले उणरो जनमणो सार्थक

अणदैजी दमामी रै पैलै दिन री राड़ में घणा घाव लागा। पण उणां कोई परवाह नीं की। जद दूजै दिन पदमसिंहजी दिखणियां सूं भिड़ण जावण लागा तो सदैव री गत उछाह रै सागै अणदैजी नै संभतां देख’र महाराज कह्यो कै- “अणदाजी थे आज रैवण दो।”

पण उण दमामी कह्यो कै नीं आज तो हूं किणीगत लारै नीं रैवूं। दयालदासजी आपरी ख्यात में लिखै—
“पैलड़ी राड़ में अणदै दमामी रै घाव लागा हा तिणनूं माराज तंबू सूं नीसर चढतां फुरमायो कै अणदाजी थांरै घाव आला छै सूं थे आज डेरा रहो। तद अणदै कह्यो “अंदाता आज हूं आपसूं दूर रहूं नहीं। तारां माराज फुरमायो क्यूं? तद इण कयो “आज वैरीसाल नगारो हाथां झालै नहीं।”

इण संवाद सूं आपां अंदाजो लगां सकां कै आंकधारी पदमसिंहजी रै मनमें आपरै छोटे सूं छोटे आदमी रै प्रति कितरी संवेदना ही तो सागै ई आपरै झरतै घावां री गिनर नीं कर’र आपरै मालिक रै आरपार रै भावां नै लख’र सागै रैय मरण उजाल़ण रो लोभ संवरण नीं करण सकण री द्रढता ई सरावणजोग।

इणीगत उफणतै जोश अर घावां सूं गरकाब रीस में महाराज पदमसिंहजी आपरै गुढै ऊभा जाट गोयंदजी मूल़ाणी नै कह्यो कै-
“रे गोयंद! आज हूं वीरगत वरूंलो सो थारो एक इज काम है कै तूं म्हारा हथवाह (शस्त्र चलावण री कुशल़ता, प्रहार करण री प्रवीणता या क्रिया) गिणतो रैजै ताकि म्हारै मरियां लारै बतावजै कै पदमसिंह किणगत रणांगण में घावां सूं गरकाब हुयैड़ै शत्रुवां रो घाण करतै घमसाण में मरण सुधारियो।”

आ सुण’र गोयंदजी कह्यो-
“हुकम! इतरी धोल़ी आंख्यां री नीं हूं जको आप लड़ो अर हूं जोऊं! आ बात बतावण सूं पैला म्हारी जीभ क्यूं नीं झड़ जावै? म्हैं उवो दिन नोज देखूं, जिणदिन म्हनै आ बात बतावणी पड़ै कै म्है ऊभै-ऊभै महाराज रा इतरा-इतरा हथवाह गिणिया। म्हैं ई आपरो लूण खायो है किणी कायर रो नीं। पछै हूं ऊभो हथवाह गिणूंलो तो लूण उजाल़ूलो कद? म्हैं ई गाडण गोरधनजी सूं नित सुणूं कै जितैतक दूध में पाणी है उतैतक दूध नीं बल़ै अर इणीगत जितैतक राजपूत पगां ऊभो है उतैतक सांम निचिंत है-

साम उबेले सांकड़ै, रजपूतां आ रीत।
जब लग पाणी आवटै, तब लग दूध नचीत।।

इण पेटे दयालदासजी आपरी ख्यात में लिखै—-
“तद महाराज नगारो निसाण दबता देख कर जाट गोयंद मूल़ाणी नूं फुरमायो कै आज हूं काम आसूं सो तूं म्हारी हथवाह गिणतो रहै। तद इण अर्ज करी जो माराज म्हारो धर्म आपरी हथवाह देखण रो नहीं है। हूं आपनै काम आया आंखे देखूं? हूं आपरै आगै पहली काम आसूं।”

वाह! कांई बखत ? अर कांई मिनख हा! नैतिकता री साक्षात पुतलियां। मरण नै महोच्छब मानता। जणै ई तो धणी मरण रो करतब देखण री मनुहार करै तो सेवग आपरै धणी रो मरण देखण सूं पैला खुद मरणो श्रेयस्कर समझै। क्यूंकै उवै जाणता कै जनमियो उणरो मरण तय है। लारै केवल बात जीवती रैणी। जिणरी बात मरगी वो जीवतो ई मरियै जेड़ो है तो क्यूं नीं मर’र जमारो सुधारियो जावै?–

सूरां दाता पंडितां, तीनूं एक सभाव।
जनमै सो मरसी खरी, बात अमर रह जाय।।

गोयंदजी मूल़ाणी आपरो आपाण बताय सामधर्म नै उजाल़’र महाराज रै मूंढै आगल़ लड़तां वीरगति वरी। उण लड़ाई में उणांरी वीरता नै आपरी निजरां देखणिया दिग्गज कवि गोरधनजी गाडण सड़ू एक गीत में लिख्यो जिणमें उण चौधरी रै ऊजल़ चरित्र अर वरेण्य वीरता रो वरणाव है। आ बात अफसोस री है कै जाट गोयंदजी मूल़ाणी किण गांम रा रैवणिया हा इणरो उल्लेख कठै ई पढण में नीं आयो। उवो गीत अविकल़ रूप सूं इण भांत है–

गीत गोयंद मूल़ाणी रो-गोरधन गाडण रो कहियो
मिले घाट विखमौ कल़ह लाट लोहां मिले,
वाज गुण चाढवे घाट वागां।
ऊकटे काट नीराट अध्रियामणो,
खाट खड़ जाट सिर झाट खागां।।
जोधार जाट बडी विखमी में जोरावर सेना रै साम्हीं जाय शस्त्र भिड़ाया। जठै जुद्ध में कपट रै साथै भिड़ती सेनावां में खार ऊकटै उठै आपरा गुण दिखाय आगै बधर वास्तव में भयानक जुद्ध करतै उण जाट रै सिर खागां रै प्रहारां झड़ी मंडी।

पदम मुख आगली दखणियां पधारण,
वधारण खड़ग धड़ करण वावार।
बल़ाबल़ वाज नै महारिण वाजियो,
साद. . . . रणै सिर सांघणो सार।।
पदमसिंह सूं दिखणिया आय जुद्ध मांडियो उठै उणांरै मुख आगल़ खागां रो व्यवहार दरसाय तरवारां तोली। जठै एक सूं बध’र एक रणमें जोधा लड़ै हा उठै उण जाट महारण में माथै पड़ती तरवारां रा वार झालिया।

बिजड़ अवझाड़ खल़ पाड़ जमदाढ वख,
विढे अवसाण कीधो वडाल़ो।
फाचरां चाचरे हुवो रिण फाबियो,
चौधरी. . . जरां लोह चाल़ो।।
उण चौधरी कष्टदायक बखत में तरवार रै आडै प्रहारां सूं अर कटार सूं अरियां री छाती छेदी। उण मोके माथै उण जोधार बडो जुद्ध कियो अर खुद ई माथो कट कुटको-कुटको हुयो

मूल़उत जीवतां संभ हल़ मोहरी,
दन खड़ग रावतां तणै दावै।
गहण रिण बाज थूं रण थटां गोदड़ो,
पटा मोटा भलां जाट पावै।।
हे गोयंद ! थे आज इण बात नै सुधार दीनी कै तैं जिकै मोटा पट्टा पाया उणरो फरज निभायै। क्यूंकै मूल़ै रो बेटो अथवा वंशज जिको जीवतो हमेश हंसतो थको हल़ खड़ण में आगीवाण हो उवो इज जाट आज अठै राजपूतां दांई रणांगण में खेल रह्यो है।

कविराज दयालदासजी रै मुजब उण लड़ाई पदमसिंहजी रै केई जोधारां रै घणा घाव लागा तो केई भड़ सुरग रा बटाऊ बणिया। जिणांमें सत्रसालजी रतनौत रै 84घाव, रुघनाथसिंहजी पदमावत रै 50घाव, कुशल़सिंहजी चूरू रै 70घाव, गाडण गोरधनजी रै 27 घाव, लागा। तो इण रणांगण में पदमसिंहजी रै साथै ई पुरबियो भगवंतरायजी, कुशल़सिंहजी कछवाहो, विजो माराज सांदू भदोरा, गोयंदजी मूल़ाणी, जाट सायरजी, दमामी अणदैजी आद सिरै जोधारां सुरग री वाट वरी। आज ई इण महाभड़ां री गौरव गाथा वीरता अर मिनखपणै रै सुर गूंजावती अमर है।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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