जैतियै रै च्यार जूत जरकावो नीं !

कॉलेज में आया जद किणी राजस्थानी विद्वान सूं एक व्याख्यान में राजस्थानी रो एक दूहो सुणियो-

मरस्यां तो मोटै मतै, सो जग कहै सपूत।
जीस्यां तो देस्यां जरू, जुलम्यां रै सिर जूत।।

व्याख्यान कर्ता इण दूहै रै रचणहार रो नाम जनकवि शंकरदान सामोर बतायो। दूहै रो मर्म अंतस नैं प्रभावित अर मानस में घर करगयो। बिनां सच्चाई जाणियां म्है ई इण दूहै नै शंकरदानजी रो ई मानण लागग्यो। आ ई नीं म्है इणनैं म्हारै एक आलेख”डिंगल़ गीतां में चारण कवियां रो सूरापण “में इणी कवि रै नाम सूं उद्धृत ई कर दियो, पण हकीकत में म्हारी आ भूल ही। इण दूहै रा रचणहार, कवि श्रेष्ठ रामनाथ कविया हा। किस्सो ओ है कै रामनाथ कविया री प्रज्ञा अर प्रतिभा सूं प्रभावित होयनै तिजाराधीश बल़वंतसिंहजी, सीहाल़ी नामक गांम इनायत कियो –

तीन सहंस धर तीन सौ, पाल़ नाल़ पैंतीस।
सीहाल़ी मौजां समंद, बल़वंत की बगसीस।।

अलवर महाराजा विनयसिंह री घात रा शिकार होय बल़वंतसिंहजी देवलोक पूगा। राजाजी उणां रा दिया बाकी गांमां साथै सीहाल़ी ई खालसै करदी।

रामनाथजी दरबार सूं मिलिया अर अरज करी कै “म्हारो गांम आप खालसै नीं कर सको। ओ गांम म्हनै दे दिरावो !”

दरबार कैयो “क्यूं नीं कर सकूं? इयां नीं दूं। कोई चतुर चारण लेवो ज्यूं पाछो ले लिरावो।”

रामनाथजी कैयो “ठीक है, हमें इयां ई लेयर बतावूंलो।”

उणां १०१ चारणां साथै अलवर में धरणो दियो। धरणो केई दिन चालियो पण पार नीं पड़ी। जद दरबार रै सीखावण सूं धरणै में भेल़ै अलवर रै पोल़ पात जैतदान जागावत सलाह दीनी कै धरणो उठा दियो जावै। कीं पार नीं पड़ती देख साथला बीजा ई गतागम में पजग्या।

अठीनै जैसलमेर रै रामां गांम रो एक रतनू हरदान आपरा घोड़ा अर बल़द बैचण अलवर आयोड़ो। हालांकि कन्हैयालालजी सहल आपरी पोथी “द्रोपदी विनय” में इणनै जैसलमेर रो रतनू लिखियो है -“उस समय जैसलमेर का रतनू शाखा का चारण भी घोड़ै का व्यापार करता हुआ इधर आ निकला जब नगर में ‘धरणै’की चर्चा सुनी तो अपने घोड़ों को आधै पूनै में ही लुटा दिया।”

उण सुणियो कै इणगत चारणां रो धरणो है। बो ई आपरो माल मवेशी ऊणै पूणै दामां में बेच धरणै री ठौड़ पूगो। आगै देखै तो धरण खिल़ बिखल़ होवण वाल़ो है। उण कैयो कै “चारणां रो धरणो बिनां निर्णायक स्थिति रै थोड़ो उठाइजै! कै तो राजा झुकैला कै आपां कटारी कंठां करांला।” दूजोड़ां कैयो कै “जैतदान धरणो उठावण रो कैवै।” आ सुणतां ई हरदान कैयो “जैतियै रै च्याय जूत जरकावो नीं ! ओ कुण है धरणो उठावण रो कैवणियो ?” जैतदान देखियो कै हमें बात बिगड़ैली तो बो छानैक ताचग्यो। रामनाथजी अर बीजोड़ां रो बल़ बंधियै कै इती भांय आगै रो चारण, जातिय हित सारु मरण तेवड़ियां निस्वार्थ भाव सूं आपां भेल़ो है तो आपां ई मर पूरा दैवांलां। रामनाथजी उण बगत करनीजी रा केई चाडाऊ दूहा कैया जिणां में ऐ दो घणा चावा है

थल़वट हेलो थाय, आता बेगा ईसरी।
मो विरियां महमाय, बूढी हुयगी बीसहथ।।
व्है सिंघ होफरड़ीह, पतसाहां परचा दिए।
डरपी डोकरड़ीह, मा आती मेवात में।।

आ बात बैवै कै दरबार नै उणी बगत ऐड़ो अहसास होयो कै वांरो पिलंग अर महल धूज रैया है। बां उणी बगत आपरा मोटा भाई थाणाधीश हनुवंतसिंहजी नै आपरी मदत में तुरतोफुरत तैड़ाया। उल्लेखजोग है कै हनुव़तसिंहजी आ कैयर अलवर छोडदी कै “म्है ऐड़ै अन्याई राज में नीं रैवूं जठै चारणां रो सम्मान नीं।” बै आया अर आपरै प्रभाव सूं धरणो उठायो। सीहाल़ी रै बदल़ै दूणी आमदनी रो गांव सटावट दिय़ो। उण बगत रामनाथजी हरदान रतनू रै प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करतां अर जैतदान री निंदा करतां दो दूहा कैया-

जागावत जैतै जिस्या, असती भगा अनेक।
कल़ियो गाडो काढबा, आयो थल़ियो एक।।
मरस्यां तो मोटै मतै, सो जग कहै सपूत।
जीस्यां तो देस्यां जरू, जैतै रै सिर जूत।।

इणी दूहै नै केई लोगां बदल़र शंकरदान सामोर रै नाम सूं “जैतै” री जागा फगत ‘जुलम्या’ कर चला दियो।

~~गिरधर दान रतनू “दासोडी”

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