जोगा! दो जोगा!!

जद-जद हथाई में बैठां तद-तद जोगां री बात सुणां ! बात तो नाजोगां री ई सुणां पण अंजस फखत जोगां माथै ई आवै नाजोगां माथै नीं। जोगो बणणो दोरो है। जोगो बणण सारू मन मोटो राखणो पड़ै।

जिण-जिण नरां मन मोटो राखियो, वांरो सुजस संसार भाखियो। इण सुजस रै प्रताप आज ई फजर री वेल़ा में लोग वांनै याद करै। ईशरा-परमेसरा कितरी सटीक कैयी कै-

दीयां रा देवल़ चढै।

देवैला वे अमर रैवैला!! इणमें कोई मीनमेख नीं है। आज सुरतसिंह, जोगो पड़िहार अर जोगो भाटी किण जागा कै किण गांम रा होता आ लोग पांतरग्या पण वे जोगा हा !आ नीं पांतरिया। जद ई तो किणी कवि कैयो कै सुरतै जिसा सपूत, हर दिशा में एक-एक होवै तो चारण-राजपूत संबंध कदै ई जूना नीं होवता-

सुरतै जिसा सपूत, दिस-दिस में हिक-हिक हुवै।
चारण नै रजपूत, जूना हुवै न च्यार जुग।।

लागै कै ऐड़ै सपूतां ई आपरी भावी पीढी में जिणगत संस्कार सींचण कियो होसी वो अनिर्वचनीय हो। इणी खातर तो कविश्रेष्ठ ऊमरदानजी लाल़स नै ई लिखणो पड़ियो कै ऐड़ै सपूतां री गुणग्राहकता नै अखी राखण सारू चारणां सुजस री सोरम पसराई उणनै किता तो जीवता बरत (काम में लेना) रैया है अर कितै ई मर्योड़ां अमर नै ई अमर किया है-

सांगो गौड़ सिरै, वल़ै वाघो कोटड़िया।
सुरतो महा सपूत, रसा बांटी रोटड़िया।
सुणै सदा हूं सरब, गढपत्ति बहिया गैलै।
पण चारण परताप, फजर होतां जस फैलै।
जीवता किता बरतै इल़ा, प्रथमी नामज पेखलो।
मर गया जिका कीधा अमर, दिल में सारा देखलो।।

ऊमरदानजी रै अंजसजोग आखरां री ऊंडाई में जावां तो दो ऐड़ा नाम दीठगत होवै जिकां आपरै काम रै पाण नाम खाटियो। ऐ दो नाम है-जोगो पड़िहार अर जोगै भाटी रो।

ऐ दोनूं ई सफा घर धणी, पण उदारता ऐड़ी कै आज ई गढ धणियां रै साथै याद करीजै। आं किती मोटी दातारगी करी आ बात कोई मायनो नीं राखै पण किण हाल में अर किणगत करी आ महताऊ है।

पैली बात जोगै (जोगीदास) भाटी री।

बात इयां चालै कै किणी बारठजी रै जचगी कै म्हारै ई चढण नै चड़ी वाल़ो ऊंठ होवणो चाहीजै। होवणो चाहीजै! पण लावै कठै सूं ? मन चालै पण टटू नीं चालै। अणूंत भाठै सूं काठी!! ओपाजी आढा सही ईज कैयो है कै-

मन जांणै चढूं हाथियां माथै,
खुर घांसतां जनम खुवै।
नर री चीती बात हुवै नह,
हर री चीती बात हुवै।।

पण उण दिनां राजपूत कवियां अर विशेषकर चारण कवियां रा पूजारी अर कद्रदान होवता सो वे जेड़ो कवि होवतो बेड़ो उणरो सनमान कर मोटो करता। बारठजी ई एक ऐड़ै दातार ठाकर रो नाम सुण गया अर कवितावां बीजी सुणाई। ठाकर रीझिया अर कैयो-
“बारठजी बा! आदेश करो ! आपरी कांई सेवा करू?”

बारठजी बिनां किणी लागलपट रै कैयो-
“आपरै टोल़ै (ऊंट-सांयढ का झुंड) मांय सूं एक पांगल़ियो (युवा ऊंट) दे दिरावो।”

ठाकर लंबा हेला अर ओछी विरकां (कदम) वाला ईज हा, ऊंठ रो नाम सुणतांई मन माठो होयो अर कैयो-
“ऊंठ तो आपरो ईज है! पण हमकै कदै ई पाछो आवोला जद दे दूं ला।”

बारठजी रै मोर वाल़ो बोलणो हाथ हो पण वरसणो तो इंद्र रै हाथ। सो वां कैयो – “कोई बात नीं हमकै दे दिराया!!”

बखत बीतो। बारठजी भल़ै आया पण ठाकर तो तय करियां बैठा हा कै-

जुर जाजक अर पावणो, चौथो मांगणहार।
लंघण तीन कराय दे, वल़ै न आवै द्वार!!

ज्यूं ई ठाकरां तीसरी बार ई कैयो कै – “बा हमकै!!’

बारठजी बिनां आपो (धैर्य) खोयां कैयो – “कोई बात नीं अबकै टोल़ै सूं पकड़ र राखिया।” कैय बहीर होयग्या।

थोड़ी क भां (दूरी) गया अर जोगो भाटी (जोगीदास) आपरी ढाणी सूं पखाल (ऊंट पर पानी ले जाने की चमड़े से बनी हुई) लावण निकल़ियो। मारग में बारठजी मिलग्या। रामा-सामा होई। चिलम-होको कियो अर जोगै पूछियो कै – “बा! हूं दो-तीन बार देख रैयो हूं के थे हाथ में मोरी (ऊंट के नाक में डालने की रस्सी) लियोड़ा जावो! कोई नासेट (किसी गुमी हुए पशु आदि को खोजने वाला) बीजी है या भल़ै कीं बात है?”

आ सुण बारठजी कैयो – “फलाणसिंह ठाकर परार (पिछले से पिछला साल) एक ऊंठ रो कैयो पण हमकै-हमकै कैवता रैवै पण म्है ई तय कर लियो कै धामीणी (दहेज में दी हुई गाय) रा दांत नीं देखणा। सो कदै तो बाई रो हाथ घिरसी।”

आ सुण र जोगै नै रीस आयगी अर कैयो कै-
“ठाकर सफा ई पतहीणो दीसै! इयां कांई थूक र चाटै। राजपूत होयर इतरो कांई सिटल़ो (वचनहीण) है? हालो पाछा म्हारै साथै। दे कै सरै!!”

आ कैय जोगो भाटी, बारठजी नै लेय ठाकर री कोटड़ी आयो। आवतै ई आव देख्यो न ताव। भिड़तां ई कैयो-
“ठाकरां कूड़ै पत न काय!! मिनख रो बोल अर बाप एक होवै!! पछै क्यूं बारठजी रा खेटर फड़ावो? ऊंठ नीं दैणो हो तो ऊतर (मना) दे देता। एक ननो सौ दुख काटै।”

आ सुण ठाकरां नै रीस आयगी। भरी छभा में उणां रो माजनो एक साधारण राजपूत पाड़ै ! आ वे कद सहन करै?
उणां ई पाछो उणी तेवर में कैयो-
“क्यूं तूं राजपूत कोनी? ऐड़ी ई दातारगी री बायड़ (नशे की तीव्र इच्छा) आवै तो ओ टंटेर (थका मा बेकार ऊंट) थारै कनै ई है नीं। दे बारठजी नै! थारै अर बारठजी रै केणै सूं कोई “हाक मारियां कुवो खुदे है कांई?”

जोगो तो साचाणी ईज जोगो हो। उण कैयो – “कोई बात नीं बारठजी। टकै री हांडी फूटी अर कुत्ते री जात लाधी। थांनै ऊंठ चाहीजै। लो ओ ले जावो। मरदां रा दिवाल़ा मुवां निकल़ै।”
कैय जोगै भाटी, बारठजी नै आपरै ऊंठ चढाय बहीर किया। उण बखत बारठजी जोगै नै संबोधित कर र एक दूहो कैयो जिको आज ई अमर है-

जोगा जग में तैं बिनां, कीरत कौण करंत।
बारठ मेढी बल़ध ज्यां, मुख बांधै ई मरंत।।
अर्थात “हे जोगा!जे संसार में तूं या थारै जेड़ा नीं जनमता तो कीरतजोग काम कुण करतो? अर जे कीरतजोग काम नीं होवतो तो पछै कवि किणनै बखाणतां। आं री हालत मेढी (गाटै में बाहर की तरफ जोड़ा जाने वाला बैल, जो मुंह नहीं भर सकता) बलध ज्यूं हो ई जावती। ऐ तो मूंडो बांध्योड़ा ई मर जावता।”

आज नीं तो जोगो है अर नीं वो ऊंठ, पण ओ दूहो आज ई अमर है।

जोगो पड़िहार।।

किणी में नाम रै मुजब गुण होवै! आ कोई जरूरी नीं पण जे होवै ई तो आ सोने में सुगंध गिणीजै। इणी कारण तो ईसरदास जी लिखै-

चारण हुइ हरि गुण चवां,
सोनो-अनै सुगंध।

वास्तव में वे कितरा संवेदनशील मिनख होवता होसी जिकै आ कैता कै ‘हे ईश्वर जे जीव राखै तो लाज राख अर लाज नीं राखै तो जीव ई मत राख। कितरी खरी। लाज विहूणो जीवण कांई काम रो ?’-

सांई तोसू़ं वीणती, ऐ दुइ भेल़ा रक्ख।
जीव रखे तो लाज रक्ख, लज बिन जीव न रक्ख।।

क्यू़ंकै ‘लाज विहूणा मानवी, लंबा ज्यारां कान।’

लाज अर संवेदना एक दूजै री पूरक है। ऐड़ो ई एक संवेदनशील मिनख होयो जोगो पड़िहार।

हो तो मारवाड़ रो वासी पण गांम किसो हो? ओ आज कोई ठाह नीं पण उण री बात लोक में विश्रूत।

बात चालै कै जोगो घर में थाकोड़ो अर लड़ तूटोड़ो (आर्थिक व पारिवारिक रूप से कमजोर) मिनख हो। बाल़काल़ में मा-बाप रैया नीं। मोटयार होयो जणै उणरै कंवारै काकै किणीगत उणरी सगाई करी ताकि अऊत (निर्वंश) नीं जावै। ब्याव मंडियो अर जान परणीजण टुरी।

आगा रिश्ता होवता अर जान आधी ऊंठां माथै अर आधी पाल़ी (पैदल) जावती।

जोगै री जान ई इणगत चढी। एक जागा तल़ाई माथै जाडी छाया देख जान रुकी। जैड़ी तैड़़ी ई बिछायत कर जानी बैठा। रोटै करण री त्यारी हुई जितै एक बारठजी उठै आया अर हथाई देखी जणै जंवारड़ा किया तो जान्यां ई बारठजी नै जथाजोग आदर देय बैठाया। जितै रोटै होये अर जीमण री त्यारी हुई।

जान्यां मांय सूं किणी कैयो कै-
“पैला बारठजी नै पुरसो!”

आ सुणतां ई बारठजी बोल्या-
“ना भाई रे! म्हारै कोई रोटी लावण री जरूत नीं ! थे थांरै जीमो, हूं रोटी नीं जीमूं।”

“आ कीकर हो सकै बा ? आप रोटी नीं जीमो अर थांरै देखतां म्हे गचल़-गचल़ गिटां ! इतरा डेल़ीचूक (बेशर्म) ई नीं हां। ऐ तो आप हो, जे थांरी जागा कोई दूजो होवतो तो ई म्हे एकला नीं जीमता। जैड़ी-तैड़ी ई मिरच-रोटी साथै जीमांला। एकला म्हे कीकर जीमसां?”

किणी जानी कैयो तो बारठजी पाछो कैयो कै-
“ना, म्है राजपूतां री रोटी जीमूं नीं ! ई खातर थे थांरै जीमो। म्हनै पोरावण (इंतजार) री जरूत नीं।”

आ सुण किणी जानी पाछो कैयो कै-
“बारठजी आ कीकर हो सकै? राजपूतां री नीं जीमो तो किणरी जीमसो? सगल़ै राजपूतां री रोटी तिलाकण री कांई नौबत आई? आप तो गलती है उणां री मत जीमो। म्हांरै आछी बात आपरी है। जीमणो ई पड़सी!!”

आ सुण बारठजी पाछो कैयो – “मरै जकै री धरती, म्हारै राजपूत री रोटी जीमण री सोगन है। हूं थां हूं घणो राजी पण रोटी नीं जीमूं।”

आ सुण वींद बणिये जोगै कैयो – “बा रोटी तो आपनै अरोगणी पड़सी। नींतर हूं ई नीं जीमूं।”

जणै बाकी रां ई कैयो – “बा ! वींद राजा अर राजा बरोबर मींढिजै सो आप ई छोकरियै रो मन राखो अर लूखी-सूकी जेड़ी ई है, म्हांरो अंजल़ कर म्हांनै मोटा करो।”

आ सुण बारठजी कैयो – “भाई ! म्हारै बणां डोकरियो कैवो भलांई छोकरियो। हूं थांरी रोटी नीं जीमूं। थे म्हारै बैठां नीं जीमो तो अलो हूं ओ वहीर होयो।”

आ कैय बारठजी वहीर होया तो जोगो ई साथै टुरण लागो। जणै बारठजी अर दूजोडां पूछियो कै “तूं सिध जावै। कागलै रै भाग रो मसां छींको तूटो अर तूं गैला तिलक री बखत लिलाड़ पाछो खांचै।”

आ सुण जोगै कैयो कै-
“म्हारै घर सूं बा भूखा जावै अर हूं जीमूं! ऐड़ी म्है सुपनै में नीं सोच सकूं। म्हारै कोई ब्याव नीं करणो। जठै बा जावैला बठै हूं साथै। का तो बा राजपूत रै घरै जीमण री तिलाक भांगसी अर छतापण नीं भांगी तो हूं ता-ऊमर आंरी सेवा में रैवूंलो।”

लोगां बारठजी नै कैयो कै – “बा! मसां ई री गवाड़ी मंडी है। आप तिलाक भांगो अर इतरो हठ मत पकड़ो। आप तो जांणो कै जे राजपूत री डीकरी तेल चढगी तो पछै वा किणरै पगै लागसी। थे पाप रा भागी बणसो।”

बारठजी जिद रा पक्का। वां कैयो कै-
“म्है कोई डफरायां करण कै थोरा करावण तिलाक थोड़ी ई ली है। म्हारो किणी बात सूं मन फाटो अर म्है अपियो (अन्न-जल़ न लेना, वहां का पानी न पीना) कियो सो थे जिद मत करो अर ई छोकरियै नै समझावो अर म्हनै जावण दो।”
कैय बारठजी भल़ै रवाना होया तो जोगो तो वींदोलै गांभां ई मांडै साथै वहीर होयो।

आगै बारठजी अर लारै जोगो। कोसएक गया जितरै बारठजी रो मन पिगल़ियो अर कैयो – वाह रै जोगा वाह! धिन है थारी मात नै अर धिन थारी रजपूती नै। थारै जैड़ै राजपूत आगै हारियो। ले अपूठो (वापिस, पीछे) हाल। थारो तो हथाल़ी में ले खावूंलो। दोनूं पाछा आया। कोड सूं जीमणवार होयो। ब्याव होयो तो साथै ई जोगै री अचड़ (कीर्ति) च्यारां कानी पसरी। कीरत पसरी तो इतरी पसरी कै च्यारां कानी वाह जोगा! वाह जोगा!! होयग्यो। बात महाराजा मानसिंहजी कनै ई पूगी कै जोगो पड़िहार ऐड़ो जोगतो मिनख है। उणां री इच्छा हुई कै उणनै है जिण हालत में लाय म्हारै साम्हो पेस करियो जावै। म्हारी उणनै देखण री इच्छा है। हाजरिया आया अर जोगै नै आपरै बाड़ै में कुत्तर करतै नै कैयो कै “थे हणै हो ज्यांई दरबार कनै हालो!! थांनै ई गत में ई हालण रो आदेश है।”

साधारण आदमी हो सो राज रै आदेश सूं डरियै पूछियो कै “म्हारो गुन्हो?”

उणां कैयो कै उठै हालियां ठाह पड़सी।

धणी रो धणी कुण उणनै जावणो पड़ियो।

हाजर होयो। लोगां कैयो-“हुकम! ओ जोगो पड़िहार है।”

दरबार देखियो कै ऊंची फाटी धोती, ऐड़ो ई झीर-झीर साफो। ऐड़ा ई लिगतरा। साव साधारण मिनख। उणी समय मानस़िंहजी एक दूहो कैयो-

जोगो किणी न जोग, सह जोगो कीधो सकव।
लांठा चारण लोग, तारण कुल़ छत्र्यां तणा।।
अर्थात ओ जोगो तो किणी ई स्थिति सूं जोगो नीं दीसै पण ऐ राजपूतां रा तारणहार चारण ईज लांठा (समर्थ) है जिको इणनै हर दीठ सूं जोगो बणा दियो।

जितै तक महाराजा मानसिंहजी रा ऐ सतोला आखर अमर रैसी जितै तक जोगै रो जोगापणो अमर रैसी।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

One comment

  • भवानी दान बोगसा

    बहुत गी शानदार लिखा ….हुकुम सुरते जैसा सपूत यह बात सूरतजी बोगसा के बारे में कही गई है ….आपके पास ज्यादा जानकारी हो तो जरूर शेयर करें

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