काळ – कवि रेवतदान जी चारण “कल्पित”

akaal
आभै ऊपर भमै गिरजड़ा चिलां उड़ती जाय
पग पग ऊपर ल्हास मिनख री कुत्ता माटी खाय
लूट डकैती खून चोरियां लाय लगी तो झालौझाळ
भूख भचीडा फिरै खावती नाचै झूमै सौ सौ ताळ

सुगन चिड़ी सूरज नै पूछ्यो गिरजा नै पूछ्यो कंकाळ
धोरां नै पूछै रुखड़ला ल्हासां नै अगनी री झाळ
क्यूं मौत री मरजी माथै जीवण री पड़गी हड़ताळ
हिरणी बोली रया करै कंई रखवालां रौ पडग्यो काळ

जेठ असाढां आंधी बाजै खीरां तपियौ तावड़ियौ
बळती लुआं हियै रमाई रैण रेत रौ रावड़ियौ
पग उरबांणा बळी चांमडी बळ बळ हूयग्यो छालो
ईण आस में सांसा अटक्या आवैला बरसालौ
आँखड़ियां पथराई बन्धगी पाणी आड़ी पाळ

सुगन…..
धोरा…..
क्यूं मौत….
हिरणी……

सदा सुहांणौ लूंबे सांवण दिन आवै अलबेला
मिनख ममौल्या बाड बेलड़ी करै मनां रा मेळ
प्रित बाव्ळी हुय नै धरती आपा में नीं मावै
पण बिरखा बैरण ऐडौ रूठी पीड़ कही नी जावै
सपनां में हरिये सांवण रा आवै है जंजाळ

सुगन……
धोरां …..
क्यूं…..
हिरणी बोली……

धरती नै वैराग सुझियौ घर घर जड़ग्या ताळा
काळ झुमतौ रमै आंगणै भुत बण्या रखवाळा
मिनख मारणौ खोस खावणौ चोरी हंदा रहग्या काम
रोटी मोटौ तीरथ हूयग्यो गंगा जमुना तीनू धाम
काळ बरस में भूख धाया हुयग्या एकण ढाळ

सुगन चिड़ी……
धोरां…………….
क्यूं मौत री………..
हिरणी बोळी रया……..

इतरा दिन तो चांद लागतौ चन्द्रमुखी रा मुखड़ा ज्यूं
आज भूख रै कारण फिकौ लागै रोटी टुकड़ा ज्यूं
भूखी बिलखी आँखड़िया में सूरमौ कदै न छाजै
नैण कंवळ री उपमा देतां हंसी फूल री लाजै
देख गिगन रौ आधौ चंदा मंगता हाथ पचारै
हिम्मत कर नै दौड़न लागी भूख मौत रै लारै
धरती ऊपर धरणौ दिनो आधेटै में थमती चाल

सुगन चिड़ी….
धोरां नै पूछै….
क्यूं मौत री…..
हिरणी बोली…

घर छुटा घरबार छुटग्या आस छुटगी जीवण री
कायौ हुय नै जैर घोलियौ हिम्मत कीनी पिवण री
मिनखा तन मिटती बेळा जीत जैर में दीसी
फांसी चढ़ता फंदो बोल्यो मत गिण मौत इतीसी
कूदण लागौ मिनख कुवा में बोल उठी परछाई
उंडौ खांडौ भरणी चावै पेट भरै नीं कांई
भंवळ खाय नै पड़गी काया आंख्यां में आयौ जंजाळ

सुगन चिड़ी…
धोरां नै पूछै…
क्यूं मौत री…
हिरणी बोली….

पांणी पी पी जापौ काढ्यो हांचळ सुखी दूधां धार
टाबर रोग्यो भूखां मरतौ मन बिलमावण लागी नार
बेटौ मां नै दोसी जांणै चीखां कर कर रोवै
खाली बोबौ चुंघै कद तक सबर कठा लग होवै
रीसां बळतौ किरड खायगौ गीगै रूप कियौ विकराळ
मां हालरियौ गाती रैगी होठ लोही सूं निरख्यां लाल
ममता बोली सोच करै क्यूं खून ब्रथा नीं जावैला
होठां चस्को भुंडो लागौ रुळो राज गिट जावैला
खून दूध सूं मिठौ लागै हंसतौ – हंसतौ पिग्यो बाळ

सुगन चिड़ी….
धोरां नै पूछै….
क्यूं मौत री…..
हिरणी बोली….

कद सूं देखै काळ धरां रौ आभौ इतरौ आगौ
पण अणचेतां नै वगत कठै के देखै काळ अभागौ
उगतौ ढळतौ सूरज देखै मांणस तड़फा तोड़ै
प्रीत तूटती देखै चन्दा छैल कांमणी छोडै
हिचकी लेवै मरतौ टाबर तूटै नभ् में तारौ
बेचै रमणी लाज चांदणौ कम पडग्यो चंदा रौ
हेमाळै रौ हिवडौ कळपै समदर रोयौ आंसू ढाळ

सुगन चिड़ी सूरज नै पूछ्यो गिरजां नै पूछ्यो कंकाळ
धोरां नै पूछै रूँखडळा ल्हासा नै अगनी री झाळ
क्यूं मौत री मरजी माथै जीवण री पड़गी हड़ताळ
हिरणी बोली रया करै कंई रखवालां रौ पडग्यो काळ

~~रेवतदान जी चारण “कल्पित” (मथानिया)

सकलंन :- कृष्णपाल सिंह राखी

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