म्हनै कांचल़ी रा मांगिया पांच वरस दे!!

आपां मध्यकाल़ रै राजस्थान नै पढां कै सुणां तो ऐड़ै-ऐड़ै पात्रां सूं ओल़खाण होवै जिकै फखत आपरी बात रै सारू ई जीया अर बात सारू ई मरिया। बीजी भांगघड़त में उणां रो कोई विश्वास ई नीं हो।

भलांई आपां जैड़ा आजरा तथाकथित समझणा उणां री इण प्रतिबद्धता नै खाली सनक कै कालाई समझता होसी पण उणां सारू वा बात फखत सहज ही। इयां तो राजस्थानी कवियां ई आ बात मानी है कै दैणो, मरणो अर मारणो जैड़ा तीन काम समझणां सूं पार नीं पड़ै ऐ तो नाम राखण सारू काला ई कर सकै-

नर सैणां सूं व्है नहीं, निपट अनौखा नाम।
दैणा मरणा मारणा, कालां हंदा काम।।

ऐड़ी ई एक बात है लोहियाणा रै कुंवर नरपाल देवल री।

बात चालै कै चंद्रावती रै सेठां री एक जान भीनमाल सूं ढालेती रुड़ा अर सदा रै रुखाल़ी में गाजै-बाजै सागै जाय रैयी ही कै अचाणचक रंग में भंग पड़ियो। धाड़व्यां जान माथै हमलो कियो। मारकाट मची जिणसूं रुड़ा रो माथो कटग्यो पण रुड़ो रणांगण में कटिये माथै ई ऐड़ो लड़ियो कै धाड़वी आपरो मूंडो लेय न्हाठा।

रुड़ै आपरी तरवार नै आपरै वागै सूं पूंछी अर म्यान में घाल सुरग रो राही बणियो।

जान आगलै मुकाम सारू लोहियाणा पूगी। सदो जान नै निझोखमी आगै पूगावण सारू अठै रै धणी राणा धांगा कनै गयो अर सहायता मांगी।

सदै जैड़ै साहसी रो उतर्योड़ो मूंडो रो कारण धांगै पूछियो।

सदै आद सूं अंत तांई सारो वाको सुणायो तो सुणर धांगै कैयो कै अबै निचींत रैवो, जान सुरक्षित पूगावण रो जिम्मो म्हारो है। आ बातचीत होवै ही जणै राणै धांगै रो बीस वरसां रो कुंवर नरपाल़ ई कनै बैठो हो। जद सदा रुड़ै री तरवार पूंछर म्यान में घालण वाल़ी बात बतावै हो जणै नरपाल़ बिचै ई बोलियो कै-
“रुड़ैजी काम तो अंजसजोग कियो। थे बतायो कै रुड़ोजी धरण माथै पड़ण सूं पैला वैरियां रै रगत सूं रंगी तरवार नै आपरी अंगरखी रै पल्लै सूं साफ कर र म्यान में घाली!! म्हनै तो आ बतावो कै उणां आपरी करमाल़ अंगरखी रै बारलै पल्लै सूं मांजी कै मांयलै सूं? जे मांयलै पल्लै सूं मांजी जणै तो निसंदेह रुड़ोजी वंदनीय वीर हा अर जे बारलै वल़ा पूंछी जणै कोई ठावको वीर नीं हो!!”

नरपाल़ री आ बात राणै नै अजोगती अर अचेरी लागी। उणनै आपरै कुंवर रो ओ बोचरड़ापणो लागो सो उण रीस में कैयो कै-
“हां ! आ करामात तो तूं करर बतावैला!!”

आ सुण उणी द्रिढता सूं कुंवर कैयो – “हां हुकम ओ काम हूं करर बतावूंलो!!”

कुंवर री इण बात आग में घी रो काम कियो। राणो रीस में बोलियो कै – “हूं तो पाको पान हूं कणै ई झड़ सकूं ! कुण देखेला थारी आ वीरता?”

कुंवर उणी नेठाव सूं कैयो – “हुकम हूं ओ काम तीस वरसां री ऊमर ईज कर बतावूंलो!!”

अबै राणै विचार कियो कै मांचो ऊंधै बख बिणीज रैयो है। उणनै ठाह हो कै असली रै बाप अर बोल एक होवै सो उण विचार कियो कै कीकर ई कुंवर शै ठंडो-मीठो करर ओ जिद छोडायो जावै। उण आपरी कुंवरी नै बुलाई अर कैयो कै “थारै भाई नै कीकर ई जिद छोडा। तूं पांच वरस थारी का़चल़ी रा मांग जिको कुंवर री ऊमर तीस सूं बधर पैंतीस तो होवै!!”

नरपाल़ री बैन आई अर भाई सूं मिली। दोनूं अणमणा। सेवट बैन कैयो “भाई ! हूं कीं थारै सूं मांगूं तो देवैला कांई?”

नरपाल कैयो – “बैन ई तो एक ऐड़ी है जिको भाई रो दियो लेवै! तूं जको ई मांगैला वो हाजर है थारै सूं आछो म्हारो ओ माथो ई नीं है!!”

“तो म्हनै थारी ऊमर रा पांच वरस, म्हारी कांचल़ी रा दे!! तूं तीस री जागा अबै पैंतीस वरसां में ओ काम करजै!!”

आ सुणर नरपाल़ कैयो “नीं बैन कालाई नीं करणी। हूं राजपूत हूं, कैयो सो कियो। वचन अफूठा नीं फुरै सो म्हारी ऊमर रा पांच वरस तनै कांचल़ी रा दिया। हमे हूं काम तीस री जागा पच्चीस री ऊमर में करू़लो!!”

आ सुण बैन कैयो – “म्है पांच बढावण रो कैयो घटावण रो नीं।”

आ सुण नरपाल़ कैयो “पांच बढाया जणै तो म्है लिया तनै कांचली रा कांई दिया? सो हूं बैन सूं लेय पाप रो भागी नीं बणूं। म्है तनै पांच दिया”-

मरदां मरणो हक्क है, मगर पच्चीसी मांय।
गोखां रोवै गोरड़ी, मरद हथायां मांय।।

वरस तीसां तणा तांम कीधा वचन,
परत नह जीवणो जठा पूठा।
कांचल़ी तणा दे वचन बाई कैयो,
छापिया जका मैं वचन छूटा।।

नरपाल़ आपरै मरण मतै साथियां रो एक दल़ बणायो अर आसै-पासै रै वीरां नै ललकारतो इण मरण उछब नै मनावण सारू खेटा करण लागो पण साक्षात मोत सूं भेटा करण कोई नीं संभियो। सेवट सोमनाथ मंदिर नै विधूंस अलाऊद्दीन खिलजी सिरोही रै गांम जीरावल़ रै सीमाड़ै निम्बज कनै आयो जणै नरपाल़ उणनै बोकारनै लड़ियो-

सींहां हक मरणो सदा, धरणो शंकन धार।
जुद्ध करणो छक जोवजै, निरणो छेड़ै नार।।
पख छाड्यां लाजै पखो, नवहत्थ बाजूं नार।
धमगजरां तोपां धुब्यां, उण पुल़ देखै आर।।

नरपाल़ अर नरपाल़ रा साथी भूखै नाहरां ज्यूं खिलजी री सेना माथै तूटग्या। भिड़ण सूं पैला नरपाल़ आपरै खास साथी गांगसी नै कैयो कै “तूं फखत देखैला अर म्हारै जुद्ध रो साच वरणाव राणैजी नै सुणावैला!!”

कैयो जावै कै नरपाल़ भयंकर मारकाट मचाई जिणसूं एकर तै खिलजी ई डरग्यो पण घणां आगै जोधार हारता रैया है सो नरपाल़ ई केई वैरियां रा माथा बाढिया पण एक दुसमण रै हाथ रो ऐड़ो झटको बुवो जिको नरपाल़ रै माथै नै लेतो गयो। नरपाल़ बिनां शीश ई लड़तो रैयो सेवट देह जवाब देवण लागी जणै आपरी आंगी रै मांयलै पल्लै सूं तरवार मांज, म्यान कर आपरा पिंडदान करर वीरगत वरी।

आ सगल़ी कथा गांगसी आय राणै नै सुणाई। नरपाल़ वीरगाथा नै अमर राखण सारू राणै धांगै केसवा गांम रै पाखती गाम ‘गढ’ में स्मारक बणाय इण वीरता नै अमरता दी।

किणी चारण कवेसर इण पूरी घटना नै ग्यारहै दूहालां रै गीत में पूरी समाहित करदी। भाव भाषा, अर बणगट सूं सजोरै गीत रो एक दाखलो-

अभंग धांगोतणो वाग जिम उरड़ियो,
उरड़ियो सैदरै साथ अतरै।
मारियो एक तरवार हूंतां मुगल,
साझिया कटारी हूंत सतरै।।
वचन नरपाल़ रा नांज जावै व्रथा,
भेजियो संदेसो फौज भांजी।
कमल पड़ियां पछै मार अर म्यांन की,
मांयलै पलै तरवार मांजी।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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