कागद़ लिखदूं थानें साई!

krishnavirah

कागद़ लिखदूं थानें साई!
मन रा आखर भाव मांडदूं, कलम नेह रसनाई!

बालम! साजण! पीव! छबीला! छैला! कुंवर कन्हाई!
रसिया! मन बसिया!, नट-नागर! कहूं आप नें कांई!1

अठै आप बिन दाय न आवै, मन री कही न जाई!
बाटूं बिरह व्यथा जो ब्रज में, हँससी लोग लुगाई!2

बृन्दावन में बन बन डोलूं कुंज-गली, अमराई!
पण थें दीठा नहीं साँवरा, खोज खोज पछताई!3

महि मटुकी सिर माथ लेय नें फिरती नित ब्रजराई!
आवो गोरस आप अरोगो, थोंरे मिस हूं लाई !4

द्वारा नगरी रा थें ठाकर, थोंरे घर ठकराई!
म्है अबोध ब्रजबाल़ वडी औ, करम तणी कठणाई!5

नित प्रत राजिवनेण उडीकूं, कर कर कोड घणाई!
पण थें परतख मिल़ो न प्रीतम, हो भल मन रे मांई!6

नरपत री अब स्याही नीठी,चीठी लिखी न जाई।
मीठी थारी याद माधवा, दीठी दरद दवाई।।7

लिखितंग थोंरी एक लाडली, ना मीरां राधाई।
नाम आप जाणों हो नटवर, इणसूं लिखती नांई।।8

~~©वैतालिक

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