कांई आपरै आ मनगी कै म्है आपनै मार दूं ला?

भरमसूरजी रतनू आपरै समय रा मोटा कवि अर पूगता पुरुष हा। इणां नै मेड़ता रा राव जयमलजी मेड़तिया मौड़ी अर बासणी नामक दो गांम देय कुरब बधायो। भरमसूरजी रा डिंगल़ गीत उपलब्ध हैं। इणी रतनू भरमसूरजी री ई वंश परंपरा में ईसरदासजी रतनू हुया। जद अकबर चित्तौड़गढ माथै आक्रमण कियो उण बखत जयमलजी मेड़तिया री सेना में रतनू भरमसूरजी अर ईसरदासजी मौजूद हा। कह्यो जावै कै भरमसूरजी इण लड़ाई में वीरगति वरी–

चारण छत्री भाइयां, साच बोल संसार।
चढियो सूरो चीतगढ, अंग इधक अधिकार।।

जयमलजी मेड़तिया जैड़ै जबरेल वीर री वदान्य वीरता नै अखी राखण सारू ईसरदास जी ‘जयमल मेड़तिया रा कवत्त’ लिखिया। आ रचना डिंगल़ री महताऊ ऐतिहासिक रचना मानी जावै। रचना री एक बांनगी कवि री मेधा नै दरशावण सारू-

आभ लग्ग रिण बग्ग, किये कर खग्ग करारै।
दियै धार पाहार, सार सेलार संघारै।
भरै बत्थ समत्थ, करै खल़हट्ट निहट्टो।
रूक झट्ट खत्रवट्ट, हुवै थट्टां आवट्टो।
ऊछल़ै जीव जल़ तोछतै, तड़फड़ धड़ भड़ माछ जिम।
जैमाल करै चित्तौड़ सिरि, रामायण हणमंत जिम।।

इणी ईसरदास जी रतनू नै आमेर राजा मानसिंहजी करोड़ पसाव रै साथ खेड़ी नामक गांव भेंट कियो। उल्लेखणजोग है कै महाराजा मानसिंहजी एक दिन छ चारण कवेसरां नै छ करोड़ पसाव कर’र छव गांम इनायत किया-

कोट कचोल्यो डोगरी, भल सांसण भैरांण।
खेड़ी और गंगावती, मांन दिया महरांण।।

कह्यो जावै कै जद दरबार सूं सीख लेय ऐ छवै ई कवेसर आप-आप रै डेरां गया तो दरबार आपरा आदमी मेल पतो करायो कै कवेसर इण खुशी में कैड़ोक कांई उछब मनावै। जद वै आदमी छदम वेश में हर कवि रै डेरे पूगा तो वां देखियो कै ईसरदासजी रतनू नै छोड’र सगल़ै कवेसरां रै डेरे तापड़धींग उडै हा। वां दरबार नै अरज करी कै – “हुकम एक ईसरदासजी रै ईज मोल़-माल़ ही बाकी तो सगल़ां रै मंगल़ गाईजै हा।”

आ सुण’र दरबार कह्यो कै – “जावो ईसरदास जी नै दिनूंगै पाछा तेड़ावो।”

हाजरियां दरबार रो आदेश ईसरदासजी नै सुणायो तो वै अजेज हाजर हुय मुजरो कियो।

दरबार पूछियो कै – “कांई बाजीसा आपरै घरै सब कुशल़-मंगल़ तो है नीं?”

“हां हुकम !आपरी किरपा सूं आणद है।”

“तो पछै रातै आपरै डेरे करोड़ पसाव अर गांम रो उछब नीं करीज्यो?” दरबार पूछियो तो ईसरदासजी कह्यो – “हुकम! इणमें कांई कोड ? खेड़ी री कांकड़ है कितरीक ? चार भैंस्यां ऊभै नीं मावै! पछै इतरीक जमी पाय हूं कांई फैंगरीजतो?”(मिथ्या गर्व)

“बस! आ ईज बात ही कोड नीं करण री कै कोई बीजी बात ही?” दरबार पूछियो तो ईसरदासजी कह्यो – “हुकम ! ही जिकी आपनै अरज कर दीनी।”

दरबार उणी बखत ईसरदासजी नै झोड़ूंदो-भोजपुरियो नामक दो गांम इनायत किया।

आं ईसरदासजी रै तीन बेटा हुया – जगमालजी, जैतसिंहजी अर उदयराजजी।

जैतसिंहजी रै छव बेटा हुया – गोरखदासजी, रामसिंह जी, जगन्नाथजी, किशोरदासजी, अचल़दासजी अर…..।
आं में जगन्नाथजी रतनू रो नाम इतियास में चावो है। आज ई कवेसर आदर रै साथै रतनू जगन्नाथ नै याद करै-

अड़ियां नह मुड़तो अडर, भिड़ियां दल़ भाराथ।
धर चावी ढूढाड़ रो, नर रतनू जगन्नाथ।।

रतनू जगन्नाथजी भीमकाय मिनख हा। जितरा डील रा डारण उतरा ई खूराक। एक दिन उणां नै दूध पीवतां नै देख’र उणां रा भाई गोरखदासजी कैय दियो कै – “इयां कांई पेट है कै खोगाल़? आध में लांकी(लोमड़ी) अर आध में पूंछ!” यानी आध में पूरो घर अर आध में एकला जगन्नाथजी।

आ बात स्वाभिमानी जगन्नाथजी नै खुभगी। उणां कह्यो कै – “वाह दादू भाई ! म्हनै तो आज ठाह लागो कै थे म्हारा कवा गिणो!पेट तो म्हारै सूं कठै ई राखीजै नीं। आपनै म्हारो पेट(खूराक) दीसग्यो पण हूं रात-दिन रड़धो(कठिन काम) करूं वो आपनै नीं दीखियो। कोई बात नीं आप, आपरो घर अर दूध काठो राखो।” आ कैय वै अजेज गांम छोड आमेर गया परा। उणां रै तेमड़ाराय रो इष्ट हो। उणां भगवती नै चितारी-

अंबेगिररायाजी,
झोड़ूंदै री रायाजी!!
खल़-गण वरण करण सतखंडी।
मिल़ नवलाख सगत ब्रहमंडी।
चारण वंश साय कर चंडी।
सदा सुररायाजी। गिर….

प्रभात रा आमेर महाराजा मिर्जा जयसिंहजी रै हाजर हुया। दरबार जगन्नाथजी रै नाम अर काम सूं घणा प्रभावित हा। हुवणा ई जगन्नाथजी विजनोट(हर प्रकार की युद्धकला में प्रवीण) हा। वां उणां नै पूगतो सम्मान देय गढ में डेरो दिरा दियो। जद पातसाह ओरंगजेब रो बुलावो दरबार नै आयो तो दरबार जगन्नाथजी नै ई आपरै साथै दिल्ली लेयग्या।

एक दिन दरबार आपरै डेरे सूं निकल़िया तो देखियो कै पातसाह आपरै कीं खास आदम्यां नै गोह(एक प्रकार की सांप प्रजाति, जिसकी पंजों की पकड़ मजबूत होती है) री सहायता सूं बुरज माथै चढण रो प्रशिक्षण दिरा रह्यो हो। उणां नै इयां करतां देख’र दरबार पूछियो कै – “जहांपनाह ! ओ कांई करा रैया हो?”

पातसाह कह्यो कै – “शिवाजी नै पकड़ण सारू कीं खास त्यारियां करां रह्यो हूं जिणमें एक आ ई है किण भांत गोह री मदत सूं बुरज माथै चढियो जा सकै।”

आ सुण’र दरबार कह्यो कै हुकम – “इणमें इण बापड़ी गोह नै दुख देवण री कठै जरूरत है? ओ काम तो म्हांरो जगन्नाथ रतनू छूटै हाथां सहज में कर देला!!”

आ सुणतां ई पातसाह रो मूंढो ढीलो पड़ग्यो अर इचरज करतां बोलियो कै – “कांई साचाणी थांरो आदमी बिनां गोह री सहायता रै बुरज माथै चढ जासी!”

महाराजा कह्यो “हुकम इण सारू तो बुरज चढणो आंख वाल़ो फूस है।”

पातसाह कह्यो “बुलावो जगन्नाथ नै अर म्हनै चढा’र बतावो।”

महाराजा उणी बखत जगन्नाथजी नै डेरे सूं तेड़ाया अर सारी बात बताय आदेश दियो कै छूटै हाथां बुरज माथै चढ’र पातसाह नै बतावै।

अजेज जगन्नाथजी तो टप-टप आंख झपकतां ई बुरज माथै चढ’र दरबार नै पूछियो कै – “भल़ै कांई आदेश है हुकम ?”

महाराजा कह्यो – “बस! चढिया ज्यूं ईज नीचै आवो रा।”

ओरंगजेब री आंख्यां पीतल़ाइजगी। वो मूंढो ढीलो करतो बोलियो – “ओ जगन्नाथ तो म्हनै दो। म्है इणनै म्हारै खास अंगरक्षकां में राखसूं।”

दरबार काठमनां ओरंगजेब रै आदेश री पाल़णा करी अर करणी ईज पड़ती। ओरंगजेब दूठ पातसाह हो। जिको आपरै बाप नै भुंचाय-भुंचाय मार सकै हो तो दूजा तो उणरै लागता ई कांई हां!

दरबार कह्यो कै – “जगन्नाथजी आज सूं आपरो काम पातसाह री रक्षा करण सारू इणांरी सेवा में रैवण रो है।”

जगन्नाथजी कह्यो – “हुकम म्हारो काम तो आपरो आदेश पाल़णो है। आप ओ आदेश दियो है तो इणरी तामील करसूं पण पछै म्है फखत पातसाह रै आदेश बंधियो रैसूं, आ आप सोच लिरावजो।”

जगन्नाथजी, पातसाह रै खास अंगरक्षक नियुक्त करीज्या।

उण दिनां पातसाह ओरंगजेब, शिवाजी रै आतंक सूं डरियोड़ो हो। आचार्य धर्मवर्धन लिखै-

खसर करतां तिके असुर सहु खूंदिया,
जीविया तिके त्रिणो लेहि जीहै।
शब्द आवाज सिवराज री सांभल़े,
बिली जिम दिल्ली रो धणी बीहे।।

सो उण, मिर्जा राजा जयसिंहजी नै, शिवाजी नै पकड़ण सारू सेना देय’र मेलिया। जयसिंहजी आपरी सेना लेय’र शिवाजी रा पग दबिया पण शिवाजी रै घोड़ां री खेह ई दीसी नीं। महाराजा, घणा ई बांठकां झूड़िया पण शिवो नीं मिलियो तो नीं मिलियो।

कह्यो जावै कै एक दिन दरबार ऐड़े गांम में पूगा जठै जगरा रां, घोड़ां बांधण रा अर जाजमां जमण रा ताजा रातोका निसाण दीठा। उणां गांम वाल़ां नै भेल़ा कर’र धमकाया पण गांम वाल़ा तो जीवती माखी गिटग्या। वै सफा नटग्या अर कह्यो कै उणां शिवाजी नै नीं दीठा। सेवट दरबार उणां नै धीजो बंधायो अर लालच दियो तो ई उणां कह्यो कै – “हुकम ! म्है कोई कृतघ्णी थोड़ा ई हां जको शिवाजी री जासूसी करां? शिवो तो म्हांरै माथै रो मोड़ है। वो किणरै कारणै दोड़ै ? फखत म्हांरै कारणै। वो म्हांरो पाल़णहार, रुखाल़णहार है। माईत है म्हांरो।”

आ सुण दरबार रो मन ई द्रवित हुयो। उणां मन में विचारी कै एक तो म्है हिंदू हूं ! जको ओरंगजेब रै कारणै दोड़ूं! अर एक ओ शिवो है जको हिंदुवां री चोटी राखण कारण दोड़ै-

धज मंदिर हिंदू धरम, सद्ग्रंथ वेद सैनाण।
मारहठै साबत मही, रंग रखिया शिवराण।।

दरबार, गांम वाल़ां नै कह्यो कै – “कोई बात नीं, पण म्हारो एक रुक्को उणां तक पूगतो करण रो काम थांनै करणो पड़सी।”
उवां हां भरी। कह्यो जावै कै दरबार लिखियो कै – एकबार म्हारै सूं सैमूंढै मिलो। मनगत री बात करणी है।

कह्यो जावै कै एकदिन शिवाजी रात रै अंधारै में सीधा दरबार रै तंबू में पूगा अर नींद में सूता दरबार नै जगाय पूछियो कै “कांई आदेश हो?”

दरबार शिवाजी री निडरता रा कायल हुयग्या अर कह्यो- “म्हनै तो पातसाह री हाजरी बजावणी पड़सी पण म्है आपनै पकड़णा नीं चावूं सो म्हारै धकै पड़ण रो काम मत करजो। क्यूंकै जोग सूं म्हारै धकै पड़ग्या अर म्है नीं पकड़िया तो म्हारी राजपूती रै दाग लागसी।”

आ बात कीकर ई उडती ओरंगजेब रै कानां पड़गी। वो डरग्यो कै कठै ई दोनूं एक नीं हुय जावै? जे एको कर लियो तो मुगलाण मिटती जेज नीं लागसी। उण जगन्नाथजी नै बुलाया अर कीं लालच कीं डर-भो बताय आदेश दियो कै जयसिंह नै मारण रो काम फखत तूं ई कर सकै। सो म्हारो आदेश है कै दखिण में जा अर उणरै अंगरक्षकां में भेल़ो हुय उणनै मार’र म्हारी छाती सूं आ एक सिलाड़ी आगी कर।

जगन्नाथजी कह्यो “हुकम-म्हनै आप इण ऐवज में जको कीं बगसोला उणरो एक रुक्को बगसावो।”

पातसाह उणनै लिख दियो तो साथै ई जयसिंहजी नै लिख दियो कै – “शिवै जैड़ै खूंखार आदमी सूं सामनो करती बखत आपरै कीं हुयग्यो तो म्हारै जको घाटो पड़ैला उणरी पूरती नीं हुय सकै सो आपरी रक्षा सारू आपरो ईज आदमी जगन्नाथ मेल रह्यो हूं।”

आंधो तो दो आंख्यां ई चावै! सो दरबार तो जगन्नाथजी नै देखतां ई घणा राजी हुया जाणै प्रजल़ियो रूंख मेह रै छांटां लागतां ई पांगरै ज्यूं ई हिरदो विकसित हुयो।

जोग सूं एक दिन दोया-दो, घणी भांय(दूरी) आगा निकल़िया। एकांत देख’र जगन्नाथजी, महाराजा नै बोकारिया अर कह्यो-“जयसिंह संभल़! म्हारै हाथां आथ थारी मोत है। मारण नै तो म्है तनै घात सूं ई मार सकतो पण घात महापाप है सो सावचेत!!”

एकर तो दरबार जाणियो बाजीसा मसकरी करै पण साम्हो जोयो तो नागी तरवार जगन्नाथजी हाथ छिड़ी नागण ज्यूं लपरका करै ही तो बाजीसा री आंख्यां में जमराज बैठो दीखियो। दरबार तो जगन्नाथजी रै हाथां रो आपाण अर आपरो पाण जाणता सो मोत नै साम्हीं नाचती देख’र जबान कालरगी(हकलाने लगी)। शरीर थांथल़’र(ढीला पड़ गया) बेखाकै(बेकाबू) हुयग्यो। उवां कह्यो कै – “हमे आप ई मारण मतै तो म्हारो बचणो भवै ई नीं हुय सकै अर आपरो मुकाबलो करूं इतरी आसंग म्हारी नीं है।” कैयर नस पाधरी कर दीनी।

“वाह रे! राजपूत वाह!! थारै हाडोहाड बैठगी कै एक चारण आपरै ईज राजा नै मारैला! कांई कठै ई इतिहास में ऐड़ो दाखलो थे पढियो कै सुणियो कै चारण स्वामी सूं घात कै पाट घाव घातियो हुवै? लो ओ परवानो पढो।” आ कैयर जगन्नाथजी आपरै कनै सूं ओरंगजेब रो लिखियो एक रुक्को दरबार रै कांपतै हाथां पकड़ायो।

दरबार पढियो। पढती ई पूरी बात समझग्या। दरबार कीं बोलता उण सूं पैला जगन्नाथजी कह्यो कै – “हुकम ! जे हूं इण आदेश री तामील नीं करतो तो वो हरामखोर म्हनै मरा देतो जणै म्है तो मरतै आक चाबियो है। बाकी आप माथै हथियार उठाऊं उणसूं पैला मरण सिरै मानूं। हमे म्हारी अरज है कै ऊभा हो ज्यां ई अठै सूं परा जावो। थांरै माथै पातसाह घात तेवड़ली है। म्है कैय दूं ला कै जयसिंह, म्हारै सूं मरियो नीं अर कीकर ई म्हारै चंगुल सूं बचर नाठग्यो।”

दरबार सजल़ नैत्रां सूं जगन्नाथ नै अंकां भिड़ियो। पछै आपरी अमोल पाघ उतार र उणांरै माथै ऊपर मेली अर उणारी पाघ आपरै माथै यानी पाघ बदल़ भाई मानियो। दरबार कह्यो – “हुकम आज सूं आगला दिन आपरा बगसियोड़ा है। अठै सूं म्है कांई! आपनै ई साथै ले जावूंलो आमेर। म्है जाणूं उणनै !, ओ मिनख नीं पैणो हो।”

आ सुणर जगन्नाथजी कह्यो कै – “हुकम! म्है उठै! कठै हालूं ला? म्हारै उठै पगरखी खोलण नै ई जागा नीं क्यूं कै झोड़ूंदो-भोजपुरियो तो हूं भाभै सूं रीसाय छोड आयो, उठै पाछो हूं नीं जावूं।”

दरबार कह्यो कै – “हुकम ! उवा पूरी आमेर आपरी ईज है।”

दरबार अजेज दखण सूं टुरिया अर दिन लागां आमेर पूगा। पातसाह नै ठाह लागो तो हाथ मसल़तो रैयग्यो। उवो जाणतो कै जयसिंह सूं ज्यादा खेटा करण रो मतलब है हिंदवां नै एक हुवण रो मोको देवणो सो वो जैर रो घूंट पीय’र रैयग्यो।

इतिहास विद अर दिग्गज डिंगल़ कवि ठाकुर अक्षयसिंहजी रतनू (जयपुर) आपरी पोथी ‘अक्षय भारत दर्शन’ में इण घटना री साख भरतां लिखै–

जगन्नाथ रतनू नृप मरजी,
विश्वासी व्यौपायो।
बुलवायो हत्या हित बहु विध,
लालच दे ललचायो।
चारण स्वामि-भक्त नृप गुप चुप,
सजग कियो षड्यत्रां।
रक्षित लायो गाढ युक्ति रच,
महिआमेर स्वमंत्रां।।
राजनीतिज्ञ मिरजा राजा रा,
चारण प्राण बचाया।।

महाराजा जयसिंहजी, जगन्नाथजी नै नांगल़ गाम इनायत कियो। गांम ई नीं अपितु जगन्नाथजी रै रैवण नै हवेली, सीतारामजी रो भव्य मंदिर अर आठतीणो(जिस कुए से आठ चड़स एकसाथ निकालें जा सके) कुवो बणायर दियो।

जयसिंहजी खुदोखुद जगन्नाथजी री हवेली री नांगल़(प्रतिष्ठा) में नांगल़ पधार’र जगन्नाथजी रै प्रति कृतज्ञता जाहिर करी। आ ई नीं पछै ई आप अठै पधारता रह्या। जद जगन्नाथजी रो स्वर्गवास हुयो जद आप मोकाण(मृतक के यहां उनके घर वालों से मिलना) करावण पधारिया। जगन्नाथजी रै देहावसान सूं थोड़ै दिनां पछै जद उणां री ठखकराणीसा ई देवलोक हुयग्या तो दरबार इण दोनां रै प्रति आपरी श्रद्धा दरसावण सारू इणां री स्मृति में नांगल़ में दो भव्य छत्र्यां बणाई। किणी कवि इण बात री साख भरतां कह्यो है-

कमठांणा मंदर कुवा, छत्र्यां मोटी छाप।
पांच बार आमेर-पत, आया नांगल़ आप।।

ऐड़ै लोगां री बात ई ढल़ती रातां में गुमर रै साथै सुमरीजै।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”
संदर्भ: भंवरदानजी रतनू खेड़ी

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