कल़ाऊ रा काचरिया याद है !!

आलाजी बारठ कल़ाऊ रैवै। कनै घणो वित्त, घणो विभो। आगो दियो पाछो पड़ै। रामजी राजी। एक दिन वे आपरै चंवरै बैठा माल़ा फेरै हा जितै एक बांमणी आपरै डावड़ै नै लियां उणांरै कनै आई अर कैयो कै – “बाजीसा म्है आपरै शरण बिखो काढण अर दिन तोड़ण आई हूं!!”

उणां उणनै पूरो आवकारो देय एक झूंपड़ो रैवण नै दे दियो अर सीधै री व्यवस्था करदी। टाबरियो पांच-सात वरसां रो हो सो उणनै उणां आपरा टोघड़िया चरावण रो काम भोल़ा दियो।

एकदिन वो बाल़क टोघड़िया चरावतो-चरावतो सूयग्यो। उणी बखत एक कालींदर निकल़ियो अर आपरै फण रो छत्र कर र उण टाबर रै माथै छिंया करी। उण नाग री छिंया करणी होई अर अठीनै सूं आलाजी रो जोग सूं उठै आवणो होयो। उणां देखियो कै बाल़क निरभै नींद में सूतो है अर माथै फणधर छत्र कियां ऊभो है। वे सुगनी हा सो उणी बखत जाण लियो कै ओ कोई साधारण छोकरो नीं है ! कोई न कोई नखतधारी है-

सूतो चूंडो नींद सुख, सिर अह कीधो छत्त।
आलै जद ही जाणियो, छै कोई छत्रपत्त।।

मिनख री पगवा सूं नाग फण समट बिल में बड़ियो अर आलाजी टाबर नै जगाय पूछियो कै –
“तूं बामण तो नीं हो सकै! बता कुण है?”

जणै उण टाबरियै कैयो कै-
“आ बात म्हारी मा ई बता सकै, म्है नीं।” जणै उणां आय उण बामणी नै पूछियो कै – “थांनै धरम री आण है! साची बतावजो कै थे कुण हो?”

जद उण लुगाई कैयो कै –
“हूं वीरमदेव सलखाणी री जोड़ायत अर ओ म्हारो डीकरो चूंडो।”

आ सुण आलाजी कैयो कै –
“जुलम किया! म्हारै सूं बात छानी राखी। घर-घराणै रा माणस म्हारै घर बिखो भोगियो।”

थोड़ै दिनां सूं आलोजी चूंडैजी रै गाभा कराया, शस्त्र दिराया अर घोड़ो दे खुद महेवे मल्लीनाथजी कनै लेजाय उणां री सेवा में राखिया। कीं दिन मल्लीनाथजी अणमणा रैया पण सेवट उणांनै सालोड़ी थाणै राखिया। चूंडोजी नखतधारी अर भागिया मिनख हा सो आपरो प्रताप बधावता गया। कनला राजपूत चूंडैजी रै बधतै प्रताप रो ताप झाल नीं सकिया अर इणी कारण गांगदेव ईंदै आपरी बाई लीला चूंडैजी नै परणाय चौरासी गांमां सूं मंडोवर दायजै दे दी। किणी कवि कैयो है-

पह ईंदां रो पा’ड़, कमधज कदै न वीसरै।
चूंडो चंवरी चाढ़, दिवी मंडोवर दायजै।।

मंडोवर रा शासक बणतां ई चूंडैजी आपरै वैरियां नै गिण-गिणर पाधरा किया। इणां री कीरत दिन दूणी अर रात चौगणी बधती गी। इणां रो जस सुण एक दिन आलोजी ई मंडोवर गया।

उणां चूंडैजी सूं मिलण री करी तो राजकाज रै तामझाम सूं उणां नै मिलण में ई तकलीफ पड़ी। सेवट ऐ मिलिया तो राज मद में अरगीज्योड़ै चूंडैजी आलैजी नै, नीं तो आवकारो दियो अर नीं पूरो मन मिल़ायो। चूंडैजी रो व्यवहार आलैजी नै अखरग्यो। क्यूंकै जिणां रै घरै रैय चूडाजी रो बाल़पण बीत्यो अर राजा रै पद तक पूगावण में हाथ! उण साथै ई ओ बरताव सो कवि नै ई रीस आयगी अर उणां कैयो कै-

“हे चूंडा ! लागै कै तूं मंडोवर रै माल़ियां में भयरहित होयग्यो जद ई तो तनै म्हारै घरै खाया कल़ाऊ रा काचरिया याद नीं आय रैया है-
चूंडा नावै चीत, काचर कल़ाऊ तणा।
आछो भयो अभीत, मंडोवर रै माल़ियां।।”

“हे चूंडा ! घर रा दीपक तो घणा ई होवै पण कुल़दीपक कोयक सो ई होवै!! आ तो तूं जाणै ई है कै चांद रै बिनां तारां रो किसो तेज है?-
घर दीवा घण होय, कुल़ दीवो कोयक हुवै।।
तारां तेज न होय, चंद बिहूणो चूंडड़ा।।”

“हे चूंडा ! कोयक सा हुवै जिणां रो थापित नेह थिर रैय सबल़ो बणतो जावै बाकी तो थारै दांई आपरै घरै नेह सूं तो बस सकै बाकी नेहियां रै चित्त में नीं बस सकै-
रह सकै तो रेह, थिर हेतो सबल़ो थियो।
घर बसियो घण नेह, चीत न बसियो चूंडड़ा।।”

इण दूहां नै सुणतां ई चूंडाजी रो राजमद उतरग्यो अर वे बोल पड़िया – “खमा बा! खमा!! माफी चावू़ं। भूल होई। कल़ाऊ रा काचर अजै ई म्हारै पेट में है थांरो ओसाप म्है नीं भूल सकूं।”

आ कैय चूंडैजी आसण सूं उठ आलाजी रा चरण वंदन किया अर पूगतो सनमान देय भांडू जागीर इनायत करी।

आलैजी रै तीन बेटां री विगत मिलै। दूल्होजी, गोरजी अर दूदोजी।

दूल्हैजी रै घरै महाशक्ति मालणदेजी रो अर गोरजी रै घरै महाशक्ति सूरमदेजी रो जनम होयो तो दूदोजी आपरै अदम्य साहस अर भुजां रै आपाण रै पाण चावा है।

जद राव जोधैजी हरबूजी रो खीच जीम उणां रै आदेश मुजब मंडोवर माथै हमलो कियो उण बखत बारठ दूदोजी ई उणां री सेना में हरोल़ हा। मंडोवर गढ री पोल़ महापराक्रमी दूदैजी आपरै बाहुबल़ अर छाती रै पाण भांगी। पछै रावजी मांया बड़ सिसोदियां नै झूड़ राव रिणमलजी रो वैर लियो।

मंडोवर सूं मेवाड़ां नै मुरड़र काढण अर रिणमलजी रो वैर लेवण में रैयी दूदैजी री अंजसजोग भूमिका री साख भरतां किणी समकालीन कवि लिख्यो है-

मारे सुत मेवाड़, वैर धणी रौ वाल़ियो !
कांठा तणा किमाड़, आंवलिया थें आलवत !!

आलोजी भक्त अर नखतधारी मिनख हा सो उणां रै घरै दो-दो महाशक्तियां रो एक ई साल 1491वि. में अवतार होयो। उणां रै बेटे दूल्हैजी रै घरै मालणदेजी जनमिया जिणां रो ब्याव राजाबंध रा कविया टीकमजी साथै होयो तो इणां रै बेटे गोरजी रै घरै जनमिया सूरदेजी री शादी सुवेरी रा लाल़स कान्हजी रै बेटे रायसिंहजी साथै होई।

कान्हैजी कनै दूधाल़ी अर रूपाल़ी घणी गायां ही। झूंसरै में चरण जावती। एक दिन ऐड़ो जोग बणियो कै बाल़ेसर रै तफैदार मेहाजल़ भाटी री नजर उण गायां माथै पड़ी। उण अजेज गायां नै घोड़ा आगै दे आपरै थान मुकांम ले आयो।

सांझ रा दूवारी रो बखत होयो अर गायां आई नीं तो अठीनै बाछड़िया रंभावण लागा। घरै में चिंता होई। रात तो कीकर ई निकल़ी पण दिनूगै पाग्यां पग देख्या तो ठाह पड़ी कै कोई गऊचोर गायां नै बाल़ेसर कानी ले गयो।

घरधणी गायां रै पगै पगै जाय पूगा। मेहाजल़ सूं मिलिया अर कैयो कै – “भलै मिनखां थे राजपूत ! अर म्हांरी गायां लाया!! एक घर तो डाकण ई टाल़ै। कोई बात नीं आप भूल सूं ले आया, अजै ई कोई आखड़िया जेड़ा पड़िया नीं। गायां ले आया ज्यूं ई दे दिरावो। दूध अर दूवारी दोनूं रैय जावैला।”

पण जेठी तो फुर बैठी!! मेहाजल़ कैयो कै “थे पांतरै में आयारा अठै कुण ढगा लावै? अठै कठै गायां है? जावो भल़ै कठै ई जोवो।”

ओ दो टूक जवाब सुण जावणिया सात भायां री बैन रै ज्यूं मूंडो लटकाय पाछा सुवेरी आयग्या। बिनां गायां देख, जावणियां नै सूरमदेजी पूछियो कै “गायां कठै?” वां कैयो कै “मेहाजल़ गिटग्यो!!”

आ सुण सूरमदेजी कैयो कै-
“गायां चारणां री है ! इयां म्हारै जीवतां गिटै उण रात उणनै उणरी मा जायो नीं!! ओ तो मेहाजल़ है ! गायां तो सिंघ रै जबाड़ां मांय सूं ई काढ लाऊ!! ईनै म्हारी गायां जरै नीं!!” आ कैय खुद बाल़ेसर बुवा अर जाय मेहाजल़ नै बोकारियो कै-
“अरे गऊचोर तूं ई भल़ै राजपूत है! तनै ओ ई घर मिल़ियो चोरी करण नै। अजै ई हाथ फेरियो ओढणै जेड़ो है। ला म्हारी गायां दे!!” पण मेहाजल़ रै सूरमदेजी री बात सूं कान माथै जूं नीं रैंगी। उण मिजल़ाई सूं कैयो “थे क्यूं फोड़ो देखियो। म्है पैला आया उणांनै कैयो नीं कै म्हारै कनै कठै गायां है?”

आ सुणतां ई सूरमदेजी कैयो – “म्है गायां लेवण नीं तनै आगै मेलण आई हूं। म्हारै साथै थारा ई दिन खूटा।” आ कैय सूरमदेजी आपरै शरीर माथै जल़ छिड़क्यो अर मंगल़झाल़ा उपाय जमर कियो। कैयो जावै कै उणी रात मेहाजल़ भाटी रो रात रा प्राणांत होयग्यो। धनदानजी लाल़स रै आखरां में-

धिन क्रोध आतुर धारियो,
मह्माय म्याजल़ मारियो

उणी दिनां मंडोवर राव जोधाजी रै अंग में कोई ऐड़ी वेदन वापरी जको कोई ओखद नीं लागी। किणी आस्थावान कैयो कै सूरमदेजी रै जातरा अर चड़ावो बोलो। माऊ चायो तो जाणै थांरै कीं हो ही कोनी। रावजी बोलबा करी अर पीड़ इयां मिटगी जाणै वे कोई मिस करता होसी।

रावजी खुद उणा़रै थांन आय प्रसाद कियो अर उणांरै चरणां में चांचल़वै रो तांबापत्र 1521 वि. में भेंट कियो। इण बात री साख भरतां डिंगल़ रा दिग्गज कवि धनदानजी लाल़स लिखै-

जगतंब नाम जिहान में,
थिर प्रचा राजस्थान में
जोधाण प्रसिद्ध राव जोधो,
उपँग पीड़ अथाह।
खुद हस्त गूगल़ खेवनै,
द्रुति नमत सूरमदेव नै।

तो इण ओल़्यां रै लेखक ई लिख्यो है–

मेहाजल़ माचियो कुछत्र मही पर,
रुगट घरवाट री आण रेटी।
रसा पर भाटियां तणी वा रीत तज,
मछर में चारणां माम मेटी।।

जोवतां वेदना मिटाई जोध री,
कमध मन धारणा अडग कीधी।
मँडोवर छात पढ जाप मुख मातरा,
दुरस उर जातरा राव दीधी।।

चांचल़वा में आपरो थान आज ई इण बात रो साखीधर है कै आप अन्याय अर अत्याचारां रै खिलाफ लोकहित में जमर कियो। ओ ई कारण है कै थल़वट में आज ई सूरमदेजी लोकदेवी रै रूप में पूजीजै।

आलाजी रै दूजै बेटे दूल्हेजी री बेटी मालणदेजी रो ब्याव बिराई रा कविया टीकमजी साथै होयो।मालणदेजी रो वंश परिचय देतां कविश्रेष्ठ धूड़जी मोतीसर लिखै-

आले घर दुलौ अवल, पाय जनम परीयाण।
मालण दुले घर मुद्दे, जनम लियो घण जाण।।
हिंगलाज आवड हुइ, भूयण सगत सतभाय।
इम दुले घर अवतरी, मालणदे महमाय।।

टीकमजी आपरी बखत रा वीर, धीर अर साहसी मिनख हा। इणांरै इण गुणां सूं प्रभावित होय तोल़ैसर राव तोल़ैजी सूंडा (राठौड़) बिराई गांम दियो।

किंवदंती है कै जद टीकमजी दूलैजी रै घरै भांडू में चंवरी में बैठा हा, उणी बखत उणां कनै खबर आई कै तोल़ैसर री गायां सिराईयां घेरली अर लियां जा रैया है। गायां री वाहर तोल़ैसर रावजी रा कुंवर राणसी गया है। राणसी अर टीकमजी रै एकैदांत रोटी तूटै। आ खबर सुण टीकमजी आधै फेरां ई गंठजोड़ खोल उणीगत गायां री वाहर चढिया जिणभांत पाबूजी राठौड़ चढिया। डॉ शक्तिदानजी कविया लिखै-

पह तीन फेरा पाविया,
उणपुल़ संदेशा आविया,
कुल़ सुरभियां ले गया तसकर,
मह सुणै बंधमौड़।।

चढ चंचल़ अंचल़ छोड चल्यो।
हिव टीकम पाल मिसाल हल्यो।
कर रीस जको सिंघ शीश कपै।
मन झाल़ उंताल़ सुं माग मपै।।

महावीर टीकमजी उण मुसल़ां रै लारै खड़िया अर जाय भिड़िया –

तोल़ैसर री गाय टोरी,
धेख मुसल़ां धार।
जिगन में इम विघन जुड़ियो,
सांभल़ै समचार।
तो तद त्यारजी तद त्यार, टीकम समर में तद त्यार।।
पाल जिम पमँगांण पीठां,
अनड़ चढियो आय।
घाय अरियण वीर घेरी,
गाढ सूं पुनी गाय।
तो कविरायजी कविराय, कटकां कोपियो कविराय।। (गि.रतनू)

सिराईयां सूं मुकाबलो होयो। टीकमजी री टणकाई आगै सिराई टिक नीं सकिया अर गायां छोड पड़ छूटा पण जावता-जावता हाथी नै कुत्तो तोड़ग्यो वाल़ी बात करी। तोल़ैसर कुंवर राणसी उणां रै हाथां वीरगत पायगा।

जिगन में विघन पड़ियो। जीत रो जश्न फीको पड़ग्यो। गाढ सूं गायां घेर आपरी घोड़ी सवार टीकमजी आगै बैवै हा कै किणी आय कैयो कै – “कुंवरजी खेत रैया। ”

आ सुणतां ई उण वीर आपरी कटारी काढी अर कैयो कै – तो कांई हूं हमे गायां पाछी घेरण री जागा ठाकर साहब नै कुंवरजी री सुणावणी (मृत्यु की खबर) अर परचावणी (मृतक के विषय में सांत्वना देना आदि) करण जावूंलो!! हे ईश्वर निजोरी करी। कुंवरजी री रक्षा नीं कर सक्यो। कुंवरजी नै कांधै घाल कांई तोल़ैसर जावूंलो!! आ कैय उणां आपरी कटार काढ गल़ै घात, कुंवरजी रो साथ कियो अर मित्रता री अमिट मिशाल कायम की। डॉ शक्तिदानजी कविया लिखै-

कंवरागुर रांण प्रयांण कियो।
भड़ वंश सूडां अवतंस भयो।
कव सांभल़ हांभल़ नीं कुसल़ै।
ग्रह ली जमदाढ प्रगाढ गल़ै।।

ऐ समाचार भांडू अर बिराई पूगा। रंग में भंग पड़ियो।

मालणदेजी च्यार वरसां तांई आपरै पिहर ई विराजिया। चरखो कातण अर ईश्वर आराधना में समय व्यतीत करता पण एक दिन च्यार वरसां पछै इणां री भावज कोई कटुवचन कैयो जिणसूं रीसाय गाडी जोड़ाय बिराई आया अर जल़ सूं अगन प्रजाल़ नवलाख रै झूलरां रल़िया। डॉ शक्तिदानजी कविया रै शब्दां में-

हित ठौड़ भुजाइय झौड़ हुई।
गृह रूठ दुलाइय ऊठ बुई।।

जल़दाग लियो बिन आग जल़ी।
प्रमजोत उदोत मिल़ी प्रघल़ी।।

बिराई में मा मालणदे रो थान जहान में चावो। दिग्गज कवि हिंगल़ाज दानजी कवियां रै आखरां में-

बजै मालणा मात तुंही बिराई।
बल़ू तूं प्रिथीराज रै राजबाई।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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