🌺काळिया रा सोरठा🌺

गळ विच गूंजामाळ,मोर पंख रो मौड सिर।
रहजै थूं रखवाळ,करूणा सागर काळिया॥1
कविता बाग-कळीह,सौरम देवै सांतरी।
भावां शबद भरीह,केवूं साची काळिया॥2
अनहद नद बध बध बहै,अंतस होय अणंद।
दूहा सोरठा छंद,कल कल धारा काळिया॥3
लिखणौ ललित ललाम,कवित भाव री कोरणी।
सरजो सुबहा शाम,कंवळा आखर काळिया॥4
बंसी अनहद री बजै,कवि मन – कानन राज।
अद्भुत जिण आवाज,कांन सांभळे काळिया॥5
मनडा तणा मतंग,मत कर घण अभिमान थूं।
सखा न होसी संग,कहूं ज जातां काळिया॥6
पग पग भमूं पहाड,ठौड ठौड ठोकर लगे।
जाळै ब्रज रा झाड,कठे गयो रे काळिया॥7
राधा रा रसराज,मीरां रा मन मोहना।
आव सुणै आवाज,कुकूं ठाकर काळिया॥8
वाणी नें वीणा बणा,आखर अलख अराध,
सुरसत री कर साध,कर कर लेखन काळिया॥9
फूंदी पाटल फूल, सौरम लेवण ने सदा।
सखा! रहे बिच शूळ,(पण)कांटा लगै न काळिया॥10
ठाकरियौ हर ठौड, जळ थळ पातळ जीव में।
सचर अचर सिरमौड,कर उण वंदन काळिया॥11
हिय जिण हरि हरमेश, शंकर चित मह है सदा,
कदे न होवे क्लेश ,काया उण रे काळिया॥12
धरतां जिण रो ध्यान, सकळ सुमंगळ काज सिध,
गोविंद रा गुणगान, कर सुध मन सूं काळिया॥13
निहचै शुध्ध निपाप, सूर -जोत, शीतळ- ससी।
अलख आतमा आप,कंचन साचौ काळिया॥14
वामन वळे विराट, सबळ निबळ वो हिज सखा!
खरौ देव खुर्राट, काळी नाथण काळिया॥15
हर इक सूं रख हेत, पंखी ,तरवर, कीट, पशु ।
जादव बैठौ जेथ,कर दरसन उण काळिया॥16
पंखी दोय सुपंख , जीव शिव इण जगत मंह।
झाड देह रो झंख,करै वियामौ काळिया॥17
रहै सदा रिछपाळ, पाळक पोसण हार प्रभु।
मुरलीधर मतवाळ,कायम भगतां काळिया॥18
भामण मां पितु भ्रात, जगत तात जगदीश इक।
है मुरली जिण हाथ,कर समरण उण काळिया॥19
खरौज खेवणहार, जग जळ बूडत जाज रो।
हेलो करौ हमार,केवट आसी काळिया॥20
नद बण बादळ नीर, जिम महरामण जा मिळै।
(इम)वंदन सब रा वीर!,केसव पूगै काळिया।21
पिता मात परिवार, मिंत हितैसी मनुज रा।
किणरी चले न कार,करम मिटावण काळिया॥22
कीडी सदा करोड, जतन करै दर जोडती।
धरम काज इम दोड,कळजुग मांहि काळिया॥23
मडो जळाय मसाण,सारा घर जावै सगा।
करियोडो कल्याण,केवळ साथी काळिया॥24
रहसी धोबो राख ,दाह लागतां देह री।
सद- कारज री साख ,कवण मिटासी काळिया ?॥25
कर कर जतन करोड,जोड सुकृत जगमांह थूं।
जस इज जोडा-जोड, कहतौ रहसी काळिया॥26
वनिता लग घर- बार,मिंतर चलै मसाण तक।
जातां इण जग लार,कुण चाले है काळिया?॥27
बन रण वैरी बीच, आग उदधि जळ अनड सर।
कळजुण रे इण कीच,करम बचावै काळिया॥28
कीकी फूट्यां आंख, कीकर देखै जगत कह ?
(इम)नेकी बिण नाहाक ,काया थारी काळिया॥29
सूंप्यां क्रोड पसाव,समय गयौ नँह सांपडै।
गोविंद रा गुण गाव,कर ले वीणा काळिया॥30
सदा न रहै सरीर,संपत पण थिर नँह सखा।
हिव धर हळधर -वीर,करूं अरज सुण काळिया॥31
सत कीरत शुभ कोट,मेटण सूं मिटसी नही।
राजी हुय दे रोट,करो धरम कछु काळिया॥32
वित मन, वळ वडताह, जोबन छाया जींदगी।
चंचळ छह चितराह,करो सोच मन काळिया॥33
देण दीन जन दांन,साच, अहिंसा, सरल़ता।
ऐ चारूं अहनांण, कहूं सजन रा काळिया॥34
सील ,खमा, अर साच,दया अहिंसा, दान ,तप।
रहै हियै जिण राच,कहिजै धरमी काळिया॥35
कहियौ अधम करूर,सजण सरलता सद धरम।
रख मन याद जरूर, केवूं सांभळ काळिया॥36
सैण मिलण, सुख भोगऊजळ कुळ ,संपत अनँत।
नित जस, देह निरोग,कोइक बिरला काळिया॥37
सुख साचो संतोस,माफी सो नँह तप मही,
दाख्यौ तृष्णा दोस,करो दया उर काळिया॥38
तांण क्षमा तलवार,सदा वार करता सजण।
है मोटो हथियार,करों माफ शठ काळिया॥39
सदा निबळ गुण रास, सद आभूषण सैण रो ।
क्षमा साबरी खास,कामण मंतर काळिया॥40
नृप बळ राज विधान,दुरजन बळ हिंसा सदा।
बळ तिय मीठी बाण,खमा सुजन बळ काळिया॥41
वडी भूख वपु पीड,चिंता चिता समान वळ।
निरभय क्षमा ज नीड,कहलावै जग काळिया ॥42
नर है जो पुरनूर, ग्यान सील गळमाळ धर ।
है सँग माफी हूर, कहौ शाह उण काळिया॥43
ग्यान वडा गहणौह, जोड नहीं जिणरी जगत।
जाचत जणों जणौह, कछु न शरम कर काळिया॥44
अनहित करे अपार, अर मन बाळे आग बिन।
अजब क्रोध अंगार, कहतौ ठारै काळिया॥45
कुवचन, निंदा, खोड, दुरजन काढै रात दिन।
सज्जन संतां जोड,क्रोध करे नँह काळिया॥46
वसु मोटा मां बाप , परतख परमेसर परम।
पातक बळे अमाप,करतां वंदन काळिया॥47
मिळे जेथ नँह मान, विधा ,बांधव, हेत वळ।
वीर ! त्याग वो स्थान,कहतौ थाने काळिया॥48
आया आदर भाव, वळे बोलणा मधु वयण।
रखणौ राख रखाव,कठे रह्यौ अब काळिया॥49
देवण सूं जळ- दान, मेघ रहै नभ मांय नित।
सदा ज उंचे स्थान,कीरत दानी काळिया॥50
उदधि सूम अणथाह,जळ संचय करतो जगत।
वीर! करै कुण वाह,केय कृपण री काळिया॥51
देजे वित रो दान, वा निज हित वापर सदा ।
वीर ! वुआ अवसान,कहलासी पर काळिया।52
निहचै उत्तम दान,मध्यम वैभव माणणौ।
निम्न नाश वित जाण , कही त्रिगत धन काळिया॥53
माखी जिम मधुकोष,कृपण जोडतो कोटि इम।
खल – जन ले जद खोस,कछुन कर सके काळिया॥54
वित सूं वाधै लोभ,विधा वधतां मद वधे।
माणस विद धन मोभ,कळजुग बिरला काळिया॥ 55
संत सुजन नित सेव, सत साहित समझण सदा।
लहर ज्ञान नित लेव,कथा श्रवण कर काळिया॥56
दुर्लभ ज्ञान प्रदीप, भाव भर्योडो तेज जिण।
सखा तूं राख समीप,कर फिर कविता काळिया॥57
भल विधा भंडार,वापरतां वसुधा वधै।
सुरसत रो संसार,कदै न नीठौ काळिया॥58
वायस करतां बीट, महिमा नह मिंदर घटै।
देख उणीं थूं दीठ,कहतो जग ने काळिया॥59
वायस गरूड बणाव, करियां खगपति किम हुवै?
प्राक्रम बिन सिरपाव,कवण नवाजै काळिया॥60
लागा थारे लार,आखर लिखवा ओपता।
भाव तणों ओ भार,कीकर सहसी काळिया॥61
मथुरा थारी मीत,गोकुल़ अर द्वारामती ।
पाळे आदू प्रीत,करे हेत मन काळिया॥62
आखर रो उपदेश,राखो उध्धव निज ह्रदय।
कहौ द्वारिका देश,कीकर है मौ काळिया॥63
देखे नाडी वैद, लेस रोग लाधै नही।
ओखद आश उमेद,केवल़ थूं है काळिया॥64
आखर भर उर पीर,डुंगर दुख रा दाखणा।
व्हाला हळधर- वीर,किकर कह दे काळिया।65
नयणां बहता नीर, काजळ ढुळियौ तिण मसि।
विरह कलम वपुपीर ,कागद लिखती काळिया॥66
काळींदी रो कूल, बंसी वट री वाटडी।
फोगट वळै फिजूल,कहती थां बिन काळिया॥67
रोय बिताउं रैण,जोय बाट जागूं दिनां।
राधा -राजीव नैण,कुमळाया रे काळिया॥68
ठाकर ! कियो न ठीक, गयौ बिरज सूं गोप पत।
नैणा रहत नजीक, (तौ) करती काजळ काळिया॥69
दिल री काढूं दाझ, अब किण री आसा करूं।
रंग लाख रसराज, कठै नाठ गो काळिया॥70

(भैरू जी रे भाव रा)

हेलो सुणै हमेश,मामा थूं रहजे मदत।
वळे न चहूं विशेष,करजै इतरो काळिया॥71
तन सिंदूरी तेल,बळे चढावूं बाकरा।
छाक धरूंला छेल,कर किरपा अब काळिया॥72
लाखां दाखां लार, राखां नाखां तज लवँग।
तिण रो मद है त्यार,कहूं छाक ले काल़िया॥73
मलावास रे माय,मंदिर थारो मनहरण।
दिल नें आयौ दाय,कवि नरपत रे काळिया॥74
रोज बणै घण रोट, चोखा घी रो चूरमौ।
खावण पीवण खोट,कदे न थारे काळिया॥75
धूप दीप धमरोळ, थारे भैरव थान में।
छंद डिंगळी छोळ,कवि गूंजावै काळिया॥76
धुरै नगाडा ढोल,डमरू डाक डमाल डफ।
बाजै घूंघर बोल,कथूं भैरवा काळिया॥77
स्वान सवारी साज,खप्पर कर लिय खेतला।
करण मदद कविराज,कद आसी थूं काळिया॥78
वपु धर बाळे वेश, रे किरमाळी ! व्याल धर।
निरभय करे नरेश,करूं अरज औ काळिया॥79
धर काशीपुरधीश, वंदन वारंवार है।
रती न राखे रीस,कहतौ थानें काळिया॥80
हेला कियां हजार, कान न मांडे तो कहै।
किण सुं करूं गुहार,काला मामा काळिया॥81
हरि रा नाम हजार, बोलावौ बस भाव सूं।
नटवर नंद कुमार,कान्हा गिरधर काळिया॥82
है दुख अठै हजार, ठा नी है थन ठाकरा।
देही मनखा धार,क्लेश जाणवा काळिया॥83
तांदूल खातां तीन,राज दियौ तिहू लोक रो।
कांई रही कमी न,कठे सखा वे काळिया॥84
सौ गाळ्या शिशुपाल़,दीधा लग माफी दयी।
आगै वधतां आळ,कियौ नास उण काळिया॥85
कण कण कौरव कंस, थळ थळ है शिशुपाल थिर।
हे मानस रा हंस,कहूं जनम ले काळिया॥86
लेवण द्रौपद लाज,हरण चीर हरदम हुवै।
बेगो आ ब्रजराज, करण मदद अब काळिया॥87
जगह लही जिण जाल़, तरवर री तन छांह कज।
रहणो उण रखवाल़, कदै न कापों काळिया॥88
व्है वा घण विदवान,दूरजन सूं दूरी भली।
मणिधर अहि ने मान,कदै न पाळों काळिया॥89
घण फोरो व्है घास,वा जुडनें रस्सी बणै।
पकडै बण गळ -पाश,करे गयँद वस काळिया॥90
हिम्मत थूं मत हार,बार बार उठ वार कर।
झूझारू जोधार,करण फतह जग काळिया॥91
कीरत वीरत लार, उड आसी अणपार घण।
सौरम इण संसार,केवल सूरां काळिया॥92
जीवन रण जोधार,हार न जिण मानी ह्रदय।
तिणरा पथ ने त्यार,करे विफल़ता काल़िया॥93
भाटी जोडाजोड,भड किवाड उतराद रा।
रण बंका राठौड,कण कण मरुथल़ काळिया॥94
चहुदिश है चहूआण,वीर प्रसूता थळ वसू।
करतां जेण बखाण,काया अँजसे काळिया॥95
मेदपाट रे माय,सूर पतो संग्राम सी।
जिण रो जस जग गाय,कहतो जुग सूं काळिया॥96
रतन राण सोढाण, सूली चढियो देस हित।
गावै कीरत गान,कण कण मरूथळ काल़िया॥97
मेदपाट महराण, मरड तोड मुगलेश री।
सदा देश री शान,केवाणां जग काळिया॥98
बीका जोधा बेय,चरण शरण ली चारणी।
थिर नृप दुय थरपेय,करणी मां उण काळिया॥99
सदा भरै जग साख, किया तृपत हिक कूलडी।
नूंतरिया नवलाख,करनल बिरवड काळिया॥100
त्याग, विधा, पद,तीन, है पर नँह अभिमान हिव।
कहियौ वा ज कुलीन,कळजुग साचौ काळिया॥101
सूर लधै सौ – एक,सुकव लधै इक -सहस मँह।
नर दांनी मन- नेक, कळजुग दुर्लभ काळिया॥102
सुरभि दीधां घास,पय देवै माणस पुनि।
न ह्वै दांन वित नास,कियां सपातर काळिया॥103
पय दो नाग पिलाय,विख रो वा करसी वमन।
खल इम मती खिलाय ,कदियक डससी काल़िया॥104
उत्तम इळ अनदान,भूखा ने भोजन करा।
नर नें जाण नाराण,करा कलेवो काळिया॥105
वडौ ज विद्या दान, आखर शुभ दीपक अवनि।
महि पर खाटण मान,कर जन साक्षर काळिया॥106
दीधां विद्या दान,सारां जग कारज सरै।
आखर रा अहसान,कदे न उतरे काळिया॥107
ज्ञान धरी जट गंग, देह भसम गुण दीपती ।
रहै सदा इक रंग,कठे संत अब काळिया॥108
चेत ! जगत दिन चार,सत संगत सद ग्रंथ पढ।
कियां वृथा तकरार,केशव भज मन काळिया॥109
तंत्री वीणा तार, तूटत है घण तांणतां।
आप्यां ढील अपार ,कदै न बाजै काळिया॥110

🌹सूर्य वंदना के भाव के🌹

वंदन कर विख्यात,जगत तात जगदीस ने।
प्हेली ऊठर प्रात,काछप सुत भज काळिया।111
अवनी भरण उजास,नह चूके नित ऊगणौ।
सदा- रथिन् सपतास,काछप सुत भज काळिया॥112
भास्कर आदित भांण, मित्र मिहिर मार्तंड वळ।
करवा जग कल्यांण,कायम ऊगै काळिया॥113
दिनकर देव दिनेश, किरणमाली अंशु-सहस।
वरदानी विश्वेश,काछप सुत भज काळिया॥114
रंक हुवै या राव, जग रा हर इक जीव पर।
करै किरण छिडकाव,काछप सुत नित काळिया॥115
देखे हेकण दीठ,पापी धरमी पुहमि रा।
प्रतख जगत वड पीठ,काछप सुत नित काळिया॥116
जात धरम अर जीव, लेश भेद चित ना लहै।
समता रखै सदीव,काछप सुत नित काळिया॥117
ऋतु-करता, दिनराज,लाज रखै दुःख भाज दे।
सदा भरै सुख साज,काज आंपणै काळिया॥118
समदरसी हिक सूर,नर नारी चित भेद नँह।
नित वरसावै नूर,काछप सुत बस काळिया॥119
ज्योतिष ,जगत- जहाज, गतिमय ज्योतिर्मय गुणी।
विचरण रथ सत-वाज, काछप सुत नित काळिया॥120
नद सर पियै न नीर,निज फल़ तरु भोगै नही।
सज्जण तणो शरीर,कज परमारथ काळिया॥121
हरियल रखण हमेश, वरसै घन वसुधा वदां।
कण पैदा कर क्लेश, काटै जग फिर काळिया॥122
अरपै सदा अमूल,पर कज निश दिन वापरै।
फोरम लहै न फूल,कदी केवडो काळिया॥123
राखै नहीं रतन्न, रतनाकर खुद रे कने।
नर इम मोटे मन्न,कहिया दुर्लभ काळिया॥124
रूंख नमै फल़-भार,मेघ-सलिल मय मंद गति।
इम वित पाय अपार,कह्यौ जगत रह काळिया।125
पीडै खल तरु पंड, खंड खंड श्रीखंड पण।
अरपै गंध अखंड,कायम चंदण काळिया॥126
कंचन- कुंडळ कांन, करियां धारण किं सरै?
श्रवण न हो श्रुति-गान,कविता साहित काळिया॥127
दुशमण दुनिया होय, रखवाळी सांई करे।
( पण)कारी लगे न कोय,कुदरत रुठ्यां काळिया॥128
पाल़क बण थूं पोख, जतन करे नित जीव जिम।
कदिय न मारे कोख, कन्या नें थूं काळिया।129
व्हाला राख विवेक, समदरसी जग देख सब।
आतम चेतन एक,कीडी कुंजर काळिया॥130

( शिव वंदना का भाव)

शंकर री कर सेव,जटी, धुरजटी, गंग- धर।
वडो विभु महादेव,कर हर समरण काळिया॥131
परसु-धरण पिनाक,भाल-ससी , भव, भूतपत ।
कापालिक, कर- डाक,कर हर समरण काळिया॥132
नमन करो नटराज,पति नगराज- सुता, परम।
सकल दियण सुख साज,कुण है शिव बिन काळिया॥133
आसुतोस, ईशान, गिरिजावर , कैलास- घर।
अवढर दानी आन,कुण है शिव बिन काळिया॥134
नमोरूप निरवाण,रूद्र, ईश, कंदर्प-हर।
सदा ज बसै स्मशान,कर हर समरण काळिया।135
बाघांबर, गळ- व्याल, अस्थिमाल, आनंदघन।
काल- रिपु, महाकाल,कर शिव वंदन काळिया॥136
त्रिपुरारि ,त्रय- नैन,ध्यान-मग्न,वितरागवर।
सकल़ सुमंगल़ दैन,केवल शंकर काळिया॥137
भसमलसितवपु, भीम,शरणागत- सुख -अभयदा।
अनहद तथा असीम,केवळ शिव जग काळिया॥138
गटकावे नित भांग,गाल फुलावै, घोर-रव।
खपराळो खट्वांग,कह्यो जगत शिव काळिया॥139
तांडव प्रिय, तनु-स्याम; लोचण त्रय, अभिनव ललित।
नित ले सुध चित नाम,काशीपत भज काळिया॥140
हेठां मत हथियार, मेल समर रे मांय थूं।
भुज बळ जीवन भार,कहूं उठा अब काळिया।141
हिम्मत रे हथियार, झूझारू रण जीत ले।
मन रा भय ने मार,कर केसरिया काळिया।142
मान मरण -त्यौहार,लथ -बथ हुय लडणौ सदा।
विपदा दुख पर वार,करतौ रह बस काळिया143
हाथ घणा हथियार,पण साहस पँड में नही।
कदी कायमा यार,करजे मत थूं काळिया॥144
कीरत री लख क्रीत, वीरत कथ वाणी विमल़।
पाळ पुरातन प्रीत,केहर- नर बण काळिया॥145
कीरत रा गढ कोट, वीरत गाथा वीरवर।
वुआं बम्ब विस्फोट,कदिय न मिटसी काळिया॥146
तूं हिम्मत- तलवार,सदा राख तौ साथ में।
दुख भल आवै द्वार,कायर मत बण काळिया।147
व्यौम रहण नित बाज, झपटै पलटै जोर सूं।
खूब करै खगराज,कावादावा काळिया॥148
झपटै पलटै जोर,हणै कबूतर होलिया।
करडो बाज कठोर,कुण उण पाले काळिया॥149
आयां फूल अपार,फाबै द्रुम घण फूटरो।
सौरम बिन किं सार,केसूडा मँह काळिया॥150
घणी जगह ले घेर, फल़ विण फबै न फूटरो।
क्यूं बोवै कंथेर, कांटा मिळसी काळिया॥151
ओरण मांय अवेर,ओखदमय तरू ओपतो।
कांटाळो पण केर, काट मती उण काळिया॥152
आपै सुक्ख अतीव,रमा रूप है दीकरी।
कल़पा मती कदीव,कूं कूं पगली काळिया॥153
नेह नीर निज नार, सींच सखा मन औ समझ।
दारा आंगण द्वार,कांब कणेरी काळिया॥154
दुविधा मैं ग्या दोय,माया मिल़ी न राम जी।
कारज सर्यो न कोय,कंथा धरिया काल़िया।155
मन सूं गयौ न मैल,तन पर राख रमावतौ।
छल़ दै छोडे छैल,कौपिन धरवा काल़िया॥156
मांडी च्यारूंमेर, कविता वाळी कोरणी।
आखर दिया उकेर,कागद कोरे काळिया॥157
किणसूं करूं गुहार,हर दिस हाहाकार है।
भय अर भ्रष्टाचार,काळिंदर फण काल़िया॥158
केर, करमदी ,बेर, खावण रे हित खूब ही।
झूड लाकडी झेर,कर फिर भेळा काळिया॥159
हंसा उडै हमेश, मानसरोवर पथ गमन।
लघु सर रूकै न लेश,क्रोड कमळ लख काळिया॥160
एक एक जुड आ’र,मुश्किल रो मिणधर हणै।
भेळी वे अहि-भार ,कीडी तांणे काळिया॥161
हो भल हंसो हेक, सरवर री सोभा करै।
बुगलां बैठा के’क ,कदे न ओपै काळिया।162
जासी हंसो जेथ,गुण रा हुसी बखाण जग।
कह गुण लाधै केथ,कागा बुगलां काळिया॥163
पय जळ तणो विवेक, कागा बुगलां किम करे।
है इळ हंसा हेक, कहुं परख ले काळिया॥164
दझै झाळ सूं देह,काळा कर ठरियां करै।
नीच देवता नेह,कायम पीडै काळिया॥165
अगन सही अणपार, घाव घाट कज घण सह्या ।
तोलातां तिल-भार,कुंदन कळपै काळिया॥166
सखा! बाजवा सेठ,करै दलाली कोयला?
मान’र बिणज समेट,काळो हुवसी कालिया।167
हिंसक गुणां हजार, केहर सूं दुनिया कँपै।
वा पण शुभ वेवार, करै वघू सँग काळिया॥168
जस लेवण जग मांय,हिळ मिळ रहणौ हेत सूं।
साकर जेम सवाय,करै मधुर पय काळिया॥169
जाय भाग जद रूठ,क्रोड जतन सूं किं सरै।
उंचै बैठां ऊंठ, करडै कुत्तौ काळिया॥170

(प्रिय जन बिछुडण रो भाव)

जीणौ मरणौ जगत में, है इक सांई हाथ।
सगा रहै संगाथ, कृपा हुयां लग काळिया॥171
सांई नांखै सोगठा, खेले चौसर खेल।
छल कर छीनै छेल,कायम प्रियजन काळिया।॥172
सांई बड सरकार री,नहीं कचैडी न्याव।
छीन झपट छल दाव,कायम खेले काळिया।173
बूढां पण मा-बाप है,जग सुत सदा जरूर।
करडौ काळ करूर ,क्यूं छीनै पण काळिया॥174
सांई अर गुरूदेव सूं , पण है वड मां बाप।
जातां किणरा जाप,करणां जग में काळिया॥175
करता जो जन चाकरी, खरै देव ज्यूं खास।
श्रवण मात पितु दास,कळजुग दुर्लभ काळिया॥176
सांई ! नरमाई करो, आई रहो उबेल।
ठाकर मत दो ठेल,करौ चरण रज काळिया॥177
सखा सदा हिज स्वजन रो, थिर कर हिव में थान।
गाणां प्रिय गुणगान,कर नित वंदन काळिया।178
दगाबाज दुनिया सदा, सगा एक मां बाप।
सखा! गयां संताप,काया होवै काळिया॥179
साई देवै सेंग ने ,प्रिय बिछुडण रो रोग।
व्हाला तणौ विजोग, कठै हिया नें काळिया॥180
तरुवर हंदी टूंक,भाखर रे बैठ’र भले ।
काग करे लख कूक , कोयल बणै न काळिया॥181
सूंपै सदा सुवास,डाबा जिमणां दोय कर।
खोबै भरियां खास,कुसम भेद बिन काळिया॥182
अहनिश आठ पहोर,खरा सैण जग पेखिया।
काकर जेम कठोर,कुसुम सुकोमल़ काळिया॥183
सुख दुख तावड छांय,सुखी जनों रे पण सदा।
जिम बध-घट जग थाय ,कला चंद्र री काळिया॥184
देणो पर उपदेश,सरल़ घणौ संसार पण।
सखा! नजीरी पेश,करै ज विरला काळिया॥185
करणो पर उपकार, संभाषण सच, नेह सह।
सैणां रा संस्कार,कहिया जग में काळिया॥186
देखी इळ गत दोय,कुसुम समान कुलीन नर।
सिर ऊपर के सोय,के वन सूके काळिया॥187
सदा ज थिर दरसाव,रतन- दीप आंधी रहै।
सज्जण अडग सुभाव,कीकर पलटै काळिया॥188
लोहित उग्यां लाल, आथमतां अरुणिम रहै।
खरा मिनख इम ख्याल,कदिय न बदले काळिया॥189
जग बिच सैण जरूर,कष्ट सहै किरपा करे।
काया जळे कपूर,काज गंध जिम काळिया॥190
हर वन मलय न होय,सब गिरि रतन न संपजै।
करि मोती मय कोय,कोइ सुजन इम काळिया॥191
रहे सदा इक सार,सुजन वचन गजदंत सम।
अँग बदले आकार, कुटिल कछप सम काळिया॥192
सौरम जेम समीर, कण कण बांटै कुसुम री।
विदग विदग रां वीर!,कथै गीत इम काळिया॥193
काट, घाट घण क्लेस, हीरो तन पर जद सहे।
वाधै तदे विसेस ,कीमत उण री काळिया॥194
फांक्यां तरु घण फाल,वळै कल़ा घट ससि बधै।
चालै जीवन चाल ,कायम दुख सुख काळिया॥195
आदि मध्य अवसान,सदा सुजन इक रँग रहै।
ताप , काप ,पुनि ताण,कंचन टीप्यां काळिया॥196
आय नदी अणपार,रतनाकर मिळती रहै।
खल -सिंधु पण खार,कदे न छंडै काळिया॥197
बाघ भले व्रतधार,रात दिनां भूखौ रहै।
मृग पण आखर मार,करे पारणां काळिया॥198
असफल़ रो उपहास, सफल तणी इर्षा सदा|
खेल लखे जग खास, कुरलावूं मन काल़िया|| 199
“अलख” भणै जग ईश,भूंडो “परतख” नें भणै|
रखै करै सुण रीस, कलजुग है औ काल़िया||200
चित-बातां दुय-चार, बांट्यां प्हैल विचारजे |
भाई ! मन रो भार, कुण ढोवै है काल़िया||201
गूंथ्योडी लख- गांठ, उळझी जो सुळझै अवनि|
कदे न देवों काट, कुल्हाडी सूं काल़िया||202
अमरवेल जग आश, हरदम राखण होंसलो|
नर-वद वात निराश, कदै न तोडों काल़िया||203
मंजिल मिल़सी मीत, वा अनुभव मिलसी वसू|
सोच इतो शुधचीत, कोशिश करजे काल़िया||204
टाल़ी टल़ै न टेव, सौरम मन हेवा सदा|
समपै कुसुम सदेव, काटणहर नें काल़िया| 205
है हर इक रे हाथ,लूंण लख्यो तन लेपवा|
भलौ वदे -व्रण- भ्रात,कथूं दिखा मत काल़िया||206
कहग्यौ म्हानै को’क,किस्सौ कथजे कवित में |
कथूं हरख के शोक,कह थूं म्हानै काल़िया||207
प्हैली आठ पहोर, बरसी किरपा बादळी|
मन रे जाण्यौ मोर,कल़पासी वा काल़िया||208
स्तवन करे वा स्नेह,खरो पाठ पढ याद रख|
ह्रदय सरल रहजेह,काय रह्यां लग काल़िया||209
पाल़ो चलियौ पंथ, रथ बहियौ को राजवी|
आयी वेल़ा अंत, काँधा चढियौ काल़िया||210
एकलियौ असवार,हर पल जग जो हालियौ|
चढियौ काँधा चार,काया छोडत काल़िया||211
कथूं किरायैदार,दौलत, ताकत दबदबौ, |
बदलै घर हर बार, काल़ पलटता काल़िया|212
सुपन न ह्वै साकार,बाट बटाऊ तौ बदल|
पान पलट ,पतझार,कोंपल लगसी काल़िया||213

हिव में नित शुभ हेव, जन-गुणि गंधी हाट जिम।

सौरम देय सदेव, कांइ न वोर्यां काळिया ||214

गुण रो गुग्गळ धूप,पसरावै जौ पुहमि पर|

भाई !नर वे भूप, कहिया साचा काळिया।।215

समदर हुयां न सार, खारौ कहसी सब खलक।

लधु सर बण जळ वार, केहर नमसी काळिया।। 216

~~©वैतालिक

व्रण -घाव,
लोहित -सूर्य

वोर्या-खरीदना

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