करन्यास – जनकवि ऊमरदान लाळस

करन्यास
(दोहा)
कौडी बिन कीमत नहीं, सगा न राखै साथ।
हाजर नांणौं हाथ में, बैरी बूझै बात।।
ओऽम् वाक् वाक्।।1।।

दाळद घर दोळौ हुवै, परणि न आवै पास।
रुपिया होवै रोकड़ा, सोरा आवै सास।।
ओऽम् प्राण: प्राण:।।2।।

कळजुग में कळदार बिन, भायां पड़िया भेव।
जिण घर माया जोर में, दरसण आवै देव।।
ओऽम् चक्षुः चक्षुः।।3।।

रूपियां बिन रागां करै, हाजर जोड़ै हाथ।
एक अधेली आंट में, बोळौ सुण लै बात।।
ओऽम् श्रोत्रम् श्रोत्रम्।।4।।

भांत भांत रा सांग भर, प्रभु सूं करे न प्रेम।
सोधै लिछमी साधड़ा, नाभ कँवल रौ नेम।।
ओऽम् नाभि:।।5।।

घरधारी घबराय नै, भणिया मांगै भीक।
नांणौं लै प्रभु नांम रौ, ठरैं काळजा ठीक।।
ओऽम् हृदयम्।।6।।

करै कमाई कपट सूं, दीन हांण कर दोर।
कंठ दाब काढै कसर, जम का लागै जोर।।
ओऽम् कण्ठ:।।7।।

देवां रौ ही देवता, रुपियां रौ ही राज।
अंगरेजां में आज दिन, सारां रा सिरताज।।
ओऽम् शिर:।।8।।

दौलत सूं दौलत बधै, दौलत आवै दोर।
जस होवै जब जगत में, जोबन आवै जोर।।
ओऽम् बाहुभ्यां यशोबलम्।।9।।

धंधौं करणौ धर्म सूं, लोकां लेणौ लाब।
पइसौ आवै प्रेम सूं, दबकै देणौ दाब।।
इति कर्तलकर पृष्ठाभ्यां नमः।।10।।

हक्क कमायौ हाथ सूं, ठावौ धरिये ठांम।
लुच्चौ आवै लेण नै, दीजे एक न दांम।।
इति अंगुष्ठाभ्यां नम:।।11।।

अन धन जिण घर आसरौ, भला अरोगै भोग।
पइसौ हुवै न पास में, भूलू करदै लोग।।
इति अनामिकाभ्यां नम:।।12।।

~~जनकवि ऊमरदान लाळस

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