करणीदान कविया-गीत

(करणीदान जी कविया एक बार शाहपुरा आये तब उम्मेदसिंह अपने पिता की मृत्यु के उपरांत राजा बन चुके थे। कवि को सम्मानित करने हेतु उन्होंने घोडा-सिरोपाव कवि के ठिकाने पर भिजवाया। कवि तब तक बहुत ख्याति प्राप्त कर चुके थे, उन्होने  घोडा -सिरोपाव  को अपने अनुरूप उपयुक्त न समझ कर ससम्मान लौटाते हुए निम्नलिखित गीत लिख भेजा..)

डाकर अत डकर करे मत डारण, सीसोदा पग मांड सधिर ।
चाल पकड लेउँ तो चारण, वारण तो वोढा नरवीर ॥

काची बात न जाणे कवनै, छाती सधर शाहपुरा छात ।
केकाणां पर निजर धरै कुण, हाथी बिगर न मांडू हाथ ॥

नधपत उमेदा सकव डर नंही, कूडी होय तो सुनै किरणाल ।
चवडे मुझ धके तूं चडसी, पडसी खबर पछै प्रतिपाल ॥

लाखां वात टलै न लिखियौ, असुभ सुभ जो हाथ अलेख ।
छत्रपत विरदां तुं ही न छोडे, टुकियक हुं इ धारियां टेक ॥

《 करणीदान जी कविया//मोरारदान सुरताणीया 》

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