कासा थामें चला कलंदर

kalandar

कासा थामे चला कलंदर!
चौखट गाँव गली दर घर घर!
सहरा, जंगल, परबत, बस्ती,
गाहे गाहे मंज़र मंज़र!
बाहर बाहर दिखै भिखारी,
भीतर भीतर शाह सिकंदर!
रेत कौडियाँ गौहर मछली
अपने भीतर लिए समंदर!
खोजे क्यूं जा जा कर बाहर,
जब रब बैठा उसके अंदर!
कतरा कतरा बरसा उस पर,
कैसे कहदूं उसको बंजर!
नरपत तुझमें कौन समाया,
इत्र इत्र सा रहे तरबतर!

~~©वैतालिक

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