कवि की पहचान!!

kavi

कवियन के सिरताज, भूप के सदा प्रिय,
उकती उटीपी अहो धरा यश जानिये।
किसी की न परवाह बे चाह रहै सदाई,
वरदाई शारद के गावै गुनगानिये।
महाजन से मान देसोतन के सम कहो,
चहुंदिस वंदनीय मनो गुणखानिये।
दंभ नहीं द्वेष नहीं राग -अनुराग नहीं,
गिरधर सौभाग ऐसे महाकवि मानिये।।

सीखे छंद चार अरूं पांच-सात गीत सीखे,
एक -आध बात सीखी दंभ उर आनिये।
गूढन में बैठ अरूं मूढन सो वाद करे,
बात में विवाद बहु मुक्की मूंछ तानिये।
आधी-ऊधी ख्यात जान खुद को सुजान माने,
ऐसो वरताव करे जैसे ग्रंथ छानिये।
विद्वता अन्य की देख आंख निज टेढी रखे,
गिरधर सुकवि ऐ तो लघु कवि मानिये।।

छंदन की छौल कवितन की किलोल चंगी,
उकती अनूप चाहे भाषा सार भनी है।
आभा अलंकारन की सभा सत्कारन जैसी,
कहबो रसीलो ऐसो सुने मस्त मुनी है।
शब्द की घड़त रू जड़त है अनोखी अहो,
धिनकारै भूप कहै लहै विज्ञ मनी है।
सभी ग्रंथन में गिरधर पढी बहु आ तो,
कवि की कसौटी गद्य ऐसी बात सुनी है।।

कविता की जोड़ नहीं अर्थ को सुमेल नहीं,
भाव नहीं भाषा नहीं तन्यो फिरे जानिये।
पल में रीसाय जाय तुनक मिजाजी और,
पढे नहीं ग्रंथ कोउ भीन्यो रहै ज्ञानिये।
गुणी रू अगुणी मांय भेद कछु आने नहीं,
लेने वालो भाव धार करत बखानिये।
रस रू कस नहीं कविता गतरस सारी,
गिरधर अरे ताको कुकवि पैचानिये।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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