सनातनी रिस्तां री रक्षार्थ मरण तेवड़णियो कवि कुशलजी रतनू

महाराजा मानसिह जोधपुर आप री रीझ अर खीझ री समवड़ता रे पाण चावा रैया है । रीझियां सामल़ै नै आपरो काल़जो तक देवण मे ओछी नी तकता तो खीझियां सामल़ै रो कालजो चीलां नै चबावण सूं पैला नैचो नी करता।

एकर महाराजा मानसिंह आपरै मर्जीदान बिहारीदास खिची माथै किणी बात कारण अरूठग्या। खिची महाराजा री आदत नै जाणतो सो दरबार रे डर सूं जोधपुर स्थित साथीण री हवेली गयो अर साथीण ठाकुर शक्तिसिंह भाटी सूं शरण मांगी। शक्तिसिंह स्वाभिमानी, अर टणकाई री टेक राखणिया वीर हा। उणां दरबार रे कोप री गिनर नी कर र शरणागत नै अभयदान देतां आपरे अठै रोक लियो। शक्तिसिंह दरबार रै खास स्वामीभक्त अर विश्वास पात्र सिरदारां मांय सूं एक हा। जद दरबार नै इण बात री ठाह पड़ी तो उणां नै झाल़ आयगी। चूंकि शक्तिसिंह सूं दरबार मेहरबान हा सो मामलै नै समझाइस सूं सल़टावण री तेवड़ी। उणां चौपासणी रा रतनू कुशल़जी नै बुलाया। कुशलजी रतनू चौपासणी रे रतनू उगरजी रा बेटा हा। आपरी बगत रा प्रभावशाली मिनख हा। महाराजा मानसिंह रे साथै जिकै सत्तरै चारण जाल़ोर रे घेरै मे साथै हा उणां मे कुशल़जी ई एक हा :-

दानो माह दुबाह इंद नै कुशल़ो आखां
मेघ अनै महराम सिरै सो बीसां साखां

सो कुशल़जी नै बुलाय दरबार कैयो कै “कुशलजी थांरो अर भाटियां रो आपस मे प्रगाढ सनातनी रिस्तो है।शक्तिसिंहजी साथीण थांरी घणी कद्र करै। थांरो कैयो लोपै नी सो थैं जावो अर साथीण ठाकुरां नै कैय दो कै दरबार रे हरामखोर नै शरण नीं देवै अर उणनै हणै रो हणै काढ देवै। नीतर फौज आवेली अर दरबार रो गुनाहगार साथीण हवेली मे नी मावैला।”

कुशल़जी रा शक्तिसिंहजी रे साथै पारिवारिक रिस्ता हा बै दरबार री आदत नै चोखी तरियां जाणै हा। कुशल़जी कैयो हुकम म्है हणै जावूं अर साथीण ठाकुरां नै कैय खीची नै ऊभै पगां कढावूं। कुशल़जी साथीण हवेली गया। ठाकुरां उणां रो पूगतो सनमान कियो। कुशल़जी बिनां देर लगायां ठाकुरसा नै दरबार रो संदेश अर मंशा दोनूं बतावतां कैयो कै “दरबार रे हरामखोर नै आप शरण मत देवो इण सूं आपांरे नुकसाण है। म्है आपरो शुभचिंतक हूं सो सही सलाह है। इण नै मानण मे आपांरी भलाई है सो आप मानो।”

ठाकुर साहब कैयो कै “आ सलाह तो आप म्हनै परिवार रे सदस्य रे नातै दी हो। आप तो एक चारण रे नातै म्हनै सलाह दो कै एक राजपूत रै नातै म्हनै कांई करणो चाहीजै।” कुशल़जी कैयो कै “एक राजपूत रे नातै आपनै शरणागत री रक्षा करणी चाहीजै पछै भलांई दरबार होवै कै कोई दूजो। आपनै शरणाई सूहड़ांह रो धर्म अखी राखणो चाहीजै जे इण खातर मरणो पड़ै तो पड़ै।” ठाकुर सा कैयो कै “तो हमै आप जायर दरबार नै कैय दो कै भाटी शरणागत री रक्षार्थ मरेला पण थूकर नी चाटेला। जावो अर म्हारी आ बात महाराजा नै कैयदो।”

कुशल़जी कैयो कै ठाकुर साहब “दरबार म्हनै थांरे घर रो आदमी जाणर म्हनै थां कनै मेलियो तो आप बतावो कै म्है जिण पोल़ रो पोल़पात हूं उण माथै भार आयां उण री रक्षार्थ मरूं कै अठै सूं दरबार रे डर सूं नाठूं? आप म्हनै इतो कायर कै गया बीतो समझियो कै म्है आपनै मोत रे सामै मंडतां देख मरण सूं डर ज्यावूंला? म्है जिण पोल़ रो पोलपात! उण री रक्षार्थ पैला मरण रो म्हारो हक है कै आपरो? अब आप ई बतावो कै दरबार म्हनै आपरे घर रो मानर अठै मेलियो हो, तो कांई कब म्है परायै दांई ऐ समाचार म्हारै मूंडै सूं सुणावण पाछो उठै पगां बैयर जावूंलो?” ठाकुर साहब कैयो कै म्हनै ठाह ही कै आप आपरे घर री आन बान सारु प्राण म्हां सूं पैला निछावर करोला।

दरबार नै ठाह लागी कै भाटी मरेला पण शरणागत नै असहाय नी छोडेला। तोपां घुरी। साथीण ठाकुर साहब रे साथै खेजड़लै रा ठाकुर सादूल़सिंह भाटी ई हा। सब सूं पैला कुशल़जी रे गोडै माथै गोल़ी लागी पण वीर पग पाछा नी दिया। गोडै री पीड़ री परवाह नी कर र ओ वीर साथीण अर सनातनी स़बंधां री रुखाल़ी सारू लड़तो रैयो। छेवट खीची मिनखां रो घाण रोकण खातर आत्मसमर्पण कर दियो। आज साथीण ठाकुर साहब री शरणागत वत्सलता री बात अमर है। कवियां साथीण ठाकुर शक्तिसिंह अर खेजड़लै ठाकुर सादुल़सिह री वीरता नै अखी कर दीनी। कवियां लिखियो कै प्रतिकुल समै रे प्रभाव सूं वीरता दरसावणी वीरां छोडदी जिण सूं वीरता वीरां सूं कानो ले लियो पण ऐ दौनूं भाटी वीर वीरता नै ढोल रे ढमकै पाछी लाया :-

रजपूती रुखसत भई दूख समै प्रतिकूल़
वाल़ी ढोल़ बजावतां सगतै नै सादूल़

तो कुशल़जी रतनू री आ बात ई सोनलियै आखरां मे मंडित है कै कीकर चारणाचार री ओल़खाण देतो वो वीर मरण तेवड़र सनातनी संबंधां री साख सवाई करी। समकालीन कवि बुद्धजी आसिया अर बगसीरामजी रतनू रा इण विषयक गीत घणा चावा है जिणां मे कृपाण अर कलम मे सिद्धहस्त कवि कुशल़जी री वीरत री कीरत अखंडित है। एक एक दूहालो देणो समीचीन रैसी :-

महपत री फोज भाटियां माथै
भड़ खीची आंटै भाराथ
लड़तां कुशल़ आभ सिर लागो
पारथ जिम वागो बड पात
राडा़ंजीत धिनो बड रतनू
खगा़ं विभाड़ां अर खैसोत
बड कव देखै घाव बराड़ां
सह धाड़ा दाखै दैसोत
                                       ~बगसीरामजी रतनू चौपासणी कृत 

मुदायत रीझ लेतो सदा मोहरी
मोहरी नेग मे झोक मतनूं
मोहरी पणो निरवाहियो मोट मन
राड़ मे मोहरी लड़ै रतनूं
                                 ~बुद्धजी आसिया भांडियावास कृत

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