रक्तिम स्याही से लिखने वाले कवि मनुज की क्रांति-चेतना

जिसने जन-जन की पीड़ा को, निज की पीड़ा कर पहचाना।
सदियों के बहते घावों पर, मरहम करने का प्रण ठाना।
महलों से बढ़कर झौंपड़ियां, जिसकी चाहत का हार बनी।
संग्राम किया नित सत्ता से, वो कलम सदा तलवार बनी।
वो गीत चिरंतन गाने वाला, है कहां विप्लवी युगचेता।
भव का नव निर्माण कराने को, जो शंखनाद कर बल देता।
शोषण की सबल दीवारों के, उड़ जाने का उद्घोष किया।
उन्मुक्त मुक्ति की अंगड़ाई, लेते मानव को जोश दिया।
उस रक्त मसी से लिखने वाले, कवि को पुनः बुलाता हूं।
मैं मानवता के प्रबल पुजारी, को आवाज लगाता हूं।
हे मालदान! हे देपावत! हे मनुज! मेरा आह्वान सुनो।
तुम आकर फिर से अवनी पर, कवि-कर्म चुनो! कवि-धर्म चुनो।।
~~शक्तिसुत।।

मेरे हृदय के ये उद्गार उस क्रांतिचेता कवि के लिए है, जिसकी लेखनी ने समय के अन्याय का प्रबल प्रतिकार करते हुए शोषण की दीवारों को समूल नष्ट करने का विकल्प तथा भव के अभिनव निर्माण का संकल्प चुना। अपने अनुभव एवं उम्र से कहीं अधिक गुणा समझ का परिचय देने वाला यह कवि राजस्थान की जनवादी परंपरा का एक ऐसा सशक्त स्तम्भ है, जो अकेले अपने दम पर जनवादी-ज्योति को जलाए रखने में सक्षम है। महलों के मोहक मायाजाल से दृष्टि हटाकर झौंपड़ियों के अंतरतम की पीड़ा को पहचानने वाला कवि मनुज सच्चे अर्थों में जनकवि है। आम जन के संतप्त मन की पीड़ा को स्वर देने वाला कवि जनकवि कहलाता है। उसका मूल कर्म ही मर्म को पहचानना होता है। यह मर्म ही उसका धर्म है। इससे बढ़कर उसके लिए ना कोई धार्मिकता होती है और ना आधुनिकता। कविता का सिंहासन से संग्राम नहीं रुकने देने का प्रबल प्रण पालने वाला कवि जनता का गायक कहलाता है तो वही जननायक का मान पाता है।

अपनी दूरदृष्टि से समय की गति एवं गंतव्य को पहचानते हुए सही-गलत की सम्यक पहचान कर सच को सामने लाने का काम कवि करता है। यों तो हर कवि संवेदनशील, सहृदय एवं प्रगतिप्रणेता होता है लेकिन भीड़ के साथ नारे लगाने वालों तथा क्रांति का झंडा थामकर सिंहासन के सामने सीना तान अड़ने वालों की भूमिकाओं में बहुत फासला होता है। झंडे के आसपास चलनेवाले तथा टेर साधने वाले तो दबाव पड़ते ही किनारे की गली में मुड़कर मूंगफली खाने लगते हैं लेकिन जो हाथ में झंडा थामकर सत्तामद से सामना रोपते हैं, उन्हें आरपार की लड़ाई के लिए तैयार रहना पड़ता है। कवि मनुज की लेखनी में सत्तामद से टकराने का जबरदस्त माद्दा है और यह माद्दा किसी मंचीय तुकबंदीकार की तालियों की चाहत में दी जाने वाली अवसरवादी प्रस्तुति जैसा नहीं है, जो श्रोताओं की आह और वाह के साथ स्वर बदले वरन यह तो युगों-युगों से सहमे-डरे लोगों के मन का वो आक्रोश है, जो अब निडर होकर डर से आंख मिलाने निकला है। वह आक्रोश उस वेगवती नदी की धारा के उनमान था, जिससे टकराने वाला या तो मिट जाता है या उसके साथ बहने को मजबूर हो जाता है।

कविता को कोरी कल्पनाओं का जाल और वाग्विलास बताने और बनाने वाले लोग क्या जाने कि असल में कवि अपने समय का केमरा होता है, वह सच का पूजारी होता है। सच के लिए मरने मारने को तैयार रहता है। सच की साख बचाने का अवसर आए तो वह आग का गोला बनकर जलने और जलाने पे उतारू होने से नहीं कतराता। ऐसे ही एक दनदनाते अग्निगोले का नाम है कवि मनुज देपावत। राजस्थान की जनवादी काव्य-परंपरा के अग्रगण्य कवियों की पंक्ति में कवि मनुज देपावत का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। यद्यपि इस कवि के काव्य का सम्यक एवं सांगोपांग अनुशीलन एवं मूल्यांकन अभी होना शेष है तथापि जहां जनवादी स्वर की बात चले वहां यथास्थान मनुज को याद किया जाता रहा है। राजस्थानी जनकवियों में आजादी की जोत जलाने वाले कवि शंकरदान सामौर, जनजागरण के अग्रदूत कवि उमरदान लाल़स, आध्यात्मिक जनजागरण के क्रांतिचेता बावजी चतरसिंह, मनुष्य की सार्वभौमिक मुक्ति के मंत्रदाता कवि गणेशीलाल व्यास उस्ताद तथा मानवीय संवेदना एवं सांस्कृतिक संचेतना के प्रज्ञावान साधक कवि कन्हैयालाल सेठिया के साहित्य पर मनुज देपावत से अपेक्षाकृत कुछ अधिक काम हुआ है। फिर भी इस परंपरा का जिस वृहद फलक में परिचय होना चाहिए, उसमें अभी नहीं हो पाया है। कतिपय चर्चित नामों पर ही घूमफिर कर आलोचकों एवं समीक्षकों की निगाहें ठहर जाती हैं जबकि राजस्थान प्रदेश के कवियों के जनवादी स्वर को जानने के लिए गहराई में उतरेंगे तो पाएंगे कि इस धरती के सुकवियों के लिए यह तेवर बहुत पुराना एवं जाना-पहचाना है। खैर! यहां मनुज के साहित्य की क्रांतिधर्मिता को उजागर करना हमारा उद्देश्य है।

वस्तुतः मनुज का साहित्य अभिनव की चिरन्तन ज्वाला में जीर्णशीर्ण पुरातन को जलाकर भस्म करने का हामी है लेकिन उसमें भव के अभिनव निर्माण की गहरी चाहत स्पष्ट परिलक्षित होती है। इस दृष्टि से कवि मनुज देपावत का चिंतन आदि-विद्रोही कबीर के समानान्तर खड़ा दिखता है। जिस तरह से कबीर ‘ज्ञान की आंधी’ के माध्यम से भ्रम की दीवारों, मोह के बलींडों, संकीर्ण हित-चित के स्तम्भों, त्रृष्णा के छप्परों और कुबुद्धि के भांडों को समूल नष्ट करने के साथ ही ‘आंधी पीछे जो जल वूठा, प्रेम हरिरस भीना’ की चाहत को उजागर करता है। यही चाहत साहित्यकार को सृजक की संज्ञा देती है। साहित्यकार की इस चाहत में जिय निर्माण की कल्पना है, वह अत्यंत आदर्श होती है। इसी से प्रभावित होकर कबीर ‘जोग जुगति कर संतों बांधी, निरचु चुवै ना पाणी’ की घोषणा करता है। क्रांतिचेता मनुज देपावत भी सामाजिकों की तंद्रा भगाने के लिए कुछ वैसे ही प्रयत्न करता नजर आता है। यही कारण है कि ना तो उसके छंद किसी कृष्णाभिसारिका के आकुल अंतर की धड़कन से आबद्ध है और ना ही उसका गायन किसी जनपद कल्याणी के नूपुरों की रुनझुन पर मुग्ध होने का अभिलाषी है। वह दुखी या हताश होकर नीरव रजनी के अंधकार में अपने आंसुओं से अतीत के धुंधले चित्रों को धोने की बजाय शोषण के शोणित-प्लावन को चित्रित कर समाज को नवीन दिशा देने का अहम कार्य करता है। अपनी शक्ति एवं सामथ्र्य को भूलाकर मरघट पर सोए मुर्दों के मानिंद निष्क्रिय हुए सामाजिकों को विकट कापालिक बनकर कवि महाप्रलय के शंखनाद से जगाता है और सत्य से आंख मिलाने का आह्वान करता है। कवि एक ओर पुतले की तरह परवश जीवन जीने वाले मानव का संसार मिटाने हेतु प्रलय-वाह्नी का वाहक बनता है तो दूसरी ओर शत-शत संघर्षों के शंखनाद में पुराने विश्वासों के निर्गमन एवं लोकयुद्ध की वेला के आगमन की घोषणा करते हुए भव अभिनव निर्माण का आह्वान करता है।

ग्राम्य संस्कृति के गुणों का गाहक कवि अपने गांव की प्रकृति एवं संस्कृति पर रीझता है, अपने गांव के घर-आंगन की अमराई उसके मन की तरुणाई बनकर उसे मोहित करती है। पीपल की फुनगी पर पंचम स्वर साधती कोयल, छत्र तानकर नाचते-टहूकते मस्त मोर, कोसों तक फैली हरियाली, खेतों-खलिहानो की रौनक, पावस की पावन एवं मनभावन ऋतु की सुहानी सांझ, खेतों से घर की राह लेते बैलों के गले की घंटियों का कर्णप्रिय स्वर सब कुछ कवि को इतना प्रिय लगता है कि वह अपने गांव को इन्द्रपुरी से अधिक सुंदर बताता है लेकिन उसी प्रिय ग्राम को भरे भादों में छोड़ने को जब उसे विवश होना पड़ता है तो भीतर का दर्द शोला बनकर भभक उठता है। कवि की ‘हे गांव तुझे मैं छोड़ चला’ की लाचार घोषणा का अभिधार्थ लगाने वाले नहीं जानते कि मनुज का गांव छोड़ने का मतलब रामगढ़ को छोड़कर श्यामगढ़ में बसने जितना मामूली नहीं है। उस आहभरी आवाज में ‘हे गांव’ का स्वर जहां गांव के प्रति उसके अनन्त और अभिन्न प्रेम को बयां करता है, वहीं ‘छोड़ चला’ में खेदयुक्त लाचारी है, बछुड़ने का असहनीय दर्द है। इससे भी अधिक अर्थगांभीर्य का वाहक है-गांव छोड़ने का समय ‘भादो का महीना’। पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए यह भाद्रपद का महीना स्वप्निल महीना है। इस माह में खेती अपने चरम यौवन पर होती है, किसान अपने खेत में लहराती फसलों को निरख-निरख कर रात-दिन सपने संजोता है तथा भविष्य की योजनाएं बनाता है। यही वो माह है, जब किसान कर्जदाता के ब्याज चुकाने से लेकर घरवाली के गहने और बेटी के हाथ पीले करने के सपने देखना प्रारंभ करता है। अब उसे मात्र एक माह आसोज के सही सलामत बीतने का इंजतार रहता है। क्योंकि कार्तिक में तो फसल पक जानी है, उसको उसके परिश्रम का फल मिलना है, उसने अपनों से जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने का महीना कार्तिक है।

लेकिन कवि मनुज का दर्द यह है कि जिस किसान ने जेठ और आसाढ की चिलचिलाती धूप में खेती की, दुनियां के देवी-देवता मनाए, चींटी से लेकर हाथी और राही से लेकर बहन-जंवाई तक सबके हिस्से की हलाइयां खींची, इंद्र भगवान की मनुहार के गीत गाए, बादलों को बुलाने हेतु पूरे गांव की कांकड़ पर दूध की कार लगाई, तलाई के हनुमान को मनाने हेतु जागरण लगाया; उस किसान को भरे भादो में लहलहाती फसलों वाले खेतों को जमींदार या कर्जदाता के पक्ष में छोड़कर खाली हाथ निकलना पड़े तो उसके लिए इससे बड़ी सजा कुछ हो नहीं सकती। ये वर्षा ऋतु की कथा, उसके लिए वर्षभर की कथा है। ‘जो भोगता है, उसी को भान है’ कि भरे भादवे में जो भूखा रह जाता है, उसके लिए अगला भाद्रपद पकड़ना बहुत भारी होता है। कवि मनुज ने धनवानों एवं बलवानों के ऐसे जुल्मों से त्रस्त किसान के हर-हकूकों पर होते कुठाराघात को जब अपनी आँखों से देखा तो उसका संवेदनशील मन इतना आहत हुआ कि वह उस मर्मान्तक पीड़ा का पचा नहीं पाया और लावा बनकर फूट पड़ा। कवि मनुज के ‘भरे भादो’ की लाचारी का आलम केवल खेती-किसानी और जमीदारों की मनमानी तक सीमित नहीं है वरन इसके विस्तृत फलक में भारत की आजादी और उसके तत्काल बाद की परिस्थितियां स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जिस तरह एक किसान अपना खून-पसीना बहाकर तथा अपनी संपूर्ण शक्तियों का अधिकतम सदुपयोग करते हुए अपने सपनों की खेती करता है, उसी तरह इस भारतवर्ष के असंख्य लोगों ने अनाम उत्सर्ग होकर आजादी की फसल को फलीभूत करने का प्रयास किया और प्रयास सार्थक भी हुआ। जिस तरह किसान का खेत भाद्रपद में हराभरा एवं सुहावना होता है, उसी तरह आजादी के सूरज के साथ यह भारतवर्ष हर भारतवासी को बहुत सुहावना लगा। जिस तरह किसान इस फसल में अपने सारे दुखों के शमन तथा सुखों के आगमन का सपना संजोता है, उसी तरह आम भारतवासी आजादी के साथ ही अपने सारे दुख-दर्दों के अंत एवं सुख-समृद्धि के बसंत की कामना किए बैठा था। लेकिन ‘कोउ नृप होऊ हमें का हानी/चेरी रहीहें बनिहें न रानी’ वाली कहावत सदा की तरह फिर से चरितार्थ हुई और आमजन के लिए कूप से निकलकर खाड में गिरने की स्थिति बनी। फर्क मात्र इतना पड़ा कि गौरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों की गद्दीनशीनी हुईं। सत्ताधीशों का रंग बदला, जुल्मों का ढंग बदला लेकिन अमीरों की नीयत और गरीबों की नियति में कोई फर्क नहीं आया। सारे सपने चकनाचूर हो गए। चाहत के बादल कहीं हवा में खो गए। ऐसे समय में कवि को अवसादग्रस्त आमजन के अरमान शुलगते हुए शोले बनकर मिलते हैं और उन्हीं सुलगती लपटों में कवि अपनी लेखनी को तपाकर कुंदन बनाता है।

कवि स्वयं घोषणा करता है कि उसके भावोद्गार दग्ध हृदय के छालों की तरह पीड़ा के पारावार एवं दर्दभरे अफसाने हैं। कवि का मानना है कि उसकी कविता बेकस किसान के जीवन की जलती हुई कहानी है –

क्या तुझे सुनाउं आज सखे, ये पीड़ा के पहचाने हैं।
ये दग्ध हृदय के छाले हैं, ये दर्द भरे अफसाने हैं।
यह जुल्म जमींदारों का है, यह धनिकों की मनमानी है।
बेकस किसान के जीवन की, यह जलती हुई कहानी है।

कवि मनुज देपावत की अवलोकन दृष्टि एवं काव्यसृष्टि दोनों गहन हैं। यही कारण है कि उनके गीतों में जिस समस्या को चिन्हित कर लिखना शुरु किया, उसका चतुर्दिक विवेचन उसमें मिलता है। किसान एवं गरीब की बदहाली को बताते हुए कवि खेती, ब्याज, बेगारी, जुल्म-ज्यादती से लेकर पैसे एवं पावर के दम पर कोठियों द्वारा किए जाने वाले काले कारनामों का पर्दापाश करता है। वह उनकी अमानवीयता, असंवेदनशीलता, चारित्रिक दुर्बलता, वासनाप्रियता तथा दंभ को सरे आम ललकारता है। मानव होकर मानव के लहू को चटकारे मारकर चाटने वाले लोगों में कवि को घिन्न आती है। वह मानव को मिट्टी का रोड़ा और टम-टम का घोड़ा समझने वाले लोगों की सोच से हैरान है –

ये जान सकेंगे कभी नहीं, इस जगती का वैभव क्या है?
कोई जाकर इनसे पूछे, दो पैरों का मानव क्या है।
मानव मिट्टी का रोड़ा है, बस जब चाहा तब तोड़ दिया।
मानव टम-टम का घोड़ा है, बस जब चाहा तब जोड दिया।

कवि के मन में गहराई से चुभी यह दर्दकील निरंतर दर्द देती है। यह प्रयोगसिद्ध सत्य है कि दर्द जब हद से ज्यादा हो कर दुस्सहनीय से असहनीय हो जाता है नाभी से आग उठती है और वह आग विध्वंस ही नहीं सृजन से भी सरोकार रखती है। वह आग शोषितों की ताकत बनकर शोषकों की नींद हराम करती है। इस दर्द को पालने वाली कलम व्यष्टि से समष्टिपरक हो जाती है और वह व्यक्ति पर नहीं व्यवस्थाओं पर प्रहार करती है। वह व्यवस्थाओं के बदलाव हेतु उद्धत होती है। उसकी यह उद्धत अवस्था इतनी प्रखर एवं निरापद होती है कि वह जमाने की रूढ़ एवं रुग्ण लक्ष्मण रेखाओं को लांघने में जरा भी संकोच नहीं करती है। फिर उसकी दृष्टि में सुर-नर-असुर किसी को कोई रियायत नहीं होती। ना पूर्वाग्रह ना दुराग्रह बस सिर्फ और सिर्फ सच का आग्रह, यही उसका धर्म बन जाता है। ऐसी स्थिति में कवि भव के अभिनव निर्माण की कल्पना करते हुए अपनी मातृभूमि ‘धोरां वाली धरती’ को जागने का आह्वान करता है। यह लाक्षणिक उक्ति इस बात की द्योतक है कि कवि को अपने राजस्थान के लोगों की सामथ्र्य पर पूरा भरोसा है। वह राजस्थान को जगाना चाहता है मतलब कि राजस्थन के एक-एक व्यक्ति को जगाना चाहता है। यहां यह भी स्पष्ट करना अत्यावश्यक मानता हूं कि कवि किसी से दुश्मनी नहीं रखता। वह मानव को मानव बने रहने हेतु प्रररित करता है तो भटकते हुए मानव को फटकार कर पुनः राह पर लाने का कार्य भी करता है। वह रूढ के विनाश के बाद जिस अभिनव का निर्माण करना चाहता है, उसमें किसी को पीछे नहीं छोड़ना चाहता। वह नवजागरण का शंख फूंक कर हर एक व्यक्ति को सच्चाई से अवगत करवाता है तथा उसे सतवट पर बहने की सुभट सीख देता है।

कवि मनुज देपावत का धोरा-धरती से आह्वान का अमर गीत ‘धोरां वाळा देस जाग रे’ अपने आपमें एक विशिष्ट रचना है। इस गीत के मर्म को समझने पर पाठक की श्रद्धा कवि मनुज के प्रति द्विगुणित हो जाती है। राजस्थान की लोक संस्कृति एवं यहां के जनजीवन से जुड़ाव रखने वाला वो व्यक्ति जो यहां की राजस्थानी भाषा एवं भावभूमि को जानता है, वही कवि मनुज के गीतों के मर्म की तह तक जा पाता है। मनुज के गीतों में प्रयुक्त एक-एक मुहावरा, लोकोक्ति एवं तीखे तंज पाठक की आंखों के सामने सजीव चित्र उपस्थित करने की क्षमता रखते हैं। कवि अपनी अनुभवी एवं पैनी दृष्टि के बल पर पाठक की चुभती नब्ज को दबाने में सिद्धहस्त है। अपनी धोरा धरती के निवासियों को जगाने के लिए कवि विगत के वैभव-विनाश की सच्चाई से अवगत करवाता है, वर्तमान का विहंगावलोचन करते हुए आगत की आदर्श छवि प्रस्तुत करता है। कवि मनुज का भाषा पर अनूठा अधिकार है, जिसके बल पर वह बड़ी से बड़ी समस्या को कम से कम शब्दों में सटीक एवं सहज तरीके से प्रस्तुत करने में सफल होता है। ‘छाती पर पैणा पड़्या नाग रे, धोरां वाळा देस जोग रे!’ गीत की पहली ही पंक्ति में कवि अपने प्रतिपाद्य को प्रबलता से प्रकट करके सीधे मुद्दे की बात पर आ जाता है। ‘पैणा’ या ‘पीवणा’ सांप वह सांप होता है जो सोते हुए मनुष्य की छाती पर धरे से आकर बैठता है और उसकी श्वास-प्रश्वास के साथ अपना जहर उस व्यक्ति के शरीर में पहुंचाता रहता है। धीरे-धीरे व्यक्ति के शरीर में विष की मात्रा बढ़ती है, वह बेहोश होता है और यदि समय पर दवा-दारू नहीं की जाए तो काल के गाल में समा जाता है। सोते हुए मनुष्य की काल बन कर सांसे गिनने वाले इस सांप से ज्यादा खतरनाक और कौनसा काल होगा? जो व्यक्ति को मौत के मुंह में धकेल देता है और जिस पर आरोप लगाने के लिए हमारे पास कोई सबूत नहीं होता। ना तो उसने डंक मारा, जिसके चिह्न को आधार बनाकर उसे दोषी ठहराया जाए। ना वह किसी को दिखाई दिया, जिससे कि उसका कोई चश्मदीध गवाह बन सके। इससे भी आगे खुद पीड़ित को भी वह दिखाई नहीं देता, अतः वह भी पूर्ण विश्वास से नहीं कह सकता कि मेरा दुश्मन यही है। कवि की उक्त एक पंक्ति का आधा हिस्सा ही यह संकेतित करने में सफल है कि मनुज की कविता का नायक किस तरह की दुविधाओं का शिकार हुआ है। उसे ठीक से जगाने के लिए तथा सच्चाई से सांगोपांग रूबरू करवाने के लिए वह एक-एक कर अनेक दृश्य उपस्थित करता है। कवि की भाषा में ओज है, उत्साह का संचार करने की शक्ति है तथा अंतरमन में झांकने का हुनर है। उसी के बलबूते वह अपनी मातृभूमि के सोए हुए वज्रांगियों (बजरंगियो) को जामवंत बनकर जगा रहा है, उन्हें उनकी शक्ति याद दिला रहा है।
कवि कहता है अरे मेरे देशवासियो! जागो। अपनी उनींदी आंखो को खोलो, मीठी नींद के आगोश से बाहर आओ क्योंकि अब अंधेरी रात का अंत हो चुका है। आजादी का नया सूरज अपने पूर्ण तेज के साथ चमक रहा है। अब तुम सच में आजाद हो। अब आजादी के सपने देखने की आवश्यकता नहीं, वास्तव में आजादी तुम्हें मिल गई है। सपनों का झूठा मोह त्याग कर सच का संसार देखो। तुम्हारी आंखों में आज भी विगत की रातों के जंजाल छाए हुए हैं। कवि स्पष्ट करता है कि जो बीत गया, वह बीत गया, उसकी झूठी आशाओं में खोने से कुछ नहीं मिलने वाला है-

उठ खोल उणींदी आंखड़ल्यां, नैणां री मीठी नींद तोड़।
रे रात नहीं अब दिन उगियो, सपनां रो झूठो मोह छोड़।
थारी आंख्यां में राच रैया, जंजाळ सुहाणी रातां रा।
थूं कोट बणावै उण जुग री, जूनोड़ी बोदी बातां रा।
पण बीत गयो सो गयो बीत, उणरी झूठी आस त्याग रे।
धोरां वाळा देस जाग रे……….

कवि ‘जूनोड़ी बोदी बातों’ के जकड़-जंजाल से सबको बाहर निकालना चाहता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कवि यद्यपि सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हुआ उसे जगने और उत्साह सहित वांछित काम पर लगने का आह्वान करता है लेकिन कविता की यह विशिष्टता होती है कि वह जिस तरह से काल की सीमाओं को पार कर जाती है, उसी तरह से पात्र एवं परिवेश की सीमाओं का भी उल्लंघन करते हुए वृहद फलक को ग्रहण कर जाती है। कवि मनुज की उपर्युक्त पंक्तियां जहां एक तरह व्यवस्थाओं के मारे, जमीदारों के जुल्म से हारे तथा धनवानों के कर्ज के मर्ज की मार से दुखियारे आमजन के लिए आजादी के आगमन की उत्साही आवाज है वहीं अनवय से दूसरी तरफ उस वर्ग के लिए चुभती चेतावनी है, जो तथाकथित रूप से आम नहीं होकर खास रहा है। उन्हें कवि चेतावनी देता है कि अब समय बदल चुका है, तुम्हारी आंखों में उसी अतीत के वैभव के सपने तैर रहे हैं लेकिन अब तुम्हारे अत्याचार एवं अनाचार के अंधेरे का नाश करने के लिए तमकता-दमकता स्वातंत्र्य-सूरज उदय हो चुका है अतः उन मोहक सपनों को छोड़ कर सच की जमीन पर आओ और अपने आपको खास मानने की बजाय आमजन बनकर राष्ट्रोत्थान में अपना योगदान दो। यहां यह भी ध्यातव्य है कि कवि जिस राजस्थानी समाज एवं संस्कृति का हिस्सा है वह बहुत झीने से अंतर के साथ समग्र भारतीय समाज एवं संस्कृति का ही अंग है अतः कवि का ‘धोरां वाळा देस’ भावों के बहाव में राजस्थान की सीमाओं को पार करता संपूर्ण भारतवर्ष का प्रतीक बनता नजर आता है। अतः इस गीत का संबंध मात्र मरुधर से करना इसके साथ न्याय नहीं होगा।

कवि किसान एवं मजदूर को अपने युग का नायक मानता है। इन्हीं को शक्तिकेंद्र मानकर वह आह्वान करता है कि हे किसानो! हे मजदूरो! जिस दिन तुम जगोगे, सही मायने में देश उसी दिन जगेगा। किसान अपने हक के लिए सजग होगा तभी उसके पसीने को पहचान मिलेगी। कवि समय के बदलने के साथ लोगों की बदली हुई भूमिकाओं तथा विवशताओं का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट करता है कि जिस रणबांकुरे राजस्थान में ‘बलिहारी उण देसड़ै, जहं माथा मोल बिकाय’ ‘अठै सुजस प्रभुता उठे, अवसर मरियां आय’ तथा ‘नहं पड़ोस कायर नरां’ की अनमोल उक्तियां जीवनमूल्यों की सूचक थी, वहां बदली परिस्थितियों में सारी भूमिकाएं बदल गई है। आज उन खनकती खागों एवं खांडों का जमाना बीत गया। युद्धोन्मत एवं मरणोत्सुक योद्धाओं के कार्यक्षेत्र बदल गए। आज तलवारों, भालों तथा तीर-कमानों के संचलन की आवश्यकता नहीं है। अतः कवि किसानों एवं मजदूरों को जगाकर इस देश में पनप रहे आस्तीन के सांपों को कुचलना चाहता है और अन्यायियों एवं नफाखोरों का खातमा करना चाहता है। आज उसे ऊंटों पर उत्साहयुक्त सवारी करते, कमर कसे हुए किसान एवं मजदूर में आशा की ज्योति दिखती है अतः वह उन्हीं को संबोधित करता है –

खागां रै लाग्यो आज काट, खूंट्यां पर टंगिया धनुष तीर।
रे लोग मरै भूखां मरता, फोगां में रुळता फिरै वीर।
रे उठो किसाणां मजदूरां, ऊंठां पर कसलो आज जीन।
आं नफाखोर अन्यायां नैं, कर दो कोडी रा तीन-तीन।
फण किचर काळियै सापां रो, तूं आज मिटा दै जहर झाग रे।
धोरां वाळा देस जाग रे…………..

यह सार्वभोम सत्य है कि जिससे जितनी आशा होती है, निराशा की मात्रा भी उससे उसी अनुपात में हुआ करती है। ‘‘आजादी के बाद अपना राज, अपने लोग, अपना कानून सब कुछ अपना होगा; अब कोई अत्याचार नहीं होगा, किसी के हितों पर कुठाराघात नहीं होगा’’ ऐसी धारणा रखकर दी गई लाखों कुर्बानियों पर मिली आजादी का उपयोग जब लोगों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए करना शुरु किया। गरीबों पर चलने वाली तलवार की मात्र म्यान बदली थी, धार वैसी की वैसी थी। यह देखकर असंख्या कुर्बानियों का कायल एवं वर्तमान परिस्थितियों की मार से घायल आमजन कवि की संवेदना का केंद्र बनता है और कवि समय के नग्न सत्य को उजागर करने हेतु मजबूर होता है। वह कटु सत्य पर से पर्दा उठाता है और कहता है कि आज मनुष्य से ज्यादा दुखी कोई नहीं है। उसके लिए जीना मरने से ज्यादा मुश्किल हो गया है। कमोबेस हर युग में ऐसी स्थितियां यदा कदा आती रहीं हैं और युगचेताओं की फटकार खाती रहीं हैं। जब अन्याय की गहरी नींव पर खड़ी हवेलियां सीना तान कर हंसती है तो झोंपड़ी का दुख दुगुना हो जाता है। आजाद भारत में पहली बार आम चुनाव 1952 में हुए। 17 अप्रेल 1952 को पहली लोगसभा गठित हुई और दुर्भाग्य से 18 मई 1952 को कवि मनुज ने इस संसार से अचानक विदाई ले ली। लेकिन 1947 से 1952 तक आजादी के लगभग 05 वर्ष में देश का नेतृत्व जिन लोगों के हाथों में था, उनसे आमजन की तरह कवि को भी बहुत अपेक्षाएं थीं लेकिन जब रक्षक को भक्षक बनते तथा बाड़ के द्वारा खेत को खाते हुए देखा गया तो कवि का आक्रोश और उबला तथा आग की लपटें बनकर बोल उठा –

रे देख मिनख मुरझाय रैयो, मरणै सूं मुश्किल है जीणो।
अै खड़ी हवेल्यां हंसे आज, आं झूंपड़ियां रो दुख दूणो।
धनवाळा थारी काया रो, भक्षक बणता जावै रे।
थूं जाग खेत रा रखवाळा! आ बाड़ खेत नैं खावै रे।
अै जका उजाड़ै झूंपड़ियां, वां महलां रै तूं लगा आग रे।
धोरां वाळा देस जाग रे….

कवि जनतंत्र के नायक को जगाना चाहता है। वह अब पत्थरों की मूर्तियों की बजाय मानवता का पुजारी बनना चाहता था। वह इंकलाब की आंधी की बजाय इंकलाब की आग का पक्षधर है। वह आग जो दिलों की दुखी हाय का हविष्य पाकर ऐसा विकराल रूप धारण करे, जिस पर आश्वासनो ंएवं प्रलोभनों के छींटों का कोई प्रभाव नहीं पड़े। वह आग आमजन के हृदय से उठकर डहकते डूंगरों को भी अपने आगोश में लेती जाए और इस तरह हर भांति के अहंकार को भस्म बना दे। पत्थरों के पुजारियों को मानवता की असली मूरत के दर्शन हों। कवि की आशावादी दृष्टि अपने नायक को अपनी मातृभूमि के सोए हुए भाग जगने की सूचना देने के साथ आनंदित होती है। वह भविष्यवाणी करता है कि अब वह दिन दूर नहीं जिस दिन मेरे देश का किसान एवं मजदूर देश की बागडोर अपने हाथों में लेगा और मेरी सदा सुहानी मातृभूमि के सोए हुए भाग्य जग उठेंगे-

अै इंकलाब रा अंगारा, सिलगावै दिल री दुखी हाय।
अब छांट्यां छिड़क्यां नहीं बुझेला, डूंगर लागी आज लाय।
इक दिन ऐसो आवेला, धोरां री धरती धूजेला।
अै सदा पत्थरां रा सेवग पण आज मिनख नैं पूजेला।
इण सदा सुरंगी मुरधर रा, सूतोड़ा जाग्या आज भाग रे…

कवि मनुज की कलम खेत में खड़ी खरपतवार की तरह इस देश की विषमताओं, विसंगतियों तथा विद्रुपताओं को काटकर सृजन की नवीन भावभूमि तैयार करती है। कवि अपनी सूक्ष्म अवलोकन दृष्टि के बल पर हमारे समाज की मानसिकता से जुड़े कुछ ऐसे पहलूओं को रेखांकित करता है, जिन पर विचार करने पर हर किसी को हैरानी होती है। हमारी धर्मभीरू मानसिकता के परिणाम स्वरूप हमने ऐसी अनेक धारणाएं और मान्यताओं को पाल कर अपने गले की फांस बना लिया है कि उनसे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल काम हो गया है। कैसी धर्मभीरुता है कि जो काला सांप जानलेवा विष लिए फिरता है, जिसके काटने पर व्यक्ति पानी भी नहीं मांगता यानी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, जिसे दूध भी पिलाओं तो वह बदले में जहर ही देने वाला है, जिसके पास क्षमा नाम की कोई चीज नहीं है, जिसका रहना आपके लिए किसी भी दृष्टि से खतरे से खाली नहीं है, उसे देवत्व संपन्न लिया। देवता मानकर उसकी पूजा का विधान कर दिया। उसे मारना पाप घोषित कर दिया। कवि ‘फण किचर काळियै-सापां रो’ की ओजभरी उक्ति के माध्यम से इस सारी रूढ़धारणा का समूलोच्छेदन करना चाहता है। वो बताना चाहता है कि जिन्हें आपने देवता मानकर पूजनीय और अवद्य माना है, वे आपके लिए कितने लाभकारक या हानिकारक हैं, इसे जानना जरूरी है। कवि अपने काव्यनायक से यह भी अपेक्षा करता है कि जब स्पष्ट हो गया कि जिसे हम रक्षक मानते थे, वही हमारा भक्षक है तो फिर अब मरी मानसिकता से उस भक्षक के आतंक में रहने या उसके प्रति तथाकथित रूप से श्रद्धावनत बने रहने का कोई औचित्य नहीं है, अब उसके काले कारनामों का दंड कवि अपने नायक के हाथों दिलाना चाहता है। वह अपने नायक में ऐसे अदम्य साहस का संचार करना चाहता है, जो कभी किसी धनवान या बलवान के सामने झुके नहीं।

निष्कर्षतः कवि मनुज देपावत के काव्य की मूल विशेषता उसकी क्रांतिधर्मिता है। कवि किसान एवं मजदूर के साथ ही अपने कलमकार मित्रों को भी अपने दायित्व के निष्ठापूर्वक निर्वहन के लिए प्रेरित करता है और कहता है कि जब धरती जल रही हो तो तारों की मृदुल हंसी को अपनी कविता का विषय नहीं बनाया जा सकता। जब पतझड़ की सांय-सांय हो रही हो तो सुमनों के मधुमास पर कविताएं नहीं लिखी जा सकती। अभिप्राय यह है कि आज के कलमकारों को भी अपनी भूमिका को ठीक से समझते हुए विषय, भाव, भाषा, छंद एवं प्रतिपाद्य का चयन करना होगा। कवि देपावत की भाषा भावों की सहज प्रवाहिनी है। ऐसा लगता है कि शब्द स्वयं उनकी लेखनी का स्पर्श करने को लालायित खड़े रहते हैं। राष्ट्रभाषा हिंदी एवं मायड़भाषा राजस्थानी दोनों ही भाषाओं पर कवि का अनूठा अधिकार है। कवि की रचनाएं विविध विषयी होने के साथ विविध रंगी एवं विविध रसी भी है लेकिन सारी रचनाएं पाठक के लिए उपलब्ध नहीं है। कोई समग्र काव्यसंग्रह अब तक प्रकाशित नहीं है। अतः जिस रूप में कवि मनुज का मूल्यांकन होना चाहिए, उस रूप में अभी नहीं हो पाया है। आशा है मुंह देखकर टीका लगाने वाले तथाकथित आलोचकों की नजरें कभी न कभी इधर भी इनायत होंगी और कवि मनुज जैसे धरातल से जुड़े कवियों के साथ देर सवेर न्याय होगा।

~~डाॅ गजादान चारण “शक्तिसुत”
विभागाध्यक्ष – हिंदी
राजकीय बांगड़ महाविद्यालय, डीडवाना

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