कवि सम्मान में आपरो कंवर अर्पित करणियो कर्मसी राठौड़

राजस्थान रै साहित्यिक इतिहास में कविवर आसाजी / आसाणंदजी बारठ रो नाम जितरो चावो उतरो ई आदरणीय। सत्य वक्ता, निर्लोभी, मित्र धर्म पाल़णिया, घण जोड़ा अर चारणाचार सूं मंडित आसोजी समूल़ी राजपूत रियासतां में मोटो नाम। भाद्रेस रा बारठ दीताजी रै घरै कवि रो जनम होयो अर नाथूसर कवि री कर्मस्थल़ी –

दीतावत मालुम दुनी सो जाणै संसार।
नाथूसर मथुरा नगर आसो हरि अवतार।।

कोटड़ै रा राठौड़ वाघोजी कोटड़ियो उणां रा मन रा मीत ।एकै दांत रोटी तूटै।वाघैजी नैं राव मालदेव डावड़ी भारमली दीनी।रूप री रंभा अर लावण्य री मूर्ति। रावजी रो मन भारमली रै बिनां लागै नीं।उणां आसैजी नैं कोटड़ै इण हिदायत रै साथै मेलिया कै भारमली नै पाछी लावो। आसोजी गया पण वाघैजी री सेवा सूं ऐड़ा रीझिया कै ओ दूहो कैय वाघैजी सूं भारमली मांगणी ई छोडदी –

जँह तरवर तँह मोरिया जँह सरवर तँह हंस।
जँह बाघो तँह भारमली जँह दारू तँह मंस।।

आसोजी कोटड़ै ई रंजिया। पाछो जोधपुर जावण रो नाम ई नीं लेवै। वाघोजी रै आसैजी सूं कोई ढक-पल नीं। नीं कोई थारी- म्हारी रो भेद। एक दिन कुजोग पड़ियो कै वाघोजी इण लोक नैं छोड आगै खड़िया। आसोजी दिन अर रात होय वाघा! हाय वाघा! करै। लोगां घणा ई पालिया पण दुख दटियो नीं। बात ऊमरकोट रै राणै कन्नै ई पूगी। उणां कैयो “अठै लावो हूं वाघै रो नाम बंद करा दूंला। बाजी लालची है! इतरा रुपिया बतावूंलो कै वाघै रो कांई! आपरो ई नाम भूल जावैला।” ऐ समाचार आसैजी रै भाई राघव सुणिया तो बां विजोगी आसैजी नैं मांडै ई ऊमरकोट लेयग्या। उठै राणैजी कैयो “बाजी रात, च्यार घड़ी री होवै! म्है एक घड़ी बाघै रो नाम नीं लेवण रा एक लाख दूंला।” आसैजी “कैयो कितरा ई दो तो ई म्है वाघै नैं नीं भूल सकूं।” राघवजी कैयो “एक रात री तो बात है! कीकर ई माठ झालो अर म्हांरै पईसा आवण दो।” मन मार आसैजी मून झाली अर साथलां मून हां री सूचक मानी। ज्यूं-ज्यूं रात गल़ण लागी त्यूं-त्यूं आसैजी नै आपरै मीत वाघैजी रो विजोग अदावण लागो। कोठै रा भाव होठै आवण सूं रुकिया नीं –

हाल हिया सिव बाड़ियां, पग दे पावड़ियांह।
बाघै सूं बातां करां, गल़ दे बांहड़ियांह।।
बाघ बिहूणो कोटड़ो, मो लागै ऐड़ोह।
जानी घरै सिधाविया, जाणक मांढेड़ोह।।
क्यूं करल़्यो रै कूकड़ा, गल़ती मांझल़ जोग।
विहंग तनै ई वींटियो, वाघा तणो विजोग।।
की कह की कह की कहां, की कह करां बखाण।
थारा म्हारा नह किया, वाघै राज दीवाण।।

प्रभात होई। जाजमां जमी जद “राणैजी कैयो कै आप च्यार लाख री हाणी करदी। एक घड़ी ई वाघैजी नैं नीं भूल सकिया। “जद कवि आसैजी जिकै आखर कैया बै आज निस्छल़ मित्रता री सैनाणी रै रूप में अखी है –

पाख कविच पड़ियांह, काठां सूं घाटै कमल़।
चींघण सिर चड़ियांह, वीसरसां जद वाघड़ो।।
चींघण चाल़वियांह, खड़हड़ मांय खंखेरियां।
राणा राख थयांह, वीसरसां जद वाघड़ो।।

इतरी सुण राणैजी कैयो “बाजी च्यार लाख गमा दिया!” कवि कैयो कै आ बात विधना रै हाथ। म्हारै हाथ होवती तो हूं –

हलरै कठण हियाह व्रज ही नाम विरामियो।
फूटो नह फीटाह वाघ तणो सुणनै विवन।।

आपनै जे इतरो ई दातारगी रो गुमेज है तो सुणलो! दातारां सूं देश भरियो है। राणैजी कैयो “इतरा कुण देवै ?”
जद आसैजी कैयो “म्है किणी दातार कन्नै एक रात सूं बत्तो रैवूंलो नी। करोड़ पसाव सूं कम लेवूंलो नीं। एक दूहै सूं ज्यादा कैवूंलो नीं अर बोई आधो सर अर आधो वीसर।” कवि उणी बगत नवाब तारकीन कन्नै पूगिया अर ओ दूहो कैयो –

कर धोया करतार, थोड़ी बोत कांनै थही।
लारै रही न लगार, तोनै घड़तां तारकीन।।

बात हालै कै नवाब करोड़ पसाव देय कवि आसैजी नैं सम्मानित किया। उठै सूं कवि उदार भाटी जखड़ै कन्नै पूगियो अर ओ दूहो कैयो –

खूटी जिण खांनैह, ज्यां सूं घड़ियो जखड़ो।
बीजी बीजांनैह, मिल़ै न माटी माढवै।।

जखड़ै ई कवि नैं सम्मानित कियो अर करोड़ पसाव दियो। कवि आसोजी छोटै ठिकाणै रै मोटै मन रै धणी रिणी रै करमसी लूणकरोत रै अठै पूगिया उण सूं पैला ओ दूहो पूगियो कै “खूटी जिण खानैह ——अर्थात जखड़ै नैं घड़तां ई दातारगी री माटी ही खांण मांय सूं खूटगी तो आगै दातार कठै सूं घड़ीजैला ? पण कवि री जीब माथै शारदा रो वास। करमसी नैं संबोधित करतां कवि कैयो “हे करमसी! बाकी बीजो संसार तो ईश्वर माटी सूं घड़ र मेलियो है पण तन्नै तो काया सूधो ई मेलियो है –

सो बीजो संसार, माटी सूं घड़ियो महण।
करियो तो करतार, काया हंदो करमसी।।

करमसी दूहो सुणतां ई गदगद होयग्यो। ठिकाणो छोटो पण मन मोटो। कवि नैं करोड़ पसाव दियो। करोड़ रो भरणो पूरो नीं होयो तो करमसी नाथूसर गांव अर आपरो कंवर कीरतसिंह सेवा रै सारु कवि श्रेष्ठ आसैजी नैं समर्पित कियो। कविवर आसैजी रै आखरां में –

कीरतसिंघ दीधो कुंमर, समर भोज वीकम समै।
भांजियो दाल़द आसो भणै, कोड़ दान आपैई कमै।।

दयालदासजी आपरी ख्यात में लिखै “इण करमसी कोड़ रै भरणै में कंवर कीरतसिंघ नूं दियो। जिण कीरतसिंघ नूं सीरोही रै देस गांव काल़ंद्री ठाकुर री बेटी परणायी।”

कवि आसैजी री मोकल़ी रचनावां। ऐ रचनावां राजस्थानी साहित्य री हेमाणी ।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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