कविते! मैं सजदा करूँ

कविते! मैं सजदा करूँ

कविते ! तुझको क्या कहूँ, छुई मुई या और ।
मन में गहरी पैठ कर, फिर फैलाती छोर ॥1॥

कविते ! तुझको दूँ सजा, आ मन की दहलीज़।
आज चाँद है ईद का, कल आषाढी बीज ॥2॥

कविते ! तुम कमनीय हो, कोमल है तव गात ।
आ फूलों से दूँ सजा, हँसकर कर ले बात ॥3॥

कविते ! तुम ही प्यार हो, तूँ ही जीवन सार ।
अलंकार रस से सजे, पहने नवलख हार ॥4॥

कविते ! तनिक दुलार दे, कर ले मुझसे प्यार ।
तेरे बिन तो फूल भी, लगते हैं अंगार ॥5॥

कविते ! तूँ नाराज़ हो, या फिर मुझ पर रीझ ।
छेडूंगा फिर आज मैं, आ मन की दहलीज़ ॥6॥

कविते ! जब जब आ गया, सुन सजनी तव पास ।
तब तब मुझको चूमकर, मेटी तुमने प्यास ॥7॥

कविता तुम कमनीय हो, तथा सुकोमल गात ।
हर पल बस हँसती रहे, औ’ बाँटे सौगात ॥8॥

कविते ! मन में पैठकर, फिर मत करना घाव ।
जब मन तुझ पर आ गया, तब कैसा अलगाव ॥9॥

कविते ! मैं सजदा करूँ, या फिर कह पाबौस ।
चौखट तेरी चूमते, ही होता मदहोश ॥10॥

कविते ! तेरी गोद में, सिरहाना कर सोउँ ।
तूँ हँस हँस बतिया तनिक, मैं जी भर के रोउँ ॥11॥

कविते ! सच्ची सहचरी, चाहूँ तेरा साथ ।
इससे ही तेरी गली, फिरता हूँ दिन रात ॥12॥

कविते ! आँचल में छुपा, अब कर दे अहसान ।
नरपत निरा अबोध है, नन्हा सा नादान ॥13॥

कविते ! मात पयस्विनी, मीठा तेरा दूध ।
मैं अबोध भूखा शिशू, कान्हा सम हिय शुद्ध ॥14॥

कविते तुम आती नहीं, अब क्यों मन के पास।
या तो है रुठी हुई,या फिर घोर उदास॥15

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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