कविवर मुरारदानजी आसिया नोखड़ा

सरल हृदय, सहज सुलभ, सौजन्य मूर्ति, सर्वजन हितेषी, न्याय प्रिय अर संत प्रकृति रा मिनख हा मुरारदानजी आसिया नोखड़ा। नोखड़ा रै जेठूदानजी आसिया रै घरै आपरो जन्म होयो। समाज में व्याप्त रूढियां रा आप घोर विरोधी हा। अन्याय रा आप कदै ई समर्थक नीं रैया। न्याय रै प्रतिबद्धता रो एक दाखलो देणो समीचीन रैसी। आपरै आगै-नैड़ै रिस्तै में एक बूढा अर बेवा माजी हा जिणां रै कोई औलाद नीं ही। आपरै पिताजी जेठूदानजी उणां रै खेत माथै कब्जो कर लियो। आ बात मुरारदानजी सूं सहन नी होई। इणां माजी रै पक्ष में आपरै पिताजी रो ई विरोध कियो अर जेठूदानजी नै खेत छोडणो पड़ियो। उण पेटै किणी कवि रो ओ दूहो आज ई लोक प्रचलित है “जेठू में जबरी करी मिणधर तैंज मुरार।” आपरो नानाणो दासोड़ी गांव में हो। आपरो निरंतर दासोड़ी आणो -जाणो हो। गांव रै हर मिनख सूं हेत। हथाई रा रूप। ग्यान रा भंडार। मिनखपणै सूं मंडित। मुरारदानजी घर भाणजा नी होयर गांव भाणजा हा। म्हारा जीसा (दादोसा) गणेशदानजी आपरै हम ऊमर हा। आपस में अणूंती अपणास ही। मुरारदानजी जद ई दासोड़ी पधारता जद गोकल़बाजी री तिबारी में जोर हथाई जचती। म्है ई जीसा रै साथै जावतो। म्है पैल पोत आपनै म्हारै बणायोड़ो छंद रोमकंद “रघुनाथ घणा रंग तो वड राजण साजण देव सु मोख सयो”
इणां नै सुणायो तो वै इता राजी होया कै म्है उण बगत रो वास्तविक वर्णन करण में असमर्थ हूं। म्है ११वीं रो विद्यार्थी हो अर महामना म्हनै जिको लाड दियो वो म्हारै वास्तै हेमाणी सरूप हो। पछै जद ई दासोड़ी पधारता तो म्हनै अवस याद करता।मुरारदानसा जैड़ो आदमी किणी टाबर नै याद करै आ घणी मोटी बात होया करती। म्हारै गांव रै किणी सैण, मुरारदानजी नै पूछ लियो कै आप गिरधर रो लाड घणो राखो? उण बगत उणां एक दूहो कैयो ।जिको म्हारै वास्तै आज ई धरोहर है-

केसव सुत गिरधर कवी, आखै बात अमुल्ल।
रिसी मुनी होवै मसत, गिरधर री सुण गल्ल।।

म्हारै काव्य प्रेम नै बधावण अर परिस्कृत करण में आपरी जिकी मेहरबानी रैयी उणनै म्है नीं भूलाय सकूं। जद म्है बी ए दूजै वरस रो विद्यार्थी हो उण बगत जागती जोत रा संपादक पूज्य डॉ मनोहर शर्मा हा उणनै म्है मुरारदानजी आसिया माथै रचित म्हारो गीत दियो वो आप छापियो।

गीत मुरारदानजी नोखड़ा रो
आसल अवंत़स वंश उजवाल़ू, पाल़ू प्रीत मुरार मुणां
जेठू सुतन पेखां जोराल़ू, सो विरदाल़ू सकव सुणां १

साचो मीत सैणपण साचो, क्रीत किता कवियाण कहै
चोगी चुतर नीत पर चालै, रीत तणो रखवाल़ रहै २

दिल रो निमल़ वरण में दाखां, हिव राखां जो बात हली
आखां राघव तणो उपासी, भू पर साखां ऐज भली ३

परकाजू ऐम पात पहचाण्यो, न्हाल़ बखाण्यो घणै नरां
जोगो मिनख दुनी सह जाण्यो, आण्यो अंजस सैण उरां ४

गै’रो पुरख सचेलो ग्यानी, दानी सांप्रत हैज दुथी
मही सकल़ बात आ मानी, नर अभिमानी है ज नथी ५

डि़गल़ तणो उपासी दाटक, कवत्त प्रकासी सैण कही
आगल भलप लैण अभलासी, सो नह जासी बात सही ६

सारा गुण भाल़ मनां मे श्रद्धा, लखवारां बल़िहार लयो
पह सुभचीत पेखियो पख में, (तो) गीध सोहणो गीत कयो ७

आप नै चारण साहित्य इतिहास अर संस्कृति रा मोकल़ा प्रमाणिक आख्यान याद हा। आप समाज में व्याप्त नशै री बुराई रा विरोधी हा। आप रो सुपनो हो कै चारण समाज मांस -मदिरा री आदत सूं मुक्त होवै। दूजै समाजां में ई आपरो जिको आदर हो वोसगिरबैजोग हो। आप केई रचनावां लिखी। मुरारदानजी डिंगल रा मोटा कवि हा। आपरो एक रोमकंद छंद आप विद्वानां री निजर कर रैयो हूं सो आप नै ठाह पड़ै कै उण मनीषी री उक्ति कैड़ी ही।

छंद रोमकंद -मुरारदानजी नोखड़ा रचित
दूहा
ररै नाम पर रीझियो कियो भगत रो काज।
जेम बिनां नह जाणतो जद मरतो गजराज।।

करी ऊपर कर किरपा तुरत मिटाई तास।
उदधि बीच उबारियो बो मोनूं विसवास।।

अरध नाम सुण आवियो तारख रसतै तज्ज।
मादव तणो मुरार नै उवो भरोसो अज्ज।।

इल़ रा अघ वारण इमठ देह धारण जगदीस।
त्रिहुपुर तारण हर त्रखा असुर संघारण ईस।।

छंद -रोमकंद
दिस भाल़ण किंकर के दुख दाल़ण लेण संभाल़ण नाथ लछी।
सुरभी दुज पाल़ण टाल़ण संकट आणंद रालंण भांत अछी।
दुसटां मद गाल़ण मूड खडाल़ण काय विधाल़ण पीय कपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै १

करटी दध रास गियो त्रिख कासर वेर सुबासर होत बडी
सकुली धर फास कियो निर आसर कुंजर सासर जाण कढी
उर नाम उपासर ले अज आसर साज सुद्रासर काढ सपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै २

विहंगम विलाप अनंतर वायक पूत खसंतर लीध पखौ
सुण संतर साद विदंतर सांभल़ लो सुद अंतर आप लखो
प्रतना जुग भंवर जाण अपंतर साज भुखंतर मोलि रुपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ३

छमदी रख बावर ऐण कूं छावर दे बिच पावर जाण दती
व्रख तोम सतावर जाऊं बधावर माधव धावर पंडु मती
सज सांत सिसावर व्याध विसावर दे अभिदावर एक दफै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ४

सिरिया चिणिया नव वासणिया सथ मांय मिनी जिणिया सिमटै
इम धावणिया विसनू भणियां बिन पार कजु किणियां न पटै
अबखी वणियां पत राखणिया जद ते पर कुंभणयान तपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ५

सुध भोम इसो पहलाद किसो सुण चातक सो रघुनाथ चवै
पितु देख रिसो मन मा़य घिसो पुनि भांति हिसो बतवाय भवै
सुत नाय खिसो जध धार कसो बज खंभ फसो हरणाख खपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ६

ब्रिज ऊपर धार विचार यूं वासव धीठ प्रचारत मीट धरी
जल़ जानि रचार मचार अजै झड़ कोप सु मूसल़धार करी
सुरि ग्वाल़ बचार सचारम सीघर कंग गिरधार ख्यो करपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ७

कर साय सँतां दुखदाय मिटावण चेटक सु निजराय चखू
जप ध्याय करूं पड़ पाय जनारद प्रीत सु मीत रखाय पखू
उर मांय भजूं हर साय अधोखज ईढ इसो फिर नाय अपै
प्रतदी उर धार करै भवपार हि जाच मुरार सु नाम जपै ८

छप्पय
पय बिन मिटै न प्यास, तरणी बिन मिटै तम्मर
जल़ बिन हलै न जाज, सबल़ बिन बणै न सम्मर
बिन पत्री जिम विहंग, निगम बिन रखै न नीति
कमल़ बिनां जिम क्रिसी, कियां दत बिनां न कीर्ति
बिन संतोस सुख ना बणै, भ्रात बिनां न मजलस भवै
बिन सोभा नर तन व्रिथा, हरि नाम बिनां न मुगत हुवै।।

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