ग़ज़ल – ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने

ख़ामख़ा ही क्यों किसी से वैर पाला आपने,
क्यों किसी की आबरू पे कीच डाला आपने

बेवजह ही वहम पाला या अहम में पड़ गए,
खून अपना व्यर्थ में ही क्यों उबाला आपने

आपका ही का ‘हेड’ था ओ ‘टेल’ भी थी आपकी,
क्यों मगर हर बार फिर सिक्का उछाला आपने

छाँह में जिनके पली हैं पादपों की पीढियां,
प्रेम के उन बरगदों को ना संभाला आपने

ज्ञान की जिस ज्योति को संसार ने सजदा किया,
क्यों तमस के रहन रक्खा वो उजाला आपने

आँख का तारा बुढ़ापे का सहारा आप थे,
क्यों अभागे बाप को घर से निकाला आपने

हो गए आजाद आजादी मगर आधी रही,
जीभ पर जो जड़ दिया सरकार ताला आपने

काट के परिवार यारी होंशियारी से करी,
जान के खुद का निकाला क्यों दिवाला आपने

देनदारी का न देखा एक भी लेखा कभी,
लेनदारी का फगत खाता खंगाला आपने

स्नेह-भाजी में जहर का काम जो करता सदा,
जीभ से ही घोल डाला वो मसाला आपने

आपका ‘गजराज’ ने कब क्या बिगाड़ा रहबरो!
छीन कर क्यों खा लिया मेरा निवाला आपने

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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