खून रै रिस्तै सूं बतो संबंधां रो विश्वास

जद खून रो रिस्तो अन्याय माथै उतर आवै। नीति मग छोड देवै। उण बगत हार्यै नैं हरि नाम ई याद आवै या ऐड़ै रिस्तां री चितार करै जठै रिस्तो तो होवै पण पीढ्यां नीं पड़ै। ऐड़ो ई एक किस्सो आप री निजर कर रैयो हूं।

बधाऊड़ो रतनूवां रो गांव। उठै रतनू मयाराम रैवै। उणां रै एक डीकरो होयो जिण रो नाम शंकरदान। जद उणां री जोड़ायत चालता रैया। दिन बीतां उणां पाछो ब्याव कियो। मोई मा केई दिनां तो दिखावो करती शंकरदान रो मन राखियो पण पछै आपरो असली रूप दिखाय शंकर नैं यातनावां देवणी शुरु कर दीनी। कीं वरस तो शंकर दांत भींचिया पण छेवट शंकर रै हाडकां अर हिंयै उत्तर दे दियो। रात रो शंकरदान घर सूं निकल़ग्यो। इन्नै बिन्नै फिरतै नैं ठाह लागो कै बीकूंकोर रा ठाकुर जैतसी उदार अर दातार है। केड़ो ई चारण आवो, ठाकुर रै मन में आदर है। लोगां बतायो कै “तूं रतनू अर ठाकुर भाटी है। थन्नै उठै जावणो चाहीजै। ” टाबर शंकरदान, बीकूंकोर पूगियो। कोट में गयो। ताम झाम सूं अजाण पण मा शारदा री पूरी कृपा। वाणी रो वरदाई। कपड़ां मे कड़पाण नीं पण आखरां में आपाण। जावतै ई दूहो कैयो –

सब सूतो संसार क्रिपणां धन काठो कियो।
जागै जग दातार जस रै हेलै जैतसी।।
अर्थात सगल़ा कंजूस आपरो धन काठो कियां सूता है पण हे जैतसी ! तूं ई एक ऐड़ो है जिको जस रै कारण जागतो रैवै। हे जेतसी! हूं उठै सूं घूमतो आयो हूं जठै
 
पदमणियां पाखांण कांगसियां गूंघट कसै।
जठै घणेरो जाण सुजस तिहारो जैतसी।
हे जैतसी !जठै भाठै री खाणां मांय सूं पदमणियां (औरतां)निपजै। बे सिंणगार ई करै अर गूंघटो ई काढै उठै ई थारो सुजस। थारी दातारगी रा किस्सा म्है सुणिया है।
 
पहिड़ा गया पयाल़ जस रथ कोई जूतो नहीं।
जुग सह जीवणियाल़ जादम डावै जैतसी।।
हे जेतसी !जस वाल़ै रथ रा पहियां कल़जीग्या। क्यूं उण नैं काढण सारु कोई सधर पुरख जुपियो ई नीं। उण बगत पूरो संसार जीवणै पासै अर तूं एकलो डावै पासै जुप जस रै कलिजतै रथ नैं गति दी।

बाल़क कवि रै मूंडै सूं सतोला आखर अर गंभीर गिरा गरिमा सुण भाटी जैतसी गदगद होयग्या। पूछियो। कुण? कवि केयो “बधाउड़ै रो रतनू शंकर!”

ठाकुरां कैयो “आप तो विराजो ! कांई आदेश है म्हनै?” बाल़क पूरी हकीकत इण दूहै में प्रगटी।
हे जैतसी ! म्हारी मा मूसल़ां सूं मारै। बाप म्हारी कोई सार नीं लेवै। ऐड़ै में तेवड़ली कै म्है निरधारां रै आधार भाटी जैत कन्नै जावूंलो-

माता मारै मूसल़ां बाप न पूछै सार।
जासां जादम जैत रै निरधारां आधार।।

दूहो सुण जैतसी रै आंसूं छूटा। “कविवर ओ घर थांरो है। पाछो बधाउड़ै जावण री जरूरत नीं है।”

दूजै ई दिन ठाकुर आपरी जागीर मांय सूं हरल़ायां गांव सांसण कर दियो। हालांकि गांव रो तांबापत्र महाराजा सूरसिंह जारी कियो। पण जैतसी रो सुजस शंकरदान रै सधर विश्वास अर सरस भावां में आज ई भल़कै।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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