क्रांतिवीर बारहठ केशरी सिंह

BarhatTrimurti(केसरीसिंह बारठ के पास विजयसिंह पथिक ने आकर क्रांति के लिए एक वीर युवा देने का आग्रह किया, बारठजी की हवेली में विजयसिंह पथिक तथा केसरीसिंह बारठ के बीच हो रहे वार्तालाप तथा वार्तालाप के बीच अपने आपको क्रांति में सम्मिलित करने हेतु प्रस्तुत करने वाले वीर युवा कुंवर प्रतापसिंह बारठ, जोरावरसिंह बारठ तथा केसरीसिंह जी के जंवाई ईश्वरदान आसिया के प्रस्ताव को आधार बनाकर यह रचना लिखी गई है)

वक्त आने पर वतन पे वार दी जिसने जवानी।
और उसके खून में भी थी रवानी ही रवानी।।
बंधु के बलिदान की मां भारती खुद ले बलैयां।
क्रांतिकारी केसरी के त्याग की अद्भुत कहानी।।01।।

पथिक ने पूछा कहो किसके, जिगर में जोश बोलो।
और है मंजूर किसको, मौत का आगोश बोलो।।
कौन है जो देश हित, निज देह का बलिदान कर दे।
कौन है स्वतंत्रता की, मांग में सिंदूर भर दे।।02।।

आए वही जिसको, आजादी से बहुत अनुराग है।
और वह आए कि जिसके, खून में ही त्याग है।।
अन्य वह आए कि जिसकी, बहिन की बिगड़ी जवानी।।
वृद्ध जननी के कलेजे की, सुनी जिसने कहानी।।03।।

बाप वह आए कि जिसकी, बेटियां बंदी बनी है।
उस अभागे तात के, दिल की कहो किसने सुनी है।।
जिसने सुनी है आरजू, अंतिम समय उस जनक की।
क्या उसे बहका सकेंगी, कोठियां महंगे कनक की।।04।।

पथिक भर-भर जोश यूं ही, एकनिष्ठ कहता रहा।
सभा मंडल मौन होकर, शब्द-शब्द सुनता रहा।
पथिक बोला कायरों का, काम रण में है नहीं।
जो भी मरने से डरे वह, हां कभी करना नहीं।।05।।

कायरों की जब पिंडलियां, थरथराने सी लगीं।
सूरवीरों की शिराएं, रक्त पिघलाने लगीं।
सुभट वीरों के जिगर में, उथल-पुथल भारी मची।
सीस वारें देशहित उनके दिलों में यह जंची।।06।।

पथिक का पाथेय सुनकर, केहरी कहने लगे।
ओज का अंदाज अद्भुत, भावनद बहने लगे।।
बोले जिगर के जख्म बेबस, हैं अभी तक भी हरे।
होगा कोई वो और जिसके अंश मरने से डरे।।07।।

मेरा अंशी स्वयं रुद्र जो, कालकूट को निगल गया।
उसकी हुंकारों के आगे, पत्थर-पत्थर पिघल गया।।
जब-जब संकट की वेला थी, मैंने खुद मरना स्वीकारा।
एक नहीं अनगिन उत्सर्गो से, भारत का मान उबारा।।08।।

जब तक मां धरती दुखियारी, सुखी नहीं रह सकता मैं।
इस गुलामी के दोजख को, और नहीं सह सकता मैं।।
कोई अपना तन, मन, धन, जीवन, मां पे वारे ! योग कहां है।
इससे अच्छा इस जीवन का, और कोई उपयोग कहां है।।09।।

सुनी केसरी की वाणी तब, एक साथ दो युवा उठे।
मैं जाऊँगा, मैं जाऊँगा, दोनों सहसा बोल उठे।।
यदि एक को जाना है तो, पहले मुझको जाने दो
जोरवर ने कहा जोर से, जाना कहां ? ठिकाने दो।।10।।

तभी एक हुंकार हुई, चाचा से पहले मैं जाऊँगा।
दुष्ट फिरंगी के दलबल के, चिथड़े-चिथड़े कर आऊँगा।।
ऐसा कहकर प्रतापसिंह ने जाने की आज्ञा चाही।
बोला देखो दुष्ट फिरंगी की करता हूं आज तबाही।।11।।

चाचा और भतीजे दोनों, के मन की जब बात सुनी।
सिंह केसरी के तन मन की, रग-रग जैसे नाच उठी।।
किशनावत ने कहा पथिक हैं, भाग हमारे बहुत बड़े।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने आतुर दो-दो सिंह खड़े।।12।।

इतने में आक्रोश भरी आवाज एक फिर गूंज उठी।
इंकलाब का नारा गूंजा दशों दिशाएं बोल उठी।।
एक नाम मेरा भी लिख लो, एक भेंट मेरी भी ले लो।
कहा आशिये ईसरसिंह ने, एक शीश मेरा भी ले लो।।13।।

बंधु, बेटा और जंवाई, तीनों की तत्परता जानी।
राष्ट्रभक्ति के खातिर ऐसी और कहां है त्याग कहानी।।
वाह! केसरीसिंह, धन्य कुल चारण, नमन वीर भू राजस्थानी।
भारत मां का अंतस बोला, , वाह! बलिदानी, राजस्थानी।।14।।

जय जगदम्ब जपी तीनों ने, हिंद-हिंद जय हिंद कहा।
जय भारत, जय भारत माता, जय-जय हिंदी-हिंद कहा।।
बूढे़ बब्बर के चरणों में, झुक तीनों ने आज्ञा मांगी,
उच्च स्वर में किशनावत ने भावभरा संदेश कहा।।15।।

भूचाल धार लो भुजदंडों में, सीनों में सुलगालो शोले।
आँख मिला लो खुद अंतक से, बोलो वीरों बम-बम भोले।।
जहर उगलते इन सांपों से भारत मां को मुक्त कराने,
कफन बाँधलो भाल कसूमल, पहनों वीर वासंती चोले।।16।।

आजादी के बीच अड़े, यदि पर्वत तो, उससे अड़ जाओ।
आजादी के बीच अड़े यदि सागर तो उससे भिड़ जाओ।।
दुनियां की सारी दौलत से हमें आजादी प्यारी है,
भारत मां के लिए लाड़लो ! स्वातंत्र्य वधू लेकर आओ।।17।।

आजादी के मग में आई हर अड़चन से हम निपटेंगे।
मां के मन की सभी मुरादें, जल्दी लेकर हम लौटेंगे।।
गोरों को चुन-चुन मारेंगे, शीघ्र देखना वो हारेंगे,
लंदन के रवि को अस्ताचल चलता करके हम लौटेंगे।।18।।

रक्त बूंद से हिंद चमन को हम सींचेंगे प्रण करते हैं।
भूचालों से नहीं डरेंगे, डटे रहेंगे प्रण करते हैं।।
जीतेंगे या मिट जाएंगे, और न कुछ स्वीकार करेंगे।
जीएंगे तब तक जुल्मी के सर पर डटकर वार करेंगे।।19।।

राजस्थानी वीरों ने गौरों को डटकर ललकारा।
आजादी के खातिर अपना, तन, मन, जीवन सारा वारा।।
भारत मां ने गोद सुलाकर उन वीरों को अमर किया।
जब तक कौम रहेगी तब तक याद करेगा जन-गण सारा।।20।।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *