लख नव लोवडियाळ

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जद आवड जी महाराज री मन में कल्पना आवै तद मन कृष्ण रे विराट रूप ज्यू उण री कल्पना करे अर एक अनंत चितराम खडो हुवै। मां नें आपे विराट वपु धारणी चारणी जगतारणी कह सकां। उणमें छपन क्रोड चामुंड नव लख लोवडियाळ अर चौरासी चारणी रो एकीकृत अवतार समझ सकां। गर छपन क्रोड नवलाख अर चौरासी वपु धारणी आवड मां आप रा उतरा मुख सूं मां सुभाषीष देवै। उणसूं दुगणी आंख सूं पुरा जगत रा चराचर जीव ने देख सके।उण सूं बीस गुणा हाथ (बीस हथी) सूं सबने आसीस दे सके अर उण री सब आंगळी सूं जगत रा सब जीव ने बाळक समझ आप हाथ री आंगळी सूं झेल मां सब रो कल्याण कर सके। छपन क्रोड नवलाख अर चौरासी मुख धारी मां आप रा हर वपु रा दोय पग सूं जगत री आसुरी शक्ति ने पग तळे दबाय सके। अर उतरा ही मुख सूं संसार री आसुरी शक्तियां ने चबाय सके। आवड आखै आसिया रा इणी भाव रे साथ बणायोडा दोहा, सोरठा, तुंबेरा सोरठा, बडो दोहा आप सब नें सादर।

लख नव लोवडियाळ, छपन क्रोड चामुंड सह।
चौरासी चरिताळ,वड आवड वपु में बसे॥65
छपन क्रोड नवलाख अर, चौरासी वपु धार।
आवड मावड आप ही,जग री पाल़णहार॥66
छपन क्रोड नव लाख, चौरासी मुख सूं सदा।
भल आसीसां भाख,आणँद देवे आवडा॥67
छपन क्रोड नव लाख,चौरासी मुख धारणी।
उण सब री दो आँख,सूं भाळै आवड अवनि॥68
छपन क्रोड नवलाख,चौरासी वपु चारणी।
सब रा द्वय दस हाथ,रखै जगत रा जीव पर॥69
छपन क्रोड नव लाख , चौरासी मय बीसहथ।
झैल जगत ने राख, कर अंगुलि करुणामयी।70
छपन क्रोड नवलाख,चौरासी वपु चारणी।
खळ दळ पग तळ राख,जबर डरावै जोगणी॥71
छपन क्रोड नवलाख,चौरासी मुख चारणी।
खळ दळ करवा खाख,जुध रत दीठी जोगणी॥72
छपन क्रोड नवलाख, चौरासी मुख चारणी।
हर इक वपु इक नाक,सूं सुंघ’र खळ खोजती॥73
आवड वडी अनंत, आभा सूं पाताळ लग।
सजन सिध्ध अर संत,पार न कोई पामिया॥74
आवड नाम अवाज री,गूंजै गाज अनंत।
सुणता विरला संत, समझ नही मूरख सकै॥75
आवड नाम अवाज सूं,गूंजै दिशा दिगंत।
मेहाई मतिमंत, माळा आवड री जपै॥76
आवड मावड आप री,जोत जबर झबकंत।
अजवाळो अवनी हुऔ,सुख पायौ सब संत॥77
आवड मावड री झडी,जिण जन पर बरसंत।
हरदिन उणरो हरखमय,आणंद वधै अनंत॥78
आवड मावड री झडी,पडी जेण पर पूर।
दुख सूं रह बा दूर, सुख पावै संसार रा॥79
आवड मावड आप रो,डावड नरपतदान।
बीस भुजावड राखजे,चरण चित्त भ्रमरान॥80
छपन क्रोड नवलाख अर,चौरासी वपु कम्म।
आवड मात अनंत है,आवड नाम अगम्म॥81
मढ में आवड मात रे,जळहळ दीपक जोत।
नित नित मंगळ होत,धूपां री धमरोळ घण॥82
प्रतपाळक बाळक तणी,रखवाळक बिरदाळ।
जोगण जूनी जाळ री,चाळक नेह निहाळ॥83
चाळक बाळक आपरो,जोगण जूनी जाळ।
जूनी जाजम आय नें,सारां संकट टाळ॥84
आवड रो अवरोध,करण चाहियौ तेमडो।
लियो मात प्रतिशोध,जबडां झालै झेरियौ॥85
आवड रे आधार, जो रहसी तरसी जगत।
नैया करसी पार,साची सगती शंकरी॥86
डग मग डग मग पाँव, थाको मां चलतां थकां।
आवड मत तरसाव,दरसण छोरू दीजियो॥87
डिंगळ री डणकार, ह्वै डाढाळी रे मढां।
रीझै सुण अणपार, सदा शगत शाकंभरी॥88
डिंगळ रे डणकारते, ताते चढ कंठीर।
आवड बैठा तेमडै, हरै सकळ जन पीर॥89
मन मंदिर में मात, रात दिवस रमती रहै।
जोगण सब जजबात,अंतस रा जाणै अवस॥90
आभौ धर पट अटकियो,देखत होय अचंभ।
झील्लण हारी जोगणी,आवड वड जग खंभ॥91
डिंगळ री डाढाळ रा,डणकै है लघुशाव।
आवड मावड सांभळै,करै हेत अणमाव॥92
रखवाळक डिंगळ रहो,अरज आवडा आज।
रहो साथ राजेसरी,जिणसू बुडै न जाज॥93
डिंगळ डिगती डोकरी,थिर राखण वड थंभ।
मनरँगथळ री मावडी,करुणाकरा कदंब॥94
हिंगळाज सरताज है, वपु आवड मय मां ज।
जोगण आखा जगत री,रहै कोहला राज॥95
महिखा मावड मारणी,पीवण शोणित पूर।
आवड कर करडी निजर,गंजै खळां गरूर॥96
~~वैतालिक

 

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