लक्ष्मणदान कविया खैण – परिचय

सीधै-सीधै शब्दां में लोककवि उणनै कह्यो जावै जिको लोकभावनावां रै लेखै लिखै। लोक ललक नै आपरै सुघड़ शब्दां में घड़’र राखण री जुगत में नीं रैयर अड़घड़िया ई खुलै खाल़ै अर अणभै कैवण री ऊरमा राखै तो साथै ई सुघड़ घड़ण री खांमची राखै तो सोनै में सुगंध हुय जावै। यानी देख्योड़ी अर भुगत्योड़ी नै कैवण सूं आ सोच’र नीं शंकै कै साच सुणावण सूं किण-किण अबखायां सूं जूंझणो पड़ै सकै? बल्कि आ सोचर लिखै कै विधाता कलम साच अर निशंक कैवण नै ई दी। ऐड़ा कवि घुरतै ढोलां आ कैवण री हिम्मत राखै कै ‘हूं तो देखूं जैड़ी दाखूं, हूं तो कूड़ रत्ति ना भाखूं।’

जिण कवियां इण वैचारिक मंथण रै पछै कलम उठाई वै कवि इज लोककवि रै विरद रा साचा हकदार है। बाकी फुरतै वायरै रै अनुकूल मंडाण मांडण में माहिर हुवै वै फुरकणिया अर चाटो देख हुरकणिया कवि हुवै। उणांमें लोकभावां नै लखण अर लिखण री ऊरमा नीं हुवै।

आज राजस्थानी में लिखै घणा ई है पण उणांरो लिख्यो पढां जणै सावजोग समझ सकां कै ऐ कवि वैचारिक कुंडाल़िए सूं बारै आय’र जनमन नै समझण अर उणरी कोठै में उपजी नै आपरै होठै लावण सूं शंकै। पण जनमन नै समझ’र उणरी अंतस भावना नै आपरै आखरां पिरोय बिनां हाण लाभ रै फिकर में जन जाजम माथै राखी है उणांमें लक्ष्मणदान कविया खैण रो नाम हरोल़ में है। साहित्य मनीषी कन्हैयालाल सेठिया रै आखरां में “लक्ष्मणदान कविया राजस्थानी रा लोककवि है। आंरी कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़्योड़ी है।” जिण कवि री कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़ी थकी है उवो कवि इज सही अरथां में लोककवि है।

जिणरै हिरदै में शोषण रै प्रति रोस, गरीब रै प्रति करुणा, पर्यावरण रै प्रति प्रेम, जातीय जकड़न रै प्रति बगावत, जड़ां सूं जुडाव नै सुभग संदेश रै सरल़ अर संप्रेषणीयता रै साथै नीर-खीर करण री खिमता अर अभिव्यक्ति कौशल हुवै उवै इज लोक लेखै देखै जैड़ै कैवै। क्यूंकै इणां रो ध्येय फगत अर फगत लोक चेतना जगाय समाज री जड़ता मिटाय सरसता लावण रो हुवै। इण कवियां रो काव्य सत्ता रो नीं अपितु साच रो पोषक अर समर्थक हुवै। जद आपां कवियांजी नै पढ़ां तो आ बात सोल़ै आना सटीक ढूकै।

लक्ष्मणदान कविया नै पढां तो उणांरी ‘अंतस अगन’ अर सागड़ी नै छोड सगल़ी कृतियां डिंगल़ शैली में प्रणीत है या पछै डिंगल़ शैली रै ओल़ै-दोल़ै।

हालांकि आजरा स्वयंभू आलोचक डिंगल़ में लिखणियां नै लोककवि अंगेजण में सहजता महसूस नीं करै, क्यूंकै इणांरो मानणो है कै डिंगल़ कवि परापरी रै चकोरिये सूं बारै नीं निकल़ सकै अर जको कुंडालिए नै नीं लांघ सकै उवो लोककवि नीं होय सकै। म्हनै लागै कै आ बात सफा हतीतती अर गोडै घड़्योड़ी है। क्यूंकै डिंगल़ कवियां में रंगरेला बीठू सूं लेय’र ऊमरदानजी लाल़स, तक री एक सुदीर्घ परंपरा है जिणां लोकभावां नै सणझर आंखन देखी नै आखरां रै संचै ढाल़ आपरी संवेदनावां रै प्रवाह नै जन चेतना री राह बहाय जगत में वाह खाटी है। इण बात रो साखीधर इणांरो प्रणीत काव्य है। इण मनीषियां रै भावां नै जिण कवियां आत्मसात किया उणांमें सिरै नाम है लक्ष्मणदान कविया रो।

श्री कविया रो समूल़ो काव्य तामझाम सूं दूर आमजन रै काल़जै री कल़झल़ नै, नीं केवल लखी अपितु सधरता साथै लिखी। इणांरो लिख्यो काव्य साधारण जन रै काल़जै री कोर नै स्पर्श करतो थको जीवटता अर हूंस भरै। ज्यूं-ज्यूं आपां कवियाजी रै काव्य री गिरा गरिमा अर भाव गांभीर्य रै मरम नै समझण री जुगत करां त्यूं-त्यूं आपां नै लागै कै पुराणै छंदां में नवै विषयां नै लेय’र राजनैतिक, सामाजिक अर आर्थिक अबखायां माथै सजोरी कवितावां सिरजण करणिये कवेसरां में कवियाजी समकालीन भारतीय साहित्य री भावधारा सूं लारै नीं है।

आज च्यारां कानी जल़ जमीन अर जंगल़ बचावण सारू मोटा-मोटा पर्यावरणविद सचेत है तो साथै ई दलित, बेटी, मजूर, किरसाण, आद रै हितां सारू ई संवेदनशील लोग आपरो फूल सारू पांखड़ी अवदान देवण सारू आगीवाण है। ऐड़ै ई आगीवाण कलम रै धारणियां में आगैडाल़ कवियां री पैली ओल़ में कवियाजी रो नाम गीरबैजोग आखरां में अंकित है।

कवियाजी रो समग्र काव्य आम आदमी रै पख में ऊभो निगै आवै। इणांरै काव्य में आम आदमी री व्यथा कथा ई नीं है अपितु इण काव्य में इणरै तिड़कतै अंतस नै हरियल़ करण रा ई जाझा जतन दीसै। इण काव्य में देशभक्ति री दीप्ति तो है ई पर्यावरण संरक्षण री अनुरक्ति, संस्कृति री अंवेर अर भावी पीढी में संस्कार सिंचन री खेचल ई है तो साथै ई तमाम तरीकै री विडरूपतावां अर विषमतावां माथै बिनां खोट चोट ई करी है।

कवियाजी रै अंतस में मायड़भोम अर मायड़भाषा रै पेटै अंजसजोग भाव भल़कता अर शब्द सरिता में खल़कता दीठगत हुवै। च्यारां कानी पग पसारती पोचाई, पनपती ओछाई, नाक चढावती नुगराई, नखरा करती नगटाई तो जड़ां रोपतै छल़-छदमां री पोल बिनां किणी ढक पल रै चवड़धाड़ै चोगड़दै खोली है।

आपरी कवितावां रो सुर जितरो सहज अर सरल लागै उतरो ई ऊंडाई में उतर्यां खारो अर खरो लागै। आपरी कवितावां में कठै ई भाव भटकाव कै अरथ अटकाव निगै नीं आवै मतलब सीधी अर सपाट। ऐ कवितावां सीधी काल़जै पूग’र आपरी सावखरी ठौड़ बणावै अर आमजन में हूंस अर ऊरमा भरण रो काम करै। कवियाजी री कवितावां री कोरणी में मायड़भोम री महिमा अर मानवीय गुणां री गरिमा रो वरणाव मूल़ सुर है। स्त्री मन री व्यथा कथा ई संवेदनावां साथै प्रगटी है। दायजा री दाझ में दाझणिया कै इणरी भावनावां नै ठेस पूगावणिया कै इणरी महत्ता नै कम आंकणियां अर इणनै कल़पावणियां री बखियां उघेड़ण में कवि संकोच नीं कियो है। प्रकृति अर मिनख रै आद जुगादु रागात्मक रिश्तां नै कवि आपरी गिरा गरिमा रै पाण उकेरण में आगीवाण है। ‘रूंख सतसई’ जैड़ी काल़जयी कृति रै ओल़ावै विरछ वंदना, वरसाल़ै री मरूधर में उपादेयता, अर सुरंगी रुत री विधरंगी बातां नै जिण खांमची रै साथै लिखी है उणसूं तो लागै कै कवि रो मन जितरो प्रकृति रै प्रेम में हेम हुवै उतरो दूजी बातां में नीं। कवि रै मन में मायड़भाषा रै प्रति प्रेम हिरदै में हबोल़ा लेवै तो साथै ई अठै रै रैवासियां री उदाशीनता, अणमणापणो, अर चिड़पड़ै सुहाग री बाण सूं कवि रो मन खिन्न है। अंतस में एक पीड़ा है अर आ पीड़ा घणी जागा उकल़तै आखरा अर बल़तै काल़जै मुखर वाणी में अभिव्यक्त हुवै। कवि मरतै मिनखाचार अर पसरतै पापाचार सूं दुखी है पण इण दुख सूं कवि हियो हेठो नीं करै बल्कै इण माथै चोट करण में आपरो कवि कर्तव्य निभाय मन नै हल़को महसूस करै।

कवि काल़ री कराल़ता, अंतस सूं खूटती अपणास, पग पसारती लिपल़ाई, धोल़ै री ओट में काल़ी करतूतां करणियां री पोल ई आपरी कवितावां में संवेदनावां रै साथै अर बाजतै डंकै निशंकै होय खोली है। कवि मानवीय मूल्यां री रुखाल़ी, भेल़प-भाईचारै री थापना, सांप्रदायिक सदभाव, अनाचार सूं अल़गाव रो सुभग संदेश खाली थोथी बातां में नीं अपितु कहणी अर करनी में अपणाव सारू देवै।

कवि लक्ष्मणदान कविया लोककवि है सो लोक रै ओल़ दोल़ै ई लिखै भलांई रूंखां री छाया अर मिनखां री माया हुवो, भलांई दुकाल़ री समाज नै दाझ। भलांई रल़ियावणी रितुवां हुवो भलांई मजूर री मैणत अर कड़पाण। भलांई दलितां रो दरद हुवो भलांई आजरी विडरूपतावां नै देख अंतस में सुल़गती अगन अर उगटतो खार। आ ई नीं कवि आधुनिकता अर परापरी रै सुभग सुमेल़ रै साथै आपरी सिरजण जात्रा करै। जड़ां सूं जुड़ाव रै साथै आपरै अंतस उमड़तै भावां नै शब्दां रो रूप देय जनमानस आगै राखै। जद ई तो गोविंद गरिमा रचै तो साथै दुर्गा सतसई जैड़ी कृति रो अजरो अनुवाद करर मन री तृप्ति मानै।

लक्ष्मणदान कविया रो रचना संसार विविधवर्णो है-
संदेशो, पाबासर, गोविंद गरिमा, रूंख सतसई, दुकाल़, रुत सतसई, सागड़ी, दुरगा सतसई, मजदूर सतसई, दलित सतसई, अंतस अगन, कैलास सतसई, कोरोना सतसई।
कवियाजी रै काव्य री विरोल़ करां तो इणांरै काव्य री सतवर्णी आभा आपांरै साम्हीं प्रकाशमान हुवै उवा निसचै ई कवि री उदात्त चेतना री द्योतक है। कवि री काव्य प्रतिभा अर वैचारिक प्रतिबद्धता रै सिंधु नै कीं बिंदुवां रै आंटै राखणा समीचीन रैसी।

सुभग संदेश रो संवाहक कवि-

कवि जिण समाज अर भांयखै में रैवै उठै रै मानखै में व्याप्त खांमियां अर बधतायां नै आपरै काव्य रो पैली वल़ा वर्ण्य विषय बणायर आपरी कलम रो कमाल बतावण सारू कमर कसै। पैली दीठ में आपां नै लागै कै कवि सांकड़ै मन रै सागै सिरजण करै पण नीं, ऐड़ो नीं है। क्यूंकै कवि तो उदात्त चेता हुवै। उणरै सारू आपरो अर परायो अभेद हुवै। उणरी सोच समष्टिमूलक हुवै। ‘संदेशो’ इण बात री साखीधर है। ‘संदेशो’ में खाली थोथा उपदेश नीं है बल्कै कवि रै मन री टीस रो प्रकटीकरण है क्यूंकै समझ नै मार है-समझै तैनै साल्है’ री बात कवि सावजोग रूप सूं जाणै। नशां री लत्तां में कल़ीज्यै मिनख नै सद्मार्ग बतावणो कवि आपरो फरज मानै। दायजै री दाझ में दुसल़ीजती बेटियां रै अवसाद नै कवि समझै तो साथै ई कवि जाणै कै मारवाड़ में काठोज ई धन है। इणी सारू कवि अनुशासित जीवण अपणाय पुरसारथ रै साथै आगै बढण अर भाग रै भरोसै सूतो नीं रैवण री बात करै। कवि आपरै पाठकां नै जड़ां सूं जुड़ाव राखण अर कुटिल़ता त्यागण अर नेकी अपणावण री बात करै।

पोथी रो वर्ण्य विषय अभिजात्य वर्ग रै सारू नीं है अपितु खेतीखड़ी अर पशुपाल आपरो जीवण यापण करणियां रै ओल़ै-दोल़ै रै वातावरण में गुंफित है। कवि सावजोग रूप सूं जाणै कै मिनख नै धरम रै धड़ां में बांट आपरी रोटी आडा खीरा देवणिये हुसनाकां री कमी नीं है। सो कवि आमजन नै आ बतावण सूं नीं चुकै कै धरम रै धड़ां लारै धूड़ बगावो अर करम में विश्वास राखो। अहिंसा परम धरम है सो इण बात रो मरम समझ हिंसा सूं आगो रैवणो। नेकी अर एकी राखियां आपांरो देश प्रगति पथ माथै अणभै बढतो रैसी-

हिंसा कर कर हाथ सूं, फरजी किरतब फूड़।
राल़ै इसड़ा रासतै, धरम नांव पर धूड़।।
कुण हिंदू मुसलिम कवण, कवण सिक्ख री कोम।
भारत रा सह भारतीय, विविधा में हिक भोम।।
क्षेत्रवाद नै छोडदे, भेद भाव ज्या भूल।
सारां नै अपणा समझ, इसड़ो राख उसूल।।

आज देश में सांप्रदायिक वैमनस्यता बढ रैयी है। धरम-धरम रै भंतूल़ियां में मिनखपणो दोटीज रैयो है। आस्था री ओट में लोग जिणगत रगत सूं हाथ रंग’र दया, करुणा, आद रै अल़ीतो लगाय आपरी दुकान चलाय अट्टहास करणिये पितलज्जां रै कैयै नीं लागर आमजन नै भेल़प-भाईचारै में रैय देश री उन्नति में

आपरो फूल सारू पांखड़ी सैयोग करण रो आव्हान करै। कवि लिखै कै आ किसड़ी आजादी आयगी !जिको भाई भाई सूं लड़ाई मांड बैठो-

भाई भाई लड़ै लड़ाई, संप्रदाय री ओट सजै।
पावन थल़ कर दिया अपावन, बाज एकता तणा बणै।।
आ किसड़ी आजादी आई, मिनखां हाथां मिनख मरै।
देस प्रेम नांही दिल मांही, कल़ह छेत्र अर जात करै।।

कवि लिखै कै आजादी रै सारू सगल़ै लोगां आपसी भेदभाव त्यागर फिरंगियां सूं लड़ाई मांडी जणै जायर आपांनै आ आजादी मिली-

पच पच मरिया सूरा पूरा, जद आजादी हाथ लगी।
जांरो जस भूल्यौ नह जासी, जोत अमर वां नांम जगी।।

कवि बेबाक लिखै कै आदमी री चाल, चरित्र अर चेहरो ऊजल़ हुवणा चाहीजै पण आजरी बखत में ऐड़ी आभा वाल़ा पुरसारथी करोड़ां मांय सूं कोयक ई मिलै। ऐड़ै नरां रै कारण ई देश तरक्की करै अर बेनेकी वाल़ा भ्रष्टाचार में डूब आपरै अर देश रै नाम अपकीरती ई लैवै-

चित ऊजल़ नेकी चलण, करणी कथनी एक।
पुरसारथ इसड़ा पुरस, क्रोड़ां मांही केक।।
नेकी सूं रहिया नरां, देस तरक्की द्वार।
बिन नेकी दिन दिन बढै, भारी भ्रष्टाचार।।

कवि पुरसारथ नै ई प्रगति रो पैलो पागोतियो अर सिद्धि रो सिद्ध धाम मानै-

पुरसारथ सिद्धि परम, धरम सिरै ओ धाम।
प्रगति री पैड़ी प्रथम, नरां करम रो नाम।।

मारवाड़ में काठोज ई धन है। कवि रूपक, उत्प्रेक्षा रै भेल़प में कितरी सहज बात कैयी है कै समुंद रै समान इण धरती माथै खरचो जल़ रै समान हुवणो चाहीजै जिणमें मितव्ययता रूपी तरणी सूं तिरोलो तो ई बेड़ो पार हुवैला-

अथ सागर रूपी इल़ा, जल़ जिम खरचो जोय।
तिण में मितव्ययता तरी, कदै न अटकै कोय।।
खरचो करणो खलक में, आमंद रै अनुसार।
मितव्ययता देवी मणां, सरणाई साधार।।

कवि नशां रै एकदम विरोध में है। मारूधर घर मोटका, दारू दिया डबोय रो प्रबल समर्थक-

दारू कारू देहरी, सतरू नाम सराब.
मद बदनामी मानखे, जुलमी काय जवाब।
जुलमी काय जवाब, आम सूं आंतरा।
महफिल दारू मांय, भिलै हर भांतरा
प्यालो गरल़ पिलाय, मौत मनवारियां।
दाल़द रो दरसाव, धरा मद धारियां।।

कवि गांमां में रुजगार रा साधन बढाय बढ़तै शहरीकरण नै रोकण री मंशा राखै। कवि मानै कै आदमी शहर में पूगां असंवेदनशीलता रो आवरण धारण कर लेवै। पारकी पीड़ में पड़ण री तो सोचै ई नीं।

संस्कृति रो अंवेर में आगीवाण-

भलांई जुग पलटग्यो। लोगबागां रै सोचण अर करण रा ढारा बदल़ग्या। देश री गधी अर पूरब री चाल में लोगां रंगीजण लागा अर ऐड़ी करड़ काबरी आधुनिकता नै अपणाय लोग आपरा संस्कार अर संस्कृति सूं मूंडो मचकोड़ण लागा। आ स्थिति देख कवि लोगां नै इण बात सारू सचेत करण कमर कसै कै आपरी जड़ां सूं जुड़ाव नीं राखणियो विरछ जिणगत एक दिन आड बरड़कै भाग धूड़ भेल़ो हुवै उणीगत मिनख आपरी संस्कृति सूं कट्यां धोबी रै कुत्ते ज्यूं नीं तो घर रो रैवै नीं अर नीं घाट रो।

सो आधुनिक ई बणो, तो ई आपरी परापरी परिपाटी नै नीं छोडणी-

अंतर सूं करणो गुरू आदर, बोलत सादर ध्यान बडा रो।
मात पिता हित मान रखौ मन, ध्यान रखौ कुल़ री गरिमा रो।
संयम राख पढौ हित साहित, धीरज संकट में नित धारौ।
आल़स छाय नहीं तन ऊपर, तो पुरसारथ मारग प्यारौ।।

कवि मानखै नै सुभट कैवै कै मना रे विरछन की गत लेय। जिणभांत बोरड़ी आपरा बोरिया हर कोई नै चखाय मन में सुखद अहसास मानै उणीगत कवि बिनां किणी भेद रै कैवै कै मिनख नै रूंखां सूं जरणा, कीरप, अर परउपकार रा भाव ग्रहण करणा चाहीजै-

जरणा रूंखां री जबर, करणा पर उपकार।
सरणागत रिच्छक सदा, भरणा फल़ भंडार।।

जिणगत रोही में भांत भांतीली वनस्पति एको राखर एक-दूजै नै सहारो देय ऊगावै, पाल़ै अर पोखै। यानी अनेकता में एकता रो संदेशो देवै। तो पछै मिनख आपस में अपणास क्यूं नीं राखै-

सदगुण वाल़ा घण सदल़, मिल़जुल़ राखै मेल़।
साखी राखी सायता, करै मिंतवां केल़।।

कवि रो सपाट कैणो है कै सादो जीवण अर उच्च विचार राखणा चाहीजै। नीं ठगीजणो अर नीं किणी नै ठगणो-

सादो जीवण देय सुख, ऊलफेल मत आंण।
मती ठगीजै और नै, खरा गुणां री खांण।।

कवि संचै री आदत नै बुरी अर त्याग रै भावां नै सिरै मानै। जद ई तो कैवै-

जंगल़ बील’ज जलमियो, पल़्यो खाय फल़ फूल।
संचण तणा सभाव रा, अल़गा रया उसूल।।

कवियाजी राजस्थानी संस्कृति रै मूलाधारां यथा गुण पूजा, मिनखपणो, परकाजू, त्याग, स्वाभिमान, देशभक्ति, भेल़प भाईचारो आद नै आपरै काव्य रै आंटै परोट पाठकां नै एक सुभग संदेश दियो है कै संस्कृति री जड़ा रो सिंचण करता रैवो। ताकि आपांनै सदैव ओ ठाह पड़तो रैवै कै आपां कुण हां ?

कुदरत री कोरणी रा कवि-

ज्यूं-ज्यूं आपां लक्ष्मणदान कविया नै पढां त्यूं-त्यूं कवि रा केई रूप आपांरै साम्हीं आवै। इणांमें ई एक रूप है कै कुदरत री कोरणी रा कवि रो। कुदरत आपरी अनंत सत कल़ा सूं जिकी कोरणी की है। उणरो वरणाव करण में कवि रो मन घणो रम्यो है।

धवल़ धोरां में कलरव करता मोर हुवो, भलांई हरियल़ पानां सूं आच्छादित अठै रा रूंखड़ा। भलांई भूरोड़ै भुरजां में खींवती पल़ाका करती बीजल़ी हुवो, भलांई खेतां में काल़ै नागै ज्यूं वल़ाका खावती बाजरी। भलांई उतराद में उमड़ती काल़ोड़ी कांठल़ हुवो, भलांई खैंखाड़ करती आंधी। भलांई धरती रा करोत करहला हुवो, भलांई धरती नै धूंसणिया केकाण। आदरो हृदयग्राही वरणाव कवि फुठरी, फबती अर मनहरणी भाषा में कियो है। जिणसूं लागै कै कवि कुदरत री कोरणी माथै बलिहारी है। जद ई तो प्रकृति री रूपाल़ी छटा नै आपरै आखरां आबद्ध करण में समर्थ है। चटक चांदणी रात में रजत रेत माथै रमण रै हेत री हलक ई न्यारी हुवै। कवि रै आखरां में-

चानणी रातां मांय चमकै, रजत जिसड़ी रेत।
सिणगार निसा अनेक साजै, हियै चंदब हेत।।
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बीजल़ घटा खिंवै घण बेल़ा, कांठल़ भूरी काल़ी।
कच जीयां लहरावै कांमण, भाल़ मुखां छिब भारी।।
समीर सूरियौ बाजै सरसर, छबी बादल़ां छावै।
केकी करत किलोल़ कांकड़ां, बिरखा तुरत बुलावै।।
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बसुधा हरी घण घास बाड़ी, सजत जिम वधु हरी साड़ी।
मंद ताड़ी मरूधरा।
जस केर झाड़ी बोर बाड़ी, रोग ताड़ी रूंख।
खेजड़ा खासा आथ आसा, नीम घासा घर नखै।
तरवरी तासा मिटी मासा, टीब वासा टूंक।।
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रूप विनायक रूंख वर, रूंख सारदा रूप।
देवां रा इणमें दरस, भू छाजण बड भूप।।. .
साखा हेटै संचरै, हित बड़ धरती हेर।
तपसी जांणक तापवै, बैठो जटा बिखेर।।
फाबै बंबल़ फूलतौ, थल़वट ऊभो थेट।
तपसी जांणक तापवै, पील़ो वसन पल़ेट।।
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परदुख रा सीरी-

यूं तो हर कवि रो काल़जो कंवल़ो हुवै। जिणमें दूजां रै दुख-दरद नै लखण री शक्ति स्वाभाविक रूप सूं हुवै पण कवियाजी नै पढ़ां जणै लागै कै किरसाण अर मजूरां री मैणत, उणांरै साम्हीं ऊभी अबखायां-अंवल़ायां नै अनुभूत करर आपरै काल़जै जिकी कल़प उठी है उवा घणै कवियां रै नीं देखी। हालांकै कवियाजी किणी माक्र्सवाद, कै जनवाद, कै प्रगतिशीलता कै सर्वहारा जैड़ै वादां रै ओल़ै-दोल़ै ई नीं है अर नीं ई किणी ऐड़ै भांजघड़ री दोघड़चिंता में है। कवियाजी तो भारतीय वाग्मय री चेतना अर वैचारिक प्रतिबद्धता रै मारग हाल दूजै रै दुख में दुखी अर दूजै रै सुख में सुखी हुवण री परापरी रा पोषक है। थूक रा आंसू ढाल़णा इणांनै नीं आवै। मजूरी, मैणत, खेती आद किया अर जिको अनुभूत कियो उणनै आपरी मुखर वाणी सूं अभिव्यंजित कियो। मजूरा़ री दारुण दशा, माथै तो आप पूरी सतसई रची। जिणमें मजूरां री मैणत उणांरो शोषण, उणांरी झिगदीजती भावनावां कूड़ा हुवता सुपना अर मरतै अरमानां रो हृदयग्राही वर्णन कियो है। भूख, लाचारी, त्रासदी आद सूं भचभूड़ा खावतै इण वर्ग चित्रण कवि कियो है उवो वास्तव में हर संवेदनशील पाठक रै मन में कल़प अर करुणा उपजावण में खिमता राखै। तो साथै ई मजूरां री लापरवाहियां, नशां री खोटां आदतां आद माथै ई कवि चिंतन अर चिंता करतां थकां इणांनै इणसूं उबरण री भोल़ावण दी है

वास्तव में ‘मजदूर सतसई’ प्रगतिशील बुद्धिजीवियां रै दांई खाली बाकाझाबड़ नीं है। इणमें कवि रो भोगोड़्यो साच अर बरत्योड़ो अनुभव है। इण कारण इज हर दूहो चित नै चकरित करै, तो चित में चैन ई उपावै। दूहो दरद ई उपावै तो साथै ई मरज री दवा ई बतावै। मजूर जिकै बापड़ा जलम दुखी तो जरा ई दुखी री गल़ाई आखै जीवण भूख अर बिखां सूं भचभेड़ा खावता आपरी जीयाजूण पूरी करै। कवि आपरै हर दूहै में आंरी दारुण दशा रो मार्मिक वर्णन कियो है-

हफ्तौ मिल़िया ही हुवै, चून बापरत चीज।
रद जीवण बिन रोकड़ा, खलक मजूरी खीझ।।
दमड़ी बिन जीवण कठै, सूखै चमड़घ सोय।
जमड़ी पैदा नीं जठै, हरख कठास्यूं होय।।
धायौड़ा मोटा धणी, होवै हिरदै हीण।
लागी मतलब री लगन, तूटै नाही तीण।।
माथै बोझ मजूरियां, करत दाकलां कांम।
झूंपड़ चौमासै जियां, चवै पसीनौ चांम।।
ताता वासण वसण तन, नाडी तातो नीर।
आंती जीवण आयगौ, तन सह ग्रीषम तीर।।

कवि लिखै कै अबखायां अर अंवल़ायां सूं पार हिम्मत राखियां ई पड़सी हैं कियां नीं-

हिम्मत राख्यां देख भायला, जीवण आछी बात बणैला
चांद ऊगियां नभ अंधियारी, चमक चानणी रात बणैला

कवि आजरी युवा पीढी रै साम्ह़ी ऊभी रोजगार री कमी सूं दुखी है। कवि लिखै कै जवान खांधां माथै जिम्मेदारी रो भार अर कनै रोजगार कमी सूं कोई मोटो दुख नीं हुवै-

बेरुजगारिय रोग बध्यो भलहीण दसा अर जोग विचारी।
ओखद जोवत हार गयो अब, और नहीं बिन स्याम हमारी।
वेद बणो मय खेद मिटावण, संकट मेटण देव सहारो।
बारंमबार पुकारत आरत गारत जीवन होत निहारौ।

दुकाल़ री दाझ रो दरद दरसावणियो कवि-

कविया जिण भांयखै में रैवै उवो भांयखो राजस्थान में काल़ री कराल़ता सूं लगैटगै बच्यो रैयो है-

सीयाल़ै खाटू भली, ऊनाल़ै अजमेर।
नागाणो नितरो भलो, सांवण बीकानेर।।

‘नागाणो नितरो भलो’ पण कवि किणी भ़ांयखै तक बंधर नीं रैवै। उवो समष्टिमूलक लिखै। ओ ई कारण है कै ओ आसैपासै री चौखाई अंकित करै तो भूंडा हाल ई लिखै। काल़ तो अपणै आप में नाम ई निनामो है। ओ जठै ई आवै उठै अन्न रो, जल़ रो, तृण रो अपूरणीय घाटो घाल देवै। आथूणो राजस्थान तो काल़ रो ठावो ठिकाणो है-

पग पूगल़ धड़ कोटड़ै, बाहू बाहड़मेर।
फिरतो घिरतो बीकपुर, ठावो जैसलमेर।।

इण आथूणी भोम में काल़-कुसमै रो थेटू वासो रैयो है। अठैरै मानखै नै ओ भूत भूंचावण में कोई कसर नीं राखै। लोककाव्य में पढां कै घणां री परणेतां खाली सांगरियां रै सटै उवांनै छोड’र दूजांरै लारै बुई गई। टाबरां नै छोड माईत अर माईत नै छोड टाबर हाथां में पगरखियां लेय बांठां पग देयग्या। रंभावती धेनां अर माटा भरावती रिड़कती भंवराल़ी भैस्यां रड़वड़ती कठै मरी खपी री लोगां नै खाली झीणी यादां रैयी। ऐड़ै धराल़ काल़ा़ं रो आपरी आंख्यां देख्यो ई वर्णन कियो।
कवियाजी काल़ री झाट में मरतै मरट, दिल में उमड़तै दरद, आंख्यां में निरीहता, पिंड री मिटती करड़ाई अर कल़पतै कालजै रो करुण चित्राम रस लेयर नीं बल्कै निसासा खावतां उकेरियो है। दुकाल़ री दाझ सबसूं बुरी दाझ हुवै। इणी सारू तो छपनै काल़ बाबत ऊमरदानजी लाल़स लिख्यो कै ‘अगलै काल़ां रा दादोजी आया।’

तो इण सदी रा काल़ पच्चीसो, चमाल़ीसो आद कवि खुद देख्या, भुगत्या। सो वर्णन अनुभूत सत्य है। एक-एक दूहो साच रै सैमूंडै ऊभो दीसै। लोगां रा घर छूटा, वित्त खूटा, मिनखां सूं टूटा। लोग कालां रा दुरदिन काटण सारू दर दर री ठोकरां खावता रड़वड़ता फिर्या।

इण पूरै दारुण दुखदायक समय में अठै रै आमजन री जिकी भूंडी गत हुई उणरो वर्णन कवि हिये री ऊंडाई सूं कियो है। इणमें दूहां री घड़त कै अलंकारां री जड़त नीं है इणमें फगत अर फगत कल़पतै काल़जै सूं भावां री निर्झरणी प्रवाहित हुई है-

दारणहारा देय दुख, दुसमी थयो दुकाल़।
अनमी थल़वट जीवड़ा, कर दीना कंकाल़।।

कवि लिखै कै जिकी परणी आपरै पूरै वैवाहिक जीवण पीवर सासरै तो गिणती रै दिनां गई पण काल़ री मार सूं माल़वै जावणो पड़्यो-

पांच बार गी पीर में, सासरिये छव बार।
ऊमर बरसां बीस अठ, गई माल़वै नार।।

तो दूजै कानी आपरै टाबरां अर घरवाल़ी नै छोड माल़वै गयै मिनख री माड़ी गत रो दरसाव कवि रै शब्दां में-

बै झूंपड़ बै रूंखड़ा, मारवाड़ रो वास।
कंत कामणी याद कर, नांखै कंत निसास।।
डीलां धूजै डोकरी, चढियो सीयो ताव।
गेरण माथै गूदड़ी, गयो माल़वै गांव।।
चिपगा भूखा हाडका, सरदी चांम सताय।
सास बटाऊ पावणो, गयो फेर ना आय।।

कवि दुकाल़ री दाझ नै गहराई सूं उकेरी है।

अठै पड़्यै काल़ां री विगत, काल़ रै साम्हीं पग रोप आंख काढतै थल़वासी री जीवटता, फीकी रितुवां, बिरंगा तीज तिंवार। आभै भमता गिरजड़ा अर दिन तोड़तै मांनखै रो दरसाव पढणहार काल़जै में एक कल़प अर आंख्यां में आंसुवां री झड़ी उपजावण में सक्षम है अर आ खांमची विरल़ै कवियां में इज हुवै। कवियाजी उण विरल़ कवियां में हरोल़ में ऊभा दीसै।

खार-खरापणै रा कवि

कवि आपरै आसपासै घटित होवती घटनावां नै आंख अदीठ नीं कर सकै। सो कवियाजी ई सजग ई है अर सचेत ई। कवि जागतै घोरावणियां अर आंख मींचर अंधारो करणियां नै खारै पण खरै आखरां सूं चेतावण बाबत कठै ई चूक नीं करी। कवि शब्दां री चोट करण में डरण रो वरण नीं करै। आपरी रचनावां माथै देवकरणजी ईंदोकली रो ओ दूहो सकीक बैठे कै ‘कवि समै रो कैमरो, विश्व बात विख्यात। ‘कवि नकस्लवाद, आतंकवाद, टीवी सूं फैलतै सांस्कृतिक प्रदूषण, प्रकृति रै अंधाधुंध दोहण सूं घटती दुर्घटनावां, आपदावां, महिला उत्पीड़न, मिलावटखोरी, शैक्षणिक जगत में कोचिंगां रो फैलतो गोरखधंधो, गणतंत्र री ओट में गौण होवतो गण अर हावी होवतो तंत्र, मरती मानवता, पनपती निष्ठुरता सरकारी योजनावां रै नाम माथै पग पसारतो भ्रष्टाचार, जैड़ी मोकल़ी राष्ट्रीय समस्यावां माथै सहज, संप्रेषणीय भाषा रै ओल़ावै कवि खारी अर खरी बात निशंक होयर लिखी है तो साथै ई आपरी व्यापक दीठ री ऊंडी ओल़खाण दीनी है।

विसंगतियां अर विद्रूपतावां नै उघाड़ण सूं लेयर राष्ट्रीय फलक तक विस्तारित आपरी कलम री कड़पाण पारंपरिक अर आधुनिक दोनूं शैली री कवितावां में बताई है। इण कवितावां रै आंटै कवि उण लोगां नै पूगतो जवाब दियो है जिकै आ कैवै कै छंदबद्ध कवितावां में खाली अतीत रा गीत ई गाईज सकै। जुगबोध सूं जुड़ाव री बात नीं। पण कवियाजी जुगबोध सूं जुड़्यै हर विषय माथै लिख्यो है। इण रचनावां रै रचाव में कवि आपरै मतै नीं चालर समकालीन मनगत सूं पगला भर्या है। पूरसल रूप सूं छंद, कविता, गजलां, में वैश्विक अबखायां सूं लेय’र ठेठ स्थानीय समस्यावां नै उठायर आपरी समकालीन सोच अर जुगबोध रै धकलै पाऊंडै बैयर कवि आ सिद्ध कर दीनी कै घड़त भलांई जूनी है पण जड़त आजरै बजार माफक है, जिणरी जगमगाट मगसी नीं पड़र ऊजल़ती जासी।

कवि स्वीकारै कै आज जिणगत द्वंद्व, फंद, छलछंद पनप रैया है पण म्हैं उणांनै अपणाय नीं सकूं पण साथै ई आदमी आदमी रो भख कर रैयो उणरो बचाव कीकर करू़ं-

मन, सीधो अर सरल़ भाव रो,
धंध फंद अपणाऊं कीकर।
आदमखोर आदमी हुयग्यो,
मिनखा जूण बचाऊं कीकर

कवि संविधान री ओट में संविधान नै दोटणियां रै धूतपणै सूं चिंतित है-

किता दिन कूटता रहसी
देस नै लूटता रहसी
जुलमी जुलम कर कर नै
जेल़ सूं छूटता रहसी।।

क्यूंकै इणरो उपाय गरीब यानी भारत रै बहुसंख्यकां कनै ई नीं। धनिकां री पूछ है-

गरीबी के करै भाया सुल़गती जिंदगाणी छै।
धनी री पूछ चौफेरूं मिनखपण चार आनी छै।

इण च्यार आना मिनखपणै री अंवेर में कवि देर नीं करै-

मिनख नै मिनख रैबा दे
कदै तो साच कैबा दे

कवि आध्यात्मिक क्षेत्र में पनपतै दोगलैपणै सूं दुखी है। जद ई तो कैवै-

लूटर मिंदर जावै छै
गुंडा कथा करावै छै
डोकर कूकै खाट पड़्यो
परणी हरजस गावै छै।
गल़ा मोस दान करणिया
भामासाह कहावै छै।

कवि चिंतित इण सारू है कै कुए में ई भांग पड़गी पछै मिनखपणो कै नेकनीयती कीकर बचै?

सगल़ो गांव बिगड़ग्यौ बाबा
ऊंधै मारग पड़ग्यौ बाबा

भगमै री ओट में पल़ता झोट, विभचार, न्यायालयां सूं मिलीभगत आद रै साथै सरकारां तक धनपतियां रै हाथां कठपुतलियां दांई हुयगी। ऐ जचै जणै इणांनै बदल़ नांखै। ऐड़ी दशा में कवि खरी कैवण सूं दिगूंपिचूं नीं हुवै-

छणिया जाय अधर छेलाई, बणिया नर व्यभिचारी।
दंड नहीं न्यायालय देवै, अपराधां अधिकारी
जुलम करै काटणिया जेबां, जहर ऊगल़ै जीबां
घुसै चोर जज साब घरां में, गिणती किसी गरीबां। ः
मन्दिर रै ओलै घण मोडा, भांमणियां मिल भोगै।
धर पावन आ गुंडागिरदी, आसक माल अरोगै।।
धाप गयो भारत धनिकां सूं, जोरां दोलत जोड़ै
समझै कठपुतली ज्यूं सरकारां, मन ज्यूं चाय मरोड़ै।।

जिण लोगां रै हाथ आमजन सत्ता सूंपै उवै तो खुद दही खाऊं मही खाऊं री भांजघड़ मेंं रैवै-

गत चुनाव घर घर रा ग्राहक, देख लहो दर दर रा दीन।
जीत रा धणी प्रीत रा जुगनू, हीत नीत रा खोटा हीन।
चित गंदा चंदा रा चाहक, मंदा करम देस रा मान।
धन पर रा खावण रा धंधा, हुवै जणां फंदा रा हान।।

कवि लिखै कै साच री लगन में मगन रैय। बल़गत भाड़ै काम काढण री बाण छोडदे। वैचारिक द्रढता राख। हर कोई रो मूंडो तक्यां रदरो होवतां जेज नीं लागैला-

सतरै कांनी निजर राख पण
ऐक निजर बिसराव मती
बल़गत भाड़ै कर कर कारज
साची लगन मिटाव मती.
भाटै भाटै देव पूजियां
कुण थारी अरदास सुणै।
ऐक इष्ट नै पकड़ बैठज्या
गुण सगल़ां रा गाव मती।

जीवणमूल्यां में जिणगत गिरावट आई है। इणसूं कवि खिन्न है। जद ई तो लिखै कै आज परकाजू नै गैलसफो अर राम-राम जपणा, पराया माल अपणा री माल़ा फैरणियां नै लोग समझदार मानण लागग्या-

खाय परायो राजी व्हेणो
इसड़ो हेवा हुवो मांनखो
हिवड़ै हरख खवायर औरां
बाजै आज गमावण वाल़ो।

कवि पुरुषप्रधान समाज री बेटी जलम माथै दीखण वाल़ी दोगली मानसिकता सूं दुखी है। कन्या भ्रूण हत्या रै लारै पुरुषां नै दोषी मानै ई मानै पण साथै ई स्त्रियां नै ई नीं बगसै। क्यूंकै ताल़ी दोनूं हाथां बाजै। एक सूं नीं-

पुरस समाज तणी करतूतां
अंतस ऊंडी खोट भरी
बेटी देख भ्रूण पटकावै
करणी माड़ी इसी करी
नार विरोध करै नीं गैली
जीवत हुयगी जेम मरी
घटतो मांन देख ही खुद रौ
होय रही छै हरख हरी।

बेटियां साथै होवतै दोयमदरजै रै व्यवहार सूं दुखी होय कवि नै लिखणो पड़्यो कै समाज री इण दोगली नीतियां सूं बेटियां अगलै जलम में बेटी रूप में जलमणी नीं चायर चिड़कली बणणी समीचीन समझैला-

फुरफुर उडती गिगन फिरूंलो
चिड़ी बण चुग लैस्यूं चूण
भूल चूक नै म्हनै विधाता
फेर न दीज्यै मिनखा जूण

जड़ां सूं जुड़ाव रा कवि-

जैड़ो कै म्हैं लिख चुको हूं कै कवियाजी री कवितावां में अठै री पावन प्रकृति अर सुरंगी संस्कृति री अनूठी आब अर छिब कोरी तो साथै ई राजस्थान री रूपाल़ी धरती री रल़ियाणी रीतां, धरती प्रेम, भाषा प्रेम री बातां हेम करै जैड़ी है। अठै रा तीज तिंवारां, मान मनवारां हेत हिंवल़ास नै अपणास रै साथै उकरेतो कवि समकालीन साच सूं समवड़ता करतो निगै आवै।

राजस्थान रो कवि अर पछै चारण!होय देशभक्ति, उदारता, स्वाभिमान, साहस, कर्मठता, कायरता आदनै वर्ण्य विषय नीं बणावै जितै उणनै आपरो कविकर्म आधो-अधूरो लखावै। इणी सारू कवियाजी सूरां-पूरां, आद नै दिल खोल दाद दीनी है। कवि लिखै कै दब’र जीवणो कायरां रो काम है सूरां रो नीं।

झुक जाणो डर जीवणो, अर सहणो अन्याय
सूरा ऐता नां सहे, जे माथो कट जाय।।
अड़ ज्यावै सच ऊपरा, जिका न गूंथै जाल़।
वचन निभावै बैवता, सूरा भाव संभाल़।।
रिच्छक साचा देस रा, सूरां दो सतकार।
कवियो लिछमण कीरती, आखी बुध अनुसार।।

कवि धरमवीर, दानवीर, करमवीर अर सत्यवीर री बात करतां लिखै कै भलांई किसो ई जुग होवो, ऐ सदैव अमर रैसी-

धरमवीर सतवीर धिन, सूरवीऋ घण सांन
दानवीर महिमा दुनी, वीर करम बखान।।
बाखान करम वीर रा सुकवी बणै, दानवीर री जग क्रीत दाखै।
सूरवीर नै जांणवै संसार सह, भलो सतवीर नै लोक भाखै
धरमवीर री महिमा अणूती धरा, रजा ना पाप री कदै राखै।
आछा कवीजै ठौड़ सब आपरी, ढाल होय जगत री लाज राख।।

राजस्थान तो ऐड़ै नर-नाहरां री खाण है ज्यांरी जगत में निकेवल़ी ओल़खाण है–

सिर दैणा सहणा दुख संकट
मायड़ राखण मांन
रणब़ाकुरां सूरां धरती
धिन धिन राजस्थान।।

भारत भोम री विमल़ ओल़खाण बतावतां कवि लिखै-

धायोड़ी भारत धरती नै
बंदू बारम बार
निरखै न्यारी निरवाल़ी
आभा जगत अपार।
धरम अहिंसा इणी धरा पै
पांगर पसरी वेल
पग पग पै उपदेस पूगिया
हुवा गुणीजन गैल

पग पग मंड्या थका प्रवाड़
नामी कीरत तणा निसाण
आरत कायरपणो न उर में
सूरवीर भारत संतान।

तो दूजै कानी कायरां नै फटकारतां लिखै-

जीवै छानै जगत में, गरल़ तणा पी घूंट।
पराधीनता पावियां, कायर खावै कूट।।
झुक जावै जावै जमी, अर सहवै अन्याय।
कायरता रै कारणै, घरणी लाज गमाय।।
पग पग मंड्या थका प्रवाड़
नामी कीरत तणा निसाण
आरत कायरपणो न उर में
सूरवीर भारत संतान।

नीति निर्देशन रा कवि-

हालांकि नीति री बातां घणा ई कवि कैयग्या सो आपांनै लखावै कै हमै भल़ै कैवण री कांई दरकार है?पण आपां आ ई जाणां कै बगत रै बदल़ाव साथै नीति री बातां ई नवै तरीकै सूं कैवणी पड़ै। इणी सारू कवियाजी आजरी बगत में करणीय, अकरणीय विषयां माथै आपरा विचार अभिव्यंजित किया है।

आज जिणगत मोबाइल फोन वापरग्या, टीवी, सिनेमां रो बोलबालो है, उपभोक्ता संस्कृति पसरण में उंतावल़ी है। बेटे अर बेटी में आज ई फरक है। बहुवां साथै आज ई संवेदनावां रै साथै बरताव री कमी है। ऐड़ै में एक संवेदनशील कवि आपरी संवेदनावां नै प्रवाहित होवण सूं कीकर रोक सकै?उणनै तो कैणो ई पड़ै कै आजरी पीढी नै अनुशासन में रैयर दुर्व्यसनां सूं, कुलत्तां सूं कोसां आगो रैयर आपरै लक्ष्य पथ री प्राप्ति करणी चाहीजै-

बाल़क आज पढो सुधरो अनुसासन, हीण न. बात बिचारौ
टीवी सिनेमा हितु दिल टूटत, पाय कुसंगत ना परवारो।
नास करौ धन नांय नसा हित देह करो मत रोगज द्वारौ
मात पिता नित मारत है मन तंग हुवै रख ध्यान तिहारौ

आज जिण दिखावै रो शिकार होय आमजन बाजारवाद री जकड़न में जकीड़ज रैयो या उपभोक्तावाद री संस्कृति री भेंट चढ, करजै में कल़ीजर अवसाद सूं ग्रसित होय हाऊझंफा खाय रैयो है। ऐड़ै में लोगां नै चेतावतो कवि लिखै-

लहणो करियां लोक में, गहणो रहे न घास।
सहणो बोरा रा सबद, रहणो मुख ना राम।।
सादा रहणो सज्जणा, मरजादा कुल़ माण.
बाधा जीवण ना बणै, कादा लगै न काण।।
बिन महनत हालत बुरी, मालत टोटा मांय।
महनत सूं सब कुछ मिल़ै, सुरजन करै सहाय।।
मोटा़ सूं फसज्यो मती, खोटा करसी खेल।
बहुवां नै ऐ बाल़दे, तन पर छिड़कर तेल।।

आज जिणगत लिंगानुपात घट रैयो है उणरै सारू दोषी लोगां माथै व्यंग्य प्रहार करतो कवि लिखै-

पूतां पग फेरो गरब घणेरो, बेटी व्ही बोकंदा है.
बेटां बतल़ावै खूब खिलावै, मन बेटी दिस मंदा है।।

हृदय में हिलोरा लेवती भक्ती-

लक्ष्मणदान कविया नै पढां जणै इण सगल़ै रूपां रै साथै उणांरो भक्त कवि रो रूप ई देखण नै मिलै। कवियाजी आजरै तथाकथित प्रगतिशील कवियां रै दांई आपरी भक्ति भावना नै नीं लुकावै। कवि संसार नै असार मानै अर ईश्वरीय सत्ता नै सर्वोपरि–

भजो हरि नाम भ्रात सुरगां चलेगो साथ।
ओई छै जीव आधार रटो दिन रात।
सारो छै झूठौ संसार बंधना बंधै बेकार।
स्वारथ रो खेल सारौ घणी करै घात।।

‘गोविंद गरिमा’ कवि री भक्ति भावना सूं ओतप्रोत रचना है। मूल़दानजी देपावत इण कृति नै त्रिवेणी संगम मानी है। वै लिखै-
‘चारतत्व, भक्ति, अर काव्य री त्रिवेणी ‘गोविंद गरिमा’ में लाभै।’

इणमें कवि आपरै निरमल़ हृदय भावां नै प्रभु रै पावन चरणां में समर्पित करतां लिखै-

रचै व्योम पाताल़ छोणी रुखाल़ो।
बसै रोम रोमं सबै बंसि वाल़ो।
इल़ा ऊपरां सूर रूपां उजाल़ी
रमै रात रा चंद रूपं रिझाल़ी।।
बसै लोक मांही वल़ै लोक बारै।
धरा थंब नांही तिकौ व्योम धारै।
मथै साथ सिंधू हथै दैत माया।
इल़ा जीवणा जीव जूणी उपाया।।

कवि ‘दुर्गा सतसई’ रो ई राजस्थानी में अजरो अनुवाद करर आमजन रै सारू नित्य पठण रो सुभग सुमेल़ कियो है। अनुवाद में मूल़ रा अभल़ेखा आवै-

उपकारक जीवां अवल, परम रु गुपत प्रवीत।
दुज सुणलै देवी कवच, पूर राख हित प्रीत।।
अगन भाल़ रण रिप घिरै, अबखी विपदां छाय।
संकट सूं मन में डरत, सरणै दुरगा आय।।

छंद वैविध्य रा खांमची-

कवियाजी छंद वैविध्य रा खांमची कवि है। डिंगल़ रै विविध छंदां में आप आजरै विषयां माथै रम्य रचनावां रच’र परापरी अर आधुनिकता रो सुभग समेल स्थापित कियो है।

आपरी कृतियां में ‘छोटे तुकरो दोहरो, सब कवितन को भूप ‘ दूहै रो साधिकार प्रयोग हुयो है तो साथै ई छंद-गीतां में झमाल, मोतीदाम, नाराच, भुजंगी, मुगताग्रह, त्रोटक, घघ्घर निसाणी, कवित्त, छप्पय, सवैया, वेलियो, प्रौढ, सांणौर, काछौ, ललितमुकट, अरध मनमोद, चितइलोल़, वीरकंठ, मनमोद, हंसावलो, सोहणो, सुद्ध साणोर, आदरो जिण खांमचाई अर सुघड़ता साथै प्रयोग हुयो है। उवो वरेण्य अर बखाणणजोग है।

कुल़ मिलायर कह्यो जा सकै कै लक्ष्मणदान कविया लोक भाषा रा खामची शब्द संपदा रा धणी अर समृद्ध भावभूमि रा कवि है। डिंगल़ री ठेठ, ठेल़ अर ठिमर शब्दावली सागै आमजन री बोलचाल में परोटीजण वाल़ै शब्दां रै आंटै बिनां किणी घुमाव-फिराव रै आपरी बात सहजता रै साथै कैवण री ऊरमा राखै। आधुनिक राजस्थानी साहित्य जगत में कवियाजी उवो नाम है जिकै नाम में नीं फगत काम में विश्वास राखै। आशा ई नीं विश्वास है कै आपरी सिरजण जात्रा इणीगत अनवरत चालती थकी राजस्थानी साहित्य री साख नै सवाई करती रैसी-

मायड़भाषा माण हित, सिरजण सिरै सुजाण।
कविया लिछमण कीरती, पसरी कलम प्रमाण।।
सींचै वड़ डिंगल़ सदा, सधर करै सदकाम।
सैंसाहर संसार में, निजपण खाट्यो नाम।।
सहज सरल तन सादगी, अंतस नीं अभिमान।
मिनख खरो मन मोटपण, लख रँग लिछमणदान।।
अपणायत छौल़ा अथग, सरब जात सनमान।
गुणसागर पण गरब नीं, लख धिन्न लिछमणदान।।
लिखिया अखर ललाम सह, समवड़ सकर सुजान।
खंडां चावी खैण नै, कीधी लिछमणदान।।
विरछ रुखाल़ण बात वट, उर धर दलित उथान।
सतसइया सिरजी सकव, कविये लिछमणदान।।
स्नेह सरिता सांपरत, उरधर बहै अमान।
न्हावै जिणमें अहर निस, गुणियण गिरधरदान।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी, कोलायत, बीकानेर 334302

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