राजस्थानी लोककथाओं के आधुनिक रूपांतर का पर्याय: श्री बिज्जी

भारत विभिन्न संस्कतियों का महान देश है। इसके पश्चिमी किनारे पर राजस्थान नामक प्रदेश बसा हुआ है। इस प्रदेश की सांस्कृतिक सीमाएं पंजाब, सिंध, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं गुजरात की सीमाओं के साथ आबद्ध हैं, जिनका असर लोककथाओं पर पड़े बिना नहीं रहता। मुगल काल तक राजस्थान भारतीय राजनीति का लीला क्षेत्र बन गया था। जितनी भी विदेशी जातियां यहां आई, राजस्थान से उनका गहरा परिचय हुआ। यह कभी तलवार के साथ समरस्थल में होता तो कभी अपनत्व की आन निभाते हुए स्वाभिमानी पगड़ी एवं स्नेहिल राखी के रूप में घर-समाज में। कहीं दुश्मन तो कहीं सज्जन। स्वाभाविक रूप से यहां की भाषा, संस्कृति एवं साहित्य पर उन लोगों की भाषा एवं नामावली (अरबी, फारसी) का पूरा प्रभाव पड़ा। इसलिए हमारे ख्यात इतिहास ग्रंथ उन विदेशी पात्रों की कथाओं से पूर्ण हैं। उजबक, तातार, बलौच एवं अफगान आदि जातियों के लोग तो राजस्थान के यौद्धाओं के साथ हमारी बातों-ख्यातों में गुंफित पात्र हैं। बलख बुखारा, अरब, समरकंद, गजनी, रूम, सूम और काबुल जैसे देशों की चर्चा तो राजस्थानी कथाओं के साथ स्पष्ट संलग्न है। यहां के दुर्गम दुर्गों के साथ गजनी के गढ़ का भी वर्णन पाया जाता है। काबुल तो सिंध और गुजरात की तरह राजस्थान का अपना एक पड़ौसी रहा है, जिसका जुड़ाव यहां प्रचलित अनेक लोक काव्योक्तियों मेें स्पष्ट दिखता है-

कैकाणां काबुल भली, पौ’र भली परभात।
मरदां भली ज मुरधरा, गोरड़ियां गुजरात।।

ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि राजस्थान के घोड़ों की नस्ल सुधारने के लिए काबुल से रेत लाई गई थी। मारवाड़ के राड़धड़ा की मिट्टी काबुल की कही जाती है।

धर ढांगी आलम धणी, परगळ लूणी पास।
लिखियो जिणनैं लाभसी, राड़धड़ा रो बास।।

राजस्थान का एक-एक किला, एक-एक मंदिर, एक-एक पहाड़, एक-एक घाटी, एक-एक गांव के ही नहीं वरन एक-एक अस्त्र-शस्त्र के पीछे भी इतिहास है। रेत का टीबा, टूटा हुआ भवन, उजाड़ जंगल में बनी देवली या चबूतरा, पहाड़ की खोह, छोटी सी बावड़ी और खंडहर के बिखरे हुए पत्थर आदि सबके पीछे अपनी जाज्वल्यमान कहानी है। यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है कि राजस्थान; इतिहास, लोक साहित्य, प्राचीन ग्रंथों, चित्रकला, हथियारों, लोक संगीत, परंपराओं और संस्कृति की दृष्टि से भारत का सबसे संपन्न राज्य है। यहां लोक कथा को बात अथवा वारता कहते हैं। यहां की बातें तथा ख्यातें बड़ी रसीली हैं। इनकी शैली माधुर्यपूर्ण एवं अपने ढंग की है। इनका एक-एक अक्षर यहां की खबरें लिए हुए हैं। एक-एक शब्द में रणांगण की राटक-झाटक तथा पीढ़ियों का पराक्रम भरा है। राजस्थान में इनके कहने एवं लिखने की परंपरा काफी पुरानी है। इनके आरंभ करने का ढंग, समाप्त करने का नियम और वर्णन करने की प्रथा स्वयं की अपनी है।

यहां यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि हिंदी कहानी की शुरुआत अंग्रेजी एवं बंगला की गल्पों के अनुकरण पर हुई है मगर राजस्थानी कहानी साहित्य उसकी निजी निधि है। इनमें कुछ बातें वर्णन प्रधान है, जहां घटनाओं को एक के बाद एक करके उपस्थित की जाती रही है। इसी लिए इस बात को लेकर अनेक उक्तियां प्रसिद्ध है-

ज्यों केले के पात में, पात-पात में पात।
त्यों चातर की बात में, बात बात में बात।।
बात भली दिन पाधरो, पैंडे पाकी बोर।
घर भींडळ घोड़ा जणै, लाडू मारै चोर।।
बातां हंदां मामला, नदियां हंदा फेर।
बहता बहै उंतावळा, घरमर घालै घेर।।
बात बात सब एक है, बात बात में फेर।
उण लोहै री कुस बणी, उणरी ही समसेर।।
बात बात सब एक है, कहणे में कछु बैण।
वो हिज काजळ ठीकरी, वो ही काजळ नैण।
बातड़ल्यां बिगताळल्यां, जे कोई कहै बणाय।
बातां हाथी पायबो, बातां हाथी पाय।।
बातड़ल्यां घर ऊजड़ै, चूल्है दाळद होय।
जे कोई जाणै बातड़ी, बातड़ल्यां घर होय।।
बात रहै दिन बीतज्या, समै पलटज्या काळ।
साजन सिळो न खाइये, जो सोनै री बाळ।।
सोरठियो दूहो भलो, भल मरवण री बात।
जोबन छाई धण भली, तारां छाई रात।।

जब हम राजस्थानी कथा साहित्य एवं लोक साहित्य की बात करते हैं तो पद्मश्री विजयदान देथा का नाम अनायास ही हमारी जुबां पर आ जाता है। अेक व्यक्ति जिसने अपनी श्रमनिष्ठ साधना के बल पर राजस्थानी लोक साहित्य को वैश्विक ख्याति दिलाने का श्लाघनीय कार्य किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बाद हिंदुस्तान के किसी साहित्यकार को साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाया। यद्यपि श्री विजयदान देथा जी भी नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने अपने रचना कर्म के बल पर नोबल पुरस्कार प्रदात्री समिति का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि राजस्थानी भाषा के किसी साहित्यकार का नाम नोबल पुरस्कार हेतु नामित हुआ और वह नाम और कोई नहीं श्री बिज्जी का नाम था। बिज्जी का अपनी भाषा पर अनुपम अधिकार था। उनके पास ऐसी विलक्षण प्रतिभा थी कि वे एक ही कहानी को संक्षिप्त करके 04-5 पृष्ठों में पूर्ण कर देते थे तो उसी कहानी को विस्तार देते हुए 40 पृष्ठों में पूर्ण कर सकते थे। खास बात यह थी कि ना तो संक्षिप्त करते समय कहानी का मूल बाधित होता था और ना ही विस्तार देने पर उसके कौतूहल में कोई कमी आती थी। उनकी शैली कथा साहित्य के लिए इतनी उपयुक्त एवं मंजी हुई है कि पाठक सब कुछ भूल कर उनके कथ्य के साथ हो जाता है। उदाहरण स्वरूप श्री बिज्जी की एक कहानी का शुभारंभ देखिए-

‘‘हिन्दू धर्म की महिमा न्यारी। मरे मानुस का खर्चा भारी। धर्म-कर्म की बातें झीनी। जीवित काया माटी से हीनी। मृत्यु उपरांत अनगिनत मोल। ढोल के भीतर पोलम-पोल। सुनो सुन पड़ता है डंके की चोट। धर्म की पेढ़ी में पूरी खोट। तो भगवान भले दिन दे कि एक था ठाकुर। जागीर तो ठीक-ठाक ही थी। पर ठकुराई बड़ी थी। पुरखों की संचित पूँजी। अकूत गहने। चाँदी के थाल। चाँदी के चमड़पोस हुक्के। अफीम गलाने के लिए चाँदी गलनी, चाँदी का टेर्या और चाँदी का गट्ठा। चाँदी के पात की चार-पाँच चिलमें। सारे ठाट-बाट के बीच कमी बस यही थी कि ठकुरानी की गोद हरी नहीं हुई। ’’ (खटकरम कहानी)

दोनों हाथ खोलकर बस्ती के बीचोंबीच नाचते-गाते जाने में और पेटीबंद खजाने को जंगल की राह ले जाने में जो अंतर है, वही अंतर लोक और वेद में है। लोक साहित्य ग्रामीण जनता और दादी-नानियों की पीठ पर सवारी गाँठकर बढता है। यही कारण है कि पहले वह कान, आँख आदि इंद्रियों और काया की भाषा में मस्तिष्क में प्रवेश करता है फिर सांसों और नसों में बस जाता है और प्राण रहते साथ नहीं छोड़ता। लोक का यही जन्मजात अधिकार है। वक्ता और श्रोता की सृजन-प्रतिभा लोकसाहित्य में हमेशा कुछ घटाती-बढ़ाती रहती है और कई रंगों में रंगती है। वह सुनने में सहज लेकिन गुनने में गूढ़ हैं। आप लोककथाओं, कविताओं, सूक्तियों, कहावतों को जितना खोलना चाहें, या आपमें खोलने का जितना माद्दा हो, वे खुलती चली जाती है। एक कथा को उठा लीजिए लगता है आख्यानों का पुलिंदा मिल गया हो। पाश्चात्य कहानी के शास्त्र में बंधे लोग शायद ही समझ पाएँ कि हमारे पास लोक में एक पूरा कथा-विधान और विवैंयों जैसी रेशेदारी और लोच है।

राजस्थानी भाषा की समृद्धि में इन बातों एवं ख्यातों का अहम योगदान रहा है। ये ऐतिहासिक, पौराणिक और लोककथाओं की संख्या बहुत बड़ी है। इन कथाओं के पद्यबद्ध एवं गद्यबद्ध दोनों रूप मिलते हैं। इन कथाओं के साथ ही कथाओं की दो समानान्तर धाराएं सतत प्रवाहित होती रही है। इन कथाओं की पहली धारा तो वह थी, जिनको कथाकार लोग सजावट के साथ लिपिबद्ध करने का परिश्रम करते तथा दूसरी धारा वह थी, जो राजस्थान निवासियों के कंठों में ही अविस्मृत ढंग से जीवित रहीं अर्थात ये कथाएं केवल कहीं-सुनी जाती रही, लिखी नहीं गई। लिखित रूप में भी बातों की छटा देखने लायक है वहां मौखिक बातों की तो गिनती भी नहीं की जा सकती। साथ ही एक ही बात के अनके रूपान्तर भी प्रचलित हैं। लोकप्रचलित चीजों के लिए ऐसा होना स्वाभाविक है।

यदि विकास यात्रा की बात करें तो 15 वीं शताब्दी से राजस्थानी साहित्य-सागर की कथा-सरिता नव्यपथगामिनी बनीं। तब उसके भाषा, विषय और शैली तीनों में परिवर्तन आया। भाषा अपभ्रंश से अलग हुईं। विषय में धार्मिकता के अतिरिक्त विषयों पर भी लोककथाएं निर्मित होने लगीं। शैली का रूप निखरा। बालावबोध, वाग्विलास और वचनिका आदि शैलियों में छोटी-छोटी कथाएं लिखी जाने लगी। सबसे प्रथम तरुणप्रभ सूरि का षडावश्यक बालावबोध (भाषा टीका) लिखा गया। 16 वीं शताब्दी में मेरुसुंदर ने भी बालावबोध भाषा टीकाओं में सैंकड़ों कथाएं दी हैं। हंसाउली, सदयवत्स प्रबंध, विद्याविलास चैपाई आदि अनेक लोककथाएं इसी शताब्दी में लिखी गईं। वाग्विलास शैली में लिखा ग्रंथ पृथ्वीचंद चरित्र इसी समय का ग्रंथ है। इस समय वचनिका, रास, रासक, ख्यात चैपाई, गीतकथा एवं लोककाव्य प्रचुर मात्रा में सृजित हुए। वस्तुतः 17 वीं एवं 18वी शताब्दी में लोककथाओं की बडी उन्नति हुई। आगे चलकर इन लोककथाओं को आधार बनाकर सैंकड़ों ख्याल यानी लोकनाट्य रचे गए। रतना हमीर री बात और पन्ना बीरमदे री बात राजस्थानी कथा साहित्य की प्रथम प्रकाशित कथाएं हैं। संवत 1956 में पलक दरियाव की बात प्रकाशित हुई। इन प्रकाशित पोथियों के साथ ही कथाओं के सैंकड़ो ंसचित्र गुटके यहां के पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। एक-एक गुटके में सौ-सौ कथाएं हैं।

आधुनिक काल की बात करें तो राजस्थानी लोकसाहित्य के अध्ययन एवं प्रकाशन में बहुत सुखद स्थितियां आई। श्री सूर्यकरण पारीक की राजस्थानी बातां, कन्हैयालाल सहल की लोक कथाएं, वीर गाथाएं, उपाख्यान एवं चैबोली नामक कथाकृतियां, नरोतमदास स्वामी के दो कथासंग्रह प्रारंभिक दौर में प्रकाशित हुए। पद्मश्री विजयदान देथा, पद्मश्री रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, गोविंद अग्रवाल, डाॅ‐ मनोहर शर्मा, गोविंद अग्रवाल, अगरचंद नाहटा, भंवरलाल नाहटा, मुरलीधर व्यास, पुरुषोत्तम मेनारिया, मोहनलाल प्रोहित, बद्रीप्रसाद साकरिया, मनोहर प्रभाकर, श्रीलाल मिश्र, नानूराम संस्कर्ता, मनोहरसिंह राठौड़ आदि आधुनिक काल के प्रमुख लोककथा संग्रहकर्ता हैं। जहां तक राजस्थानी लोककथाओं के आधुनिक रूपान्तर का विषय है इस दिशा में श्री विजयदान देथा का कार्य श्रेष्ठ प्रतिमान है। पद्मश्री देथा के ‘बातां री फुलवाड़ी’ शीर्षक से 14 संग्रह राजस्थानी लोककथाओं के प्रकाशित हुए है, इनमें लेखक की भाषा, शैली, वर्णन वैचित्र्य, घटना-वृत्त, प्रकृति चित्रण एवं कमनीय कल्पनाओं का ऐसा संुदर परिपाक दृष्टिगोचर होता है, जो सुधी पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। यद्यपि आधुनिक युग में अनेक विद्वानों ने लोककथाओं पर कार्य किया है। श्री गोविंद अग्रवाल ने लोककथाओं के दो संग्रह तैयार किए लेकिन उनकी लोककथाओं में आधुनिक रूपांतर जैसा कुछ नहीं मिलता। वे कथाएं हूबहू उसी रूप में लिखी गई है, जैसी कि उन्होंने गांव के लोगों से सुनी। इसी तरह नरोत्तमदास स्वामी एवं कन्हैयालाल सहल के संकलनों में भी आधुनिक रूपांतर के कतिपय संकेत ही मिलते हैं। इस दिशा में डाॅ‐ मनोहर शर्मा एवं रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत के कार्य महत्त्वपूर्ण रहे। यद्यपि इन साहित्यकारों के यहां भी आधुनिक रूपांतर के पूर्ण दर्शन तो नहीं हो पाए लेकिन स्थान-स्थान पर भाषा, शैली एवं वर्णन की दृष्टि से रूपांतर के उदाहरण इनके यहां मिलते हैं। स्वामीजी ने 212 लोककथाओं की सूची दी वहीं रानी लक्ष्मीकुमारी ने 370 लोककथाओं की सूची प्रकाशित की वहीं परंपरा के बात अंक में 350 बातों की सूची प्रकाशित हुई। गोविंद अग्रवाल ने करीब 1000 लोककथाएं प्रकाशित करने का श्रमसाध्य कार्य पूर्ण किया। बीकानेर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय में वैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, दम्पति विनोद आदि पुस्तकों के राजस्थानी अनुवाद भी मिलते हैं।

राजस्थानी लोककथाओं के क्षेत्र में विस्मयकारी कार्य किया पद्मश्री विजयदान देथा ने। श्री देथा का लोककथा विषयक कार्य न केवल राजस्थानी साहित्य जगत वरन हिंदी एवं विश्व साहित्य जगत में भी अपना कोई सानी नहीं रखता। सन 1961 में जोधपुर के निकट बोरूंदा नामक गांव में रूपायन संस्थान नाम से लोक साहित्य शोध एवं सर्वेक्षण से संबंधित संस्था का गठन कर श्री देथा ने लोककथाओं का संकलन ही नहीं किया वरन उनका रोचक शैली में पुनर्लेखन शुरु किया और देखते ही देखते एक के बाद एक कथासंग्रह आते गए।

देथा ने आठ सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में हो चुका है। राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्रा में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है। उनकी कहानियों पर आधारित तीन हिन्दी फिल्में-दुविधा, पहेली और परिणीता-बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं। साहित्य अकादेमी तथा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। कुछ प्रमुख कृतियाँ-बातां री फुलवारी (14 खण्ड), रूँख, दुविधा और अन्य कहानियाँ, उलझन, सपनप्रिया, अन्तराल तथा राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोश। राजस्थानी लोक गीत (6 भाग) का संकलन-सम्पादन।

श्री विजयदान देथा का मानना था कि ‘‘हवाई शब्दजाल व विदेशी लेखकों के अपच उच्छिष्ट का वमन करने में मुझे कोई सार नजर नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगता है। अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।’

ऐसी विलक्षण दृष्टि वाले लेखक श्री विजयदान देथा की लोककथाएं आधुनिक रूपांतर का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। समय के साथ समाज के मूल्य बदलते हैं, घटनाओं को देखने में सामाजिकों का नजरिया बदलता है, पाठक की अभिरुचि एवं अभिलाषाएं बदलती है, राजसत्ता के रंग और ढंग बदलते हैं। लेकिन लोककथाओं में वर्णित अनुभूत सत्य कालजयी बनकर अपनी उपस्थिति बरकरार रखता है। आगत की पदचाप से भविष्य को भांपने वाले रचनाधर्मा लोग सनातन सत्य को प्रसंग एवं परिस्थितियों के अनुरूप ढालने का हुनर रखते हैं। श्री देथा ने इस तथ्य को चारु-चरितार्थ किया है। अक्सर देथा जी की कथा के यहाँ तो चरित्र, प्रतीक के किसी महीन अर्थ गुँथाकर अपना स्थूल रूप खो देते हैं और कथाएं शरीर त्याग कर कोई जीवननार्थ उदघाटित करती हैं। शायद इसलिए उनका लोकलेखन, आधुनिक चारितार्थता को पाता है। यानी लोक भी रहता है और आधुनिक भी।

बदलते समय में लोगों में तार्किकता एवं पुनर्निणयन की क्षमता आई है। पोंगापंथी सोच पर सामयिक तर्क की विजय होती है। धार्मिक आडंबर एवं भावनात्मक शोषण पर भी नवीन जीवनमूल्यों एवं खुली सोच ने पहरे लगाए हैं।

श्री देथा की एक कहानी है ‘वैतरणी’, जिसमें उन्होंने पोंगापंथी पंडित एवं धनलोभी सेठ दोनों की पोल खोलने में कोई कोर-कसर नहीं रखी है। कथानायक को सपना आता है कि उसके घर में एक सुंदर गाय बंधी हुई है, घर में दूध-दही के थाट हैं। यह सपना उसे एक बार नहीं, बार-बार आता। एक दिन उसने अपनी पत्नी को सपने का अर्थ बताने हेतु आग्रह किया। अनपढ़ पत्नी ने सीधे कहा सपने का अर्थ तो मुझे मालूम नहीं लेकिन यदि सपने को साकार करना चाहते हो तो मेरे स्वर्णाभूषण आपको सौंपती हूं, इन्हें बेचकर एक अच्छी सी गाय खरीद लाइए। पति अपन पत्नी की समझदारी एवं समर्पण भाव से खुश हुआ और गाय लाने का मन बनाया लेकिन वह गाय लेने के बदले अपनी पत्नी के गहने नहीं बेचना चाहता था वरन सेठ-साहूकार से ऋण लेना चाहता था। पत्नी ने विनम्रता से अपने पति को समझाया कि साहूकार से उधार नहीं लेकर गहनों के बदले ही गाय खरीदें। अंततोगत्वा गहने बेच कर गाय खरीद ली। घर सुंदर, खूब दूध। पूरा परिवार आनंदित। कथानायक के बूढे पिता अपने बचपन के पंडित मित्र के साथ बातें करते रहते। पंडित को यह गाय चित्त चढ़ गई। येन-केन-प्रकारेण वह उसे हथियाना चाहता था। मौका आ गया। कथानायक के पिता बीमार होकर मरणासन्न स्थिति में आ गए। पंडित मित्र उन्हें रोज इस लोक से परलोक तक जाने के रास्ते की जानकारियां देता था, जिसमें वैतरणी नदी का भी जिक्र पूरे मन से किया करता था। मरणासन्न बूढ़ा मरते वक्त वैतरणी के नाम से इतना डरा कि बार-बार उसका नाम लेने लगा। पंडित मित्र ने उपाय बताया कि आपकी यह गाय इतनी सामथ्र्यवान है कि इसकी पूंछ पकड़ी जाए तो वैतरणी सरलता से पार हो सकती है। पंडित की बात सुनकर कथानायक चैंक पड़ा और बोला कोई लंबे पूंछ वाली दूसरी गाय लाकर दे दूंगा लेकिन मेरी बगुली (गाय का नाम) किसी सूरत में नहीं दूंगा। पंडित तो कलाकार था, उसने तुरंत कहा, बगुली के अलावा किसी दूसरी गाय से वैतरणी पार नहीं हो सकती। वैतरणी कोई छोटी-मोटी नदी है क्या? परेशान पिता ने अपने बेटे को विनम्र प्रार्थना करते हुए कहा अपने बूढ़े बाप की इतनी मदद करदे, मैं बगुली के बिना वैतरणी पार नहीं कर पाऊंगा और नर्क में पड़े-पड़े सड़ूंगा। बेटे ने पिता की आर्त-पुकार सुनकर बगुली पंडित को सौंप दी। पिता ने सुखी मन से प्राण त्याग दिए। वृद्ध व्यक्ति का जाना तय ही था लेकिन उनके साथ बगुली का जाना सबको दुखी कर गया। घर में पिता की मृत्यु से कहीं अधिक शोक बगुली का था।

जनवादी चिंतन के सिद्धहस्त कथाकार श्री देथा ने यहां आधुनिक रूपांतर के माध्यम से कथा को युगबोध प्रदान करते हुए आगे बढ़ाया है। घर में बगुली का शोक करते हुए कथानायक चिंता की मुद्रा में है। घरवाली सुबकती हुई उसके पास आई। कहने लगी, ‘‘बनिए की छुरी से तो बगुली बच गई, पर बाँभन बगुली को डंके की चोट पर डकार गया।’’

‘‘डकार गया ? डकार गया कैसे ? बगुली तो वैतरणी के उस पार गई। नहीं तो बाबा वैतरणी पार कैसे करता !’’

घरवाली ने एक जलता हुआ निःश्वास छोड़ा। कहा, ‘‘ये तो बाँभनों की बातों की वैतरणियाँ हैं। बनिए की बहियाँ भी उनका मुकाबला नहीं कर सकतीं। बगुली तो पण्डितजी के बाड़े में बँधी है। मैं रात को ही उसका लाड़ करके आई।’’

कहानी आगे बढ़ती है तथा सारी रूढ़ियो एवं आडम्बरों पर तार्किक प्रहार करते हुए पाठक वर्ग को नवीन चिंतन एवं नवीन जोश प्रदान करती हुई अपने उद्देश्य की पूर्ति के साथ पूर्णता को प्राप्त होती है।

कथानायक अपनी पत्नी की बात सुनते ही कमर कस कर दौड़ा और पंडित के घर पहुंच गया। उसने देखा कि पत्नी ने सच कहा था। उसने ‘बगुली-बगुली’ की आवाज लगाई तो सामने से उसकी गाय जोर से रँभाई। रस्सी तुड़ाकर स्वामी की ओर दौड़ी। उसने एक बार फिर खुली आँखों अपने सपने को गले लगाया।

घबराए हुए पण्डित ने रास्ता रोका तो उसे धक्का देकर गिरा दिया। बछिया और बगुली को हाँकते हुए बोला, ‘‘वैतरणी के पार गया बाबा वापस तो आने से रहा ! अब हमें दुनिया की वैतरणी पार करनी है। बगुली के दूध के बिना वह पार नहीं होगी। खबरदार, मेरे घर की ओर मुँह भी किया तो सीधा हरिद्वार पहुँचा दूँगा।”

‘बिज्जी’ के नाम से साहित्याकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह चमकने वाले पद्मश्री विजयदान देथा ऐसे इकलौते कथाकार हैं, जिनकी रचनाओं में लोक का आलोक अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित है। आपने राजस्थानी लोक-मानस में सहेजी-बिखरी कथाओं को अपने अप्रतिम सृजन-कौशल से ऐसा स्वरूप प्रदान किया है कि उनमें लोक का मूल तत्व तो अक्षत रहता ही है, साथ ही युगों पुरानी कहानियाँ समकालीनता का स्पर्श पा जाती हैं।

बिज्जी की कहानियों की भाषा भी अलग से ध्यान देने की माँग करती है। उनकी हिन्दी में राजस्थानी बानी की ऐसी छौंक है, जो हिन्दी का सामथ्र्य विस्तार करने के साथ-साथ उसे एक नया स्वरूप देती है। इससे पाठकों को एक नया आस्वाद मिलता है। बिज्जी ने राजस्थानी के लोक मानस के खजाने से चुनकर ऐसी कहानियों को अपनी लेखनी का स्पर्श दिया है जो मानवीय मूल्यों को मजबूती से हमारे सामने लाती हैं।

हिंदी और राजस्थानी में समान रूप से सृजन करने वाले वरिष्ठ रचनाकार विजयदान देथा (बिज्जी) की लेखनी से निःसृत कहानियों के संग्रह में राजस्थानी लोकमानस की अपूर्व कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है। बिज्जी की रचनात्मकता का स्पर्श पाकर ये लोक कथाएँ सिर्फ अतीत की स्मृति भर न रहकर हमारे वर्तमान के रास्ते की ऐसी रोशनियाँ बन गयी हैं, जो हमें मानवीय मूल्यबोधों का दर्शन कराती हैं।

श्री देथा ने अपनी ही राजस्थानी लोककथाओं का हिंदी रूपांतरण भी किया है लेकिन वह अनुवाद नहीं होकर पुनर्सृजन है। स्वयं श्री देथा ने अपने मित्र एवं प्रशासनिक अधिकारी श्री अनिल बोर्दिया को लिखे पत्र में इस बात का खुलासा करते हुए लिखा है कि-

‘‘पर मैं फकत अनुवाद ही तो नहीं करता, अनिल। हिन्दी में फुलवाड़ी की कथाओं को पुनःसृजित करता हूँ। राजस्थानी ‘बात’ का वजन, उसकी ध्वनि, उसके छिपे अर्थ जो व्यक्त के द्वारा अव्यक्त की ओर संकेत करते हैं, प्रच्छन्न मौन को मुखरित अर्थ करते हैं-यह सब प्रखर हो जाता है। बहुत बदल जाता है। कथानक वे ही हैं। पर कहानी के आयाम बदल जाते हैं। इसलिए कि मैं निरन्तर बदलता रहता हूँ। कहूँ कि और संशोधित होता रहता हूँ। जीवित गाछ-बिरछों के उनमान प्रस्फुटित करता रहता हूँ। सघन होता रहता हूँ।’’

जो व्यक्ति नित्य नवीन होता रहता है वही तो आधुनिक रूपांतर का सिद्धहस्त हो सकता है। भाषा एवं शैली की सिद्धता के पीछे स्वयं लेखक का दृष्टिकोण आधार बना है। स्वयं लेखक के शब्दों में देखिए-

‘‘बस, चाकू की धार तेज एवं टिकाऊ होनी चाहिए। फिर उससे प्याज काटो, चाहे आलू, लौकी या बैंगन। आसानी से कट जाते हैं। शुरूआत में हिन्दी के रियाज से जो धार लगी, वह राजधानी में उसी कौशल से काम आयी। दृष्टि हमेशा ऊपर की ओर रखी कि शरीर से न भी हो, पर मन और आत्मा से बादलों पर चलूँ। लहराती बिजलियों को बाहुपाश में भरूं और बादलों के बीच ही नहाऊँ। धोऊँ। चाँदनी से प्यास बुझाऊँ !’’

देथा जी का सृजन और जीवन यह बताता है कि आधुनिक होने के लिए सहज ग्रामीणता छोड़ना जरूरी नहीं है। जो लेखक रचना में विरुद्धो या विभिन्नों का सामंजस्य करने पर तुला हो, वह अगर अपने जीवन में ही यह न कर सके तो फटे बाँस की बाँसुरी जैसा होगा।

मणि कौल प्रोडक्शंस की ओर से 21 मई, 1972 को श्री विजयदान देथा-बिज्जी के नाम लिखे पत्र का प्रथम अंतरा दृष्टव्य है-‘‘सच तुम तो छुपे हुए ठीक हो। न जाने क्यूँ आज लगा कि तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गईं तो वे कुत्तों की तरह टूट पड़ेंगे। गिद्ध हैं-नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल में ढक कर रखा है। धूल भी नजर आती है। रत्न भी। कल रात से आज दिन तक तीनों कहानियाँ बिना रुके पढ़ चुका हूं-‘असमांन जोगी’, ‘नागण थारौ बंस बधै’ और ‘मिनख-जमारौ’। कहानियों का विश्लेषण करना तो आँधी के बाद चीजों को फिर-से समेटना-सा लगता है।

प्रो. कृष्णकुमार ने ‘कहानी के नए प्रतिमान’ पुस्तक में विजयदान देथा को लोकराग एवं लोकआग से कथारस पैदा करने वाला कहानीकार बताया है तथा लिखा है कि ‘‘गर्मी सर्दी, आंधी-तूफान की परवाह किए बगैर जिस तरह बीज की रखवाली में बीजूका पूरा जीवन बिता देता है, ठीक उसी प्रकार श्री देथा जोधपुर की रेत पर मानवीय संवेदना के बीज बचाने में दिनरात खड़े हैं। ’’ (कहानी के नये प्रतिमान: कृष्ण कुमार, पृष्ठ 136)

ऐसी महान विभूति को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’
(11 नवंबर 2020)

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