सोशियल मिडिया री राजस्थानी साहित्य ने अनोखी भेट-लोक कवि मीठे खांजी मीर, डभाल

आज कल राजस्थानी भाषा रे मांय भावों री काव्यमय अभिव्यक्ति करबा वाळां री बाढ दिसे है। राजस्थान री कला संस्कृति सूं जुडियौडौ हर शख्स राजस्थानी में आपरा भाव व्यक्त करे। सोशियल मिडिया रे मांय एहडाइज एक गुणीजन धूम मचाय रिया है जिण री कविता भणिया, अणभणिया, टाबर, मोटियार अर डोकरा सब पसंद करे। जिणां रो नाम है मीठे खां जी मीर। आप री शोशियल मिडिया रे मांय ओळख “मीठा मीर डभाल “है।

मीठा खां जी मीर शोशियल मिडिया री राजस्थानी साहित्य ने अनुपम भेंट है। मीठा खां जी मीर साहब री बात करूं तो आप री शोशियल मिडिया सूं जुडण री कहाणी बडी रोचक है। बात सात सूं आठ साल पुराणी है जद म्हारै पैतृक गांव में म्हारी छोटौडी ब्हेन आशा रो जद आंणौ तेडवा वा रे ससुर जी म्हारै गांव पधारिया तद आयौडा म्हैमानां रा मनोरंजन सारू दो तीन मीरासी गायक म्हारै गांव म्हारै पिताजी तेडाया हा। संगीत रा समा रे साथ साथ जद उठै साहित री बात किणी छेडी तौ उणां मिरासीऔं मांय सूं किणी एक मीरासी कहियौ के म्हारे गांव रो मीठौ मीर एक नामी कवि है। म्है तुरंत वठा सूं इज मीठा खां जी ने मोबाइल लगायौ। मीठा खां जी एक कवि सूं बात कर बडा राजी हुया अर वा आप री एक रचना जिका चित्त इलोळ गीत मे शाकंभरी री वंदना ही वा मोबाईल माथै म्हां सब नें सुणाई। म्है उण दिन सूं आप रो नंबर सेव कर दियो। अर वे नंबर जद म्है राजस्थानी ग्रुप डिंगळ री डणकार बणायौ तद मीठा खां जी मीर ने ग्रुप मे जोडण रे काम आया। मीठा खां जी मीर सूं इण सूं प्हैली म्हारौ रूबरू परिचय कदेई नी हुयौ।

आज सूं एक साल प्हैली म्है आप ने बाडमेर प्रवास में मिळियौ तद ही म्हाने ठा पडियौ के मीठा खां जी मीर साहब किता सरल व्यक्तित्व रा धणी है। आप रो पेशो शादी ब्याव में राजस्थानी गीतां री प्रस्तुति रो है, उण रे सागै आप राजस्थानी रा परंपरागत दोहा सोरठा, डिंगळ गीत आदि में अनवरत सिरजण करता रेवै। आप री कविता रा विषय खास कर भगति, प्रकृति काव्य, ग्यान वैराग्य आदि है।

एक बार सब आप आप रो परिचय देय रिया हा उण टेम मीठा खां जी सरल मन सूं लिखियौ के “मांग ने पेटियौ रळूं अर मस्त रेवूं” आ बात आप सहजता सूं कही ही पण म्हनै थोडी अजूगती लागी जद म्है आप रे निजर दो दोहा करिया

मीठेखांजी मीर थें, आखर रा उमराव।
कहिजो मत किण नें कदी, थें मांगे ने खाव।।१
मीठे खांजी मीर थें, सुरसत रा लघु साव।
कहिजो मत किण नें कदी, थें मागे ने खाव।।२

MitheKhaanMirमीठा खांजी मीर साचांई आखर रा उमराव अर मां सुरसती रा सबसूं प्रिय टाबर है उण चीज रो ठा म्हां सब ने उण दिन पडियौ जद एक बार डिंगळ री डणकार ग्रुप रे मांय घोडां री काव्य चर्चा अर संदर्भ काव्य री बातां छिडी। घोडां रा शुभलखण अर अपलखण री बात छिडी। अर डिंगळ री डणकार रा एक गुणी सदस्य आदरणीय नितिराज सा सांदू सिहू नागौर जिका स्वयं घोडां रा पारखी अर घोडां रा व्यवसायी है आप ने बतायौ के आप री काव्य प्रतिभा सूं प्रभावित हुय वा मीठेखांजी मीर ने घोडी रो दान देवण चावे है। नीतिराज जी आप रो औ कोल निभायौ अर घोडी मीठा खां जी ने भेट करी। आप उण घटना ने एक डिंगळ गीत लिख संजोयौ जिका पुरै शोशियल मीडिया रे मांय वियोडी अभूतपूर्व अर अविश्वसनीय घटना है। मीर साहब शोशियल मीडिया रे मांय एक न्यारी ओळख राजस्थानी कवि रे रूप में राखै।

राजस्थानी भाषा रा नामी गिरामी साहितकार आदरणीय मोहन सिंह जी रतनू चौपासणी, डी वाय एस पी जयपुर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो आप री काव्य प्रतिभा नें बिरदावतां थकां आप रे मान में उजळा आखर लिखिया है जिण में सूं थोडा आप सब नें निजर कर रियौ हूं।

भाग जिकण रा है भला, तिरिया रा तकदीर।
हाथ पकड वर हेरियौ, मीठेखांजी मीर।।१
मन मीठोमीठा वयण, कंठ मधुर जिम कीर।
आखर मीठा आपरा, मीठे खांजी मीर।।२

आप सबां ने म्है राजस्थानी भाषा रा लोक कवि मीठा खां जी मीर रा आत्मोद्बोधन काव्य मीठिया रा सोरठा लिखियौ गीत आप गुणी पाठकों रे सामी परिचय कराय’र म्हारी कलम नें विराम देवूं हूं।

।।मीठिया रा सोरठा।।
परधन जिकै प्रमांण, ध्रब गिणै नह धूळ सम।।
होवे जिणरी हांण, मालिक रे घर मीठिया।।१।।
निरखै दूजी नार, कामी नर जो काम वश।।
(तो) खांतै हुय खौआर, मुऱख जगमें मीठिया।।२।।
जिकै हणै औ जीव, आमिष कारण नर अठै।।
(तो) निभै न ज्यांरी नींव, मिनखपणा री मीठिया।।३।।
हणै जीव कर हाम, मांस भक्षण कज मानवी।।
तैह बदळो तमाम, मिळसी आखिर मीठिया।।४।।
चुगल जुआरी चोर, नीच कृतघण नर जिकै।।
ठावी उणरी ठौर, मांय नरक रे मीठिया।।५।।
कुटिल जिकै वश काम, हाम चाम री मन हुवै।।
रहै जठै क्यूं राम, मालिक उण घट मीठिया।।६।।
मिनख जमारा मांय, कियो न सुकरत रटण कर।।
(तो) कारी लगै न कांय, मालिक रे घर मीठिया।।७।।
लोभ तणी मन लाय, घट ज्यांरै होवे घणी।।
(ते) खांतै लूंटै खाय, मिनखां रो धन मीठिया।।८।।
धन देखे मत धाय, पारख कर गुण री प्रथम।।
अकल बिना किम आय, मौज घणेरी मीठिया।।९।।
कहत वेद कुरान, सबदां हन्दा सार में।।
समझै नह शैतान, माया लोभी मीठिया।।१०।।
पोथी वैद पुराण, जबर ग्रंथ इण जगत में।।
गीताजी रो ज्ञान, मिळै न दूजै मीठिया।।११।।
मिळै न जां घर मान, रात न उणघर रैवणो।।
मन उपर मेहमानव, मत तूं होवे मीठिया।।१२।।
भले न होवै भांन, बुद्धि बळ दौनूं तणो।।
माया लारै मांन, मिळै जगत में मीठिया।।१३।।
देवकी सुत दयाळ, भार हरण भूमि तणो।।
कंस तणोही काळ, मोहन जायो मीठिया।।१४।।
बणाय दिया ब्रजराय, महल अनुपम मोकळा।।
सुदामा री सहाय, मोहन किनी मीठिया।।१५।।
परगळ कर कर पाप, माया कमाय मोकळी।।
उणरो बदळो आप, मानव भुगतै मीठिया।।१६।।
पईसा कारण पाप, जबर वध्यो इण जगत में।।
कबहू लेसी काप, मालिक जगरो मीठिया।।१७।।
मिनख जमारे मांय, भल माया भेळी करी।।
चीत घण माया च्हाय, मन ही ज्यांरो मीठिया।।१८।।
परथम अवगुण पास, भुंडाई मन में भरी।।
उणसूं भलीह आस, मतीह करजै मीठिया।।१९।।
सतन होय सपूत, भर्या थौक भलपण तणा।।
(पण)कुळ में होय कपूत, मिनखो दोरो मीठिया।।२०।।

~~नरपत आवडदान आसिया “वैतालिक”
गांधीनगर गुजरात,

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