लूणोजी रोहड़िया री वेलि

बीठूजी नै खींवसी सांखला 12 गांव दिया। बीठूजी आपरै नाम सूं बीठनोक बसायो। कालांतर में इणी गांव म़े सिंध रै राठ मुसलमानां सूं सीमाड़ै अर गोधन री रुखाल़ी करतां बीठूजी वीरगति पाई। जिणरो साखीधर उठै एक स्तंभ आज ई मौजूद है। बीठूजी री वंश परंपरा में धरमोजी होया अर धरमोजी रै मेहोजी। मेहोजी रै सांगटजी/सांगड़जी होया। बीठनोक भाईबंटै में सांगड़जी नै मिलियो जिणरै बदल़ै में तत्कालीन जांगलू नरेश इणां नै सींथल़ इनायत कियो।

सांगड़जी सींथल आयग्या। सांगड़जी रै च्यार बेटा हा-मूल़राजजी, सारंगजी, पीथोजी, अर लूणोजी। एकबार भयंकर काल़ पड़ियो तो च्यारूं भाई आपरी मवेशी लेयर माल़वै गया परा। लारै सूं सूनो गांम देख ऊदावतां सींथल माथै कब्जो कर लियो। मेह होयो। हरियाल़ी होई तो ऐ पाछा आपरै गांम आया। आगे देखै तो ऊदावत धणी बणिया बैठा है! उणां विध विध सूं समझाया पण उणांरै कान जूं ई नीं रेंगी। दूजै भाईयां तो कोई घणो जोर नीं कियो पण लूणैजी सूं आ बात सहन नीं होई। उणां ऊदावतां माथै रीस अणाय आपरै गल़ै इक्कीस बार कटारी खाधी पण घाव एकर ई नीं फाटियो। देखणियां नै अचूंभो होयो अर उणां मानियो कै लूणोजी कटारी नीं खायर खाली राजपूतां नै डरावण रो सांग कर रैया है। घाव नीं फाटण सूं लूणैजी नै ई आपरो अपमान लागियो। बै सीधा देशनोक करनीजी कन्नै आया अर पूरी बात बताय स्वाभिमान कायम राखण रो निवेदन कियो।

करनीजी कैयो कै “आज थारै पाखती रै गांम वासी में सांखलां रै अठै ब्याव है सो तूं उठै जा परो। उठै तन्नै बकरी रै दूध री खीर पुरसैला। उण खीर में बकरी रो बाल़ आवैला बो थारै कंठां में आवतां ई पूरा घाव फाट जावैला। पछै तैं में आपै ई देवत्व प्रगट होवैलो।”

लूणोजी वासी आया। उठै सांखलां घणा कोड किया। जीमण रो बगत होयो जणै जानियां अर मांढियां लूणैजी नै भोजन अरोगण रो कैयो पण लूणैजी मना कर दियो।

राजपूतां कैयो “आ तो होय नीं सकै कै म्हे भोजन करां अर म्हांरै घरै चारण भूखो रैवै! धूड़ है म्हांरै ऐड़ै भोजन में।”

लूणैजी कैयो “थांरै घरै शुभ काम है अर म्हारा भोजन करतां ई प्राण नीं रैवै सो थांरै घरै विघन नीं करूं।”

सांखलां कैयो कै “आप म्हांरै माथै रा मोड़। आप भूखा रैवो अर म्हे जीमां! तो म्हांनै लख लांणत है। हिंदू मरै जठै ई हद है! जे ऐड़ी होयगी तो आपरी जथा जुगत करांला!!”

लूणैजी देखियो सांखला मानै नी जणै उणां कैयो कै “थे ओ वचन देवो कै अठै म्हारा प्राणांत हो जावै तो म्हनै अठै दाग नीं देयर म्हारै गांम ले जाय ऊदावतां री तिबारी रै दरवाजै माथै दाग देवोला!”

सांखलां कैयो “वचन है !! जै आपरो शरीर नीं रैवैला तो म्हे दाग ऊदावतां री तिबारी रै दरवाजै देवांला।”

लूणैजी ज्यूं ई भोजन कियो। ज्यूं ई इक्कीस घाव फाटग्या। जिगन में विघन पड़ियो पण उण बगत रा मिनख बाप अर बोल नै एक मानता। उणां लूणैजी री अरथी बणाय खांधां उखणी अर सींथल़ आया। लूणैजी नै दिए वचनां मुजब ऊदावतां री तिबारी में अरथी नै उतारी। ऊदावतां ई उजर किय़ो पण सांखलां नै मरण मतै देख हियो हेठो कियो।

उणी दिन कई ऊदावत डरता दिन रा गाडां गोल़ नाठग्या। एक ऊदावत आ कैयर नीं गयो कै लूणो जीवतो ई कीं नीं कर सक्यो तो मरियोड़ो कांई करेला! रात रा उणरो मांचो ऊ़चो उठियो। बो डाडियो कै थारी कवली गाय हूं! मार मती। अबार ई सींथल़ छोड दूंला! लूणैजी उणनै छोड दियो बो गयो परो। ओ जिकै गांम में बस्यो, सींथल़ रा वासी उणनै निनामियो गांम कैवै। नाम नीं लेवै। जिकै ऊदावत दिन रा डरता नाठा बै सोवै गांम में बसिया।

म्हारी घणै दिनां सूं इच्छा ही कै इण महान जूंझार माथै कीं लिख्यो जावै। आज इच्छा पूरी होई अर पूरै कथानक माथै 31 दूहालां रो एक वेलियो गीत लिखियो जिको आपरी पारखी निजरां भेंट कर रैयो हूं—

।।दूहा।।
सींथल़ धर राखी सबल़, साखी सब संसार।
सांगट सुत लूणा सधर, कीधी गल़ै कटार।।1
धरमाहर राखी धरा, भुजबल लीधां भार।
लाख मुखां रँग लूण नै, कीधी गल़ै कटार।।2
सांगड़ियो अड़ियो सही, लड़ियो धर निज लैण।
मेहाहर मांटी मरद, वडपण राख्या वैण।।3
पहरी लूणै पाणबल़, प्रतमाल़ी गल़ पात।
रहसी रोहड़राण री, वसुधा कायम बात।।4
ऊदा धरा उथापिया, सबल़ापणै सराप।
पड़वै वाल़ा पातवां, धिन राखै धणियाप।।5
आखर दे मुझ ऊजल़ा, उकती वल़ै अमांम।
आखूं निजपण आपरा, कीरत वाल़ा कांम।।6
सत साखी पड़वो सही, साखी धरा सींहांण।
ईहग लूणा आपरी, उथपै कोयन आंण।।7

।।गीत वेलियो।।
सांसण ओ दियो सांखलां सींथल़,
रोहड़ सांगड़ नैं कर रीझ।
फरहर धजा सुपातां फरकी,
वसुधा अखी धरम रो बीज।।8
सांगड़ सुकव वंश रो सूरज,
सो धिन जिणरै चार सुजाव।
मूल़ो पीथ सारंग रु लूणो,
दाटक दैण दोयणां डाव।।9
वित बहु पार वीदगां वासै,
ठावी थल़ी गवाड़ी ठीक।
बाजै घरै अणद री वंसी,
लोपै नाय धरम री लीक।।10
पड़ियो काल़ अचाणक पापी,
गायां चरण नीठियो घास।
माल़व दिसा बुवा मन माठै,
सुकवि छोड धरा सुखरास।।11
ऊदां आय दाबली अवनी,
अंकै मन में धार अनीत।
संकिया नाय धर्यो सिटल़ापण,
रेटी मड़ां छत्रिया रीत।।12
पाणी तेय पींपल़िये पीवै,
निसचै रैवै होय नचीत।
बैवै नाय वाट वडकां री,
बसिया आय इसा बुरचीत।।13
धरहर मेह वरसियो धरणी,
चरण हुवो घण लीलो चार।
पुल़िया पात धरा दिस पाछा,
चितसुध निजरो गांम चितार।।14
घुसपेठी अगे देखिया गढवां,
विफर बणिया वन रा बाघ।
ऊभां थकां दबै कुण अवनी,
खांचां मरण करां में खाग।।15
छता निकल़िया आगे छत्री,
रसा नहीं भिड़वा री रीत।
करसां हमे कटारी कंठां,
उथपां ऊदां तणी अनीत।।16
सांगड़ सुतन लूणो सबल़ापण,
धुर सँभियो मरणै री धार।
चारणपणो करण जग चावो,
कवियण कंठां करी कटार।।17
धरमाहरो रखण धिन धरती,
भुजां उठायो कुल़ रो भार।
खीझ -खीझ लूणै हद खाधी,
वीदग गलै इक्कीसा बार।।28
पहरी सकव गल़ै प्रतमाल़ी,
अवनी रखण धरम री आण।
तन पर घाव फूटो नह तारां,
पुनि थिर रह्या देह में प्राण।।19
सांगड़ सुतन कियो मन सांसो,
उबरै केम पातवां आण।
कंठां बार इक्कीसां कीधी,
हिव विध नाय पूगियो हाण।।20
ईहगां तणी आबरू आ तो,
जाती दीखै अबै जरूर।
किसड़ो पाप लगो मो काया,
देह सूं मरण भागियो दूर।।21
विदग वाट देसाणै बहियो,
पड़़ियो आय करनला पाव।
माऊ बात समझ मो मन री,
अब तो करजै बेग उपाव।।22
उबरै लाज ईहगां आई,
देवूं करां दोयणां डाव।
दे वरदान डीकरां देवी,
भलां समझजै मन रा भाव।।23
करनी बात करी सह कानां,
सजी सरासर राखण सीर।
ऊपर करण आद ज्यूं आई,
भल -भल हुई लूण री भीर।।24
सुण गल लूण कैयो सुरराया,
साचो अजै सांखलां सीर।
वासी जाय जिकां रै वासै,
खाजै अजा दूध री खीर।।25
बकरी बाल़ कंठां बिच आसी,
जिण सूं घाव फूटसी जोय।
जोती तूझ मिल़ै प्रमजोतां,
हेतव सुजस धरा पर होय।।26
ईहग सुणै वासी धर आयो,
साचो देख सांखलां सीर।
जाझो माण दियो जांगल़वां,
नामी वंश चढावण नीर।।27
त्यारी भोज तणी तिण वेल़ा,
जिमण हली अयोड़ी जान।
कूरब करै छत्रियां कहियो,
करी नहीं सांगड़ियै कान।।28
आदर करण सांखला आया,
भाणव भाव करावण भोज।
म्हांरै लूण मोड़ माथै रो,
निरणो रहै घरां में नोज।।29
सुकवि कैयो वचन दो सारा,
अपसो म्हनै इसोड़ो आघ।
जावै प्राण म्हारा जिण वेल़ा,
देसो ऊद कोटड़ी दाग।।30
कर मन गाढ सांखलां कहियो,
वचन अमीणा गढवा वीर!
देसां दाग ऊदां घर दूथी,
सचपण रखां सनातन सीर।।31
पीनी खीर पात जद पेखो,
घट रा सकल़ उघड़िया घाव।
संभिया वीर सांखला सारा,
निसचै वचनां करण निभाव।।32
साचड़िया सबल़ पूगिया सींथल,
दीनो वचन प्रमाणै दाग।
आधी रात आवतां ईहग,
बणियो लूण सांपरत बाघ।।33
ऊंधै माग नाठिया ऊदा
खूटल़ सुजस आपरो खोय।
सिरहर आज सांसणां सींथल़
जस हद लूण राखियो जोय।।34
लड़ धर काज सबल़पण लूणो,
मेहाहरो थपण कुल़ मान।
सांगड़ सुतन रखी इल़ साबत
साखी स़ीथल़ अजै सुथान।।35
प्रिथी अजै राजै निज पड़वै,
वसुधा अमर वीरत री बात।
खपिया ऊद कुखत्री खोटा,
प्रसन्न उठै राजिया पात।।36
धिन -धिन लूण हुवो धर सारी
बल़िहारी थारी विखियात।
अडरापणै हुवो धर ओडप,
हितवां साख रखी निज हाथ।।37
पनरा साल सतक पनरासौ
विमल़ असाढी सुकल़ा बीज।
गढवी गुमर रख्यो गढवाड़ां
धुर परवाड़ा दीनो धीज।।38
सिमर्यां देस विदेसां स्हायक,
ऊजल़ वागै करण उबेल।
रोहड़राण रुखाल़ै रैयत,
हिव विध सुणै सताबी हेल।।39
स़ीथल़ धरा सुकवियां सौभा,
लंबहथ जबर बधाई लूण।
सारां मुगट सुतन सांगड़ रो
करसै तूझ समोवड़ कूण।।40
गिरधरदान कहै इम गढवी,
नाना गीत तिहाल़ै नाम।
अड़िया काम करै अल़वल़िया,
पड़वै वाल़ा तूझ परणाम।।41

~~गिरधर दान रतनू दासोड़ी

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