शरणागत की रक्षार्थ प्राण अर्पित किए- (मा पुनसरी एक परिचय)

हमारी संस्कृति के मूलाधार गुणों में से एक गुण है शरणागत की रक्षा अपने प्राण देकर भी करना। ऐसे उदाहरणो की आभा से हमारा इतिहास व साहित्य आलोकित रहा है, जिसका उजास सदैव सद्कर्मों हेतु हमारा पथ प्रशस्त करता है।

जब हम अन्य महापुरूषों के साथ-साथ चारण मनस्विनियों के चरित्र का पठन या श्रवण करते हैं तो ऐसे उदाहरण हमारे समक्ष उभरकर आते हैं कि हमारा सिर बिना किसी ऊहापोह के उनके चरणकमलों में नतमस्तक हो जाता है।

ऐसी ही एक कहानी है गुजरात के कच्छ प्रदेश की त्याग व दया की प्रतिमूर्ति मा पुनसरी (पुनश्री) की।

कच्छ के कठार प्रदेश में मुदरा गांव की पूर्व दिशा में चारणों का एक गांव है शेखड़िया। शेखड़िया, भांचळिया चारणों की एक उपशाखा है और इन्हीं के नाम से इस गांव का नामकरण हुआ है।

इसी गांव में मा पुनसरी रहती थी। यह इनका पीहर था या ससुराल यह अभी गवेष्य है। पुनसरी की शादी बाल वय में हो चुकी थी और दुर्योग से थोड़े समय बाद ही उनके पति का देहावसान हो गया था। पुनसरी गो-पालन व भैंसें रखती थी। यही उनकी आजीविका का साधन था। प्रभु नाम की माला जपना, गायों की सेवा करना तथा आशा लेकर घर आए को अन्नजल करवाना। यह उनका नित्यकर्म था। ऐसे सद्कर्म करते-करते उन्होंने वृद्धावस्था में प्रवेश कर लिया।

चौमासे का समय था। पुनसरी अपनी गायों-भैंसों हेतु घास लाने अपने खेत गई। घास काटा, भारा बनाया। भारा सिर पर धरा और थोड़ी ही दूरी चली थी कि उन्हें थकावट महसूस हुई। उन्होंने एक गहरे वृक्ष की छाया में भारा उतारकर एक तरफ रखा। थोड़ी सुस्ताई और फिर आंख मूंदकर माला जपने लगी। इधर पास के ही साडाऊ गांव का ठाकुर कान्हा एक खरगोश को मारने की नियत से उधर आया। उसने खरगोश को पकड़ने हेतु सताया। ऐसे में खरगोश बचाव की मुद्रा में हेतु इधर-उधर भागा लेकिन उसे सुरक्षित जगह नहीं मिली। ऐसे में उस मूक प्राणी को एक वृक्ष की छाया में मा पुनसरी योगमुद्रा में दिखाई दी। वो बिना झिझक आई के खोळै में जाकर दुबक गया। जब आई ने अपने खोळै में यह अजीब हरकत देखी तो उन्होंने आंखें खोली। उन्होंने देखा कि कोमल बालों का एक खरगोश हांफा हुआ उनके अभय आंचल में सुरक्षा के भावों से शरणागत हुआ है। उन्होंने कहा कि-
“अरे! भोळा जीव तूं मेरी शरण आया है तो धैर्य धर। श्वास को विराम दे। अब तेरा कोई बाल ही बांका नहीं कर सकता।”

इतने में खरगोश का पीछा करता हुआ काना आई के पास आया और बोला-
“यह खरगोश मेरा शिकार है। इसे मुझे दे और घास उठाकर तेरे घर जा।”

“खरगोश अब मेरी शरण में है। वैसे भी इस अबोल ने तुम्हारा क्या नुकसान किया है? जो इसके प्राण हनन करने की ठानी है?” पुनसरी ने कहा तो कान्हा बोला-
“अरे जा ! शरण देने वाली ! शरीर तो संभल ही नहीं रहा है और इसको शरण देगी। जानती नहीं मैं कौन हूं? मैं साडाऊ का मालिक हूं। यह मेरा शिकार है। ला दे! फालतु समय नष्ट मत कर।”

“अरे! तूं राजपूत है! राजपूत को तो सिंहों की शिकार रमनी चाहिए, लेकिन वो तुम रम नहीं सकते क्योंकि-

लावां तीतर लार, हर कोई हाका करे।
सिंघां तणी शिकार, रमणी मुसकिल राजिया।।

हां तूं कान खोलकर सुन ले। यह मुझे मा मानकर मेरे खोळै में शरण ले ली है तो अब इसके प्राण लेने से पहले तुझे मेरे प्राण लेने होंगे।” पुनसरी ने कहा तो कान्हा क्रोधित होकर बोला कि-
“डोसी (बुढिया) ! मुझे उपदेश देने की आवश्यकता नहीं हैअगर तूं मुझे सीधे-सीधे खरगोश नहीं देती है तो मैं जबरन छीन लूंगा। धक्के दूंगा सो ऊपर। अतः ठीक यही रहेगा कि तूं मुझे मेरा शिकार दे दे।”

पुनसरी ने कहा कि-
“हां यह बात सही है। तेरे आचरण में क्षत्रियत्व के लक्षण दिखाई नहीं दे रहें हैं-

धन जोबन अरूं चाकरी, ता ऊपर अविवेक।
ऐ च्यारूं भेल़ा हुवां, अनरथ करे अनेक।।”

वो आगे कुछ कहती इससे पूर्व ही कान्हा ने अचानक उनके हाथों से खरगोश छीना और अपने गांव की तरफ भागा।

यह दृश्य देखकर पुनसरी की आंखों से ज्वाला बरसने लगी। वो हंसिया लेकर उसके पीछे दौड़ी लेकिन कान्हा जवान और यह वृद्ध थी सो कान्हा पकड़ में नहीं आया। उन्होंने कान्हा को संबोधित करते हुए कहा कि-
“दुष्ट ! तूं इस अबोल और मेरे शरणागत को मारकर खाएगा तो भुगत-भुगतकर मरेगा।”

वहां से सीधे वो अपने गांव पहुंची। गांव वालों को इकट्ठा किया और कहा कि-
“मैं मेरे शरणागत की रक्षा नहीं कर सकी। एक मूक प्राणी मेरी आंखों में निरीह दृष्टि से देखता रहा, कलपता रहा लेकिन मैं उसकी सहायतार्थ कुछ नहीं कर सकी। अब मैं जीवित नहीं रहूंगी अतः मैं आपकी उपस्थिति और सूर्य की साक्षी में उस दुष्ट पर जमर कर रही हूं। आप सब यह सुन लेना कि कभी भी दया के मार्ग से भटकना मत। क्योकि-

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र ही
एते वेदा अवेदा:स्युर्दया यत्र न विद्यते।
अर्थात बिना दया के किए गए काम का कोई फल नहीं मिलता, ऐसा काम जहां धर्म नहीं होता वहां वेद भी अवेद बन जाते हैं।

इतना कहकर आई पुनसरी ने जमर कर अत्याचारी कान्हा को शापित किया। उस अंचल में मान्यता है कि कान्हा चित्तभ्रमित होकर मरा।

मा पुनसरी की दया और त्याग की इस श्रद्धास्पद कथा को गुजराती के प्रसिद्ध कवि कवि आल ने अपने शब्दों में इस प्रकार गूंथा है–

गांव शेखड़िये में चारण ज्ञाति,
पुनसरी नांम प्रख्यात।
पशु पाळन नो पवित्र धंधो,
रांम रटवा दिन रात।
कथा मारी मात नो केवी, आज मुने आवड़ै ऐवी।।

एक सवारे उठ्या वेहला,
गया लेवा ना घास।
खड़ लेता त्यां खोळले आयो,
ससलो लेतो सास।
बीतो-बीतो गोद मे बैठो, देवी अनै नजरै दीठो।।

आव कही नै आसरो दीधो,
हळवै फेर्यो हाथ।
एटळ में इक पापियो आव्यो,
निकट साडाऊ नो नाथ।
काळो दिल नांम छे कांनो, दया बिनां नो साव छे दांनो।।

मूंगा प्रांणी ना कदै न मारण,
कोई नो थावो काळ।
सती माता ऐ खूब समझाव्यो,
मांन्यो नहीं महिपाळ।
अचानक आंचकी लीधो, ससलो लेनै भाग्यो सीधो।।

पुनश्री आई पण पाछल दोड़्या,
शरीरे बाध्यो सत्त।
चिता खड़की नै चारण बोल्या,
प्रभुजी राखजे पत्त।
ज्वाल़ा अंगोअंग में जागी, महिपते आविनै माफियुं मांगी।।
~~कवि आल

ऐसी दयामयी देवी की कमनीय कीर्ति को इन पंक्तियों के लेखक ने अपने शब्द इस प्रकार दिए हैं–

।।मा पुनसरी रा दूहा।।
पुनसरी जग में प्रसिद्ध, हुई त्यागबळ हेर।
अंग प्रखाळण अगन झळ, जस पण अड़्यो सुमेर।।1
शेखड़ियै दीधो सुजस, अहर-निसा रट ओम।
जुड़ी नवैलख झूळरां, हाड हुतासण होम।।2
जप माळ तप जोगणी, कर कर परहित कांम।
पुनसरी कीधो पहुम, शेखड़ियो सरणांम।।
गाय महिखी पाळ घर, पौरस धर पिंड पांण।
दूध आयै नै खोल दिल, मात पाय दे मांण।।4
एक अहर उठ अंबका, हिये धार पशु हेत।
गई सताबी गाढधर, खड़ लेबा नै खेत।।5
भट थट कीनो भारियो, वल़ै कियो विसरांम।
तरवर गहरै छांह तळ, रटण विराजी रांम।।6
वरियां उण वनराय में, बणी अचाणक बात।
एक शिकारी आयनै, घाली सुसियै घात।।7
सठ साडाऊ गांम रो, ऊ कानो अधपत्त।
सजियो सुसै शिकार कज, हया दया सब हत्त।।8
बी’तो सुसियो बापड़ो, दिस-दिस दोड़्यो देख।
पार नहीं किणविध पड़्यो, उणरो पडपँच एक।।9
माथै भमती मोतड़ी, पिंड पण रयो न पांण।
उणपुळ पायो आसरो, अबळै जीव अचांण।।10
जपती माळा जांमणी, जिणपुळ दीठी जीव।
जाय खोळै में जंपियो, अणभय हुवो अतीव।।11
तज माळा तद देखियो, आयो सरण अबोल।
बछळता व्यापी बदन्न, कियो बचावण कोल।।12
जोय अबोलै जीव नै, पुनि फिर गई पसीज।
नैण नीर निरमळ झर्यो, भोम गई सह भीज।।13
सुण रै ससिया सधर मन, आयो सरण अमांह।
घाव म्हारै ई घालियां, तो फिर घलै तमांह।।14
इतरै आयो असुर व्रत, कानो काळ करूर।
मांग्यो ससियो मछर मन, जो बल तणै जरूर।।15
जाब दिया ऐ जांमणी, सुणरै कान सधीर।
ससिया मार्यां सिटळिया, बजै नहीं धर वीर।।16
तूं छत्री हूं चारणी, सची सनातन साख।
उणरी तो कींयक अबै, रे मरजादा राख।।17
शरण आयां रिछा सजण, प्रथमी बात प्रमांण।
आंच आवै इण ऊपरै, पिंड में रखूं न प्रांण।।18
मूढ नकोई मांनियो, छळ-बळ ससियो छीन।
गयो माग पड़ गांम रै, मरण मतै मतहीन।।19
कपटी सुणजै कांनिया, आयल वचन अदेर।
चरू चढायां चित विटळ, जो तूं होसी जेर।।20
चोळ किया चख चारणी, जमर सजी जगतंब।
शेखड़ियै अजतक सही, खड़िया कीरत खंभ।।21
पसरी प्रभता परगळी, हर दिस में हिंदवांण।
परचा पुनसरी पवित, करै कवित कवियांण।।22

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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