माणस अर माछर

ओ छोटो सो जीव रंगीलो, बात होळै सी कह्वै कान में।
करै कुचरणी, नींद उड़ावै, रक्तपान नै धार ध्यान में।।
ऊमस, गरमी हुवो कितीही, भांवै सांस निकाळै आवै।
आँख लागतां पाण जुझारू, सागण जूनी तान सुणावै।।
कड़कड़ ठंड दांत कड़कावै, भांवै बरसै मूसळाधार।
ओ नीं सोवै नीं सोवण दे, ओ छोटो मोटो सरदार।।
जाग सुतोड़ा हूँ बतळाऊँ, बिन बतळायां घात न घालूं।
पहली तीन वार तूं करलै, छत्री धरम राह में चालूं।।
थे कुळ रीत त्यागदी थांरी, मूळ बात सै लारै मे’ली।
ओगणगारो मनै बताओ, पण थे थांरी सोचो पे’ली।।
खून, दूध रा रिश्ता सगळा, माणस आज आप तूं भूल्यो।
करम करै सै निक्यांजोगा, फिरै तूं क्यामै फूल्यो-फूल्यो।।
माणस तूं माछर सूं माड़ो, सो फीसद आ साची बात।
म्हैं तो काटां जूण धरम है, तूं क्यों काटै कर-कर घात।।
माछर नीं माछर नै काटै, ना रिश्वत सूं मारग मोड़ै।
अबैं बता तूं माणस कीकर, लाग सकै माछर रै जोड़ै।।
ना दावत ले दोष मिटावै, ना कुळ री मरजादा तोड़ै।
वो निरपेखी कर्मभाव सूं, डंक आपरो सैं पर छोड़ै।।
माणस थारो अंतस मरियो, तूं नीं सोच करै पछतासी।
मिजळो माछर सूं भी माणस, गिण्या दिनां में रोज कहासी।।

~~डॉ गजादान चारण “शक्तिसुत”

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