मध्यकालीन राजस्थानी काव्य में रामभक्ति परंपरा

राजस्थान और राजस्थानी काव्य अपनी शैली व विषय वैविध्य के कारण संपूर्ण देश में न केवल विशेष पहचान रखता है अपितु सम्मान की दृष्टि से भी देखा जाता रहा है। शक्ति, भक्ति और प्रकृति से अनुरक्ति रखने वाली इस धरा ने संस्कृति और संस्कारों को संजोएं रखने के महनीय यत्न किए हैं। इस धरा के साहित्य में वीर, श्रृंगार और भक्ति की त्रिवेणी धारा समरूप से प्रवहित होते हुए लोगों के अंतस को आलोकित करने में किसी प्रकार की कसर नहीं रखी है। इस रस त्रिवेणी में यहां के लोगों ने डुबकियां लगाकर आनंद उठाया है। इस आनंद की लहरें मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक सतत रूप से संचरती व विस्तीर्ण होती रही है। यही कारण है कि मध्यकाल को राजस्थानी का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस कालखंड में राजस्थानी साहित्य का जिस विपुलता और विविधता के साथ सृजन हुआ है वो वरेण्य है। यही कारण था कि तत्कालीन राज व समाज ने समरूप से इस काव्यधारा को समादृत माना। भलेही मध्यकाल में वीररसात्मक काव्य सृजन का आधिक्य था परंतु समग्र रूप से अध्ययन करते हैं तो विदित होता है कि उस कालखंड में भक्ति काव्य भी कोई कम मात्रा में सृजित नहीं हुआ। इसलिए शायद यह कहना समीचीन रहेगा कि मध्यकालीन राजस्थानी काव्य का अध्ययन करने वालों को एकपक्षीय दृष्टिकोण नहीं रखकर व्यापक दृष्टि से समग्र लेखाजोखा करना चाहिए। क्योंकि उस कालखंड में भक्ति काव्य धारा भी सतत रूप से प्रवाहित हुई है। निर्गुण व सगुण दोनों काव्यधाराओं में अनेक रचनाएं उपलब्ध हैं। सगुण भक्ति काव्य धारा में राम और कृष्ण के प्रति यहां के कवियों ने सतोल उद्गार प्रकट करके काव्यधारा को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया वो वंदनीय है, अभिनंदनीय है
मैं यहां दूसरी किन्हीं भक्तिधाराओं की बात नहीं करके सीधा मध्यकालीन रामभक्ति काव्य की ही बात करूंगा। इन कवियों ने राम के प्रति जो सहज भाव व लगाव दर्शाया है वो स्तुत्य है। राम के चरित्र की चंद्रिका चतुर्दिक चमकाने हेतु इन कवियों ने अपनी प्रज्ञा व प्रतिभा का सांगोपांग उपयोग किया है। राजस्थानी संस्कृति के मूलाधार साहस, शौर्य, स्वाभिमान, उदारता, मर्यादा पालन, सत्यनिष्ठा और सदाचरण राम से अनुप्राणित हैं। यही कारण कि कवियों ने राम की मर्यादा और सदाचार के साथ शील, स्नेह सबके प्रति समभाव और चरित्र की शक्ति के प्रति यहां के लोगों की अनुरक्ति को वाणी देते समय अपनी हृदयगत समस्त आस्था और अटूट विश्वास राम के चरणों में समर्पित कर अपनी साधना को साफल्यमंडित माना है। मध्यकालीन रामभक्ति काव्य धारा प्रबंध काव्य, खंडकाव्य, और प्रकीर्णक काव्य के रूप में संचरती हुई अपनी सौरभ से यहां के जनमानस को सुवासित व आनंदित करती रही है। साथ ही अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने में भी पूर्णतया सफल रही है। यहां के कवियों का मानना है कि अगर स्वर्ण को किसी प्रकार की काट लगे तो राम कथा को भी किसी प्रकार की काट लगे। अर्थात दोनों निष्कलुषित हैं। यानी जो चीज काट रहित है वो ही कराल काल के प्रहार झेलने में सक्षम होती है। कविवर हमीरजी रतनू के शब्दों में–

कह तपनीय पीतरंग कुरमदन, जातरूप कल़धोत जथा।
लाख जुग लग काट न लागै, कल़ंक न लागै रांम कथा।।

इस काट रहित कथा को आधार मानकर राजस्थानी कवियों ने राम महिमा और नाम निर्देशन का जो सुभग संदेश जनमानस को दिया है उनमें मेहारामायण (मेहा गोदारा), रामरासो (माधोदास दधवाड़िया) दूहा दसरथराउत रा (पृथ्वीराज राठौड़), रामरासो (सुरजन पूनिया), रामरासो रसायन (केसराज), रामरास (रूपदेवी), रामसुयश (केसोदास गाडण), रुघरास (रघुनाथ मुंहता) भक्तमाल (ब्रह्मदास बीठू), रुघनाथ रूपक (मंछाराम सेवग), रघुवर जस प्रकाश (किसनाजी आढा), के साथ नरहरिदास बारठ, पीरदान लाल़स प्रभृति नाम गिनाएं जा सकते हैं लेकिन विस्तार भय से इतने ही समीचीन रहेंगे।

इन रचनाओं पर राजस्थानी के कई उद्भट विद्वान अपने ग्रंथों में व्यापक चर्चा कर चुके हैं। अतः पुनः चर्चा करना पिष्टपेषण ही होगा अतः मैं इन रचनाओं की बात नहीं करके उस फुटकर रचनाओं की बात करूंगा जिन पर अभी तक या तो चर्चा हुई नहीं है या हुई भी है तो नहीं के बराबर। इस राजस्थानी प्रकीर्णक रचनाओं में राम का पीड़ित और प्रताड़ित के पक्ष में खड़े धनुषधारी लोक रक्षक के रूप में चित्रण हुआ है तो साथ ही मर्यादाओं की स्थापना करने वाले राम की अखंडित महिमा मंडित है।
मध्यकालीन भक्त कवियों में नांदणजी बीठू का नाम अग्रगण्य हैं। उनकी भक्ति विषयक रचनाएं तो कोई विशेष उपलब्ध नहीं हैं। केवल कुछ छप्पय उपलब्ध हैं। छप्पय उच्चकोटि के हैं। कवि नांदणजी लिखते हैं कि धर्म तराजू में एक पलड़े में आदमी के सभी पुण्य डालें और दूसरे में केवल राम नाम। तो भी राम नाम रूपि पलड़ा भारी रहेगा-

सहस ज्याग असमेद, सहस सर सलिल सगच्छति।
सहस वावि सौ वारि, सहस धेनका सवगच्छति।
सहस भार सौव्रंन, सहस भौमी स भौमी।
सहस सति ग. . सहस ऊरणा सरौमी।
अड़सठि तीरथ अवगाहि अनि, ध्रम चाढि हेकणि घड़ै।
श्रीरांम नांम चेल़ो सबल़, अजै घणै भरि उप्पड़ै।।1

‘ईशरा परमेसरा’ के नाम से लोक विश्रुत कवि ईसरदासजी अपने पावन ग्रंथ ‘हरिरस’ में राम नाम की महत्ता बताते हुए लिखते हैं कि जिस मुख से राम नाम अगर उच्चरित नहीं होता हो उस मुंह को लोह से सिलवा देना चाहिए-

राम जपंता रै रिदा, आल़स मकर अजाण।
जो तूं गुण जाणै नहीं, पूछै वेद पुराण।।
राम भणै भण तो राम भण, अवरां राम भणाय।
जा मुख राम न उच्चरै, ता मुख लोह जड़ाय।।2

कविवर ईसरदासजी के भक्ति विषयक डिंगल गीतों पर अभी तक कोई विशेष काम नहीं हुआ है। कवि के कई डिंगल गीत प्राप्य है। इन गीतों में कवि ने राम नाम की रुचिरता और रम्यता के साथ जो बोधगम्यता दर्शाई है वो उल्लेख्य है-

अधम उधार अरज अन्नदाता, सुण हो सुण त्रहलोकां सांम।
रंक निवाज रघुकुल राजा, रंक हूं रिजक पजोवो रांम।।3

कवि करमाणंदजी मीसण अपने दोहों के भावपक्ष व कलापक्ष की घड़त तथा जड़ित के लिए नामचीन रहे हैं। सहज, सरस दोहों में जितनी सतोली बात करमाणंदजी ने की है वो दूसरों के बूते की बात नहीं है। कवि लिखता है कि जिस प्रकार पत्थर अंकुरित नहीं हो सकता है उसी प्रकार भक्ति के बिना मुक्ति नहीं मिलती और उन लोगों को तो कतई नहीं मिल सकती जिन्हें राम राग से अनुराग नहीं होकर छोटे-छोटे देवताओं की राग अलापने में है। कवि लिखता है जो लोग हरि नाम में रत्त तथा परनारियों को आदर की दृष्टि से देखते हैं वे ही सब प्रकार के संकट से उबर पाते हैं-

करमाणंद पाखाण को, ऊगै नहीं अंकूर।
मुगती नीं भगती बिनां, साखी तोरो सूर।।
करमाणंद जो हरि रता, परनारियां विरत्त।
तांह नरां लागै नहीं, जरा मरण जम लत्त।।
केसव करमाणंद कहे, लोग दुखी इण लाग।
लौहड़ा देव लडावियां, राम न गायो राग।।4

इस मुक्ति प्रदाता नाम को कविवर अलूजी कविया रंकों के हाथों में रत्न मानते हैं। इस नाम को रटने वालों को उसी प्रकार आनंद मिलता है जिस प्रकार मछली को पानी से, भूखे को भोजन से, नशाई को नशे से, आनंद मिलता है-

जिम मोरां दद्दरां, सघण घण पावस बूठै।
जल़ विछड़ियां मच्छ, वल़ै जल़ जाइ पइट्ठै।
तन बंधण तूटतां, अमल बायड़िये लद्धो।
खीर खांड घ्रत सहित, घण सुखियारथ खद्धो।
आणंद हुवो मन माहरै, जीव तणो पायो जतन।
राम रो नाम मिल़ियो अलू, रंक हाथ चढियो रतन।।5

कविश्रेष्ठ दुरसाजी आढा का नाम औदार्य व शौर्य को अनुप्राणित करने वाली रचनाओं के रचनाकार के रूप में विश्रुत रहा है। लेकिन इनकी भक्ति विषयक रचनाएं भी प्राप्य है। कविवर अपनी रचना ‘परमेसरजी री नाममाल़ा’ में पूर्ण प्रभु के नाम की पावनता को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं-

वदै वांमणो वीठल़ो सांमि व्रनो।
वेदां वाल़णो वनमाल़ी विसन्नो।
रिपो रांमणो राघवो रुघ रांमो।
नरसिंघ नारायणो सहंस नांमो।।6

दुरसाजी के अद्यावधि अल्पज्ञात दो गीत ‘परमेसर रा गीत’ नाम से मिलते हैं। इसमें एक गीत में सीता की विरह वेदना और हनुमान से राम को संदेश पहुंचाने की बात है तो दूसरे में राम के शौर्य को अभिमंडित किया गया है। दोनों के एक-एक पद्यांश-

राजा राम सूं कहजो कपिराजा, सीता तणो संदेशो।
रामा कदै मारसो रावण, लंक दुरग कद लैसो।।

साम दुरस चा वाल़ी सीता, पाड़ै कुंभ सु पाणां।
रावण मार मंदोदर रांडी, राण विभीखण राणां।।7

इस कालखंड में अपने छंद वैविध्य व रचना कौशल के लिए अपनी अलग पहचान रखने वाले मेहाजी बीठू की भक्ति विषयक दो अज्ञात रचनाएं मिली हैं। जो अद्यावधि अप्रकाशित हैं। हालांकि उनकी देवी भक्ति विषयक तो कई रचनाएं उपलब्ध और प्रकाशित है।

एक रचना ‘अवतारां री स्तुति’ में प्रणीत है तो दूसरी ‘लिछमण जती रो छंद’ है।

राम की महिमा गान करते हुए कविश्रेष्ठ ने एक ही पद्यांश में समग्र मुख्य घटनाओं को उकेर दिया है–

कौशल़ा मन्नू दसरथ तन्नू, समरतन्नू उपवन्नू।
गुर वासठ गन्नू विधा वहन्नू, पिता वचन्नू वास वन्नू।
वाल़ै धी जन्नू लंक दहन्नू, सब दसकंधू संघारू।
कव मेह प्रसन्नू जयो क्रसन्नू, दयण दन्नू दातारू।।8

‘लिछमण जती रो छंद’ में कविवर रचना के समाहार में राम की सर्वोच्चता व लक्ष्मण की श्रेष्ठता बताते हुए लिखते हैं-

राम समर ओ राम, समर सीता ओ साई।
समर सीस जल़ समर, आप अवगतै अथाई।
समर वैकूंठ रो नाथ, कमी नह राखै काई।
राम समर ओ राम, सकत ओ राम सहाई।
कवै विरचित केही करै, भाहु मन दाखै भवह।
अवतार प्रेम दीठो अधक, कव वीरो लिछमण कह।।9

कविवर चुतरजी अपनी रचना ‘राम नाटक’ में लिखते हैं कि
रावन ने राम पर आक्रमण किया था तो राम ने रावण का सामना ही नहीं किया अपितु दश शीश और बीस भुजाओं को सहजता से काट दिया। वन में पैदल चलते हुए किस्कंधा पहुंचे, जहां वानर संग्राम रत थे, वहां उन्होंने बाली वानर को युद्ध में परास्त किया तथा हनुमान जैसे संग्राम शूर को अपनी सेवा में लिया। इस प्रकार दशरथ नंदन ने खेल-खेल में ऐसे चरित्र किए–

रावन से रांम रांम से रावन, रावन से श्रीरांम भिड़े।
तोड़िक दस सीस बीस भुज तोड़िक, खुखदिक खुखदिक खूख खड़ै।
कलियर कपि करै कपि कलियर, कपि कलियर हणवंत जिसं।
दां दां गिड़दिक दसरथ नंदन देव, श्रीरामचंद्र नाटक रिसं।।10

‘रामरासो’ जैसी कालजयी रचना के रचयिता कवि माधोदासजी दधवाड़िया के राम भक्ति विषयक फुटकर गीत मिलते हैं। सरल, सहज और सरस शब्दावली में राम का यशोगान पाठक के हृदय को स्पर्श करने वाला है। दस पद्यों में प्रणीत एक गीत में राम का लंका आगमन से विजय उत्सव तक पठनीय वर्णन हुआ है। उदाहरण स्वरूप-

थुहजै विषंधर अहि थकायो, परवतां गरुवत पजायो।
बोल़ि जल़निधि बल़ बंधायो, ऐह छायो ऐह छायो।
विषहरां सुर नर वंदिता, देव उग्रह ग्रहां दीतां।
सांम माधव रांम सीता, जगत जीता जगत जीता।।11

एक दूसरे गीत में कवि राम के लंक आगमन से रामसेतु का निर्माण, ग्रहों की मुक्ति, सुरों को अवसर, सीता की बंधन मुक्ति, और रावण को मृत्यु प्राप्त हुई का वर्णन किया है। माधोदासजी दधवाड़िया के शब्दों में-

हुवो बंधण महण ग्रहां उग्रहां हुवो, समर अवसर हुवो सुरां साथै।
हुवो सीत वल़ण लंक पालड़ हुवो, हुवो रामण मरण राम हाथै।।12

राम भक्ति विषयक रचनाएं लिखने वालों में कानोजी बारठ और कानूजी (कान्होजी) मोतीसर के नाम प्रसिद्ध है। हालांकि दोनों में समय साम्यता नहीं है लेकिन नाम साम्यता के कारण रचनाओं का घालमेल लोगों ने कर दिया है। कानोजी बारठ के गीत टकशाली डिंगल में सम्मिलित किए जाते हैं। सहज शब्दावली में गुंफित गीत जनमानस में प्रिय रहे हैं। वे अपने गीत में लिखते हैं कि जिन्होंने राम को नहीं जान वे झूठे हैं और जिन्होंने जान लिया वे सत्य को पहचान लिया। जिन्होंने इन दो अक्षरों के नाम की महिमा जानली उनके हृदय से दूसरे नाम उतर गए। जो यह सार समझ गए उन्हें किसी दूसरे झंझटों में फंसने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जिन्होंने यह सारगर्भित नाम हृदय में उतार लिया तो मानो अपना जीवन सार्थक कर लिया-

झूठो सो हो बिन राम जाणिये, जाणै राम तिकै जन जाण।
एकण नाम पार उतरणो, पढवो किसूं अढारै पुराण।।
कानियो कहै राम मुख कैहतां, अवर रिदै सूं उतरिया।
आखर उभै लिखै उर अंतर, अहनिस पढै सो उबरिया।।13

कविवर कानूजी मोतीसर माड़वा की राम भक्ति विषयक पंक्तियां तो लोकोक्तियां बन चुकी है। कवि याचनावृति वालों को आगाह करते हुए लिखते हैं कि अगर जांचना ही करनी है तो क्यों किसी सूम का सुयश करें। फिर तो जगदीश को ही जांचना चाहिए। तो इसी प्रकार कवि लिखता है कि मृत्यु को अवश्यंभावी समझकर राम को रटना चाहिए। नीच कर्मों में कतई प्रवृत्त होकर कोड़ी के बदले यह अमूल्य मानव जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए–

जाचै तो जाच जनारन, वेद पुराणां वाचिये।
कानिया जाच किरतार नै, जाचक रो की जाचिये?

कर कर बखाण कथिये क्रपण, विसनदेव न बखाणिये।
जांणिये जनम कासू कियो, ज्यां रांम नांम नह जाणिये।।

आगलो जनम भूले गयो, नीच करमगत नानिया।
राम रो नाम भूलै गयो, कोडी बदल़ै कानिया।।14

कवि की राम के प्रति अथाह आस्था है और अटूट विश्वास है। जब ही तो कवि लिखता है कि क्रोध, काम, लोभ, मोह, आशा, तृष्णा, जैसे भयंकर विषधरों का को कवि ने मात्र इस राम नाम के प्रताप से बस में कर रखा है-

क्रोध भुयंगम काल़, काम सोई विषहर काल़ो।
पीवण सरप सलोभ, मोह धांमण मूंछाल़ो।
आश पदमण नागणी, परड़ तिसणा जुग खाया।
जारिया ऐता अजर, मांहि इजगर इक काया।
गुर सबद मिल़ै सोई गारुड़ी, सही खिलावै सांमठा।
राम भज कानिये राखिया, ऐता विषहर एकठा।।15

कवि अपनी रचना ‘अवतारां री अस्तुति’ में राम अवतार का भावप्रवण वर्णन करते हुए लिखता है कि राम का नाम ही राम नाम के समतुल्य है बाकी नहीं-

जठै नरंद रामचंद, पूर दध्ध पाजऐ।
सचै सुथाप लंक आप, रोल़ रांण राजऐ।
अरी उथाप लंक आप, हाथ पूर हामऐ।
ज. 16

यही कारण है कि विजैरामजी कविया ने बिना राम नाम उच्चरित देह को खेह उड़ाती हुई गधे की योनी माना है–

कवि विजैराम कारण किसै, जो विध वामी किन जुड़ै।
नर देह राम भजिये नहीं, सो देह खर समवड़ै।।17

यही बात बारठ तेजसी टेला मानते हैं। भक्तवर तेजसी लिखते हैं कि भलेही आप का कुल उच्च है, काया निरोगी है और रूपवान हैं, भांति भांति के भोजन आपको उपलब्ध है, शरीर पर चंदन आलेपन किया हुआ है, आपका घर अच्छे स्थान पर हैं परंतु आप राम नाम नहीं लेते हैं तो सब व्यर्थ हैं:-

बडै वंश जनमंत काया निरोगी।
महा रूप राशी नना भातं भोगी।
सतं दास दासी सुभं सेज संगम।
किये चंदनादम अलेपं अनंगम।
नना भांत चत्रीसवा पत्र वाजै।
सदा संसथानम एवासं विराजै।
सुहेम दानं पत्र चत्रम थाहै।
बिनां राम नामम व्रिथा है व्रिथा है।।18

इसी कड़ी में ईसरदासजी दधवाड़िया बल़ूंदा बड़े कवि हुए हैं। चारण भक्त कवियों में इनका नाम भी श्रदास्पद है। वे लिखते हैं कि आवागमन से मुक्ति देने वाला तथा कष्ट हरके संतोष की प्राप्ति के साथ हर इच्छा की पूर्ति करने वाला केवल राम ही है-

सबै लोक लोकेस ओपै सुमेती।
खपै ऊपजै पाप पुन्याद खेती।
हरि कष्ट की साद संतोप हामम।
रमै राम रामेति रामेति रामम।।19

राजस्थानी साहित्य संसार में जगाजी खिड़िया बहुत प्रसिद्ध नाम हैं। उनका नाम वीरता व भक्ति विषयक रचनाएं प्रणीत करने वालों में अग्रगण्य हैं। वे इस बात की पुष्टि करते हुए लिखते हैं कि जिन्होंने राम नाम रूपि रंग लगा लिया अर्थात जो इस रंग से सराबोर हो गया उसे सर्व सुख सहज रूप से प्राप्य है-

सुखपाल़ां ऊपरै, फिरै बैठा नर कंधै।
नार पदमणी साथ, रमै सुख सैजां मध्धै।
चीर हीर चम्मीर, अंग परमल़ उमावो।
रस कपूर तेंबोल़, अनै मन वंछत खावो।
कुंजरां चढै मौजां करै, असि कोतल़ चालै अगा।
भोगवै इसा सुखवर भवण, जकां राम जपियो जगा।।20

कवि खूमाणजी बारठ, रामोजी रतनू आदि कवियों ने रामभजन की महत्ता अपने सारग्राह्य दोहों में सरलतम शब्दावली में कही है-

सीतापत चरणां सदा, खूमाणा मन राख।
जु सुधरै मनखा जनम, सहको बोलै साख।।
राम अमोलख रांमला, कंठ सूं मेले काह।
हर हीरो भजरै हिया, सो तेरा घट माह।।
हर चिंतामण हाथ, हर पारस हर पोरसो।
और न रहसी आथ, रात दिवस जप रांमला।।21

विसरामजी रावल़ ने इसीलिए कहा है कि आलश्य त्यागकर ज्ञान और ध्यान रूपि दो बैल धरके मनेच्छा पूर्ण करने वाली अग्रसर होखर राम नाम रूपि बीज से खेती करनी चाहिए–

सज ध्यान ग्यान दोय बेहल सपेती,
हल़ नागल़ सेती मन हांम।
आल़स मत कर जोड़ अगेती,
रांम नांम खेती विसरांम।।22

कवि आसाजी सांवल फैंदाणी लिखते हैं कि इस नाम की खेती करने वालों को अमर रोटी मिली है। जिन्होंने यह खेती नहीं की वे राम रोटी और दोवटी के लिए घर-घर भटकते फिरते रहे-

जाणै मिनख बियो धन जोड़ां, दिये न पहरण दोटी।
रोटै राब घरोघर रुल़तां, राम न मांडी रोटी।।23

मध्यकालीन भक्त कवियों में जैतरूपजी आशिया सीलवा का नाम भी उल्लेखनीय है। उनका शिव पर लिखा गया त्रिभंगी छंद तथा ‘लीलावतार’ का भुजंगी छंद पठनीय रचनाएं हैं। ‘लीलावतार में जैतरूपजी लिखते हैं-

श्री रघुवर सिमरिये, करुणाकर किरपाल़।
जाहि भजन ते मिटत जग,
जनम मरण की जाल़।।

भजै रामचंदं सदानंद भाजं।
निराधार आधार दीनं निवाजं।
कृपा सिंधु सिल्ला तार मुक्तकारी।
हितू संत संसार व्है जोगहारी।।24

चैनजी सांदू भदोरा डिंगल के दिग्गज कवि हुए हैं। उन्होंने अपने पचास पद्यों के एक सपखरा गीत में पूरी रामायण गुंफित करदी। कवि लिखता है कि रामचंद्र का चरित्र इतना अथाह कि मैं एक जीव्हा वाला क्या? अपितु सहस्त्र जीव्हा वाला शेषनाग भी पूर्ण रूप से गा नहीं सकता!-

ध्यान मुदै माहेस वाल़ा मनां धावै,
आंन रिखां व्रंद वाल़ा आवै चीत धार।
ग्यांन मुखां हजार फुणिंद वाल़ा सदा गावै,
पावै कोण श्री रांमचंद्र वाला पार।।25

मध्यकालीन राजस्थानी काव्य में राम की उदारता और वीरता का चित्ताकर्षक वर्णन हुआ है। राजस्थानी कवियों का मन जितना शौर्य निरूपण में रमा है उतना अन्य वर्णन में नहीं। राम का लंका प्रयाण और वहां हुए भयंकर युद्ध में राम के तीखे तीरों से ढ़हते लंका के कंगुरों तथा लंका के वीरों में समाए डर का हृदयग्राही वर्णन करते हुए कवि नाथाजी बारठ लोल़ास अपने एक त्रिकुटबंध गीत में लिखते हैं-

करि सेन प्रारंभ कोपियो, इण भांत राघव ओपियो।
दयवांण रावण करण दमँगल़, जोरवर जमरांण।
सझि सीत कजि कर साखती, पुणि हणुं लखमण ओपती
हुय कल़ल़ हुंकल़ चाल हल़वल़।
सबल़ जल़ वंधि भल़ल़ साबल़।
करण छल़छल़ कुंभ अणँकल़।
मंगल़ झल़ जिम जोध महाबल़।
सुजि कमल़ लसि अत सेस सल़सल़।
वहि आवध चहुंबल़ तँडल़ वल़वल़।
गूंद पड़दल़ गीध गल़गल़।
पड़ै खल़ पीठांण।।26

इसी क्रम में लिखते हुए जयमलजी बारठ भाद्रेस राम की वीरता मंदोदरी के मुख से कहलाते हुए लिखते हैं कि ‘हे कुंभकर्ण के भ्राता! तूं सदैव राम को इंगित करके उपहास करता रहता था। आज उधर देख तेरी लंका में उन्होंने तंबू तान दिए हैं-

लंका लीजसी जल़ सागर लोपै,
हरि लग करतो हासा।
भाल़ै कुंभकरण रा भाई,
तंबू तणा तमासा।।27

एक दूसरे गीत में जयमलजी लिखते हैं कि “हे रावण!उठ तेरी धरा पर राम के कपि वीर तेरे प्राणों के पिपासु होकर अट्टहास कर रहें हैं। तरवारों से के तीक्ष्ण प्रहारों से लंका के कंगुरे धरासायी हो रहे हैं-

हड़हड़ै वीर रथ अड़ै भड़ आहुड़ै,
पड़ै गढ कपि चड़ै आप प्राणा।
खग झड़ै खड़खड़ै कांगुरा खड़हड़ै,
रामचंद्र आवियो ऊठ राणा।।28

राम की उदारता और दातारगी विषयक वर्णन किन्हीं चारण कवियों ने शानदार किया है। कवि लिखते हैं कि जो वस्तु पास हों तो भी देना संभव नहीं बनता लेकिन राम की यह विशेषता है कि जो लंका उनके पास में थी नहीं, जिसकी आने की संभावनाएं भी दूर की कोड़ी थी लेकिन उदार राम ने वो लंका विभीषण जैसे रंक को दान करदी। क्योंकि विधाता के लिखे अंकों को मिटाने की शक्ति केवल राम में ही थी-

आडा वल़िया अंक, राघव रजपूती तणा।
लीधां पैली लंक, तैं दीधी दसरथ तणा।।
रामचंद दसरत्थ रो, लहरी व्रवण लंक।
कदै इक मेटै केसवो, अपरबल़ रा अंक।।
गिरां पखाल़ण वन चरण, नदी हिलोल़ण नीर।
सूखा सरवर कुण भरै, आप बिनां रघुवीर।।29

डिंगल़ गीतों के प्रावीण्य प्राप्त कवि केसरोजी खिड़िया कांवल़िया मनुष्य को अनीति त्याज्य कर नीति पथ का वरण करने का सुभग संदेश देते हुए अपने एक गीत में केवल राम नाम स्मरण के संबंध में लिखते हैं-

पकड़ नीत अनीत परहर, ऐह गीत उच्चार।
रीत विरियां चीत राघव, सीतवर संभार।।
रहत निसदिन रटत रसना, जपत आठूं जांम।
रांम नांम कटत निज क्रम, समर सीतारांम।।30

इनके परवर्ती कवि फतैदानजी वणसूर पाडलाऊ अपने समय के श्रेण्य कवि थे। उनके गीतों की भाषा प्रांजल व परिमार्जित है। भगवान राम की श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए कवि लिखता है कि जिस प्रकार समस्त ग्रहों में सूर्य, पापों को जलानें में गंगाजी, तारों में चंद्रमा, अठारह भार वनस्पतियों में कल्पववृक्ष, तथा सभी योगियों में गंगाजी के जल प्रवाह को अपनी जटाओं में अवरुद्ध करनें वाले भगवान शिव श्रेष्ठ हैं उसी प्रकार धनुषधारीयों में श्रीराम श्रेष्ठ हैं–

सारां ग्रहां चारां भांण पाप जारां में जान्हवी सिधां,
तारां सिधां इंदु भार अठारां तरिंद,
सारां ताल़ सिधां अंबधारां मेखी रोध सिधां,
चापधारां अवतारां सिधां रामचंद।।31

पनारामजी मोतीसर अपने समय के उच्चकोटि के कवि थे। उन्होंने डिंगल और पिंगल में समान गति से लिखा। दुर्भाग्य से उनकी नाममात्र रचनाएं उपलब्ध होती। वे प्रभु राम की वंदना करते हुए अपनी रचना ‘चौबीस अवतारां रो गीत’ में रावण के कंध भांगकर जिन्होंने सर्वत्र कीर्ति योग्य काम किया-

अजोध्यानाथ भाराथ जीपण अरी।
करां दस-कंठ नै काट अचड़ां करी।
सती घर आंण गिरवाण कारज सरी।
हंस द्विस संस ब्रख गज कीनो हरी।।32

इसी कालखंड में भक्तकवि हमीरसिंहजी चूंडावत का नाम उल्लेखनीय हैं। उनके गीतों में राम भजन पर जोर दिया गया है। इनके भक्तिभावना से परिपूर्ण कई गीत उपलब्ध है। कवि लिखता है कि ‘ हे हमीर! राम का नाम अपने रोम रोम में रमाले। जिन्होंने शेष के सिर पर धरा स्थिर कर रखी है। उस हरि का नाम स्मरण कर-

रोम रोम थिरू सेस रे सीस धर अवन थंमेरिया।
धमण उस्सास घट सास धमेरिया।
रोम रोमां महे रा़म रमेरिया।
हरि भज हरि भज हमे हमेरिया।।33

परवर्ती कवियों में रणछोड़दानजी रतनू का नाम उल्लेखनीय है। इनकी रचना ‘धनुष भंग रो छंद’ भाव तथा भाषा की दृष्टि से श्रेष्ठ रचना है।

कवि लिखता है कि ऋषियों, मुनियों, देवताओं, राजकुमारों से भरे जनक दरबार में रघुवीर ने जिस गंभीरता का परिचय देकर शिव धनुष भंजन व सिया का मन रंजन किया वो स्तुत्य है–

सुर नर फुनि समर शँकर गरवर तर, तेड़ सवर वर सगर तठै।
अवसर धर सधर अछर मिल़ि उण पर, अवर सवर कुल़ निअर अठै।
भर-भर अति हरख कुंवर कज भूपत, चमरबंध चक्रवंत चड़ै।
धाये पुर जनक धनक धरवा कज, अमर अवर श्रीवर ज अड़ै।।34

इसी कड़ी में जंवारदानजी रतनू थूंसड़ा भी उल्लेख्य कवियों में हैं। अपनी रचना ‘करुणाष्टाक’ में पतित उद्धारक व दुष्ट संहारक राम के औदार्य का वर्णन करते हुए कवि लिखता है-

भक्त विभीखण को जब दे दियो रावण देश निकारण।
आय गयो सरणै रघुवीर के, धीर बंधाय कियो छत्र धारण।
दीन सखा सुग्रीव महालख, बेग गए तुम बालि संघारण।
आज जंवार की वेर इति, करुणानिध देर करी कँई कारण?35

भक्त कवियों में ईसरदासजी बोगसा सरवड़ी का नाम भी समादरणीय है। इन्होंने भक्तमाल के भाव से 28छप्पय लिखे। जो उनकी प्रसिद्ध रचना है। ईसरदासजी नाम साम्यता के कारण लोगों ने इनकी रचना को ईसरदासजी बारठ के नाम से भूलवश छाप भी दिया।

इस संबंध में डॉ. शक्तिदानजी कविया लिखते हैं- “निस्सन्देह ईसरदास कृत ये भक्तिपरक सवैया छंद गांव सरवड़ी (मारवाड़) निवासी बीसवीं सदी के कवि ईसरदासजी बोगसा की ही रचना है ”

ईसरदासजी के इन्हीं सवैयों में से उदाहरण स्वरूप-

जात करात अनात अली, सबरी दिन रात हरी गुन गायो।
धेस वसे सर खेस करे जल़, घाट पयाल़ ने नेस छोडायो।
ता सबरी घर आय हरी तँह, सेद प्रसार प्रसन्न व्है पायो।
ईसरदास की बेर दयानिध, नींद लगी कन आल़स आयो।।36

राम नाम की महिमा अनिर्वचनीय, अद्वितीय तथा अपरंपार है। अतः विस्तार भय से ज्यादा नहीं लिखकर केवल उल्लेखनीय रचनाकारों के नामोल्लेख करना ही समीचीन रहेगा। ताकि इस विषय पर शोध करने वालों का कुछ पथ प्रशस्त हो सके।
हमीरजी रतनू (घड़ोई), भीखजी रतनू, (बिणलिया) बगसीरामजी रतनू, (चौपासणी) रुघजी रतनू (दासोड़ी) जादूरामजी आढा (पांचेटिया), रूपजी बारठ, उदैरामजी बारठ (गूंगा), कलजी, हीरजी सांदू (मिरगेसर), (राघोदासजी मिरगेसर),
आदि की रचनाओं में राम का भक्त वात्सल्य, दयालुता, उदारता, महानता, आदि का वर्णन हैं।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

संदर्भ-
1-राजस्थानी साहित्य संपदा-ले सौभाग्य सिंह शेखावत
2-हरिरस-सं. मानदान नगरी
5-अलूनाथ कविया-फतेहसिंह मानव
6-राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव-ले. डॉ. शक्तिदान कविया
11, 13, 19-अभिलेखागार-जो. अपु. अभि. 34/8 बीकानेर-,
27-चारण साहित्य का इतिहास भाग1डॉ. मोहनलाल जिज्ञासु
28-प्राचीन गीत संग्रह भाग-12
29-राजस्थानी दूहा संग्रह-सं. डॉ. शक्तिदान कविया
3, 4, , 7, 8, 9, 10, 12, 14, 15, 16, 17, 18, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 30, 31, 32, 33, 34, 35-लेखक का निजी संग्रह
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान, दासोड़ी, तह. कोलायत, बीकानेर।

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