महा पदारथ लाधो संतो! – गज़ल

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महा पदारथ लाधो संतो!
अलख-ब्रह्म आराधो संतो!
मूरख पढ पढ बणिया ग्यानी,
दो आखर इक आधो संतो!
भाव-नगर, री पोल़ पूगिया,
क्यूं नीं तोरण-वांदो संतो?
सबद भाव हांडी धर चूल्है,
मन तांदल़जो रांधो संतो!
सबद-अमर इण जग सोनलिया,
यावत् सूरज चांदो संतो!
सूर चंद री जोत जगमगे,
तौ पण औ जग आंधो संतो!
अलख धणी हिव बसे तोय क्यूं,
पूजो माटी माधो संतो!
गज़ल कथी है “नपे” फूटरी,
कहिजो ! “साधो !साधो!” संतो!

~~©नरपत “वैतालिक”

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