मजूरण

मजूरण रै उणियारै में
प्रतख दीखतो
उण विधाता रो रूप
जिकै इण जग नैं रचियो
पण
अरपण कीधो बीजां नैं।
अरे! इणी विध
इण भुजां रै आपाण
कई घड़िया
सतखंडिया
आभै सूं अड़िया
बे महल
जिणां रै सिरजण में
समरपण कीधो
इण जीवण
आपरो जोबन सारो
विसरी ममता मिसरी सी
छिटकाया हांचल़ रा फूल
उजाड़्यो घर
बिगाड़्यो कारज
फगत इणां री नीव
सीसै री करण नैं!
पण !
ऐ सदियां सूं नुगरा
साथी स्वारथ रा
कद पाल़ै हा
प्रीत पूरबल़ी
जद आ
सांझ सवार रै जांदां सूं आंती
मार्योड़ी मांदगी रै हाथां
लड़खड़ाती बूढापै री फेट सूं
भूख सूं बाथेड़ा करती
डाण भरती
आई भमती
इणां रै बारणै
तो फगत
इणां रो इण खातर
एक ई संदेशो हो
ओ घर छोड
बडै घर जा!

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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