मालणदे महिमा

थल़वट री लोकदेवी मालणजी अर प्रणवीर पाबूजी रै ज्यूं ईज तीसरै फैरै गायां री रक्षार्थ चंवरी त्याग रणांगण बैवण वाल़ै महावीर टीकमजी कविया रो सुजस आपरी निजर:-
।।दूहा – सोरठा।।
आलावत दूलो अखां, पखां उजाल़ण पात।
भांडू पावन भोमपर, मालण जनमी मात।।1

धणियांणी जिण धोरियां, रमणी मालण रीझ।
उजवाल़ी धर आलरी, परचां हुई पतीज।।2

समरावत कवियो सधर, टीकम राखण टेक।
जोड़ी मालण जोड़री, दूल पितु वर देख।।3

बाई रो जद ब्यांव, दूलै रचियो हरस दिल।
आलै घरै उछाव, भाल़ो भांडू भोमपर।।4

अंतस अथग उमाव, दूलाई वरवा दुरस,
चित हित टीकम चाव, चारण बैठो चंवरियां।।5

उण वेल़ा आईह, खबर अचाणक खास आ।
उरड़ै अनियाईह, गायां हरली गांमरी।।6

जदै खोल गंठजोड़, उठियो टीकम अनड़ इम।
रीत रची राठौड़, पाल़ी टीकम पाल़ जिम।।7

टीकम टणकाईह, खागां खणकाई कटक।
भल भल रे भाईह! कवी वडाई यूं करै।।8

पाबू सम पेखोह, लेखो लो इण लीकपर,
अनड़ वरण एकोह, देखो टीकम नै दुरस।।9

भड़ गोधन री भीर, चढ्यो सधीरं चायनै।
बंकै टीकम वीर, नीर चढायो निडरपण।।10

रण भिड़ कमधज राण, कण कण हो कटियो कँवर।
ईहग जदै आपाण, समर बतायो समरसुत।।11

पहर गल़ै प्रतमाल़, पंगी ली प्रथमाद पर।
ईहग वरण उजाल़, वरी अमर कथ वीरगत।।12

मालणदे महमाय, पेख विराजी पी’र में।
चार साल लग चाय, जपियो हर हर जोगणी।।13

भूंडो भोजाईह, कुवचनां बोली कुटल़।
उण वरियां आईह, बही बिराई बीसहथ।।14

मालणदे माताह, सँत माता कर सेवियां।
टाल़ै दिन ताताह, वडदाता तूं बीसहथ।।15

मालण महमाईह, वसै बिराई बीसहथ।
सेव्यां सरणाईह, आई बिखमी में अवस।।16

निरमल़ कीधो नीर, समंद खीर सो सांपरत।
सुरराई निज सीर, मात धीर दे मालणा।।17

।।गीत – चित इलोल़।।

इल़ा भांडू करी ऊजल़,
आल रै घर आय।
देह धर हिंगल़ाज दुनियण,
मालणा महमाय।
तो भलभायजी भलभाय, भांडू भोम धिन मन भाय।।18

रमी धोरां रीझ रांमत,
बीसहथ बण बाल़।
दूल पितु नै मोद दीनो,
रोहड़ां रिछपाल़।
तो रिछपालजी रिछपाल़, रैणी रेणवां रिछपाल़।।19

कटु नींबड़ा पलटाय करिया,
अमीरस सा अंब।
साथण्यां फल़ सरस दीधा,
जाणनै जगतंब।
तो जगतंबजी जगतंब, जाणी तात मन जगतंब।।20

दूल कवियण अरज दाखी,
कियो उत्तम काज।
अंब वाल़ी अवन अमरै,
रहण दे नीं राज।
तो कर काजजी कर काज, कहियो तात रो काज।।21

करी क्रा़मत मात कर निज,
भाल़ पितु रो भाव।
आंबड़ा पुनि नींब अवनी,
पलक में पलटाव।
तो पलटावजी पलटाव, पुनि कर विरछड़ा पलटाव।।22

कवियाण टीकम जात कवियो,
सधर भड़ सरणाम।
देखियो वर दूल तनुजा,
बिराई वरियाम।
तो वरियामजी वरियाम, वर निज लाडली वरियाम।।23

गीत मंगल़ धमल़ गाया,
चंवरियां में चाव।
रीझ सूं कवि दूल रचियो,
जोर रो जिगनाव।
तो वरतावजी वरताव, वासव जोड़ रो वरताव।।24

तोल़ैसर री गाय टोरी,
धेख मुसल़ां धार।
जिगन में इम विघन जुड़ियो,
सांभलै समचार।
तो तद त्यारजी तद त्यार, टीकम समर में तद त्यार।।25

पाल जिम पमंगाण पीठां,
अनड़ चढियो आय।
घाय अरियण वीर घेरी,
गाढ सूं पुनी गाय।
तो कविरायजी कविराय, कटकां कोपियो कविराय।।26

कमध राणो काम आयो,
सांभल़ी सुभियाण।
प्रतमाल़ कर गलमाल़ पैरी,
जोग टीकम जाण।
तो जगजाणजी जगजाण, जाझी कीरति जग जाण।।27

चार वरसां रही चंडी,
पीहर री प्रतपाल़।
भूंड भाभज भणी तिणदिन,
कोपगी किरपाल़।
तो क्रोधाल़जी क्रोधाल़, कोपी मालणा क्रोधाल़।।28

भोम भांडू तजी भाल़ो,
जोगणी चखझाल़।
जोड़ बैली बुई जोगण,
सासरै सचियाल़।
तो.सचियाल़जी सचियाल़, सतवट पाल़णी सचियाल़।।29

झल़हल़ां अग्नि ऊपनी जल़,
देख लीनो दाग।
करी पावन भोम कवियां,
ईसरी अनुराग।
तो अनुरागजी अनुराग, आयल आपरां अनुराग।।30

आपरै परताप आयल,
दिपै कविया देस।
विघन सकट नहीं व्यापै,
निपट कुशल़ै नेस।
तो आदेशजी आदेश, आई मालणा आदेश।।31

दासुड़ी जँगल़ रहुं देवी,
आय कर अणभीत।
राजरी धणियाप रचियो,
गीधिये कवि गीत।
तो शुभचींतजी शुभचींत, सामण आप हो शुभचींत।।32

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *