मंदोदरी-सूर्पणखा संवाद – बांकजी बीठू

भावज मंदोदरी अर नणदल सूर्पणखा संवाद घणो सतोलो अर हास्य रूपाऴो बणियोङो है। बांकजी बीठू बासणी भोपाऴगढ रा निवासी हा अर प्रज्ञाचक्षु हा, रामचंन्द्रजी सेना सझाय लंका पर चढिया जिण समै नणद-भोजाई इणगत औ संवाद करियो जिणमें असत पर सत री जीत रो भी कूंतो है।।।

मंदोदरी उवाचः……
ज्वाऴा लगाई कपेश लंक मंदोदरी बोली जठै,
लंका तणो कोट भाई-बैन लेख।
कठै सिया हेर आई नाक कांन लेर आई,
वऴै साई देर आई लंका री विसेख।।1।।

सूर्पणखा उवाचः…….
भोजाई विचार बोल म्हनै ई कहै छै भूंडी,
जांणै नहीं बात उंडी म्हांरै सांमी जोय।
डुलंती द्वै वाट वीच प्रिथी में फूटगी डूंडी,
सांमियां री मूंडी जिका नाक काटै सोय।।2।।

नाक म्हांरो काटियो छै अज्या रौ बाकरौ नांय,
सील म्हांरौ राखणौ गमायौ किसै साब।
मांण नहीं मेलसुं हूं आकरौ सभाव म्हांरौ,
जोगीङा नै पूछ लेसूं नाक रौ जबाब।।3।।

मंदोदरी उवाचः…….
जोगीङा हेकूको नांक मांगसौ कठा सूं जादा,
सांमठा छै नांक थारै वीर रै कु सांग।
बैण तो उछांचऴी में कुमी नांई कांई बोध,
मेक नाक कांचऴी में उरौ लौ नीं मांग।।4।।

सूर्पणखा उवाचः……….
बोली रै ऐ बोलवंती बोलती हंसावै लोग,
पाल थारै पीव नै पराई नार पीक।
बीर तो म्हांरो भी लागै छै भाई बडोङको,
ठाह पङसी जगत नै अबै ठीक।।5।।

मंदोदरी उवाचः……….
छंदौ हमै राखौ मती गरज तौ थांरै ई छती,
तपस्या रा थोरा किया धरे रूप तीख।
गई छी कुदङका काढती गैलसप्पी,
लैयर आई मुरजाद नै लोपती लीक।।6।।

सूर्पणखा उवाचः………
तपस्या रा थोरा किया किसी रांड कयौ तनै,
चोटी झाल तांण नै ले जासूं उठै चाल।
तीनूं ही सुभ्रात म्हांरा नैणां नहीं देखूं त्यानै,
हरी ब्रह्म कीज्यो ज्यांमें मोकऴा हवाल।।7।।

मंदोदरी उवाचः………
नैणां सहीं देखस्यो अठारै पदम आई नैङी,
लाखां हाल हुवा तौई थारै नहीं लाज।
बेटै म्हांरै मेघनाद आवगी संभाई बाजी,
आसुरां सारां में होती थारै जैङी आज।।8।।

इण तरियां कवि बांकजी बीठू ओ काव्य सृजन करियो जिको आपरै निजरां अर्पण है।।

प्रेषित: राजेंन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर (राज.)

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