मारवाड़ के चारण कवियों की मुखरता

राजस्थानी भाषा के साहित्य का हम अध्ययन करते हैं तो हमारे सामने लोक-साहित्य, संत-साहित्य, जैन-साहित्य एवं चारण-साहित्य का नाम उभरकर आता है। इस चतुष्टय का नाम ही राजस्थानी साहित्य है। इस साहित्य के सृजन, अभिवर्धन एवं संरक्षण में चारणों का अद्वितीय अवदान रहा है। इस बात की स्वीकारोक्ति कमोबेश उन सभी विद्वानों ने की हैं जिन्होंने राजस्थानी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन पर काम किया या कर रहे हैं।

हम राजस्थानी चारण साहित्य का अनुशीलन करते हैं तो एक बात हमारे मानसपटल पर स्पष्ट हो जाती है कि चारण कवियों को साहित्य सृजन की भावभूमि जितनी मारवाड़ में उपलब्ध हुई है, उतनी अन्यत्र नहीं।

मारवाड़ के शासकों यथा पंवारों, पड़िहारों ने भी चारण कवियों को पूरा सम्मान तथा संरक्षण दिया लेकिन यहां के राठौड़ शासकों ने तो चारण कवियों को साहित्यिक मेधा परिष्कृत करने एवं अपनी सृजनात्मकता को उंचाइयां देने के सहज साधन उपलब्ध करवाएं। इसीलिए तो कहा गया है-

ए न एकेला रीझणा, ऐ रीझै दुइ जोड़।
त्यां पर रीझै सरसती, ज्यां रीझै राठौड़।।

मारवाड़ के प्रतापी शासक राव चूंडाजी ने तो अपना कष्टसाध्य बचपन आलाजी बारठ(कल़ाऊ)के घर पर ही व्यतीत किया था। जिसके संबंध में आलाजी भाणोत के दोहे प्रसिद्ध है-

चूंडा न आवै चीत, काचर कल़ाऊ तणा।
आछो भयो अभीत, मंडोवर रै माल़ियां।।
रह सकै तो रेह, थिर हेतो सबल़ो थयो।
घर बसियो घण नेह, चीत न बसियो चूंड रा।।

राव चूंडाजी के अदम्य साहस व अतुल्य पराक्रम को इंगित करते हुए गीत समकालीन कवियों के उपलब्ध होते हैं। मुस्लिम आक्रांताओं को पराजीत कर अपनी सुयश पताका फहराने वाले चूंडाजी के चारू चरित्र को रेखांकित करते हुए दूदाजी बारठ कहते हैं-

असुरां सूं किया कमंध असंकत,
प्रगट प्रवाड़ा इसी परि।
गढ गढपत चांडै रायांगुर,
मारे लियास दीध मरि।।

महावीर चूंडाजी के बाद राव रणमलजी साहसी एवं दुर्धर्ष वीर हुए। जिन्होंने मेवाड़ राज्य की संक्रमणकाल में सहायता कर वहां के विद्रोहियों का दमन किया था। दुर्योग से वे वहां सिसोदियों की घात के शिकार हो गए थे। तत्कालीन राणा कुंभा ने मुनादी करवा दी थी कि रणमल का कोई दाहसंस्कार नहीं करेगा। उस समय मारवाड़ के ही चारण चानणजी खिड़िया, जिन्हें मेवाड़ शासकों ने जागीर दे रखी थी को त्यागकर अपनी स्वामीभक्ति का परिचय देते हुए रावजी का दाहसंस्कार किया था। दुर्योग से उस समय रणमलजी के पार्थिव शरीर के पास उनका कोई आत्मीयजन उपस्थित नहीं था, केवल चानणजी को छोड़कर। चानणजी के इस वरेण्य कार्य के कारण ही उन्हें रणमलजी के मानसपुत्र की संज्ञा से अभिहित किया जाता है-

सुत बंधव चाकर सगा, सब भग्गा सथ छोड़।
चित्ता रिड़मल री चिणी, चानण गढ चीतौड़।।
चौबीसूं रिड़माल रा, धर लाटण अवधूत।
कीरत पुत्र पचीसमो, है तूं चंद सपूत।।

राव रणमल के समकालीनों में चानणजी खिड़िया, पसायतजी गाडण, हरसूरजी बारठ, महपाजी बारठ, लूणपालजी बीठू प्रभृति कवियों के नाम महनीय हैं। इन सभी की रचनाएं प्राप्य है।

रणमलजी के उत्तराधिकारी राव जोधाजी दूरदृष्टा, साहसी व पराक्रमी थे। जिन्होंने राणा कुंभा के सैन्यबलों को मंडोवर से भागने हेतु विवश कर दिया था। जब जोधाजी ने मंडोवर पर आक्रमण किया उस समय उनके पास प्रयाप्त सैन्यबल नहीं था फिर भी अपने साहस से राणा कुंभा को मंडोवर छोड़ने पर विवश कर दिया था। इस संबंध में भरमसूरजी रतनू लिखते हैं कि कुंभा के गजारोही सैनिक जोधा के गाडो पर आए सैनिकों के सामने टिक नहीं सके-

धूहड़ियै छाया खेहां धर,
खेड़ैचै दल़ खेड़विया।
नर हैमर नागद्रहा नरे,
गैमर गाडा देख गया।।

उस समय मंडोवर की पोल को पटकने हेतु अपना शरीर समर्पित करने वालेआलाजी के पुत्र दूदाजी बारठ का नाम सदैव अमर रहेगा। जिन्होंने देशभक्ति व स्वामीभक्ति के सुभग सुमेल का परिचय दिया था-

मारे सुत मेवाड़, वैर धणी रो वाल़ियो।
काठां तणा किमाड़, आंवल़िया थें आलवत।।

राव जोधाजी ने कवियों को पूरा प्रोत्साहन व सम्मान दिया था। उनके समकालीन प्रमुख कवियों में चानणजी खिड़िया, भरमसूरजी रतनू, चौमुखजी सिंढायच, पूनरावजी आशिया, अमराजी बारठ, थिराजी बारठ, सूरजी बारठ गिनाए जा सकते हैं। जिन्होंने अपने साहित्यिक आभामंडल से तत्कालीन राज व समाज को प्रभावित किया था।

अमराजी बारठ तो राव जोधाजी के विश्वसनीय सलाहकारों में से एक थे। यही कारण था कि महराणगढ़ (मयुरध्वज)किले की नींव करनजी के हाथों से दिलाने हेतु जोधाजी ने अमराजी को ही देशनोक भेजा था। खेतसी बारठ के शब्दों में-

विमल़देह धारियां सगत जंगल़धर विराजै,
थान देसाण श्रीहथां थाया।
उठै कवि भेजिया राव करबां अरज,
जोधपुर पधारो जोगमाया।।
—-
अचल़ मेहासधू हुकम तद आपियो,
जदि गढ थापियो राव जोधै।।

बाद के शासकों ने भी साहित्यिक जोत को जाग्रत रखने मे अपना यथाशक्ति योगदान अर्पित किया था।

राव गांगाजी ने काव्य सलिला को प्रवहमान रखने में अपने औदार्य का परिचय देकर कवियों को अपनी प्रतिभा निखारने का पूरा अवसर प्रदान किया था। उनकी उदारता व काव्य के प्रति अनन्य प्रेम के भावों को उद्घाटित करता हुआ झूठाजी आशिया का एक गीत तो इतना प्रसिद्ध है कि आज भूल से लोग गांगाजी रचित ही समझते हैं। जबकि उसमें गीत-नायक के भावों को कवि ने अपने शब्दों में पिरोया है। कवि ने कहा कि दातार गांगा कह रहा है कि ये जो श्वेत कली से रंगी हुई प्राचीरें समय के साथ काली पड़ जाएगी। इनके शिखर पर सुशोभित कलश जर्जर हो जाएगा। ये जो मंडप है वो गजों के धक्कों से एक तरफ झुक जाएंगे उसके के कारण कालांतर में ये भीतें धूलधूसरित हो जाएगी लेकिन गीतों में गुंफित अक्षर सदैव अमर रहेंगे-

कल़ी सेत व्रन पाल़टे पड़ै जोखिम कल़स,
खसै खुंभी हुवै मडंप खांगो।
भींतड़ा ढहि जाइ धरती भिल़ै,
गीतड़ा नह जाइ कहै गांगो।।
महल चौबार अदवां तणा माल़िया,
दिनै वोल़ीजतै जुरा दहसी।
मंडल़ धू सथिर अहराव सिर मेदनी,
राव गांगो कहै त्यां गीत रहसी।।

इस गीत में नायक के काव्यप्रेम को कवि ने पिरोया है। जिसे बिना समझे कुछ लोग भूलवश गांगाजी रचित ही मानते है। हालांकि कुछ प्रतियों में यह गीत तेजसी बारठ रचित भी बताया गया है जिन्हें गांगाजी ने आंगदोस गांव इनायत किया था।
राव मालदेवजी जोधपुर के पराक्रमी शासक हुए। उन्होंने जोधपुर की सीमाओं को जितना विस्तीर्ण किया उतना अन्य राजाओं ने नहीं किया। मालदेवजी की विस्तारवादी नीति के शिकार अन्य शासक/ठाकुरों के साथ-साथ उनके अपने कौटुम्बिक सदस्य भी हुए। जिनमें बीकानेर व मेड़ता प्रमुख थे। उनकी कौटुम्बिक सदस्यों की दमननीति को तत्कालीन कवियों ने उचित नहीं माना। उन्होंने उचित संदेश अपनी कविताओं के माध्यम से दिया।

ऐसा स्पष्ट संदेश देने वालों में मेहाजी वीठू बड़े कवियों में शुमार किए जाते हैं। जब मालदेवजी ने अपने सेनानायक जैताजी को मेड़ता राव वीरमदेवजी के दमन हेतु जाने का आदेश दिया तब मेहाजी वीठू ने जैताजी की मनोदशा से मालदेवजी को परिचित करवाते हुए पारिवारिक एकता व सौहार्द्र बनाएं रखने का संदेश दिया था। जिसे मालदेवजी जैसे अभिमानी शासक ने अनसुना किया–

जैतो कहै दहूं कर जोड़ै,
खत्री नै मोटी आ खोड़।
भला कहै न तोड़ियां भायां,
तुरकाणो को तो दूं तोड़।।

जिसका खामियाजा उन्हें गिररी-सुमेल के युद्ध में चुकाना पड़ा। जहां स्वयं युद्धभूमि से पलायन कर गए और कूंपाजी, जैताजी, अखैराजजी, खींवकरणजी जैसे दुर्धर्ष वीर उनकी ओर से वीरगति को प्राप्त हुए थे। उस समय वे आत्मग्लानि से भरकर
भलेही युद्धभूमि में निमग्न नहीं रहे हों फिर भी उन्होंने कवियों को पूरा प्रश्रय दिया था।

यों तो उस समय के कवियों की एक लंबी श्रृंखला है लेकिन जनमानस को अपनी प्रज्ञा व प्रतिभा से प्रभावित करने वालों में मेहाजी वीठू, आसाजी बारठ, झूठाजी आशिया, तेजोजी बारठ आदि प्रमुख थे। जिन्होंने शौर्य, औदार्य, स्वाभिमान, साहस व स्वामीभक्ति को अपना वर्ण्य विषय बनाकर काव्य सलिला को सतत रूप से प्रवहमान रखा।

कवि आशाजी ने सुभग संदेश दिया कि शासक हो भलेही शासित, उनमें लोकलाज का होना अत्यावश्यक है। जो लोकधर्म का निर्वाह करेगा वो हीन कार्य की तरफ उन्मुख नहीं होगा। वे मालदेवजी की राणी ‘ऊमादे भटियाणी रा कवत्त’ में लोकनायकों के समतुल्य मानते हुए रूठी राणी के आंखों के पाणी का समुज्ज्वल उल्लेख करते हुए लिखते हैं–

जेण लाज हमीर, मुवो जूझै रणथिंभर।
जेण लाज पातल, मूवो पाबागढ अंतर।
जेण लाज चूंडरज, मुवो नागौर तणै सिर।
कान्हड़दे जाल़ोर, अनै दूदो जैसल़गिर।।

राव चंद्रसेनजी का समय संक्रमणकाल रहा। वे स्वाभिमानी और स्वातंत्र्य प्रेमी थे। एक मायने में कहा जाए तो मदांध मुगलों की विस्तारवादी नीति की राजस्थान में प्रथम खटकण वे ही थे। उनके चारू चरित्र का शब्द चित्रांकन दुरसाजी आढा के शब्दों में-

अणदगिया तुरी ऊजल़ा असमर,
चाकर रहण न डिगियो चीत।
सारै हिंदसथान तणै सिर,
पातल नै चंद्रसेन पवीत।।

जिन्हें दिग्गज कवियों ने पूरे हिंदू शासकों में पवित्र माना उनके अदम्य साहस को उकेरते हुए मालाजी सांदू लिखते हैं-

कड़ा नीवड़ा लोहड़ा ऊजल़ा कोरड़ा,
बाथ फेरे घड़ा चंद वारै।
रीठ पड़तां बिचै ऊधड़ा रौदड़ा,
माल रा वंकड़ा तुंही मारै।।

जिंदा जमीर चंद्रसेनजी जब वीरगति को प्राप्त हुए तब अकबर ने चैन की श्वास ली। अखाजी बारठ लिखते हैं–

जरद जे मरद ऊपरा जड़ती,
जुड़ै न इसड़ी भांत जुई।
सुवर मुवो मालदे समोभ्रम,
अकबर फौज नचीत हुई।।

मालाजी सांदू उस समय के बड़े कवियों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने तत्कालीन सांस्कृतिक व जातीय गौरव को गुंफित करते हुए अपने समकालीन वीर पुरुषों के पौरुषेय को अपने गीतों में संरक्षित कर अक्षित किया है। उन्होंने जोधपुर राजपरिवार की उल्लेख्य उपलब्धियों को गीतबध किया है लेकिन जो अभिभूत करने वाली भावाभिव्यक्ति कल्ला रायमलोत, महाराणा प्रताप, ईसर मेड़तिया, महेश सांखला, जोगीदास भाटी, कल्याणदास वैरीसिंघोत आदि के गीतों में देखने को मिलती है वो अन्य गीतों में नहीं। इन गीतों में कवि का मानवीय पक्ष संवेदनाओं के साथ उद्घाटित होता है। धरा, धर्म और स्त्री सम्मान की त्रिवेणी के लिए मुगलों से लोहा लेकर सिवाणा के सुयश सौरभ को दिग्दिगंत में वीस्तीर्ण कर स्वार्गारोहण करने वाले वीर कल्ला की कमनीय कीर्ति उकरते हुए मालाजी स्पष्ट लिखते हैं कि-

हे कल्ला तूं अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ अन्य राजाओं की तरह न तो इधर-उधर भटका और नहीं जीतेजी दुर्ग अरियों के हाथों में जाने दिया। तूने तो मर्यादा की रक्षार्थ युद्धघोष किया। हे वीर! तुमने रामायण किया अर्थात मर्यादा की रक्षार्थ युद्ध किया-
रड़वड़ियो नहीं अनेरे रायहर,
रिण सारियौ न हेकण राड़।
रायमलोत कियो रामायण,
गयो न राणै दुरंग गमाड़।।

मोटाराजा उदयसिंह और चारण कवियों के बीच संबंध ठंडे ही रहे। मनोमालिन्य इतना बढ़ा कि चारणों को उनके खिलाफ सत्याग्रह कर प्राणोत्सर्ग करने पड़े। उस समय सत्याग्रहियों की सहायतार्थ जो अनिर्वचनीय त्याग पाली ठाकुर गोपालदासजी चांपावत ने किया वो आज भी अमिट है। तभी तो कहा गया है- ‘चांपावत नै चारणां, पैलै भव री प्रीत।’ उन्होंने घर जलाकर तीर्थ यात्रा का उपक्रम किया था। उनके चारण मनीषियों के प्रति आदरभावों को एक कवि ने इस प्रकार प्रकटन किया है-

चांपाहरै सरस व्रन चारण,
दिल पाखै मावीत दछा।
सकव्यां रा पाल़टसी सांसण,
पाली रिणसी गांम पछा।।

महाराजा सूरसिंहजी ने पुनः चारण कवियों दिल से आदर देखर साहित्य सृजन की तरफ उन्मुख किया। इनके उत्तराधिकारी महाराजा गजसिंहजी ने साहित्य सृजन का पूरा वातावरण निर्मित किया। उन्होंने इस उक्ति को चरितार्थ किया कि-

दाता जो न होत तो कवीन दान देतो कौन?
कवि जो न होत कविता कौन करतो?

ये उदारता और वीरता दोनों में समतुल्य थे। उनके समकालीन कवियों की श्रृंखला लंबी है। जिन्होंने राजस्थानी साहित्य को पल्लवित व पुष्पित किया। गजसिंह जी ने एक ही दिन में उस समय के श्रेष्ठ कवियों को पंद्रह लाख पसाव व आठ गांव इनायत किए थे-

गांम आठ बारै गयंद, पनरै लाख पसाव।
गुण पातां रीझै गुणी, दीधा दिल दरियाव।।

केसोदासजी गाडण, हेमजी सामोर, सामदासजी दधवाड़िया पंचायणजी कविया, प्रभृति कवियों का राजस्थानी को अवदान अतुल्य है।

गजसिंहजी के ही पुत्र और नागौर राव अमरसिंहजी ने भी चारण साहित्य की सृजनधर्मिता को संरक्षण दिया था। वे स्वाभिमानी और निडर तो थे ही साथ ही अपनी मर्जी के मालिक भी थे। उन्होंने अपनी आनबान की रक्षार्थ सलावतखां को भरे दरबार में ललकार कर मारा था जहां स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हो गए। तब अनेक कवियों ने उनके उस दुष्साहस को वरेण्य मानकर भूरी-भूरी प्रशंसा की थी। नरहरिदासजी बारठ ने उनकी उस उल्लेख्य वीरता को अंकित करते हुए लिखा है कि तगाजी सोनगरा, जयमलजी मेड़तिया के बाद अगर दिल्ली को किसी ने दहशत से भरा है तो वो केवल और केवल एक अमरसिंह ही था-

कियो प्रथम साको वडो दिल्ली किणियागरै,
दल़थंभ कमंध चीतौड़ दांई।
अमर अवगाढ जमदाढ जिम आगरै,
राण रिणमाल उजवाल़िया राई।।

यही बात सुंदरदासजी बीठू झोरड़ा ने लिखी है कि जिनके डर से दिल्ली सहमी हुई रहती थी वो वीर आज नहीं रहा-

कहै कवि सुंदरदास राव अमरेस आज,
ऐसे अदूल्ली हूंत दिल्ली दहलानी है।

रोजा निवाज भूला मसजित का काज भूला,
ऐसो शोर बीतो आज अमर अमानी का।

महाराजा जसवंतसिंहजी ने भी उक्त परंपरा का सातत्य बनाए रखा। उन्होंने निर्भीकता पूर्ण बात कहने वाले कवियों का सदैव आदर किया। इस बात की पुष्टि उनके द्वारा रचित बारठ राजसिंहजी के मर्सियों से होती है-

हथजोड़ा रहिया हमै, गढवी काज गरत्थ।
ऊ राजड़ छत्रधारियां, गो जोड़ावण हत्थ।।

धरमात की लड़ाई से मारवाड़ के सरदारों के अनुग्रह पर जसवंतसिंहजी का पलायन करना कवियों को रास नहीं आया। उस समय आसोप ठाकुर महेसदासजी जो वय में काफी वरिष्ठ थे का युद्ध से पलायन करना तो कवियों को कतई नहीं भाया। कवियों ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा-

महाराजा भल आविया, सुबस बसावो देस।
जंबुक ऐ क्यूं जीविया, आसो किसन महेस!!

नरहरिदासजी ने सेना को युद्ध मैदान में छोड़कर महाराजा के आने को कतई अच्छा नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था-

जे तो विमाह री वाट जोती जगत,
रूक बल़ त्रासियो गयो ताजा।
मराड़ी जान घर आवियो मांडवै,
तेल चढी रही अपछरा ताजा।।

लेकिन महाराजा के देहावसान पर इन्हीं नरहरिदासजी ने उनके विराट व्यक्तित्व को व्यथित मन से यों उकेरा-

सूर धरम सांकड़ै, पाप उसराण प्रगटै।
हिंदवाण हल़हल़ै, थाट वागां वल़ थटै।
प्रथी मेछ परवरै, दस पड़त्रास दहल्लै।
विप्र सांसण खटव्रन, थान थानक परसल्लै।
छत्रबंध कमंध पाल़ग छठो, रिण दुगाम गजबंध रो।
जसराज आज जोखमियो, महाराजा मंडोवरो।।

उस कालखंड में चारण कवियों ने राजस्थानी साहित्य की महनीय सेवाएं की। धर्म, धरती, स्त्री के सम्मानार्थ अपना रक्त-पसीना एक करने वालों को कवियों ने ईश्वर सदृश माना। देशभक्ति की आभा से दीप्त दुर्गादासजी राठौड़ के विषय में दयालदासजी आढा लिखते हैं-

धजवड़ां पाण खत्रीधरम,
धींग भुजै जिण धारियो।
सिध मरद दुरग आसा सुतन,
जाणै परम जुहारियो।।

महाराजा अजीतसिंहजी ने भी कवियों को पूरा प्रोत्साहन दिया था। उस कालखंड में कवियों की लंबी श्रृंखला है। विस्तारभय से नामोल्लेख उचित नहीं होगा। उन कवियों ने जहां महाराजा की वीरता की प्रशंसा की है-

बीबी सह दासी हुई, बीबा हुआ फजीत।
हिंदू सह ताजा हुआ, राजा हुआ अजीत।।

वहीं उनके समाजविरोधी कार्यों की खुलकर निंदा भी की है। भलेही उन्होंने दुर्गादासजी को देश से निष्कासित किया हो भलेही अपनी पुत्री इंद्रकुमारी का विवाह वृद्ध बादशाह फर्रुखशियर से किया हो। कवियों ने लोकादर्शों की अव्हेलना करने पर अजीतसिंहजी की आलोचना करने में कोई संकोच नहीं किया। कविवर समरथदानजी, भभूतदानजी आदि की व्यंग्योक्तियां तो लोकोक्तियां बन चूकी है-

रखवाल़ी कर राज री, पाल़ी अणहद प्रीत।
दुरगो देसां काढनै, अबखी करी अजीत।।

काल़च री कुल़ में कमंध, राची किम आ रीत।
दिल्ली डोल़ो भेजनै, अबखी करी अजीत।।

भलेही वे शासक निरंकुश व स्वेच्छाचारी थे लेकिन सत्य सुनने व स्वीकारने में उन्होंने कभी दर्प को आड़े नहीं आने दिया। जब जयपुर व शाहपुरा के साथ तत्कालीन महाराजा अभयसिंहजी पुष्कर सरोवर पर थे। वहां करनीदानजी कविया ने सिसोदियों के मुगल विरोध व स्वातंत्र्य प्रेम को रेखांकित करते हुए कहा था–

डोल़ै नह दी दीकरी, नवरोजै निरमाण।
हुवा नहीं को होवसी, सिसोदियां समान।।

कवि की सत्य के प्रति बेबाकी देखकर जब महाराजा ने कवि से कहा कि “चलो यह बात तो आपकी दुरस्त है। लेकिन जयपुर व जोधपुर में से श्रेष्ठ कौन है? बताइए।”
उस समय भी करनीदानजी ने उसी सत्यनिष्ठा से प्रत्युत्तर दिया था-

जयपुर ओ जोधाणपत, दोनूं थाप-उथाप।
कूरम मार्यो डीकरो, कमधज मार्यो बाप।।

अभयसिंहजी कवि की सत्य अभिव्यंजना से इतने प्रभावित हुए कि ससम्मान उन्हें अपने साथ ले आए। इतना ही नहीं उन्हें अपना कविराज बनाकर आलावास जागीर में इनायत किया-

श्री हथ तुररो टांकियो, श्रीहथ बांधी पाघ।
कवराजा कह करन रो, अभै बधायो आघ।।
अस चढियो राजा अभो, कव चाढै गजराज।
पौहर एक जलेब में, मौहर हलै महाराजा।।

उस समय वीरभाणजी रतनू, बखताजी खिड़िया, मुकंददासजी दधवाड़िया आदि श्रेष्ठ कवि हुए, जिनका काव्य तत्कालीन समाज का प्रतिबिंब माना जाता है। उस समय अनेक कवियों ने राजस्थानी साहित्य की श्रीवृद्धि कर अपनी शब्द साधना को उंचाइयां दी थी।

इन्हीं महाराजा के भाई बखतसिंहजी ने अपने पिता अजीतसिंहजी की हत्या करदी थी। कवियों ने इस कुकृत्य की तीव्र निंदा की। दलपतजी बारठ, करनीदानजी कविया आदि की कविताएं लोकभावनाओं की ही अभिव्यक्ति है-

नृप बखता राच्यो नहीं, जूनै नरकां जीव।
आछी दी अजमाल रा, नवा नरक री नीव।।

बखतेस जलम पायां पछै,
किसी बात आछी करी?

कहकर पितृहन्ता के जघन्य पाप की निंदा करने में रतिभर भी संकोच नहीं किया।

जब बखतसिंहजी ने रामसिंहजी को पदच्युत कर जोधपुर की राजगादी हथियाने में सफलता प्राप्त की और उनके उस कार्य में उनके ही श्वसुर सुजाणसिंहजी भाटी ने सहायता की। उस समय भी कवियों ने उस कार्य को उचित नहीं माना था। वयोवृद्ध किलेदार सुजाणसिंह के विश्वासघात की निंदा करते हुए कवियों ने कहा था-

थारो नाम सुजाण थो, अबकै हुवो अजाण।
आसरम चौथै आवियो, ओ चूको अवसाण।।

बखतसिंहजी के उत्तराधिकारी विजयसिंहजी ने भी कवियों की सृजनात्मकता को पूरा संरक्षण दिया था। उस काल में भी राजस्थानी चारण साहित्य निर्बाध गति से पल्लवित हुआ। कवियों का समाज पर पूरा प्रभाव था। महाराजा विजयसिंहजी की अपने कौटुम्बिक या सामंतों की दमनात्मक नीति का कवियों ने खुलकर विरोध किया था। यहां तक कि दादूपंथी हो चूके ब्रहमदासजी बीठू को भी अपना कविधर्म निभाने को प्रेरित होना पड़ा। जब महाराजा ने छलबल से आऊवा ठाकुर जैतसिंहजी व पोकरण ठाकुर देवीसिंहजी को मरवा दिया, तब साधूवेशधारी चारण कवि की संवेदनाएं जाग उठी और उन्होंने बेबाक कहा-

बडै मेवासां गाल़णो डल़ै उथालणो वैरीहरां,
लड़ेवा चालणो दल़ां सांमहो लंकाल़।
बाघहां पालणो देवो झालणो न हुतो वीजा,
हकालणो हुतो दिल्ली ऊपरै हठाल़।।

कियो हमल्लां दिल्ली रै नाथ सतारा सूं खूर हकै,
कराल़ा बाजतां जागी बापूकारा केत।
राखणो छो जतन्नां सूं मारणो न हुतो राजा,
जेणवारां फौजां माथै हाकणो छो जैत।।

महाराजा के ऐसे कार्यों के कारण तत्कालीन कई बड़े ठाकुर रुष्ट होकर अपने-अपने स्थानों पर चले गए थे। उस समय मराठों ने मारवाड़ पर आक्रमण किया था। महाराजा उद्विग्न हो गए। अपनेआप को एक तरह से असहाय महसूस करने लगे। ऐसे में उन्होंने गिरधरदासजी मथाणिया को बुलाया और मार्गप्रशस्त करने को कहा था। कवि ने कहा कि मारवाड़ की रक्षार्थ सभी राठौड़ वीर अपनेआप को समर्पित मानते हैं। आप पत्र लिखकर उन्हें आदर सहित बुलाइए। गिरधरदासजी ने महेसदासजी आसोप, भीमराजजी पातावत प्रभृति रुष्ट सरदारों को महाराजा के भावों में दोहे लिखे। वे वीर आए भी और मातृभूमि की रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त भी हुए। जिसका इतिहास साक्षी है-

दिखणी आयो सज दल़ां, प्रथी भरावण पेस।
तो ऊभां दलपत तणा, मुरधर जाय महेस!!

सीस रखै तो नाक तज, नाक रखै तज सीस।
भीमा जो मनभावती, लिखदे मुरधरधीस।।

उस झगड़े में महेशदासजी कूंपावत ने जो अदम्य साहस प्रर्दशित किया था वो इतिहास में अमिट है। लेकिन जैसाकि कहा जाता है-

राजा जोगी अगन जल़, आंरी उलटी रीत।
डरता रहज्यो परसराम, ए, थोड़ी पाल़ै प्रीत।।

महाराजा विजयसिंहजी को किन्हीं चुगलखोरों ने पाटी पढ़ाई कि महेशदासजी के पारिवारिक सदस्यों ने युद्ध में साकारात्मक भूमिका नहीं निभाई थी। महाराजा के बदले तेवरों को भांपकर महेशदासजी का परिवार बीकानेर चला गया और आसोप जगरामजी कूंपावत को मिल गई। जिनकी उस युद्ध में भूमिका नगण्य थी। इस बात की तत्कालीन चारण कवियों ने खुलकर निंदा की थी। जिसके परिणाम स्वरूप महेसदासजी के बेटे को आसोप पुनः मिला। उस समय गिरवरदानजी सांदू भदोरा ने कहा था-

मरज्यो मती महेस ज्यूं, राड़ बिचै पग रोप!
झगड़ा में नाठो जगो, उण पाई आसोप!!

विजयसिंहजी के पुत्र भीमसिंहजी ने भी साहित्यसृजन को प्रोत्साहित किया लेकिन उनका स्वयं का कार्यकाल कोई विशेष उल्लेख्य नहीं रहा। महाराजा मानसिंहजी ने साहित्यकारों को न केवल संरक्षण दिया अपितु उनकी प्रज्ञा व प्रतिभा को निखरने का पूरा वातावरण प्रदान किया था। स्वयं भी श्रेष्ठ कवि थे तो कवियों के कद्रदान भी। तभी तो कहा गया है-

जोध बसायो जोधपुर, व्रज कीनी विजपाल।
लखनेऊ कासी दिली, मांन कियौ महिपाल।।

इन्होंने चारण कवियों को इकसठ गांव जागीर में दिए थे-

इकसठ सांसण आपिया,
मानै गुमनाणी।

इनकी अंग्रेज विरोधी नीति जगजाहिर है। इनके कविराजा बांकीदासजी आशिया ने साहित्यिक क्षेत्र में अंग्रेजी सत्ता का संपूर्ण भारत में सर्वप्रथम मुखर विरोध किया था-

आयो अंग्रेज मुलक रै ऊपर,
आहंस लीधो खैंच उरा।
धणियां मरै न दीधी धरती,
धणियां ऊभां गई धरा।।

इन्हीं के समकालीन कवि गांगाजी ने क्षत्रिय गौरव को अक्षुण्ण रखने हेतु अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने का आव्हान करते हुए कहा था-

अब छत्रियां इसी हार क्यूं आई,
वरदाई जामण री वेत।
व्यौपार्यां आगल़ वानेतां,
खारो लगै बुहारण खेत।।

व्यापक फलक पर लड़ने की तैयारी का आव्हान करने वाले कवियों ने स्थानीय स्तर पर फैली अराजकता तथा उसका फायदा उठाकर मारवाड़ में पड़ोसी राज्य की लूटखसोट पर भी व्यथा प्रकट की थी। मालानी क्षेत्र में माड़ के भाटियों द्वारा लूटखसोट की निंदा व मारवाड़ के दिवंगत सामंतों के शौर्य को याद करते हुए सुरताजी बोगसा लिखते हैं-

नहीं आज देवसा पौढी न्रभै नर,
आउवै नहीं कुसल़ेस आखां।
साख सिणगार जोरो नहीं खींवसर,
भगौ रोहिट नहीं एम भाखां।।
धुंबड़ै वाघ नह आज ओपम धरा,
धीर नह मनाणै नखत धारी।
सेर दूदो नहीं अभंग रीयां सिरै,
(जणै)माड़ री टेमियां खेड़ मारी।।

महाराजा मानसिंहजी के शासनकाल में चारण साहित्य सृजन मारवाड़ में चरमोत्कर्ष पर था। यह परंपरा अनवरत बनी रही। अगली पीढ़ी में कई मुखर कवि हुए जिन्होंने स्वाभिमान व मातृभूमि की आन पर आंच आती देख शासकों व सामंतों को सीधा संबोधित किया। मेवाड़-मारवाड़ सीमा समझौते से असहमत जनकवि ऊमरदानजी ने तत्कालीन बड़े ठाकुरों को आगाह करते हुए एक गीत लिखा था। अद्यावधि अप्रकाशित उस गीत की भावाभिव्यक्ति द्रष्टव्य है-

पहुमीधर प्रथम करलो जिरह पाखरां,
ओल़खो आखरां बात ऊंडी।
लाखनै ठाकरां पटायत लाखरां,
भाखरां दियां सूं घणी भूंडी।।8
राज नै जगत कहसी टकै रोकरा,
ओक परलोक रा नहीं आछा।
वसूधर वाहरू डोकरा बह गया,
छोकरा रह गया मूंछ छाछा।।13

ऊमरदानजी ने समकालीन सामंती वर्ग में पनपी तमाम विद्रूपताओं पर बेबाक कुठाराघात किया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था
कि क्षत्रियों में निम्न गुणों की प्रधानता होनी चाहिए–

परजा पाल़ण पुत्रां सम, के हण प्राण कपूत रा।।
मादक अलीण मेलै न मुख, प्रिय लक्षण रजपूत रा।।

जब उन्होंने देखा कि उक्त गुणों की न्यूनता आ रही है और आजकी सामंती युवा पीढ़ी फूट-फजीती, निरर्थक हिंसा, मद्यपान आदि दुष्प्रवृत्तियों की ओर अधिक उन्मुख है। तब उन्होंने कहा था-

शश शिकार तितर सुभट, कुरजां चिड़ी कबूतरा।
भायां सूं उठ नित भिड़ै, परम धरम रजपूत रा।।

ऊमरदानजी निर्भीक कवि थे। उन्होंने सत्य संभाषण से कभी संकोच नहीं किया। तत्कालीन शासकवर्ग में पनप रही कुंठाएं, हीनता, दीनता व विदेशी सत्ता के प्रति समर्पित भावों का कारण बताते हुए वे लिखते हैं कि अंग्रेजी सत्ता वो डायन है जो रजवट के सांस्कृतिक गौरव प्रतीक सात सकारों को खा गई। उन्होंने संपूर्ण भारतीय शासक वर्ग को इस ओर आगाह करते हुए लिखा था-

या जग के सम्राट सम्राटी कूं,
भाखत हूं जो यथारथ भासन।
रीझि के देत है सी बी खिताब रु,
खीजि के लेत है सर्व सु सासन।
सूर सती सुरभी रु सुतंत्रता,
सुध्रम सुद्रढ सूरमा साकन।
श्री सरकार बकार ब्रिटेनिया,
सात सकार डकारगी डाकन।।

जगनाथजी बारठ ने भी तत्कालीन समाज में पनप रही विद्रूपताओं व पाखंडों पर जबरदस्त प्रहार किया था-

दे धन जोड़ां दान, जगत न दे गुणजोड़ां।
भगत बजै ठग भाव, रगत चेहिया आरोड़ां।
रजनामां छिवि रीत, छता नामो छल़ छंडो।
एक सेर आहूत, मेर गिल़वा मुख मंडो।
विपरीत नीत अपजस बडम, ढांण नीर हल़खंड ढहै।
भगवांन केम राखिस भगति, वरतमान इसड़ी बहै।।

वर्तमान की विद्रूपताओं, संस्कारहीनताओं के साथ ही सामाजिक मूल्यों के बिखरते तानेबाने पर प्रहार करते हुए जवाहरदानजी पांचेटिया लिखते हैं-

बखत कल़ू महाघोर विपरीत बातां बणै,
जिकी नह श्रवणां सुणी जावै।
हाय रे!हाय अन्याव ऐहड़ा हुवै,
खेत री काकड़ी बाड़ खावै।।
जलमिया बडे घर पूत नाजोग रा,
दुसट चित बुरा नित दाव देवै।
बूडगी बात अब कियां कांई बणै?
लाज रा रुखाल़ा लाज लेवै!!

इस पीढ़ी के बाद मारवाड़ में चारण साहित्य की श्रीवृद्धि करने वाले कवियों में देवकरणजी बारठ, जसकरणजी रतनू चौपासणी, उदयराजजी ऊजल़ चंडीदानजी हिलोड़ी, आसूदानजी माड़वा, धनदानजी चांचल़वा, ब्रजलालजी कविया, खूमदानजी बाल़ेबा, भंवरदानजी झिणकली आदि कवियों को गिनाया जा सकता हैं, जिन्होंने अपनी गिरा गरिमा से राज व समाज को एक नवीन दिशा दी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्थापित होते ही लोगों ने गिरगिट के तरह रंग बदला और क्षत्रियों की हजारों वर्षों के देश व धर्म हित में दिए बलिदानों को विस्मृत कर उन्हें आलोचना के कटघरे में खड़ा करने की एक प्रवृत्ति ने जन्म लिया। इस प्रवृत्ति की निंदा करते हुए देवकरणजी लिखते हैं-

राजपूत रखवाल़, वीर भारत रा बंका।
भड़ पड़ियां रणभोम, समर नह लाया संका।
सिर पड़ियां समसेर, बजाई केई वारां।
वीरां रा केई वार, हुवा उपकार हजारां।
क्षत्रियां तणी निंदा करै, (ज्यांनै)धिक धिक कह धिक्कारणो।
देखजो फरज सब देस रो, (ज्यांरै)मुख पर रेपट मारणो।।

कविवर देवकरणजी ईंदोकली ने राजतंत्र भी देखा था तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के भी वे हिस्सा रहे थे। उन्होंने पंचायती राज में अनपढ़ और नसेड़ी पंचों का वास्तविक चित्रण करते हुए लिखा है-

हीणबुध पंच भेल़ा हुवा, कोरी मारण कीड़ियां।
सुधारण देश कुण दे सल्ला? ऐ बैठा फूंकै बीड़ियां!!

स्त्रियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, पनप रहे अलगाव के भावों से खिन्न होकर बद्रीदानजी कविया जयहिंद के जयघोष पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हुए लिखते हैं–

लड़ पंजाब आसाम ली, सातूं लीनी सिंध।
कासमीर लेवण खसै, हार हुय कै जयहिंद!!
नागी द्रोपद निरखतां, कुरूवंश भो निसकंद।
नार हजारां नगन व्है, हार हुय कै जयहिंद!!

ऐसे संक्रमणकाल में साहित्यकारों का दायित्व बढ़ जाता है। क्योंकि जब समाज में शोषण, भ्रष्टाचार, सामाजिक वैषम्य, विद्रूपताएं फैलने लगती है तब कवि को विरोध में मुखर होना पड़ता है।

नारायणसिंहजी कविया लिखते हैं कि साहित्यकार को भौतिक सुविधाएं त्याज्य कर जनहित में अपनी आवाज मुखर करनी चाहिए–

दमन अनीति देश में, शोषण भ्रष्टाचार।
भौतिक भोग विलास में, सूतो साहितकार।।
लाज लूटतां द्रोपदी, राखी किसन मुरार।
लुटतां संस्कृति देसरी, सो मत साहितकार।।

अगर साहित्यकार विद्रूपताओं पर चोट नहीं करेगा या समाज में पनप रही खोटों का खुलासा नहीं करेगा तो समाज ‘अंध घोड़े असवार’ की स्थिति में आ जाएगा। ऐसी स्थिति में अंधविश्वास, पाखंड, अफंड, व ढोंग का बोलबाला होगा। ऐसे ही पाखंड व ढोंग पर प्रहार करते हुए आसूदानजी माड़वा अपनी कविता ‘भोपा भंडण’ में लिखते हैं-

मरे साथरे मोत, सुण्या नहीं कानै सूरा।
मुरदो अगनी मांय, खाख रह उडग्या खूरा।
प्राणी हुवो प्रवेश, जाय दुहेली जूणी।
भवसागर भरमाय, धीठ दे भोपा धूणी।
पा’ड़ री गाड़ पूजै प्रसिद्ध, पंथ चलावै पापिया।
मुरधरा मांय देखो मुदै, थान घरोघर थापिया।।

राजतंत्र पर सुविधाभोगी, विलासी, व्यष्टिगत होने व लोकधन के अपव्यय के आरोप लगाने वालों के हाथों में जब राज आया तो उनके तामझाम देखकर जनता भौचक्की रह गई। लोकराज के दावे करने वाले अपने ही स्वागत पर लाखों रुपये उड़ाने लगे। ऐसे में जनकवि मौन कैसे रह सकते हैं?ब्रजलालजी कविया ने बेबाकी से इन लोकतंत्र के कर्णधारों को उनके काम व न्याय की असलियत बताते हुए सत्य ही कहा है-

आवै नेता एक, अवस धन लाख उडावै।
स्वागत रै मिस सैंग, खलक मिल-मिल नै खावै।
मोटर गाडी मांय, आप नित मौज उडावै।
करै देस पर करज, ठीक घर बंगला ठावै।
पावली हेक मांगा़ं पगा, नटिया गिणै न नाज रा।
रांम रे !रांम! देखो रैया, रुल़ा काम इण राज रा!!

कुण सुणै कूक किणनै कहै? अधपी नेता आजरा।
रांम रे! रांम! देखो रैया, रुल़ा न्याव इण राज रा।।

आजादी के बाद की बदलती परिस्थितियों व परिस्थितियों से अनुकूलन नहीं बना पाने वालों को भी चेताया है। उन्होंने द्वंद्वात्मक स्थिति में रहकर राजतंत्र का रोना रोने वालों को परजीवी की संज्ञा से अभिहित करते हुए व्यंग्य किया तो साथ ही पद के मद में भ्रष्टाचार में लिप्त होकर कोडी के मालिकों को करोड़ों के मालिक होने पर आश्चर्य भी प्रकट किया है। भंवरदानजी झिणकली लिखते है-

आजादी री घटा ऊमड़ी,
बांवल़ दोट बजायो।
खोपा खड़ै बछेरा खावै,
ओ पड़पंच उडायो।
कोट गढां रा झड़्या कांगरा,
बिखर पड़्यो परकोटो।
तो ई पोल़ झाल कूकै परजीवी,
बखत आयग्यो खोटो।।
काल़ै धन री करामात सूं,
होड मची हदी भारी।
झूंपड़िया री जगा झुकाया,
ऊंचा महल अटारी।
कोड़दास कोड़ीधज कीना,
लागो लूट खसोटो।
पोल़ झाल कूकै परजीवी,
बखत आयग्यो खोटो।।

जब राज की ओट में खोट पनपती है या विश्वासों पर चोट होती है तब कटुता, विखंडन, वैमनस्यता फैलने लगती है। ऐसे में संवेदनाओं के संवाहक कवियों का कर्तव्य बोध जाग्रत हो उठता है और उन्हें जन-जन को फूट के दुष्परिणामों से आगाह करवाना पड़ता है। यही कारण है कि उदयराजजी उज्ज्वल एकता का सुभग संदेश देते हुए लिखते हैं-

बिनां संप बीगड़ी, भूप रावण री भगती।
कौरव पंडु कुसंप, सिटी भारत री सगती।
जैचंद’र प्रिथीराज, गया कुसंप रै घाटै।
ऐ राजा इण वार, संप बिन थया सपाटै।
लारली पौर छत्री लखै, अजां जु संपत आदरै।
कुण हाण आय थांरी करै, महिमंडल मनुजाद रै।।

आज जिस तरह जल जंगल़ को हानि पहुंचाई जा रही है या यों कहे कि आधुनिकता की आंधी में स्थानीय वृक्षों को काटकर विदेशी बबूलों के माध्यम से धरती की उर्वरा खत्म कर कैंसर को प्रश्रय दिया जा रहा है, उससे जल जंगल को समर्पित चारण कवियों को अपनी कलम उठाकर निरीह जनता को चेताना पड़ा। देवकरणजी लिखते हैं-

रे बद पेड़ बबूल के, धिक-धिक तो सिर धूल।
मेहनत करतां हिज मिले, (म्हांनै)सेवा बदल़ै शूल।।

राजस्थान और विशेषकर पश्चिमी राजस्थान के लिए कल्पवृक्ष के सदृश माने गए खेजड़ी वृक्ष की नादान लोगों द्वारा कटाई से व्यथित कवि खूमदानजी बालेबा ने इसकी साधारणजनों, पशुओं, व पक्षियों के लिए उपयोगिता तथा मरूस्थल के स्थरीकरण में महनीय भूमिका को रेखांकित कर इसका मानवीकरण करते हुए लिखा है वो सदैव प्रासंगिक रहेगा-

राखत हरियाल़ दुकाल़ां धरती,
झांख उडत नह धूड़ जबै।
मंजर लग चैत मास रै मांही,
सुध वायु हर रोग सबै।
भंवरा गुंजार कीट कर भण-भण,
इम सौभा वन पास अती।
वनसपत रूप खेजड़ी बोलत,
मूरख नर मुझ बाढ मती!!

इन कवियों ने अपनी मुखरता व प्रखरता के सातत्य को बनाए रखा। आजादी की ओट में मरते मानवीय मूल्यों तथा प्रांतवाद, जातिवाद व अलगाव की विस्तीर्ण होती भावनाओं से कवि चिंतनशील है। ऐसी विद्रूपताएं देश की आजादी के लिए खतरे का संकेत है। इस संदर्भ में लक्ष्मणदानजी कविया लिखते हैं-

आ किसड़ी आजादी आई,
मिनखां हाथां मिनख मरै।
देस प्रेम नाहीं दिल मांही,
कल़ह छेत्र अर जात करै।।
आं लखणां सूं आजादी,
घणै दिनां री नाय गिणो।
मरजासी बेमोत मानखो,
चुगता फिरस्यो चिणो-चिणो।।

आज जिस तरह धार्मिक स्थलों की ओट में खोटे संतों का बोलबाला हो रहा या लोकतांत्रिक व्यस्थाओं के नाम पर चुनावी बिसातें बिछाई जा रही है। उसमें यथा राजा तथा प्रजा की लोकोक्ति को चरितार्थ होते देख डॉ.शक्तिदानजी कविया को जनभावनाएं अभिव्यंजित करनी पड़ी-

आश्रम जठै हजार आवगा,
बाबा साथ बजार बहै।
सुत परिवार सहित संन्यासी,
करतूतां अखबार कहै।।

ऐसी काली करतूतों तथा अपने आपको तथाकथित बड़ी जाति में मानने वालों को फटकारते हुए डॉ. कविया लिखते हैं कि वास्तविक भक्त हृदय लोग तो तथाकथित छोटी समझी जाने वाली जातियों में ही हुए हैं। बड़े लोग तो केवल पोल में ढोल पीटते हैं-

पोल ढोल ज्यूं पेखिया, बडा नांम बाजंत।
भणां घणकरा भगत तौ, छोटे कुल़ छाजंत।।

आज चुनावी प्रक्रिया का लाभ उठाकर लोगों में ‘हट्टी जाणै जट्टी नै ठगूं अर जट्टी जाणै हट्टी नै!’वाली स्थिति बनादी है। उम्मीदवार व मतदाताओं की खोट का खुलासा करते हुए डॉ.शक्तिदानजी कविया लिखते हैं-

रोज चीकणा जीमै रोटा।
मौज करै बंधाणी मोटा।
छड़ा किणी रै टाबर छोटा।
खास बणै पण मनमें खोटा।।

जब सिद्धश्री में ही खोट होगी तो फिर कार्यसिद्धि का कल्पना करना बेकार है। आजके झांसाबाज नेताओं की बखियां उधेड़ते हुए डॉ.शक्तिदानजी कविया लिखते हैं-

खोटै नेता खनै,
आस कर जनता आवै।
झांसा दे-दे झूठ,

भरोसै राख भमावै।
न तो करै इनकार,
कार पण कदै न कीनो।
दूनां तरफ दोसती,
लखै निज मतलब लीनो।
पारटी अनै बे पारटी,
जको फरक नह जाणसी।
मुफत रा जठै पइसा मिलै,
तरफ उठी री ताणसी।।

जब ऐसे मलीन लोगों के हाथों में अधिकार आते हैं तब भ्रष्टाचार पनपता है। भ्रष्टाचारियों को किए हुए के फल भुगतने ही पड़ते है। अतः अच्छा यही है कि ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया जाए ताकि खोटी कमाई की खाई में गिरने से बचा सके। इस संबंध में मोहनसिंहजी रतनू खोटी कमाई पर गिद्ध दृष्टि रखने वालों को इसके भवितव्य के दुष्परिणामों के प्रति सचेत करते हुए लिखते हैं-

खोटा रुपिया खावतां,
खून ऊपजै खार।
घर कुसंप झगड़ो घणो,
पूत जाय परवार।।
परणी नै तो परहरै,
परदारा सूं प्रीत।
रुल़ जावै सारी रकम,
रिसवत री आ रीत।।

चारण काव्य का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं करके उस पर पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर दोषारोपण करने वालों तथा इसकी कालजयी मुखर परंपरा से अनभिज्ञता प्रदर्शित करने वालों को इस काव्य के तेवर व तासीर से परिचित करवाते हुए डूंगरदानजी आशिया लिखते हैं-

आपी घणै उछाह, गई जमियां जागीरां।
मिटिया कोट किमाड़, पड़ी प्रोल़ां प्राचीरां।
दीना गज गघ दान, धजर नचता धाटी रा।
माटी में मिल गया, रमतिया वै माटी रा।
थे दियो जिको ढगल़ा थयो, धन सारो छत्रधारियां।
समपियो हमां गहणो सुजस, (थांरी)अजै भरी अलमारियां।।

पाखरां रुखाल़ै पिंड ज्यां, सुजस कियो जस आखरां।
लाखरां हूंत मुहंगा लिख्या, (म्हे)ठगी नहीं की ठाकरां।।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मारवाड़ के राजस्थानी चारण साहित्य का अद्यावधि पूरा लेखाजोखा नहीं हो पाया है। अतः इस बात की महनीय आवश्यकता है कि मारवाड़ में सृजित राजस्थानी चारण साहित्य का समग्र मूल्यांकन होना चाहिए ताकि आजकी पीढ़ी इस साहित्य के सुभग संदेश तथा मुखरता से परिचित हो सके।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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