मतलब जठै, बठै न मिताई

चित्र-करसन भाई देवसी भाईओडेदरा

चित्र-करसन भाई देवसी भाई ओडेदरा

अखिल चराचर मांय मानखै जितरा रिश्ता-नाता बणाया है, वां मांय अेक उल्लेखणजोग रिश्तो है- मिताई वाळी। मिताई यानी कै मित्रता, यारी, दोस्ती, भायलाचारी। इतियास री आंख सूं देखां तो मिताई री मोटी-मोटी मिसालां आपणै सामी है, जिणमें भगवान कृष्ण अर सुदामा री मिताई तो जगचावी है। कृष्ण अर अरजण  पण तगड़ा मित्र हा। श्रीराम रै ई सुग्रीव अर विभीखण जियांकला मित्रां री कथावां आपणै सामी है। भगवान कृष्ण री फोटू वाळो अेक पोस्टर देख्यो, जकै माथै लिख्योड़ो हो कै – कृष्ण सूं कोई पूछ्यो कै महाराज मित्रता रो मतलब कांई है? कृष्ण भगवान मुळकता सा जबाब दियो कै भोळा “मतलब हुवै बठै मित्रता कद हुया करै?” वास्तव में ई बात मारकै री लागी। मतलब हुवै बठै मित्रता नीं हो सकै। राजस्थानी रा प्रसिद्ध नीतिकार कविवर कृपारामजी खिड़िया लिख्यो कै-

पल-पल में कर प्यार, पल-पल में पलटै परा।
यै मतलब रा यार, रहै न छानां राजिया।।
~कृपाराम खिड़िया

सावसाची बात है कै “मतलब जठै, बठै न मिताई” जठै मतलब यानी स्वारथ, लाभ अर कीं पावण-कमावण री भावना आवै बठै ई मित्रता खतम हुज्यावै अर व्यापार चालू हुज्यावै। हां! मित्रता सूं अनायास तो घणा ई मतलब सरता, निसरता रैवै पण मित्रता रै मूळ में मतलब रो भाव नीं हुयां ई आ बात संभव हो सकै। द्रोपदी नैं जद राजसभा में लाय दुस्सासन उणरो चीरहरण करण लागै, तो द्रोपदी च्यारां कानीं सूं निरास होय’र भगवान कृष्ण नैं याद करै अर भगवान उणरी रिछ्या करै। द्रोपदी भगवान नै अरदास करती वेळा कृष्ण अर पांडवां री मित्रता री दुहाई देवै-

तन मो तिल तेतोह, आज सभा मझ ऊघड़ै।
हरि-पंडव हेतोह, हूं जाणूं होतो नहीं।।
~रामनाथ कविया (द्रोपदी विनय)

(द्रोपदी पुकार करै कै हे सांवरिया! आज इण सभा में जे म्हारो तिल जितरो सौ तन भी उघड़ग्यो तो हूं जाणूंली कै हरि यानी कृष्ण रै अर पांडवां रै कोई हेत, कोई मित्रता ही ई कोनी) मित्रता रो महल अेक दूसरै रै सम्मान, सैयोग अर स्नेह री नींव माथै खड़ो हुवै। अठै छोटै-बड़ै, गरीब-अमीर का कमजोर-जोरावर रो कोई भेद नीं हुया करै। कृष्ण जियांकलो तीनूं लोगां रो स्वामी आपरै मित्र अरजण रो सारथी बणग्यो, इणसूं सिद्ध हुवै कै साचो मित्र आपरै भायलै सारू कीं पण काम कर सकै-

साचो मित्र सचेत, कहो काम न करै किसौ।
हर अरजण रै हेत, रथ कर हांक्यो राजिया।।
~कृपाराम खिड़िया

मित्रता में अेक-दूसरै रै गुणावगुणां नैं स्वीकार करतां निजू हितां री तिलांजलि देवणी पड़ै। आपरो अहंकार अर अस्तित्व री अेंठ सगळी छोड़णी पड़ै। भगवान तो पांडवां रै अठै जूठी पातळां तकात उठाई है। मिताई सारू मानखै रै अलावा अेक मोटी मिसाल ‘दूध अर पाणी’ री दी जावै। आपणै रोजीनां री दिनचर्या में है कै दूध में पाणी मिलावां। जद दूध में पाणी मिलावां तो पाणी आपरी न्यारी हस्ती नीं बणावतो दूध में अेकाकार हुज्यावै अर आपरै मित्र दूध रो वजन बढावै। दूध नैं आंच माथै गरम करण सारू तपेली का भगोनै मांय राख’र गैस का चूल्हो जगावां। जियां ई दूध नैं आंच लागै तो पाणी आपरै मित्र रो बचाव करतो पैली खुद आग रै हवालै हुज्यावै पण दूध नैं बळण नीं देवै। स्यात ‘आंच नीं आवण’ री कैबत इण प्रसंग सूं चाली व्हेला। पैली पाणी बळै। पाणी बळ्यो अर दूध रै खळबळो माचै। दूध भगोनी वाळो मैदान छोड़’र बारै भागणो चावै, मतलब कै उफणण लागै। दूध नैं उफणतो देख’र आपां पाणी रो छाबको देवां। दूध पाछो भगोनी में जातो रैवै। आ मिसाल है दूध अर पाणी री मित्रता री। –

क्षीर में नीर मिलाय दियो तब नीर नै क्षीर में अंग छिपायो।
सीत सुभाय को आंच लगी तब नीर नै अपनो अंग जरायो।
जल्यो जब नीर, चल्यो तब क्षीर, बाहर आकर मीत बुलायो।
मिल्यो जब नीर, रुक्यो तब क्षीर, (यूं) सच्चे ही मित्र नैं धर्म निभायो।।

नीर-क्षीर री मिताई पर कई बार इयांकला सवाल खड़्या हुया कै अठै फगत नीर रो ई त्याग दीखै क्योंकै दूध में मिल’र आपरो अस्तित्व मिटावै तो नीर, आग में बळै तो नीर, गरम दूध नैं ठंडडो करण सारू पाछो आग में कूदै तो नीर तो पछै क्षीर कांई कर्यो ? आओ! दूजोड़ी आंख सूं देखां। दूध पाणी री अपेक्षा घणो ख्यातनाम अर मूंघो द्रव है। आपां इयां मानां कै दूध अमीर है अर पाणी गरीब। दूध बलवान है अर पाणी कमजोर। उणरै बावजूद पाणी जद दूध में मिल्यो तो दूध उणसूं कोई भींट का छुआछूत कोनी करी, उणसूं नफरत कोनी करी, उणनैं दुर-दुर कर’र निरास कोनी कर्यो वरन आपरै जीवण रो अंश, आपरी ताकत रो हिस्सो अर आपरी खुद री हस्ती उणनैं बणायो। आपां जाणां कै पाणी मिल्यां दूध रो मोल घट्यो, उणरी गुणवत्ता कमजोर पड़ी, उणरी असलियत माथै सवाल उठ्या। उणरै बावजूद भी दूध आपरै मित्र पाणी नै खुद सूं अळगो नीं कियो, ओ दूध री मिताई रो मोटो प्रमाण है। करण अर दुरजोधन री मित्रता रो आधार ओ ई हो। जिण बगत करण सूं कोई बात करण सारू त्यार नीं हो, उण बगत करण नैं गळै लगावण वाळो दुरजोधन करण रो जिगरी इण कारण बण्यो। बाकी तो ओ सनातन सत्य है कै लड़ तो पतळियो ई घसीजै, सौ दूध सूं पैली पाणी आंच में उबळ’र भाप बणग्यो तो पाणी री सामथ्र्य ई इतरी ई है, उणमें दूध कांई करतो। हर चीज रा दोनूं पहलू है, बस आपणी देखणगत मायनो राखै।

मित्रता अर रिश्तेदारी सारू अेक घणी मोटी दरकार आ भी है कै अै दोनूं सारीखां साथै ई करणी चाईजै। मोटा देख’र बांथ घालणियां में छेवट फोड़ा पड़ै। क्योंकै ऊंदरो जे प्राण छोड’र आपरो सरीर सौंपद्यै तो ई नगारो तो मढीजै कोनी। (कैसे छोटे नरनु तें, सरत बड़न के काम/ मढ्यो दमामो जात किम, कहि चूहे के चाम।। बिहारी।। ) कई बार स्वारथ रै मारग लाग्योड़ा लोगबाग आपरै विपरीत सभाव वाळा लोगां सूं मित्रता कर लेवै पण उणरो निभाव कियां हुवै। ऊंदरा अर बिलाई जे मित्रता करै तो उणरो अंजाम कांई होवणो, कुणसूं छानो। कृपाराम जी लिख्यो-‘मूसा नै मंजार, हितकर बैठा हेकठा/सौ जाणै संसार, रस नह रहसी राजिया।’ राजनीति में आयैदिन बणण वाळी दळदळिया (गठबंधण) सरकारां री भायलाचारी री पोल खोलती राजस्थानी रै लाडलै गीतकार कवि कानदान कल्पित ‘झोरड़ा’ री अै काव्यओळियां कितरी सटीक अर ठीक है-

तन तो मिळ्या है पण मन आंतरा/ऊपर सूं दीखै घणां सांतरा।
चोळै री खोळी में फण सांपरा/किरड़ा-गोहीरा घणी भांतरा।
रंग-बदळू, संग-बदळू, दळ-बदळू है/ मतलबी पूरा आपोआप रा।
आं रो भरोसो करै सोई मरै/ साथी न सीरी सगै बाप रा।
खीचड़ाळी हांडकी आई उफाण सा/ खींचताण सा, खींचताण सा।।
~~कवि कानदान कल्पित

जठै अपणै आपनैं राजाभोज अर सामलै नैं गंगू तेली समझै, खुद चला’र रामा-स्यामा करण में ई तोहीन समझै, रात-दिन धोखै री धूणियां धुकती रैवै, अेक-दूजै री आंख्यां लड़ै, अेक-दूजै रै सुख सूं दुखी हुवै, इयांकलां रै बिचाळै मित्रता कियां निभै। इयांकली छाछ तो ढुळण जोगी हुवै, भलां ई पैली फैंकद्यो अर भलां ई लड़-भिड़’र हांड्यां फोड़’र ढोळद्यो पण आ कोई रै सावळसर काम नीं आ सकै।

डिंगल कवि चंडीदानजी सांदू हिलौड़ी रो अेक शिक्षाप्रद गीत डाॅ. शक्तिदानजी कविया री पोथी राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव मांय पढण नैं मिल्यो। कवि लिख्यो है कै जे आत्मसम्मान सूं जीवणो चावो तो सगपण अर मिताई सारीखां सूं राखो। इयांकला मोटा मिनख आपणै कांई काम रा जकां री रीझ अर खीज दोनूं ई आपणै सारू कष्ट रो कारण बणै। रीझ तो इयां दुखदाई है कै इयांकला मोटा मिनख जे आपणै घरै आयग्या तो सगळै घर रा लोग अेकपग ऊभा रैवां अर आं री खातरदारी करां। थोड़ी सी चूक हुयां नाराज होवण रो डर। जे कोई चीज मांगल्यै तो भलांई आपणै उणरी कितरी ई जरूरत हुवो पण वांनै नटता संकां, वांरै दाय आवै जकी चीज उठा’र लेज्यावै। लेज्यावै सौ लेज्यावै, वां रै उणरो कोई गुण-किरावर का आभार कोनी। इणसूं ई आगै माड़ी तो जद हुवै कै जे कदैई मारग में मिलज्यावां तो आपानैं ओळखै ई कोनी। वांरै घर जावां तो आपणै सूं रूं ई कोनी जोड़ै, आपरी हेंकड़ी में ई रैवै। सलाम करां तो ई करड़ा हुया रैवै। कोई काम पड़ै तो करै कोनी। राजी रैवै जित्तै आपां नैं काम में रगड़ै अर नाराज हुज्यावै तो नुकसाण करै। इण वास्तै गिनायत अर मित्र आप सारीखा ई ठीक है। मोटोड़ां सूं मिताई राख्यां दुख ई दुख है, सुख रो लेस ई नीं है। कवि चंडीदानजी सांदू कैवै कै आं मोटै मिनखां नैं तो अळगै सूं ई आदेस करो-

आयां घर करै एक पग ऊभा, खातर खलल पड़्यां व्है खीज।
संकौ करां नटां न सरम सूं, चित्त चढ़ै वा ले लै चीज।।
कठै हि मिळै (तौ) पिछांणै कोनीं, सदन गयां नह बूझै सार।
करां सलांम दखै करडापण, कांम पड़्यां कछु करै न कार।।
राजी हुवां कांम में रगड़ै, नाराजियां करै नुकसाण।
छोटकियां मोटोड़ां छोड़ौ, मिळौ सारीखां चाहौ मांण।
आं सूं मेळ कियां दुख उपजै, रंच न लाभै सुख रौ रेस।
मुणै ‘चंड’ मोटा मिनखां सूं, अळगां सूं करणा आदेस।। पृष्ठ 20।।

म्हारा पूर्वज अर डिंगल रा प्रख्यात कवि आसाणंद बारठ री बाघै कोटड़ियै साथै गैरी मित्रता ही, जकी इतियास प्रसिद्ध है। बाघै री मित्रता सारू कवि आसाणंद मालदेव जियांकलै राजा सूं अळगो रैवणो अंगेज्यो। कई करोड़ पसावां रै ठोकरां मारी। छेवट ताळाब रै कांठै राणीराव नैं जवाब देवतां कवि मित्रता री असली जड़ रो खुलासो कर्यो अर कैयो कै-

कींकर कींकर कीं करूं, कींकर करूं बखाण।
थारा-म्हारा नह किया, अै बाघा अहनांण।।
~आसाणंद बारठ

(हे राजा! उण बाघै री अर म्हारी मित्रता रो कांई अर कींकर बखाण करूं। उणरै अर म्हारै बीच में थारी-म्हारी कोनी ही, इण कारण बाघो म्हनैं अतिप्रिय है, उणनैं कींकर भूल जाऊं)

मित्रता मांय आपसरीखी परगत अर आदत वाळा लोग ई निभ सकै। मित्रता मांय परसपर सावळ परख करणी ई लाजमी हुवै। बिनां पितायां, परख्या कोई सूं मित्रता करणी खतरै सूं खाली नीं हुया करै। कागलै अर हंस री मित्रता रो अेक नीतिप्रद गीत श्री नवलजी लाळस रो कह्यो लिखतां इण आलेख नैं पूर्ण करां-

कउवै नै हंस मिंत्राई कीनी, जळ सघनायत जोय जठै।
बिहुंवै मिळै परसपर बैठा, तरळा तरवर छांह तठै।।
इतरै उठै कोई नृप आयो, हवा निहाळी छांह हरी।
धीरट नैं आडौ दे धेटी, कउवै कुबदी वींट करी।।
ओडव चाप ऊठियो नरियंद, जिंह मग वायो खांच जुवौ।
उडै गयो सांवळ कर ऊंधी, मौत बिनां धवळंग मुवो।।
आ इज गत मानवियां आळी, पापी रो संग अवस पुवै।
मोटा मिनख नीच नै मांनै, हुई हंस में जिकी हुवै।।

(हंस अर कागलै मित्रता करी। सघन पाणी रै कांठै अेक हरियाळै रूंख रै डाळै दोनूं बैठा हथाई करै। जंगळ में अेक राजा घूमतो आयो अर जाडी छियां देख’र उण रूंख हेठै आराम करण ढूको। कुबदी कागलै होळै सी राजा पर वींट कर दी। राजा नैं रीस आई। बण आपरो बाण खींच’र मार्यो, काळै अर कुचमादी सभाव वाळो कागलो तो वींट कर’र उडग्यो अर बापड़ो सीधो अर सरल सभाव वाळो हंस उण बाण रो सिकार हुवो। कागलै जियांकलै काळै मन वाळै लोगां सूं कदैई ना तो मित्रता करो अर ना ई कोई संबंध राखो, नीं तर हंस में हुई जिसी आप में हुवैली। )
जय राजस्थानी।

~~डाॅ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

 

One comment

  • महाराजा फ़तेह अग्रसेन

    क्षीर में नीर मिलाय दियो तब नीर ने क्षीर में अपनों रंग छिपयो …

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