वरसाळे रा छंद – मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो – अळसीदान जी रतनू (बारहट का गाँव, जैसलमेर)


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॥दोहा॥
ज्वाहर तखत विराजतां सुर नर हुआ सचेळ।
इन्द्र भरण सर आवियो ईळ पत करण उजेळ।।
उतर घटा घण ऊमची पूसर पखाळण पाळ।
अठा सक्र दे आवियो मेघ दळा दस माळ।।

॥छंद त्रोटक॥
रुक वाव सियारिय बोल रही।
मतवाल उगो किरणाळ मही।
सुरंगो नभ सोसनिया सबही।
जळ धार अपार भया जबही।
धुरवा सुभराट चढै सखरो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।1।।

कितरा अवनीपत रुप कियार ।
कठठी लस कांठळ काजळिया।
प्रथमी चित्त पूरण आस पिया।
लपट्यो शुच बारह मैघ लियां।
ब्रखभाण, जैसाण, निवांण भरो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।2।।

बिरखा घण लूम्बीय वेद वळा।
चमकै घण व्योम रमै चपळा।
गुडळा भुरजा बिच गाडरिया।
हद आतुर खेत बधै हरिया।
कजळी रंग प्योधर रुप करो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।3।।

विण वाव दळां उतराध विखै।
धर रैलण लीनोय देश धके।
घनघोर घटा मिळ जोर घणी।
पड़ ताळ उडै झड़ मैह तणी।
मुख दादुर मोर झिगोर करो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।4।।

किल मेह घटा झुक नाह कमी।
जळ रो बळ झाल सके न जमी।
पछटै जळ पाड़ पखाळ पलां।
खळके नद नाळाय नीर खुला।
सज रूप अनूप चढे सधरो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।5।।

भरिया सर तालर पालर मे।
घमकै जळ माळ अचाण मगै।
नदियो किक नाद सू भूरी मिळे।
गड़सी सर नीर छिले गुडले।
चित पूरण धेनोय लील चरो।
मतवाल घुरै मुधरो मुधरो।।6।।

हद रूप रही सज माड़ मही।
सद दादुर मोर झिंगोर सही।
पख फूल रही बनवास पती।
तन वेस किया हरिया धरती।
सुख पाय सवाय आसीस करो।
मतवाल घुरै मुधरो मुधरो।।6।।

ज्वारेस नरेश भया जबही।
सुख चैन करै परजा सबही।
जुग जाण चालीस तणी जुगली।
सब उच्छब रैत करे सगली।
दुख दान महा जुग ज्यान हरो।
मतवाल घुरै मुधरो मुधरो।।7।।

कर जोड़ प्रभा अलसेस करे।
सकवी कर सेवियो काज सरे।
करतार दयावंत मैर करी।
हद ज्यांन जीवा सिर पीड़ हरी।
रंज मेट दियो दुनिया सबरो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।8।।

~~अळसीदान जी रतनू (बारहट का गाँव, जैसलमेर)

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