मायड भाषा ने मिळै

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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मायड भासा ने मिळे, राज मानता राज।
औ अरजी है आप नें, मेहाई महराज।।७२१
डिंगळ डिगती डोकरी, थां बैठां किण काज।
मायड दीजो मानता, मेहाई महराज।।७२२
डिंगळ री डणकार रा, बोल्या सब कविराज।
मायड दीजो मानता, मेहाई महराज।।७२३
डिंगळ डिगती डोकरी, थारै हाथां लाज।
मायड दीजो मानता, मेहाई महराज।।७२४
रोज याद करतौ रिधू, कद आसो फिर काज।
मायड दीजो मानता, मेहाई महराज।।७२५
मायडभासा मावडी, सब बोली सिरताज।
देरावौ थें मानता, मेहाई महराज।।७२६
आवडमय अरदास सुण, रुप राज हिंगलाज।
मायड दीजो मानता, मेहाई महराज।।७२७
मायड भासा रो नहीं, जिण रे मन में नाज।
उण में चेतनता जगा, मेहाई महराज।।७२८

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