संवैधानिक मान्यता की मोहताज मायड़भाषा राजस्थानी

(राजस्थान सामान्य ज्ञान की मासिक पत्रिका “प्रतियोगिता ज्ञान क्षितिज” के अक्टूबर 2017 के अंक में प्रकाशित लेख)

माँ, मातृभूमि एवं मातृभाषा तीनों का स्थान अति महनीय है क्योंकि ये तीनों हमें आकार, आधार एवं अस्तित्व प्रदान करती हैं। माँ तथा मातृभूमि की तरह ही मातृभाषा की महत्ता निर्विवाद है। संस्कृति के सहज स्रोत के रूप में वहां की भाषा की भूमिका प्रमुख होती है। यह अटल सत्य है कि मातृभाषा ही वह सहज साधन-स्रोत है, जो मनुष्य के चेतन एवं अचेतन से अहर्निश जुड़ी रहती है। यही कारण है जैसे ही किसी समाज या समूह का अपनी मायड़भाषा से संबंध विच्छेद होता है, वैसे ही उस समाज एवं समूह के चिंतन की मौलिकता नष्ट हो जाती है। लेकिन यह विडम्बना है कि आजाद भारत में राजस्थान वासियों को चिंतन की मौलिकता का अधिकार अभी मिला ही नहीं है क्योंकि हमारी मातृभाषा को भारतीय संविधान में मान्यता नहीं है और बिना मातृभाषा के, मौलिक चिंतन संभव नहीं है। संपूर्ण भारतीय भाषाओं के साहित्य का अध्ययन यह बताता है कि भारतवर्ष में अंग्रेजी सत्ता के प्रबल प्रतिरोध की प्रथम ललकार जिस भाषा में हुई, वह भाषा हमारी मातृभाषा राजस्थानी है, जो कि आज भी मान्यता की सुनहरी चूनड़ के लिए प्रतीक्षारत रहने को विवश है।

यह चिंतनीय ही नहीं वरन चिंताजनक पहलू है कि एक समृद्ध भाषा के लिए वांछनीय संपूर्ण तत्त्वों की मौजूदगी के बावजूद दस करोड़ से अधिक कंठों की वाणी हमारी मायड़भाषा राजस्थानी आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी संवैधानिक मान्यता की मोहताज बनी हुईं है। यह प्रश्न हर राजस्थानी भाषाभाषी के मन में है कि आखिर किस कारण उसकी मातृभाषा को मान्यता से महरूम रखा गया और रखा जा रहा है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से राजस्थान प्रांत की मातृभाषा राजस्थानी अपने आप में एक स्वतंत्र, समृद्ध एवं प्राचीन भाषा है, जो कि अन्य भारतीय भाषाओं की भांति भाषा विकास क्रम के लगभग एक हजार से अधिक गौरवमयी वर्षों की साक्षी है। भाषाविज्ञान, साहित्य और लोकाभिव्यक्ति की दृष्टि से आधुनिक भारतीय भाषाओं में जिसका बहुमान है। विदेशी आक्रांताओं एवं आतताइयों से राजस्थान के संघर्ष की वरेण्य वीरगाथाएं लिखने वाली यह वही भाषा है, जिसके साहित्य को आधार बनाकर कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के प्रत्येक गांव को थर्मोपोली और प्रत्येक योद्धा को लियोनिडास के विरुद से विभूषित किया। यह वही भाषा है जिसके विशिष्ट पठन-शैली वाले वीरगीतों को (डिंगल कवि हिंगलाजदान कविया, सेवापुरा के मुख से) सुनकर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ बरबस ही कह उठे थे कि “भक्तिरस का साहित्य तो किसी न किसी रूप में प्रत्येक प्रांतीय भाषा में मिलता है परन्तु राजस्थान के कवियों ने अपने रक्त से जिस वीररस के साहित्य का निर्माण किया है, उसकी जोड़ का साहित्य अन्यत्र दुर्लभ है।” यह वही भाषा है जिसने राष्ट्र या समाज पर मंडराते संकट के बादलों को छांटने हेतु अपनी लेखनी की धार को तीक्ष्ण करके संबंधित के जमीर को जगाने में कोई कोर कसर नहीं रखी। भले ही अंग्रेजी सत्ता के इरादों एवं भावी परिणामों की उद्घोषणा करती बांकीदास आसिया की “आयो अंगरेज मुलक रै ऊपर, आहंस लीधी खेंच उरां” फटकार हो या कि शंकरदान सामौर की “मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छड जबर जुड़सी” की आह्वानकारक आवाज हो। भले ही सितारेहिंद के लिए उतावले उदयपुर महाराणा फतेहसिंह को उनके हिंदुआ-सूरज के वंशविरुद की याद दिलाते क्रांतिकारी केसरीसिंह बारठ की चेतावनी के चाबुक हों, राजस्थानी भाषा ने उत्कृष्ट के अभिनंदन एवं निकृष्ट के निंदन में कोई कमी नहीं रखी।

ऐतिहासिक गौरव से लेकर वर्तमान वैभव तक की उल्लेखनीय विकासयात्रा पूर्ण करने वाली भाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने के पीछे दोषी कौन है ? यह सिद्ध करना मेरा उद्देश्य नहीं है और न ही मैं किसी व्यक्ति, विचारधारा या वर्ग विशेष को इसके लिए दोषी मानता हूं। यह शोध और प्रबोध करना मायड़भाषा राजस्थानी के करोड़ों करोड़ बेटे-बेटियों (जिनमें मैं भी सम्मिलित हूं) के लिए स्वतंत्र छोड़ता हूं, जिनकी माँ यानी मातृभाषा आज भी मान्यता की मोहताज है। विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों एवं भाषायी कक्षाओं तथा सेमीनार-सिंपोजियम के दौरान अनेक बार शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा उठाए गए प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं को आधार बनाकर लिखे जा रहे इस आलेख के माध्यम से राजस्थानी भाषा मान्यता से जुड़े विविध पहलुओं की सारगर्भित, तथ्यात्मक एवं सटीक जानकारी आम पाठक को उपलब्ध करवाना, मेरा उद्देश्य है।

मेरी जानकारी में राजस्थानी भाषा मान्यता का आंदोलन भारत में ही नहीं वरन विश्व में किसी भी भाषा की मान्यता के लिए चलने वाला सबसे लंबा आंदोलन है। दुनिया में इससे बड़ा कोई संकट नहीं हो सकता जब व्यक्ति को जुबान होते हुए बोलने की आजादी ना हो। आंकड़े गवाह हैं कि आजादी से पूर्व अंग्रेजी शासन के समय भी सजग एवं संचेतनासंपन्न बुद्धिजीवियों को यह बात अखरती थी। यही कारण रहा के सन 1925 में (21 फरवरी, 1925) तरुण राजस्थान नामक अखबार में राजस्थानी भाषा की मान्यता हेतु मांग उठी। उसके बाद 01 सितम्बर, 1944 को जयनारायण व्यास (पूर्व मुख्यमंत्री-राजस्थान) द्वारा राजस्थानी भाषा को प्रादेशिक भाषा घोषित करने हेतु पुरुषोत्तमदास टंडन समिति को एक ज्ञापन प्रस्तुत कर इस आंदोलन को जन आंदोलन बताया गया। इसी समय सन 1944 में ही दीनाजपुर (बंगाल) में अखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन का बड़ा जलसा हुआ, जिसकी अध्यक्षता करते हुए ठा. रामसिंह तंवर ने अपने 56 पृष्ठ के अध्यक्षीय उद्बोधन में मातृभाषा राजस्थानी की उपयोगिता एवं उपादेयता के साथ ही उसके उज्ज्वल पक्षों को उजागर किया। इस सम्मेलन में राजस्थानी की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का प्रस्ताव पास हुआ और साहित्यकार सुमनेश जोशी को यह काम सौंपा गया। इस साहित्य सम्मेलन के समय से ही राजस्थानी भाषा मान्यता का आंदोलन जारी है। राजस्थानी साहित्यकारों तथा सजग भाषाप्रेमियों के प्रयासों से आंदोलन की यह जोत सतत जल रही है। हां! इस आंदोलन ने कभी हड़ताल, बंद, आगजनी या तोड़फोड़ का रूप नहीं लिया और वह रूप राजस्थानी भाषा मान्यता से जुड़े महानुभावों के लिए ग्राह्य भी नहीं है। भले ही रह-रहकर ही सही पर यह आंदोलन प्रवाहमान रहा है और आज इसने जन आंदोलन बनने की ओर सशक्त कदम बढ़ाए हैं। उसी का परिणाम है कि आज गांव-गांव से राजस्थानी मान्यता की आवाज उठने लगी है। राजस्थानी भाषा मान्यता के लंबे इतिहास में किया गया हर प्रयास स्तुत्य है लेकिन इसकी विगत 15 वर्ष की समयावधि अधिक सक्रियता वाली रही है। आजादी के बाद हुए प्रयासों को इस क्रम में सूचीबद्ध किया जा सकता है-

  1. बीकानेर के पूर्व महाराजा तथा पूर्व सांसद डॉ करणीसिंहजी ने लोकसभा में दिनांक 14 मार्च, 1966 तथा 16 फरवरी, 1968 को दो बार राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवी अनुसूची में जोड़ने के लिए निजी सदस्य बिल पेश किए। इसी तरह सांसद डॉ लक्ष्मीमल सिंघवी ने 1967 मेें लोकसभा में तथा 1968 में राज्यसभा में दो बार निजी विधेयक पेश किए।
  2. साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा को अकादमी भाषा का दर्जा मिलना और 1974 में केंद्रीय साहित्य अकादेमी की ओर से पहले राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा हुई। राजस्थानी कथासंसार के शीर्षस्थ हस्ताक्षर पद्मश्री विजयदान देथा की “बातां री फुलवाड़ी” पर यह पुरस्कार दिया गया, जो कि राजस्थानी प्रेमियों के लिए अतीव सुखद क्षण था। इसके साथ ही जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर एवं मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर में राजस्थानी विभागों की स्थापना हुई। 21 फरवरी को राजस्थानी साहित्यकारों ने मायड़भाषा दिवस के रूप में मनाना शुरु किया, जो आज संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से मातृभाषा दिवस के रूप में संपूर्ण विश्व में मनाया जाता है।
  3. सन 1983 को प्रदेश में राजस्थानी भाषा की स्वतंत्र अकादमी “राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी” की स्थापना हुई, जिसका मुख्यालय बीकानेर रखा गया।
  4. 22 जुलाई, 1992 को सांसद जस्टिस गुमानमल लोढा, सांसद बलराम जाखड़, सांसद नाथूराम मिर्धा, महाराजा गजसिंह जोधपुर, ओंकारसिंह लखावत, पदम मेहता, रामनिवास लखोटिया, विजयदान देथा, कल्याणसिंह शेखावत, विधायक जोगेश्वर गर्ग, श्रीमती सूर्यकांता व्यास सहित कई नेताओं ने वोटकल्ब दिल्ली में धरना देकर राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता की पुरजोर मांग रखी। वहां के अनुभव एवं भाषा मान्यता प्रक्रिया की मांग के अनुरूप इस धरने के बाद मायड़भाषा प्रेमियों ने राज्य एवं केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरु किया
  5. सन 1994 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के तत्कालीन अध्यक्ष सौभाग्यसिंह शेखावत की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय कमेटी “राजस्थानी भाषा संवैधानिक मान्यता एवं उन्नयन समिति” का गठन किया, जिसने 13 फरवरी, 1995 को अपना प्रतिवेदन मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया।
  6. इसी दौरान एक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत को प्रधानमंत्री के नाम लिखे राजस्थानी भाषा मान्यता के ज्ञापन की प्रति प्रस्तुत की, जिसमें 104 विधायकों के हस्ताक्षर थे।
  7. 29 नवम्बर, 2000 को राजस्थान के शिक्षासचिव श्री एस एन थानवी ने राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए एक बैठक बुलाई, जिसमें राज्यभर से कई लेखक एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित हुए। इस बैठक में राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता एवं राज्य की दूसरी भाषा बनाने हेतु शिफारिश की गई।
  8. राजस्थानी साहित्यकार लक्ष्मणदान कविया “खेण” ने दिसम्बर, 2000 अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति का गठन कर नागौर में इस समिति का पहला सम्मेलन बुलाया तथा मायड़भाषा मान्यता के इस सवाल को जन आंदोलन बनाने की दिशा में अहम पहल शुरु की। नागौर सम्मेलन में समिति संस्थापक श्री लक्ष्मणदान कविया ने अपनी 21 सूत्रीय योजना प्रस्तुत की, जिसके आधार पर राजस्थान के सभी संभागों में संघर्ष समिति के गठन की योजना बनी। नवीन जोश के साथ संघर्ष समिति ने कार्य प्रारम्भ किया। साहित्यकारों के साथ गांव गांव के जन सामान्य तक मातृभाषा एवं उसके महत्व की चर्चाएं होने लगीं। हर क्षेत्र के लोगों के बीच राजस्थानी भाषा मान्यता का मुद्दा विमर्श का विषय बना और उसका सकारात्मक परिणाम सामने आया।
  9. 03 मार्च 2003 को मान्यता संघर्ष समिति के आह्वान पर स्टेचू सर्किल जयपुर में एक एक दिवसीय धरना रखा गया, जिसमें संपूर्ण राजस्थान से मातृभाषा प्रेमी सहभागी बने। साहित्यकारों के साथ-साथ राजनेता, उद्योगपति, फिल्मजगत एवं शिक्षा एवं पत्रकारिता से जुड़े महानुभावों ने इस धरने को प्रभावी बनाया तथा अपने मंतव्य को सरकार के समक्ष वांछित स्वरूप में पहुंचाने में सफलता अर्जित की। वरिष्ठ साहित्यकार रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत के नेतृत्व में संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को अपना ज्ञापन सौंपा तथा भाषा मान्यता हेतु सर्वसम्मत संकल्प पारित करने का आग्रह किया, जिस पर मुख्यमंत्रीजी ने आश्वासन दिया।
  10. इसी दौरान समिति ने एक विशेष मुहीम के तहत सांसदों एवं विधायकों से संपर्क कर उन्हें मान्यता की लड़ाई का हिस्सा बनाने का सफल प्रयास किया जिसकी परिणति 2003 में हुई।
  11. 25 अगस्त, 2003 को राजस्थान विधान सभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने का संकल्प पारित कर भारत सरकार को भेजा। यह इस आंदोलन के लम्बे इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। आठवीं अनुसूची में नाम जुड़ने की राह में यह संकल्पपत्र, जिस पर राजस्थान के सभी 200 विधायकों के हस्ताक्षर है, मील का पत्थर है। लेकिन भूखे को तो भोजन करके ही संतुष्टि प्राप्त हो सकती है। दिल्ली तब भी दूर ही थी और आज भी।
  12. संघर्ष समिति अपना काम करती रही। 2005 में समिति ने अपने कार्य का विस्तार किया और इसी बैनर तले चार नयी संस्थाओं के गठन की घोषणा की, जिनका उद्देश्य था युवाओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों, फिल्मकारों तथा महिलाओं को मायड़भाषा के इस मुद्दे से प्रत्यक्ष जोड़ना। 1. युवावर्ग के लिए राजस्थानी मोट्यार परिषद, 2. शिक्षकों, चिंतकों तथा पत्रकारों के लिए राजस्थानी चिंतन परिषद, 3. फिल्म से जुड़े महानुभावों की राजस्थानी फिल्म परिषद तथा 4. नारी शक्ति को इस मुहीम से जोड़ने के लिए राजस्थानी महिला परिषद। सबसे अधिक जोशभरी संस्था बनी राजस्थानी मोट्यार परिषद। मोट्यार यानी जवान। जोशभरे युवाओं के दल के दल हर संभाग, जिला तथा तहसील स्तर पर इकाइयों का गठन कर मायड़भाषा मान्यता हेतु संघर्षरत हैं।
  13. संघर्ष समिति ने राजस्थानी भाषा के पक्ष में एक माहौल तैयार करने हेतु हर वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया। वर्ष में दो कार्यक्रम बड़े स्तर पर तय किए जिनमें एक 21 फरवरी को मातृभाषा की मान्यता हेतु हर संभाग तथा जिला स्तर पर धरना, ज्ञापन एवं संगोष्ठियों का आयोजन। तथा दूसरा 30 मार्च को राजस्थान दिवस के अवसर पर जगह-जगह साहित्यिक आयोजन, कवि सम्मेलन, संगोष्ठियों आदि के आयोजन करना। इसी तरह 02 अक्टूबर को गांधी जयन्ती के अवसर पर मुखपट्टी सत्याग्रह करके सरकार को यह समझाने का प्रयास किया कि गांधीजी ने देश की आजादी के लिए सत्याग्रह किया था, हम अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सत्याग्रह की राह पर हैं। इन आयोजनों से जन जुड़ाव को बढावा मिला। अब राजस्थानी भाषा की मान्यता और उसके मायनों को लोग समझने लगे।
  14. राजस्थान सरकार के संकल्प पत्र पारित करने के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से कार्यवाही को शिथिल होते देख समिति ने 21 फरवरी, 2005 को एक मायड़भाषा सम्मान रथयात्रा प्रारम्भ की। यह यात्रा गंगानगर से दिल्ली तक की यात्रा थी, जिसमें प्रदेश के लगभग 19 जिलों में यह मायड़भाषा सम्मान सूचक रथ एक विशेष संदेश के साथ लोगों को जोड़ने का काम करता हुआ मार्च के प्रथम सप्ताह में दिल्ली पहुंचा। 03 मार्च 2005 को संघर्ष समिति पदाधिकारियों ने सांसद श्रीमती प्रभा ठाकुर, सुभाष महरिया, वीपी सिंह सहित अनेक साहित्यकारों के प्रतिनिधि मंडल के साथ राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील को ज्ञापन प्रस्तुत कर अपनी मांग रखी। ज्ञापन की प्रतियां प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं उपराष्ट्रपति सबको प्रेषित की गई।
  15. इस दौरान राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर ने तत्कालीन अध्यक्ष श्री देव कोठारी के नेतृत्व में राजस्थानी मान्यता के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। अकादमी की ओर से जनवरी 2005 में अखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन, कोलकाता तथा दिसम्बर, 2005 में अखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन, हैदराबाद के आयोजन कर प्रवासी राजस्थानियों को इस दिशा में सकारात्मक सहयोग करने का एक माहौल तैयार किया।
  16. अकादमी की ओर से 13-14 दिसम्बर, 2006 को जयपुर में अंतर्राष्ट्रीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सभा को संबोधित करते हुए राजस्थानी भाषा को लोकभाषा बताया एवं इसकी मान्यता प्रदेश की जनता के लिए हितकर बताया। इस अंतर्राष्ट्रीय राजस्थानी सम्मेलन के समय तक राजस्थानी अकादमी, राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति एवं राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति से जुड़ी अनेक संस्थाओं के सदप्रयासों से सकारात्मक माहौल बना।
  17. 17 दिसम्बर 2006 को सांसद कर्णसिंह यादव, रासासिंह रावत, श्रीमती प्रभा ठाकुर, गिरधारी लाल भार्गव आदि के प्रश्नों के जवाब में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल ने लोकसभा में कहा कि “राजस्थानी एवं भोजपुरी को मान्यता हेतु सरकार ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है। गृहमंत्रालय ने नोट तैयार कर लिया है। बजट सत्र 2007 में विधेयक पेश कर दिया जाएगा।” यही बात दिल्ली में श्री जासलवाल ने प्रेसवार्ता में भी कही।
  18. हर वर्ष संसद के उस सत्र की प्रतीक्षा रहती थी और है, जिसमें हमारी मायड़भाषा को मान्यता मिले। हर वर्ष संभाग, जिला एवं तहसील स्तर के साथ गांव गांव में आयोजनों का दौर चलता रहा। समिति के प्रयासों से राजस्थान लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भी राजस्थानी को आंशिक ही सही पर जोड़ने में सफलता मिली। यद्यपि हाल ही में आरपीएससी ने उस राजस्थानी अंश को यह कहते हुए हटा दिया कि राजस्थानी संविधान या राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त भाषा नहीं है।
  19. मई 2015 में संघर्ष समिति ने दिल्ली में धरना देकर अपनी मांग फिर से दोहराई। धरने के मंच से समिति पदाधिकारियों के अलावा राजनेताओं ने भी इस मांग को दोहराया। ज्ञापन दिया गया, आश्वासन मिला।
  20. जुलाई 2015 में संघर्ष समिति ने मुम्बई से दिल्ली तक की मायड़भाषा सम्मान रथयात्रा की। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहुंची इस यात्रा ने राजस्थान के बाहर भी प्रवासी राजस्थानियों में एक माहौल बनाया। सांसद अर्जुनराम मेघवाल, गजेन्द्रसिंह शेखावत के साथ समिति ने ज्ञापन सौंपा।
  21. राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु चला यह लंबा सफर अपनी झोली में अवश्य ही कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां लेकर खड़ा है। विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों, समितियों, संगठनों तथा मान्यता संघर्ष समिति की यात्रा के दौरान अलग-अलग बैनरों तले हुए विभिन्न आयोजनों, संगोष्ठियों, विमर्शों, रथयात्राओं एवं धरने-ज्ञापनों का व्यापक परिणाम यह है कि भाषा मान्यता को लेकर फैलाए जाने वाले वाह्यात भ्रमों का जाल अब छंट चुका है। आज हर पाठक एवं राजस्थानी प्रेमी के पास वे सारे जवाब हैं, जो कभी सिर्फ और सिर्फ कतिपय वरिष्ठ साहित्यकारों के पास हुआ करते थे। आज मान्यता के मापदंडों पर राजस्थानी भाषा को खरा नहीं मानने वालों के लिए हर जुबान से जवाब निकलता है कि –
    1. राजस्थानी भाषा का भौगोलिक क्षेत्र विशाल है, जो समूचे राजस्थान में व्याप्त है। इसके अतिरिक्त प्रवासी राजस्थानी भी देश के अन्य प्रदेशों एवं विदेशों में इसे अपने दैनन्दिन कार्यों में व्यव्हृत करते हैं।
    2. इसके बोलने वालों की संख्या दस करोड़ से अधिक है।
    3. जिस तरह से किसी भी भाषा की विविध बोलियां होती हैं, उसी तरह इस भाषा की भी बहुत सी समृद्ध बोलियां हैं, जिनका समुच्चय राजस्थानी है। जिस प्रकार से हिंदी विभिन्न बोलियों एवं विभाषाओं का समुच्चय है, उसी तरह राजस्थानी है। उसके किसी एक बोली रूप को मानक मानकर संविधान में मान्यता दी जा सकती है, जिस तरह हिंदी के खड़ीबोली रूप को दी गई है।
    4. राजस्थानी की मान्यता से राष्ट्रभाषा/राजभाषा हिंदी को उसी तरह से कोई हानि नहीं होगी, जिस तरह से संविधान में मान्यता प्राप्त अन्य भारतीय भाषाओं से नहीं हो रही है वरन यह हिंदी की समृद्धि में सहायक सिद्ध होगी।
    5. इसकी लिपि देवनागरी है, जो कि भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त एकाधिक भाषाओं की मान्य लिपि है यानी कि देवनागरी से अलग लिपि का नहीं होना मान्यता के मार्ग का अवरोध नहीं है।
    6. इसका अपना व्याकरण है, जो वैज्ञानिक ढंग से लिखित एवं प्रकाशित है। वैयाकरण आचार्य हेमचंद्र, ग्रियर्सन, टैस्सीटोरी, सुनीतिकुमार चटर्जी, नरोतमदास स्वामी एवं सीताराम लालस द्वारा लिखित व्याकरण प्रकाशित हैं।
    7. ‘‘वृहद राजस्थानी शब्दकोश’’ नाम से इसका अपना स्वतंत्र शब्दकोश है, जो कि पद्मश्री सीताराम लालस द्वारा लिखित है। इसमें सवा दो लाख शब्द उदाहरण सहित सम्मिलित किए गए हैं। बद्रीप्रसाद साकरिया एवं बीएल माली अशांत द्वारा रचित शब्दकोश भी प्रकाशित हैं।
    8. लगभग 1000 वर्षों की कालावधि में रचित विशाल, विस्तृत, विविध विषयी, विविध स्तर का समृद्ध, सामयिक एवं उपादेय साहित्य है, जिसकी न केवल देश के विद्वानों वरन विदेशी अध्येताओं द्वारा भी मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई है।
    9. राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधीन विद्यालय स्तर पर, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर एवं मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन की सुविधा है। प्रदेश के अधिकतर विश्वविद्यालयों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर दूरस्थ शिक्षा, पत्राचार एवं स्वयंपाठी परीक्षार्थी के रूप में अध्ययन की सुविधा है।
    10. प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों में इस भाषा के साहित्य में एमफिल एवं पीएचडी शोध की सुविधाएं विद्यमान है। एक अनुमान के तहत इस भाषा के साहित्य पर अब तक हजारों शोधार्थियों ने शोध प्रबंध पूर्ण किए हैं। इससे भी अधिक विभिन्न विद्वानों द्वारा निरन्तर शोध एवं सर्वेक्षण का कार्य जारी है।
    11. आकाशवाणी, जयपुर से प्रतिदिन राजस्थानी भाषा में समाचार प्रसारित होते हैं। मिमझर आदि कार्यक्रमों काव्यपाठ, वार्ता, पोथीचर्चा एवं लोकगीत, लोकनाटक आदि भी प्रसारित होते हैं। इसी तरह अन्य केंद्रों से भी मायड़भाषा किसी न किसी रूप में प्रसारित होती है। टीवी चैनल्स से भी आज समाचार एवं धारावाहिकों का प्रसारण होने लगा है।
    12. प्रदेश में इस भाषा की अपनी अकादमी है- राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर, जो प्रतिवर्ष पांडुलिपि प्रकाशन, प्रकाशन सहायता, पुरस्कार एवं साहित्यिक गतिविधियों एवं सम्मेलनों का आयोजन करवाती है।
    13. केंद्रीय साहित्य अकादेमी दिल्ली ने अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ही इस भाषा को भी साहित्यिक मान्यता दे रखी है। अकादेमी की योजना के अंतर्गत इस भाषा के अनेक मौलिक एवं अनूदित ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। राजस्थानी भाषा के श्रेष्ठ रचनाकारों को राष्ट्रीय पुरस्कार इस अकादेमी की ओर से दिया जाता है।
    14. पिछले डेढ दशक में राजस्थानी भाषा में विविध विषयों से जुड़ी सैकड़ों चर्चित फिल्में बनीं हैं, जिन्हें सरकार ने करों में रियायत देकर बढ़ावा दिया है।
    15. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से इस भाषा में स्नातकोत्तर, एम.फिल., पीएच.डी., नेट एवं सेट/स्लेट परीक्षाओं हेतु मान्यता प्रदान है।
    16. राइट टू एजूकेशन पॉलिसी स्पष्ट कहती है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, इस नाते भी राजस्थानी भाषा प्रदेश की द्वितीय भाषा का दर्जा पाने की अधिकारिणी है।

इस लंबी कहानी का परिणाम आज भी ‘सिफर’ ही है। आज भी राजस्थानी मान्यता की मोहताज ही है। अपने मन में अपनी मातृभाषा के प्रति अगाध आदर एवं स्नेह रखने वाले 10 करोड़ से अधिक राजस्थानी भाषाभाषी आज भी अपने जुबान पर लगे ताले के खुलने का इंतजार कर रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री बंशीलाल ने शपथ लेने के तत्काल बाद घोषणा की कि उनके प्रदेश हरियाणा की द्वितीय भाषा पंजाबी होगी और वह हो गई। गोवा के मुख्यमंत्री ने अपने प्रदेश में कोंकणी को राज्य की द्वितीय भाषा घोषित कर अपनी भाषा को सम्मान दिया उसी तरह हमारी राजस्थान सरकार करोड़ों लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए इस भाषा को प्रदेश की द्वितीय भाषा घोषित करे, उस दिन का इंतजार है।

भाषाओं के विकासक्रम को देखें तो राजस्थानी एवं गुजराती का नाता बहुत नजदीक का है। 13 वीं से 16 वीं सदी तक ये एक ही थीं उसके बाद दोनों भाषाओं ने स्वतंत्र रूप धारण कर लिया। गुजराती भाषाविद मनीषी झवेरचंद मेघाणी राजस्थानी को ‘गुजराती नीं मोटी बेन’ यानी गुजराती की बड़ी बहिन कह कर मान देते हैं। आजादी के दौरान गुजराती को महात्मा गांधी जैसा मातृभाषा प्रेमी नेतृत्व मिला, जो मातृभाषा की महनीयता एवं उपादेयता से अभिज्ञ थे अतः गुजाराती को अन्य जागरुक लोगों की भारतीय भाषाओं की तरह भारतीय संविधान में मान्यता मिली लेकिन मातृभाषा और उसके उपयोग की उपादेयता से अनभिज्ञ राजस्थानवासी आज भी उस रूप में नहीं जगे हैं, जिस रूप में जगना चाहिए।

राजस्थानी भाषा मान्यता की लंबी लड़ाई के परिणाम स्वरूप आज केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों के पास इस भाषा को आठवी एवं नवीं दोनों अनुसूचियों में जोड़ने के पर्याप्त आधार उपलब्ध करवा दिए गए हैं। केंद्रीय नेतृत्व माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी के हाथ में हैं, जो कि लोकरंग एवं लोकभाषाओं के संवर्द्धन एवं उन्नयन के प्रबल समर्थक हैं, जिसका उदाहरण हाल ही में उनकी राजस्थान यात्रा के दौरान देखने को मिला, जब मेवाड़ की धरती पर राजस्थान के करोड़ों लोगों की प्रिय जुबान में ‘‘खमाघणी’’ के साथ अपने उद्बोधन का शुभारंभ किया और उनके इस अभिवादन का सभामंडल ने जिस अंदाज की करतल ध्वनि में स्वागत किया, वह मातृभाषा के प्रति जनसमूह का स्नेह था। प्रधानमंत्रीजी ने हाल ही में एक शहीद की पत्नी एवं बेटी से फोन पर बात की, जिसे सब चैनल से सुना गया। वह बात हिंदी में शुरू हुई थी लेकिन जैसे ही बात भावुक क्षण पर पहुंची शहीद की पत्नी एवं बेटी ने अपनी मातृभाषा गुजराती में अपने भाव अपने देश के वड़ाप्रधान को सुनाए। देश की सीमा के लिए असंख्य शहादत देने वाले राजस्थान की वीरांगनाओं एवं बेटियों सहित गरीब, मजदूर, किसान भी अपनी मायड़भाषा में अपने मन के उद्गार प्रकट करने को आतुर हैं। विगत चुनावों में राजस्थान बीजेपी ने अपने चुनाव मेनीफेस्टो में क्रमसंख्या 141 पर लिखा था कि ‘‘राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता के लिए पार्टी पूर्ण प्रयास करेगी।’’ वास्तविकता यह है कि इस भाषा का वास्तविक उन्नयन तभी संभव हो सकेगा, जब इसे मान्यता की माला से नवाजा जाएगा। इस राजस्थान की कोटि-कोटि जनता को उस दिन का इंतजार है, जब वह अपनी मातृभाषा में अपनी बात कह सकेगी, हमारी हजारांे वर्षों की संचित ज्ञानराशि के आधार पर अपनी अंतर्निहित शक्तियों का राष्ट्रहित में अधिकतम सदुपयोग कर सकेंगे।
~~डॉ.गजादान चारण “शक्तिसुत”

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