म्है दाण नीं ! प्राण देवूंला

माड़वो पोकरण रै दिखणादै पासै आयोड़ो एक ऐतिहासिक गांम है। जिणरो इतिहास अंजसजोग अर गर्विलो रैयो है। पोकरण राव हमीर जगमालोत ओ गांम अखै जी सोढावत नै दियो। जिणरी साख री एक जूनै कवित्त री ऐ ओल़्यां चावी है-

हमीर राण सुप्रसन्न हुय, सूरज समो सुझाड़वो।
अखै नै गाम उण दिन अप्यो, मोटो सांसण माड़वो।।

इणी अखैजी रै भाई भलै जी रै घरै महाशक्ति देवल रो जनम हुयो-

भलिया थारो भाग, देवल जेड़ी दीकरी।
समंदां लग सोभाग, परवरियो सारी प्रिथी।।

ओ ई बो माड़वो है जठै भगवती चंदू रो जनम हुयो जिण सांमतशाही रै खिलाफ जंमर कियो। इणी धरा रा सपूत मेहरदान जी संढायच आपरी मरट अर स्वाभिमानी चारण रै रूप में चौताल़ै चावा रैया हा। राजस्थानी रो ओ कैताणो प्रमाणिक है कै-

मामा ज्यांरा मारका, भूंडा किम भाणेज
अर्थात जिणां रा मामा मारका यानी मठोठ वाल़ा होवैला तो पक्की बात है भाणेज ई तेजधारी होवैला।

मा चंदू अर मेहरदान जी दोयां रो ई नानाणो भाखरी रै मिकसां रै अठै। आसूदानजी आपरी एक चिरजा में लिखै-

दासोड़ी उजवालिय देवी,
मिकस भाखरी माण!!

इण आंटीलै वीर अर सधीर सपूत मेहरदान जी रो जनम माड़वै में अखैजी री गौरवमय वंश परंमपरा मे माण जी रै धड़ै में धरमदान जी रै घरै होयो।

मेहरदानजी रै घरै पूरसल अड़दू खानो। काल़ रो बगत ! मेहरदानजी आपरा ऊंठ अर आदमी लेय सिंध कत्तार लावण नैं संभिया तो मेहरदानजी रो जोगतो संग देख दर्जी, सुथार, वेलदार, नाई, आद रै साथै साथै माड़वै रा कई पोकरणा सिरदार ई संभग्या ताकि चारणां रै साथै होवण सूं दाण ई नीं लागैला अर लूंटीजण रो ई खतरो नीं रैवै! इणी लोभ रै पाण ऐ कई जातियां रा आदमीआप आप रा संझ लेय मेहरदान जी साथै सिंध गया अर उठै सूं आपरी पुसारत सारु धान चूण लेय पाछा रवाना होया। बिच में रातीवासो जैसल़मेर रै गड़ीसर तल़ाब माथै लियो।

उण बगत एक स्टेट सूं दूसरी स्टेट सूं वौपार करण माथै दाण लागिया करतो। दिन ऊगो। जैसलमेरियां मोकल़ा ऊंठां अर धान री छाट्यां देखी तो आयर कत्तारियां नै दाण भरण रो हुकम सुणायो। दाण री बात सुणर उठै उतरिया कई भल़ै बीजी जातां रा आदमी ई मेहरदानजी कनै गया अर निवेदन कियो कै “बाजीसा !म्हांरा ऊंठ ई आप आपरा बतावजो !”

गरीब मिनखां री दयनीय दशा देख मेहरदानजी हां भरली।

राज रां आदम्यां जोर दियो जणै लोगां कैयो कै “सा आ पूरी कत्तार वे होकां पी रैया है उणां मेहरदानजी बा री है, म्है तो फगत उणां रा आदमी हां !”

राज रा मिनख मेहरदानजी नै कैयो “बा ! ऐ पूरा ऊंठ आपरा है ?”

मेहरदानजी कैयो “क्यूं थांनै कोई वहम है ?”

“तो आप जोधपुर रा वासी हो ! अठै आपनै दाण भरणी पड़सी। “ राज रै मिनखां कैयो।

मेहरदानजी कैयो “म्हें तो चारण हां!! म्हनै भल़ै केहड़ो दाण ?”

बात बधगी। छेवट कई सिरदारां रै हस्तक्षेप सूं ओ संदेशो आयो कै मेहरदान धरम माथै राखर आप आप रै ऊंठां रो दाण नीं देवै बाकी साथै कोई होवो!! दाण भरणो पड़सी।

उण दिनां जैसलमेर माथै महारावल़ रणजीतसिंह रो शासन हो। राज री पूरी बागडोर इणां रै पिता अर नाचणै ठाकुर केशरीसिंह रै हाथ में ही।
मेहरदानजी कैयो कै “आ कत्तार चारणां री है अर इणरो मुख्य म्है हूं! चारण दाण मुक्त है। ”

दरबारी नी मानिया। दरबार कैयो कै मेहरदान नै छोडर दाण ले लियो जावै। आ बात सुणर मेहरदान कैयो कै “म्हारै साथै जिकी ई जात रो है! वो म्हारो भाई है ! दाण नीं तो म्है दूं अर नीं देवण दूं। “

छेवट बात इति बधगी कै साथलां रो दाण बचावण सारू मेहरदान गड़ीसर माथै धरणो दियो। दो दिन धरणो रैयो पण दरबार रै कोई फरक नीं पड़ियो। दूजै दिन, दिन बधतां ई मेहरदान जी धरणार्थियां नै छोड आपरी घोड़ी बैठ माड़वै टुरिया। नीं तो साथलां पूछियो अर नीं पूछण री हीमत होई!!

भखावटै मेहरदान री घोड़ी री पोड़ां सुण उणां री मा जागी। जितै मेहरदान जी आय पूगिया! मा मेहरदान जी नै देखतां ई कैयो
“लख लाणत है तनै ! चंदू रो भतीजो होय मोत सूं डरग्यो ! म्हनै मूंडो मत बताजै !”

मेहरदान जी कैयो “मा म्है थारो दूध पीयो है! मोत सूं डरू !! तैं म्हनै उण रात रो जनम नीं दियो ! म्है सवारै मोत सूं बाथै मिलूंलो सो थारी आशीष लेवण आयो हूं कै म्हारो काम सिग चढै अर लोग तैं माथै मोद करै का मेहरो इण दुथणी रो जायो हो !!”

मेहरदान जी री मा वछलता सूं मेहरदानजी नै देखियो जिणसूं उणां रै थणां सूं धार छूटी जको परिया ऊभां मेहरदान जी रै मूंडै में जाय पड़ी!

मा कैयो “जा बेटा !चारण जात नै ऊजल़ी कर !”

मेहरदान जी अजेज चढिया ! अठीनै दरबार धरणो उठावण सारु दबाव दियो ! धरणार्थियां रो मन काचो पड़ रैयो हो जितै मेहरदान पाछा पूगिया अर कैयो म्हें दाण नीं प्राण देवांला!!

तेलिया करण री तेवड़ी। राज रै मिनखां भंज घालियो जणै गड़ीसर माथै उतरी आंटिये टीकां वाल़ां री जमात सूं मेहरदान मदत मांगी।

बाबां कैयो “मेहरदान ! म्हें अठै फगत तीन दिन ठंभांला ! बोल थारी कांई मदत करां ?”

मेहरदान जी कैयो “आप तीन दिन तक म्हारी सड़ू (जहां दाह संस्कार होता है वह जगह व भस्मी) रुखाल़़ लिया। कोई विघन मत पड़ण दिया अर तीसरै दिन जावो जणै म्हारो जीराण चेतन करर जाया अर्थात म्हनै हेलो करर जाया !”

बाबां कैयो “ओ म्हारो वचन है! म्हें 140 संन्यासी जितै जीवता हां अर म्हांरी फुरण्यां सूं वायरो फरूकलै जितै थारी सड़ू रै कोई नैड़ो तो कांई, साम्हो ई नीं जोवैला !!”

गड़ीसर सरवर पास गढवी,
तास वसतर तेल।
आयस सातां बीसां आया,
बांध बगतर वेल।
तो जबरेलजी जबरेल,
जल़ियो मेहरो जबरेल।।
(आसूदान जी माड़वा)

तो किणी दूजै कवि लिखियो है-

आय गड़ीसर ऊपरै,
जुड़ियो महिपत जंग।
अमलां वेल़ा आपनै,
रेणव महरा रंग।।

धूड़ जी मोतीसर “चंदू माऊ रा छंद’ में लिखै-

भतीज मेहरो, गुमर गहरो,
करण चहरो कोपियो।
अजरंग अहरो जमर जहरो,
साज डहरो सोंपियो।
केसरी के’ रो डंड डेरो,
जादवै रो जाड़वै।
वड चरण वंदू शील संधू,
मात चंदू माड़वै।।

तीसरै दिन बाबां रै महंत गाय रो घी मेहरदानजी रै सड़ू में सींचर कैयो “अले भाई मेहरदान ! म्हें म्हांरो काम कियो अबै तूं थारो काम करजै !!”

कैवै कै उणी बगत एक ज्वाल़ा प्रजल़ित होई अर सीधी महल कानी संचरी। महारावल़ रणजीतसिंह गादी माथै बैठा चमक र उठिया अर कैयो कै “कोई रोको!! कोई रोको!! ओ मेहरदान आवै!! ओ मेहरदान आवै !!”

लोगां जाणियो कै दरबार नै वहम होयग्यो पण जोग री बात ही कै उणी बगत दरबार रो चित भमग्यो अर तीसरै दिन दरबार रो प्राणांत होयग्यो। इण बात रो इतियास साखी है। आ बात संमत 1921 जेठ सुदि नम री है। आज ई माड़वै में नम री तिथ मेहरदान जी री अगतै है-

सुकल़ वा नवम्मी जेठ री इकीसै,
संमत जिण उनीसै सोम साखी।
जूझियो जोर सुत धरम रो जोरवर,
रसा जसजोग वा बात राखी।।(गि.रतनू)

रणजीतसिंह रै पछै पाट माथै कई खोलै आया। किंवदंती है कै ‘मोती महल’ म़े रात रा मेहरदान जी रै होकै री गड़गड़ाट सुणीजती रैवती। जिणसूं महल मे सणणाटो रैवतो। मोती महल रो एक कमरो आज ई मेहरदान रै डर सूं बंद पड़ियो है। छेवट गिरधरसिंह जी री बगत सांगड़ रा लाछांबाई दरबार नै सलाह दीनी कै गोरहर छोडर महल री जागा मंदिर नाम राखो अर निवास करो जणै जायर थोड़ी शांति बापरी।

मेहरदान संढायच गरीब मिनखां अर शरणागतां सारू निःस्वार्थ भाव सूं तेलिया करर चारण चरित्र री चंद्रिका नै चोताल़ै चावी करग्या-

मैर संढायच माडवै, केव्या रै सिर काल़
धरमावत सारी धरा, भारी प्रभता भाल़!!(गि.रतनू)

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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