मैं जैसी तेरी मा वैसी ही जालमे की

गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा कि परहित ही धर्म है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना ही पाप है। धर्म और पाप की इस सरलतम परिभाषा को जिन्होंने आत्मसात किया उन्होंने ही अपना इहलोक व परलोक धन्य किया।

जब हम हमारा लोक कंठाग्र साहित्य का श्रवणपान करते हैं तो ऐसे अनेक उदात्त उदाहरण हमारे समक्ष उभरकर आते हैं जिन्हें हम हमारे क्षुद्र स्वार्थों के वशीभूत विस्मृत कर चुके हैं लेकिन निस्वार्थ भाव से अपना कार्य करने वाला लोकमानस ऐसी गर्विली गाथाओं को अपने हृदय में संजोकर भावी पीढ़ी को हस्तांतरण कर मंगलकारी कार्य कर परमसंतोष की प्राप्ति मानता है।

ऐसी ही एक घटना है, लोकहितार्थ अपना तन अग्नि को समर्पित करने वाली अमरां माऊ की।

अमरां माऊ का जन्म वि. की उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में कोडां गांव के रतनू हरदासजी धनजी रां के घर हुआ था। अमरां माऊ का ससुराल पुसड गांव में था। पुसड़ में मीसण जाति के चारण हैं। पुसड की सीमा धारवी गांव से लगती है और धारवी खाबड़िया राठौड़ों का गांव है। यहां के निवासी होने के कारण यह धारोइया कहलाते हैं।

पुसड के चारण धनवाल़ तो थे ही साथ ही खेती भी खूब करते थे लेकिन आए चौमासे सूरो और कलो धारोइयो इनके खेतों में उजाड़ कराते थे जिसके कारण हमेशा विवाद रहता था। ऐसे करते-करते लंबा समय व्यतीत हो गया लेकिन ये धारोइया नहीं मानते थे। चारण हमेशा चौमासे में इन्हें ‘थांनै जोगमाया देखसी’ कहकर हारकर बैठ जाते थे।

क्योंकि धारोइया समर्थ थे, संख्याबल में भी अधिक थे ऐसे में नगण्य चारण उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर पाते थे। वैसे भी कहा गया है कि बल बिना बुद्धि बापड़ी है। एक समय तो ऐसा भी आया कि पुसड वासियों ने धारोई की तरफ खेती करने का विचार ही त्याग दिया लेकिन अमरां माऊ ने उन्हें कहा कि-
“खेती करना नहीं छोड़ सकते क्योंकि ‘ऊंदरै रो जायो तो बिल ई खोदसी।’ उन्होंने खेती की लेकिन धारोइयों ने अपनी निष्कृष्टता नहीं छोड़ी।

अमरा माऊ के पति पुसड के मुख्य जमीदारों में थे। उनके घर हल़ी-बाल़दी सब थे। तत्कालीन रीति अनुसार उनके घर में वजीर भी थे। उनके एक वजीर का नाम था जालमा।

जालमा अमरां माऊ के पुत्र के सम आयु था। जिसे अमरां माऊ पुत्रवत ही मानती थी। यानी जालमा उन्हें बहुत प्रिय था। जालमे ने भी अपनी खेती कर रखी थी। एक दिन वो अपने खेत गया तो उसने देखा कि धारोइयों की मवेशी हरभरे खेतों में चर रही थी और थोड़े दूर सूरा और कला दो चार धारवी के आदमियों के साथ बैठे आराम से हथाई कर रहे थे। जालमा ने अपने खेत में इस तरह मवेशी को बिगाड़ करते देखा तो उसने गालियां देते हुए वित्त को हांकना शुरु कर दिया। जब जालमा को गालियां निकालते व मवेशी को हांकते देखा तो मदांध धारोइयों ने जालमा को टोका कि-
“वो धन को तगड़ै नहीं। अपनी औकात को समझें और जिस मार्ग आया है उसी मार्ग चला जाए।”

जालमा ने भी कहा कि-
“थोड़ा ईश्वर से डरें, राजपूत हैं तो राजपूतों जैसा व्यवहार करें। अगर बाड़ ही खेत को खाएगी तो रक्षा कौन करेगा? थोड़ी हया-दया रखो।”

यह कहकर जालमा ने पुनः मवेशियों को तगड़ना शुरु किया तो धारोइयों ने आकर जालमा को पीटना शुरु कर दिया। उनकी मार से जब जालमा अर्द्धमूर्छित होकर धरती पर गिरा तो वे वहां से भाग छूटे।

जब यह हृदयविदारक समाचार अमरां माऊ के पास पहुंचा और लोगों ने बताया कि अब जालमा ज्यादा समय बचना मुश्किल है। उन लोगों ने इतना पीटा है कि बेचारा पड़ा खेत में तड़फ रहा है। ऐसा सुनते ही अमरां माऊ की क्रोधाग्नि जाग उठी। उन्होंने कहा कि-
“जालमा को मारने वालों को नवलाख पहुंचेगी। उसकी हाय से ये दुष्ट समूल रूप से मिट जाएंगे। मुझे मा हिंगलाज का आदेश हो गया कि मैं अब जमर की ज्वालाओं में स्नान कर नवलाख के समूह में सम्मिलित होऊं।”

इतना कहकर अमरां माऊ तीव्रगति से वहां पहुंची जहां जालमा वजीर अंतिम श्वासें ले रहा था। उन्होंने जाते ही जालमा का सिर अपने खोल़े में रखा और क्रोध तथा करुणा के मिश्रित स्वर में कहा कि-
“अरे डीकरा! ई दुष्टां सूं माथो क्यूं लगायो। तूं खेत की तरफ आया भी तो मुझे बिना बताए। मैं तेरा मरण निर्रथक नहीं जाने दूंगी। इन दुष्टों ने अति करदी है। काल़ींदर की पूंछ पर हाथ रखा है। ये भूल गए थे कि तपियो भाठो तेड़ देवै।” वो आगे कुछ कहती उससे पहले ही पीड़ा से कराहते हुए जालमा ने अमरां माऊ की गोद में अंतिम श्वास ली।

यह करुणार्द्र दृश्य देखकर अमरां माऊ ने पास खड़े लोगों से कहा कि जमर की तैयारी करो। मैं जालमा को गोद में लेकर जमर करूंगी। यह सुनकर पास खड़े अमरां माऊ के किसी कौटुम्बिक किशोर ने कहा कि-
“माऊ! क्या पागलों सी बहकी बहकी बातें कर रही हैं। माना जालमा आपका प्रिय वजीर था लेकिन फिर भी था तो वजीर ही। आप तो ऐसी करुणार्द्र हो रही है मानो ये आपका वजीर न होकर आपका पुत्र हो।”

यह सुनकर अमरां माऊ की भ्रगुटियां तन गई। उन्होंने उस किशोर से कहा-
“जा रे! काला जैसी मैं तुम्हारी माऊ हूं, उसी प्रकार इस जालमे की भी माऊ हूं। इसको मारने वाले आराम से रहे तो मेरी शक्ति साधना में धूड़ है। जालमा को मारने वालों को मेरी लोवड़याल़ पहुंचेगी। मैं जालमा को गोद में लेकर जमर कर रही हूं ताकि आगे यह सनद रहे कि चारण अपनी संतति और रैयत में कोई भेद नहीं मानते। मेरा जमर जागृत रहे इसका ध्यान रखें। अगर जमर में बारहवें दिन जाल वृक्ष प्रस्फुटित हो जाए तो मान लेना कि सूरा और कला के अत्याचारों व इनकी खुद की अंतिम घड़ी आ पहुंची है।”

इतना कहकर अमरां माऊ ने जालमा को गोद में ले जमर कर परहित की भावना को पोषित ही नहीं किया अपितु अपने नाम के अनुरूप अमर भी कर दिया।

आज भी इस बात की साक्षी में पुसड की कांकड़ में अमरां माऊ की मूर्ति गहडंबर जाल की छाया में अन्याय के प्रतिकार स्वरूप अडिग खड़ी है।

।।अमरां माऊ रा दूहा।।
माडधरा चावी मुदै, जस कोडा घण जांण।
अवतरणी अमरां अठै, मह कुल़ बाधो मांण।।1
चरित विमल़ जस चौखल़ै, हितवां दैण हुलास।
भाग वडा धर भांणवां, आई सँपूरण आस।।2
धिन कोडां ऊ धरतरी, रतनू व्रन रैवास।
अमरां जनमी आय उथ, हेर घरे हरदास।।3
परणाई पितु प्रेम सूं, पुत्री धरा पुसड्ड।
गाय भैंस गघ थाट घण, मन सुध देयर मड्ढ।।4
पूसड रा मीसण पुणां, धिन चारण धनवाल़।
कर खेती किरसण विभो, पिंडां पौरस पाल़।।5
धर पासै है धारवी, राड़गरा रजपूत।
खेत भिल़ावै खाग बल़, धरम शरम छड धूत।।
पुल़छ भेल़ावै पापिया, भर चौमासै भाल़।
धारै नहिं धारोइया, करै सुकाल़ां काल़।।7
पच चारण थकिया परा, हियै धारली हार।
विघनगारां सूं वादियां, पड़ै न एकण पार।।8
मह जस मेट्यो माल रो, पोता हुवा कपूत।
धूड़ उडाई धारवी, रीत तजी रजपूत।।9
सूरो सिटल़ो सांपरत, कल्लो साव करूर।
खूटल खावड़िया उठै, जो हद नीच जरूर।।10
एक आसरो अवन इण, रिदै भरोसो राख।
चित सुध कहियो चारणां, न्याय करै नवलाख।।11
ईहग घरां में अम्मरां, अबंका जोड़ै आप।
जोत करै जगतंब री, जपती माल़ा जाप।।13
जिणरै चावो जालमो, बाल़क समो वजीर।
ममता दे पाल़्यो मुदै, घर दे लाड गहीर।।14
जिको खेत ग्यो जालमो, हिव धर हिरदै हेत।
भैंस्यां देखी भेल़तां, खड़ियोड़ो निज खेत।।15
आंख्यां देख उजाड़ ओ, आई रीस अचांण।
जोरां बोल्यो जालमो, कर कर रीस कुबांण।।16
मदछकिया धर मछर मन, खार भल़ै घण खाय।
धूत साथ धारोइया, अड़्या जाल सूं आय।।17
बोतां बल़ निज बांह रै, जद फिर तज्यो जमीर।
ज्यांसूं लड़तो जालमो, बहियो सुरग वजीर।।18
सुणियो अमरां निज सदन, खत्र्यां तज्यो खमीर।
मोथां निखुनो मारियो, विदगां तणो वजीर।।19
ममता उमड़ी मातवत, चख भहिया व्रन चोल़।
जमर करण जद जांमणी, इम मग बही अडोल़।।20
पूत समोवड़ पाल़ पख, जालम रो जगतंब।
खोल़ै ले बैठी खमा! अंग न्हाई झल़-अंब।।21
अरियण मर खूटा अवन, भटक्या चित भरमाय।
अमरां जस नित आपरो, वरणै कवी बणाय।।22

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी
कथा सूत्र – रेवंतदानजी देथा पुसड

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