म्हारै कानां रा लोल़िया तोड़ै! तो तोड़ लेई!!

बीकानेर रो सींथल़ गांम रोहड़ियां रो कदीमी सांसण। सांसण गांम में राज रो कोई दखल नीं अर जै कोई राज रै जोम में दखल देवण री कोशिश करतो तो सोरै सास उठै रा वासी इण बात नै सहन नीं करता अर आपरो ठरको कायम राखण नै मर पूरा देता। ऐड़ी ई एक बात है सांसण गांम री टणकाई सारू मरण अंगेजण री।

बात उण दिनां री है जिण दिनां बीकानेर माथै महाराजा रतनसिंह रो शासन हो। उणां री सेना में रिड़मलसर-सागर रो एक सिपाही-मुसल़मान नूरदीन किणी छोटे-मोटै पद माथै चाकरी करतो। वो एक दिन आपरै दस-पंद्रह जिणां साथै बैतो सींथल आयो अर विंसाई खावण सारू ठंभियो। उणी बखत रुघाराम नाई रछानी (नाई का समान) लियां कनैकर निकल़िया। नरदीन उणांनै हेलो कियो कै – “इनै आ रे!”

रुघजी कनै आयो अर पूछियो कै – “हां कांई कैवो?”

“ले पैला म्हारै दाड़ी कर पछै आगै जाई!!” नूरदीन कैयो तो रुघजी पाछो कैयो-
“म्हारै कनै तो एक ई पाछणो है!, दूजो पाछणो नीं है!! अर इण पाछणै सूं म्है, म्हारै धण्यां टाल़ किणी री दाड़ी नीं करूं अर पछै थारी तो अंकै ई नीं!!”

आ सुण र नूरदीन नै रीस आयगी अर वो तमतमार उठियो अर एक लपड़ रुघजी रै बावतो बकियो कै – “म्हनै जाणै कै म्है कुण हूं ? म्हारै सूं ऊपर धणी कुण है? राज रै मिनखां ई नीं सदरै!!”

लपड़ खाय रुघजी सीधा मूल़ां रै बास में आया। उणां नै उण बखत हड़वंतसिंह मिलग्या। हडवंतसिंह होवता मोटयार हा सो रुघजी जाणियो कै इण टाबरियै नै तो कांई कैवूं ? किणी बूढियै नै कैवूं कै म्हारै साथै कांई होयो है!!

जितै तो हड़वंतसिंह री मींट रुघजी री बिखर्योड़ी दाड़़ी, खिंड्योड़ी पाघड़ी अर रछानी रै तूटोड़ै कसै माथै पड़़ी अर उणां पूछियो कै – “रुघा बाबा आज इयां कियां? कांई होयो?”

“होयो तो घणो ई है पण थे टाबर हो सो किणी दानै मिनख नै बतायां ई कोई बात बणसी!!”
रुघजी कैयो जणै उणां पाछो कैयो –
“हमे हूं कांई रो टाबर हूं ? थे म्हनै हाथां सूं परणायर लाया हो!! अर जे अजै ई टाबर मानो तो पछै चारण री बेटी नै क्यूं लारै लाया?”

आ सुणर रुघजी कैयो -“एक राज रो मुसल़ो आयोड़ो है सो म्हारै लपड़ बाई!” अर उणां धुरामूल़ सूं पूरी बात बताई।

बात पूरी सुणी ई नीं अर उणां कैयो कै –
“इण हरामखोर री मोत आई दीसै सो थांरै माथै हाथ उठायो। कठै है ? हालो।”

रुघजी कैयो कै-
“अरे हुकम! वे दस-पंद्रह जिणा है अर थे एकला! भल़ै कोई नै हेलो करां!!”

“नीं थे तो आवो रा” कैय हड़वंतसिंह अजेज उठै पूगिया जठै वो आपरै आदमी सूं उगाड़ो मालिस करावै हो। हड़वंतसिंह थोड़ी करी न घणी सीधी तड़ी बाई सड़ंद दैणी वो कीं समझतो जितै दूजोड़ी भल़ै बुई तडंद दैणी अर हड़वंतसिंह बोल्या कै-
“हराम रा पिल्ला! रुघै बाबै रै हाथ लगावै ! म्हे मरग्या! म्हांरो ई गांम अर म्हांरै ई आदमी नै कूटै?”

जितै बीच बिचाव कर लोगां हड़वंतसिंह नै ठंडा मीठा घातिया।

नूरदीन रै जीव में जीव आयो जणै वो खार खाय बोल्यो कै-
“म्हनै जाणै ! म्हारो नाम कांई है ? राज रो मिनख हूं !!”

आ सुण उणां पाछो कैयो – “जा रे पिल्ली! अठै राज हूं ई हूं! म्हांरै माथै भल़ै कैड़ो राज? जा म्हारै कानां रा लोल़िया तोड़ावै तो तोड़ा लेई!! म्हारो नाम हड़वंतसिंह है ! बता देई किणी राज नै जे नव री तेरे करतो होवै तो!!”

नूरदीन खार खाय ओठी मेल बीकानेर संदेसो करायो कै इणगत एक धोल़ै मूंडै रै छोकरिये म्हारो अपमान कियो सो इणांनै पाधरा करण सारू भल़ै आदमी मेलो। राज सूं पाछो संदेशो आयो कै – “उठै गयो ई क्यूं? उठै कांई खालसो देख्यो!! वो तो सांसण है उठै राज रो कोई उजर नीं सो थूं अबोलो पाछो आवरो।”

वो मूंडो पिलकाय पाछो गयो परो पण उणरी दध नीं मिटी।

जोग नै कुण टाल़ै बेगोई पाछो कुजोग बणियो। बात यूं बणी कै जद रतनसिंह कुंवर-पदै हा जद देशनोक करनीजी रा दरसण करण गया। उणां आपरै पीवण सारू पाणी लावण देपासर कुए माथै आदमी मेलिया अर कैयो कै ‘साम्है बारै’ (सीधे चड़स से ही) सूं कलश भर लावो ताकि कुंवरजी अरोगै। हाजरियां जाय गोसी (कुए के बाहर चड़स के पानी को खाली करने वाला) नै कैयो कै “सीधै बारै सूं ई कलश भरदो ताकि कुंवरजी अरोगै।” आ सुण गोसी कैयो “भाया अठै भलांई कुंवरजी होवो ! भलांई भंवरजी!! सगल़ा समवड़ (बराबर) है ! अठै सीधै बारै सूं कल़श फखत दादी मा (करनीजी) रै पूजन सारू ईज भरीजै बाकी किणी रै नीं! ओ पड़ियो धाफ (कुए के पीने योग्य पानी को रखने की वर्गाकार कुंडी) में पाणी भरले।”

हाजरिये सीधै जाय कुंवरजी नै कैयो –
“हुकम ऐ तो पाणी ई नीं भरण दे। आ तो आपरी हुकम अदूली है। कीं आंख बतावो चारणां नै, माथै घणा चढग्या है!”

आ सुण कुंवरजी कैयो कै “हणै तो हूं कीं नीं कर सकूं पण राजा बणियो उण दिन देखसूं! पूरो आफरो झाड़ देसूं।”

महाराजा सुरतसिंह वि.सं.1885 में सुरगवास होया अर रतनसिंह गादी बैठिया। आठ साल पछै उणी नूरदीन याद अणाई कै- “आप देशनोकियां री अकड़ मेटण री कैता नीं सो कद मेटोला ?”

दरबार कैयो – “जरूर मेटसूं ! म्हारो ई कल़श नीं भरै! ऐड़ा कैड़ाक त्रिसींघ है?” उणां कैयो कै “फलाणै दिन देशनोक माथै जावो अर गांम नै लूंटलो!!”

चारणां रै गांमां में आ खबर रातोरात पूगगी सो पूरै बीकानेर रा चारण देशनोक भेल़ा होया अर तय कियो कै पैली बात तो आ कै दरबार नै अकल आ जावैला छतापण नीं आई तो अकल अणावलां अर इण पछै ई नीं आई तो मर पूरा देवांला। आ खबर हरसोल़ाव (नागौर) ठाकुर अजीतसिंह कनै ई पूगी तो वे ई सनातनी प्रीत रै कारणै देशनोक आय चारणां भेल़ा होया। जद इण पूरी बात री खबर दरबार कनै पूगी कै “चारण कटारी खाय मरैला उणां सूं पैला हरसोल़ाव ठाकर अजीतसिंह ई चारणां भेल़ो ईज मरैला।” तो दरबार मतो बदल़ियो अर आपरै आदम्यां नै लारै रो लारै ओठी मेल कैवायो कै ओरण में पग मत दिया ! पाछा आवोरा।”

अजीतसिंह री इण ऊजल़ी प्रीत री साख भरतां किणी कवेसर लिख्यो है-

चांपावत नै चारणां, पैला भव री प्रीत।
मो ऊभां नह मरण दूं, यूं कह कमध अजीत।।
जंगल़धर रो पातसा, रूठो राव रतन्न।
उण वरियां तूठो अजो, मेर जेम वडमन्न।।

ओठी आय संदेश दियो जणै किणी कैयो कै “पाछा कांई हालां ? देशनोक अर दासोड़ी री एक ई राशि है। उणां माथै हालां रा!!” जणै उण नूरदीन कैयो कै – “दासोड़ी रा चारण तो रतनू है ! इणां रा गिनायत है। वे तो निर्दोषा है। ऐ कनै ई इणां रा भाई सींथल़िया बैठा है नीं! निरभागा कल़ै रा मूल़! कनलै-कनलै गांमां रै आक चोय राख्यो है तो क्यूं नीं थोड़ी पाण उणांरी उतारदां। हमे चढ्योड़ा पाछा बीकानेर कांई हाला?”

घोड़ा सीधा सींथल़ माथै आया अर गांम रा सगल़ा बड़ण रा मारग रोक दिया। उण बखत घणाकराक मिनख देशनोक मढ में हा अर मूल़ां में हणवंतसिंह अर नगाण्यां में खूमजी सैति थोड़ाक आदमी ई गांम में हा।

हड़वंतसिंह वीर अर साहसी मोटयार हा। उणांनै डर तो किणी बात रो नीं हो। वे आपरै नायकां (भील) साथै डूंगरेच रै मढ (जको मूल़ां रै बास में हो अर अठै खेतसिंह मूल़ा री हवेली ही) में मोरचो लेय मुकाबलो कियो।

रीठां बाजी। चारणां कनै सोर निवड़ियो इनै बीकानेरियां हवेली नै गोल़ां सूं पटकी।

सेवट नगाणियां रै बास में रायभांणजी री जोड़ायत ‘गरवी माजी’ (नाम ठाह नीं) जिकै खींदासर रा गरवी (रतनुवां री एक उपशाखा) हा उणां पीपल़िये गवाड़ में जमर कियो। अगन झाल़ां में सांपड़ (स्नान) आपरै कुल़ गौरव नै मंडित कियो। इण जमर री रुखाल़ी रो जिम्मो खूमजी नगाणी कनै हो जिकै बीकानेर कानी सूं छूटी गोल़ी सूं वीरगत वरी। बीकानेरियां जमर नै भ्रष्ट कियो पण अठीनै करनीजी रै मढ आगै मूल़ां रै बास रा प्रभुदानजी री जोड़ायत लाल़स चतरू माजी (ढाढरवाल़ा री धीयारी) जमर कियो। इण जमर री रुखाल़ी रो जिम्मो खुद हड़वंतसिंह कनै हो।

वीठू मूल़ैजी री परंपरा में प्रतापजी अर प्रतापजी री वंश परंपरा में नारायणसिंह होया अर इणां री संतति में पदमसिंह होया। पदमसिंह रै घरै वीर सपूत हड़वंतसिंह रो जनम होयो।

जद लाल़स माजी जमर बैठा उण बखत हड़वंतसिंह कनै ऊभा हा। जितै परिया ऊभै उण नूरदीन कैयो – “हड़ा! जे आज थारै कानां रा लोल़िया नीं तोड़लूं तो म्हनै फिटकार कैयी।”

इतरी सुणतां ई इण वीर आपरी बंदूक ताण घोड़ो दाबियो पण बंदूक छूटी नीं जणै उणां आपरी कटारी काढ आपरै शरीर रो मांस छून-छून इण जमर री अगन में प्रजाल़ियो। सेवट उणांनै लागो कै शरीर में हमे अंकै ई पाण (शक्ति) नीं रैयो जणै उणां आपरी मा सरूपा काकी ‘लाल़स माजी’ रै खोल़ै में बैठ खुद नै ई जमर में होम इण अन्याय रै विरोध में किए समर में अमरता वरी-
किणी कवेसर लिख्यो-

चतरू चेल़ो चारणां, अंतस तोसूं काज।
मरण कियो झल़ मंगल़ां, लाल़स व्रन री लाज।।

उण बखत बमुसकल हड़वंतसिंह री ऊमर उगणीस-बीस वरस ही पण मन रो मरट अर रजवट रो वट रुखाल़ण री ऊरमा वंदनीय ही। आ घटना वि.स़ 1893 रै बैसाख सुदि नवमी री है। इण जमर नै बीकानेर रा आदमी भ्रष्ट नीं कर सकिया। क्यूंकै इण रा रुखाल़ा हड़वंतसिंह रा स्वामीभक्त नायक हा। आठ-दस नायक काम ई आया पण जमर री रुखाल़ी में कोई खामी नीं आवण दी।

इण जमर नै उण बखत रै केई कवेसरां बखाणियो। रुघजी रतनू दासोड़ी आपरी रचना ‘रंग रा दूहा’ में लिखै-

हड़मंतै हड़मंत ज्यूं, वडहथ आंकै वार।
दुनिया सारी दाखवै, जाझा रंग जूंझार।।
रावल़ राणा राजवी, अमलां वार अभंग।
पदमावत सारी प्रिथी, रहै हणूंता रंग।।

किणी दूजै समकालीन कवि लिख्यो है-

राव रतनसा कोपियो, त्यार किया तुरकाण।
मन साचै मिल़ियो मतै, रंग हो रोहड़राण।।

परवर्ती कवियां ई इण सुजस गाथा नै गरबीलै आखरां में गुंफित कर खुद नै धिनधिन किया।

‘वीर मेहा प्रकाश (मेहा मांगलिया पर प्रबंध काव्य) रा प्रणेता जसूदान वीठू लिखै-

राह-चहूं नगर परवेस रा रोकिया,
झोकिया ससत्रां मढ झीको।
रोपिया पाव हणंवत रणखेत में,
फेट सुत पदम कमधेस फीको।।
—–
सेल-अणियां घण दुनाल़ां साजिया,
भाजिया घोर सुण सोर भुखी।
जोगतो जाब जद दे दियो जोगणी,
चिता चढ चारणी नहीं चूकी।।
—–
पाय परमोद सुत गोद में पैठियो,
बैठियो जल़ेबा साथ बेटो।
साथ सखियात उण रात सप्रस होयो,
खटक कर कमध सूं करण खेटो।।

कैयो जावै कै जद आ अजोगती खबर बीकानेर पूगी तो दरबार रै हिंयाबूझी आयगी। ओ काम दरबार री बिना रजा अर बिनां ठाह होयो। पण होयो बो अणहोयो होवै नीं सो दरबार नै रात री नींद आवणी बंद होयगी। रात रा जमर री झाल़ा अर हड़वंतसिंह रो कटारी लियां दरसाव होवै।

जद उणां विद्वान बांमणा नै बुलाय इण आफत रै निवारण रो कारण पूछियो, जणै पंडां कैयो कै इणां रो कोई स्वगोती गयाजी जाय पिंड सराय आवै तो इण हड़वंतसिंह री कल़ा जाती रैवैला। दरबार सींथल़ रै मूल़ां रै बास सूं किणी लालची चारण नै बुलाय गयाजी मेलियो अर बदल़ै में जमी दैणी करी। आज ई सींथल में बात चालै कै ‘उण लालची’ नै पूरै मारग आवाज सुणीजती रैयी कै – “काका ओ नाजोगो काम मत कर।” पण वो नीं मानियो अर गयो। जसूदान वीठू लिखै कै उण खुटल रै लारै वंश नीं चालियो-

गोत रो पात पिंड्डांण घालै गयो,
दया न हुवै कुल़हीण दरसै।
लियो जो धन गियो गढ लार में,
गमै धर नाम कुल़ गाम घरसै।।

इणी जसजोग घटना माथै इण ओल़्यां रै लेखक लिख्यो-

रतनेस लही अपकीरत राजन,
वीरत रोहड़ तैंज वरी।
सच तीरथ रूप हुवो धर सींथल़,
कीरत खाटण बात करी।
रतनू कर जोड़ रच्यो कव रूपक,
कांन करै कवि गीध कयो।
पुरखां तण वाट बुवो पदमावत,
लाट हड़ू जस नाम लियो।
जयो कीरत खाटण काम कियो।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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