म्हारै ऊभां मेड़ते पग देवै ! ऐड़ो कुण?

राजस्थान रै मध्यकालीन वीर महेसदास कूंपावत री अदभुत वीरता विषयक बात घणी चावी है पण आ बात कमती लोग जाणै कै जद मराठां मारवाड़ माथै हमलो कियो उण बगत महाराजा विजयसिंह सूं मारवाड़ रा केई मोटा सिरदार नाराज हा। दरबार नैं सूचना मिल़ी कै माधोजी सिंधिया आपरै दल़-बल़ सैती आयो है अर मेड़तै में उणरा डेरा है। दरबार डाफाचूक होयग्या। क्यूं कै सिंधियां री झाट झालणिया तो रूठोड़ा है अर दरबार उणांनैं किण मूंडै सूं आ सूचना देवै कै मारवाड़ आफत में है!

उण बगत उठै मथाणिया रा बारठ गिरधारीदान ई विराजियोड़ा होता। उणां दरबार नैं कैयो “आप इण बगत मेड़तै किणनै मेलणा चावो?”

उणां कैयो “म्है जिणांनैं मेलणो चावूं वै म्हारै सूं रूठोड़ा है ! आवै नीं।”

गिरधारीदानजी कैयो “हुकम पिंडां आवण रो कैवै अर राठौड़ आवै नीं ! आ कदै ई होवै? आप रुको मंगावो अर नाम बताओ। रुको पूरो पढैला नीं उणसूं पैला घोड़ा जोधाण कानी बड़गड़ैला। जोधाण जैड़ो आपरो वैड़ो ई उणां रो। पछै कीं म्हांरो ई है। म्हनै भरोसो है, पिंडां नचीता होय नाम बताओ?”

दरबार कैयो “आप तो आसोप ठाकुर महेसदास अर पलीणा ठाकुर भीमराज नै बुलाय सको तो बुलावो!”

“हुकम आप फरमावो म्है लिखूं अर पछै राज रा रजपूत नीं आवै ! आ तो म्है सुपनै में ई नीं सोच सकूं!” गिरधारीदानजी दोनूं ठाकुरां नैं जिण भावां अर सबदां में दूहा लिखिया वै आज ई लोक रसना माथै कवि री सबद साधना रो पतियारो दिरावै। (बिना ठाह केई लोग इण दूहां नैं विजयसिंहजी रा कथिया मानै) भाव दरबार रा अर सबद गियधारीदानजी रा।

ठाकुर महेसदासजी नैं कवि लिखियो :

दिखणी आयो सज दल़ां, प्रथी भरावण पेस।
कूपा तो विण कुण करै, म्हारी मदत महेस।।
सुख महलां नह सोवणो, भार न झल्लै सेस।
तो ऊभां दलपत तणा, (म्हारी)मुरधर जाय महेस।।

घणा दूहा है पण विस्तार भय सूं इता ई ठीक रैसी। इणीगत कवि भीमराजजी पातावत नैं लिखियो –

मारहठै हठ मांडियो, लूटण मुरधर लाज।
चढियो सो नह चूकसी, सिंधियो माधवराज।।
सीस रखै तो नाक तज, नाक रखै तज सीस।
भीमा जो मन भावती, लिखदे मुरधरधीस।।

“हे भीमराज ! जे सीस राखणो चावै त़ नाक तज अर जे नाक राखणो चावै तो सीस तज दे।”

इतियास साखी है कै ऐ दोनूं वीर अजेज जोधपुर आय झगड़ै रा मांझी बणिया। कवि केसरोजी खिड़िया आपरै एक गीत में महेसदास री गर्वोक्ति नैं कांई सतोलै आखरां मे कही है:

मुचण पाटण तणो कदै जाणो मती
गरब खाटण तणो आद गुणछै।
मो जिसां नरां ऊभां थकां मेड़तै
कांकड़ां पाव दे इसो कुणछै।।

अठीनैं मराठां रो फ्रांसिसी सैनापति डिवोयम आपरी तोपां रा गोल़ा वरपावै तो अठीनैं रणबंका राठौड़ आपरी तरवारां सूं रीठ बजावै। सूरां रै मन मरण रो कोई भय नीं। अदम्य साहस, वरेण्य वीरता अर मारवाड़ री मरजाद नैं अखी राखता केई राठौड़ वीर इण लड़ाई में काम आया केई नाजोगां मरण भय सूं बांठां पग दिया पण महेसदासजी कैयी वा कर बताई अर देश रै कारण महेस, मसेस री माल़ा रो सुमेरु बणियो।

गिरधारीदानजी रै आखरां में-

मेस कहै रै मेड़तै, साची साख भरेह।
कुण भिड़सी कुण भाजसी, देखै जिसी कहेह।।
दूजां ज्यूं भागो नहीं, दाग न लागो देस।
वागां खागां वांकड़ो, मह वांको महेस।।

किणी कवि कैयो है कै तोपां रै खोफ सूं जठै दूजा डर र नाठग्या उठै महेसदास पग रोप लड़ियो अर वीरगति वरी –

मेड़तै भागलां साथै न भागो महेस।।

पण जेड़़ो कै कैताणो है ‘राजा जोगी अगन जल़, ज्यांरी उलटी रीत।।’ ज्यूं ई लड़ाई खतम होई अर वीर जोधाण पूगा तो जिकै नाठग्या वै पैला आय बधाई दी अर जीत रो श्रेय लियो अर महेसदास रै बेटै रतनसिंह रै पेटै उलटी पाटी पढाय भिड़ा दिया।विजयसिंहजी, झगड़ै में नाठणियै कूंपावत जगरामसिंह नै आसोप देय दी। रतनसिंहजी, विजयसिंह री बोदी नीत नैं आछी तरै जाणता सो वै सीधा बीकानेर आयग्या। बीकानेर दरबार उणां नैं घणै आघ साथै राखिया।

जोग सूं एक दिन जोधपुर रो दरबार जुड़ियोड़ो। वीरता अर स्वामीभक्ति री बातां चालै। किणी सूर कैयो कै दरबार रै खातर ओ खोल़ियो हाजर है। उण बगत उठै बैठै किणी चारण कवि (संभवतः गिरवरदानजी सांदू भदोरा) ऊभै होय सिरदारां नैं संबोधित करतां कैयो कै “अठै मरण री जरूत नीं है अठै तो जुद्ध में नाठणियां नैं जागीर मिलै!” इतरी सुणतां ई दरबार आंख डेढी करर बोलिया “क्यूं बाजीसा आ कीकर कैयी ? है ऐड़ो कोई दाखलो।” कवि बिनां शंकै उठै बैठै जगरामसिंह नैं इंगित करर ओ दूहो सुणायो –

मरज्यो मती महेस ज्यूं, राड़ बिचै पग रोप।
झगड़ै में नाठो जगो, इण पाई आसोप।।

दरबार नैं ज्यूं ई खारी बात रै मिस खरी बात रो ठाह लागो तो उणां हाथोहाथ बीकानेर सूं रतनसिंह नैं बुलाय आसोप पाछी दी।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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